भारतीय समाज की शास्त्रीय दृष्टिकोण से व्याख्या कीजिए - bhaarateey samaaj kee shaastreey drshtikon se vyaakhya keejie

हिन्दू समाज में करीब चार हजार वर्ष पूर्व ही कुछ समाज चिन्तकों ने यह अनुभव किया कि व्यक्ति और समाज की प्रगति उस समय तक सम्भव नहीं है जब तक लोगों को जीवन के मूलभूत तथ्यों से परिचित नहीं कराया जाता। जब तक उन्हें अपने कर्त्तव्यों की जानकारी प्रदान नहीं की जाती और जब तक दायित्वों का निर्वाह करने हेतु उन्हें कोई प्रेरणा प्रदान नहीं की जाती। 

सामाजिक जीवन को संगठित बनाये रखने की दृष्टि से यह सब कुछ आवश्यक समझा गया। लोगों के सम्मुख ऐसा जीवन-दर्शन रखा गया और इस प्रकार की सामाजिक योजना बनायी गयी जिसने सामाजिक जीवन को संगठित बनाये रखने में योग दिया। 

इसी उद्देश्य की पूर्ति हेतु भारतीय समाज को दो प्रमुख आधारों पर संगठित किया गया, जिनमें से प्रथम दार्शनिक आधार तथा द्वितीय संगठनात्मक आधार है। दार्शनिक आधार के अन्तर्गत उन सिद्धान्तों को महत्ता प्रदान की गयी, जिन्होंने व्यक्ति के जीवन को परिष्कृत कर उसे उसके लक्ष्यों एवं कर्त्तव्यों से परिचित कराने में योग दिया। 

संगठनात्मक आधार के अन्तर्गत वे सामाजिक योजनाएँ आती हैं। जिनके माध्यम से व्यक्ति और समूह के जीवन को इस प्रकार विभिन्न इकाइयों में बाँटा गया कि उनकी योग्यता और कार्यक्षमता का पूरा-पूरा लाभ उठाया जा सके। अब हम यहाँ इन दोनों आधारों का संक्षेप में उल्लेख करेंगे। 

(I) दार्शनिक आधार - मौलिक विशेषताएँ

दार्शनिक आधारों में पाँच आधार प्रमुख हैं। जिन्होंने सामाजिक जीवन को संगठित बनाये रखने और व्यक्ति को पग-पग पर उसके कर्त्तव्यों का बोध कराने में सहायता पहुँचायी। ये आधार निम्न प्रकार हैं

(1) धर्म - हिन्दू सामाजिक जीवन में धर्म का प्रमुख स्थान है। हिन्दुओं का सम्पूर्ण जीवन धर्म के इर्द-गिर्द घूमता है। एक हिन्दू प्रातः काल उठने से रात्रि को सोने तक, जन्म से लेकर मृत्यु तक अपने जीवन में अनेक धार्मिक क्रियाएँ सम्पन्न करता है। 

हिन्दुओं में चार पुरुषार्थ अर्थात् कर्त्तव्य माने गये हैं- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। इस प्रकार से धर्म की पूर्ति मानव का सर्वोपरि कर्त्तव्य है। हिन्दुओं में धर्म को सभी जीवों पर दया करने के रूप में और कर्त्तव्य के रूप में माना गया है। 

धर्म के भी यहाँ अनेक स्वरूप पाये जाते हैं। जैसे-सामान्य धर्म, विशिष्ट धर्म, राज धर्म, मित्र धर्म, गुरु धर्म, युग धर्म, आपद्धर्म आदि। धर्म ने व्यक्ति और समाज के नियन्त्रण में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है।

(2) पुरुषार्थ - पुरुषार्थ सिद्धान्त के द्वारा व्यक्ति के जीवन के चार प्रमुख लक्ष्यों को स्पष्ट किया गया है। ये चार लक्ष्य हैं- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष । इन्हें ही चार पुरुषार्थ माना गया है, जिन्हें प्राप्त करने का प्रयत्न व्यक्ति अपने जीवन में करता है। यहाँ धर्म का अर्थ नैतिक कर्त्तव्यों और नियमों के पालन से लिया गया है ताकि व्यक्ति और समाज दोनों का विकास हो सके। 

धर्म आत्मसंयम, सन्तोष, दया, उदारता, क्षमा, अहिंसा एवं कर्त्तव्य-पालन आदि गुणों को ग्रहण करने की प्रेरणा देता है। अर्थ का तात्पर्य केवल धन या सम्पत्ति से नहीं है। बल्कि उन सभी साधनों से है। जिनकी सहायता से हम अपनी भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं। यहाँ अर्थ या धन को साध्य नहीं, बल्कि साधन माना गया है। 

अपने विभिन्न धार्मिक कर्त्तव्यों के पालन के लिए अर्थ को एक पुरुषार्थ के रूप में महत्ता प्रदान की गयी है। काम का तात्पर्य केवल यौन सन्तुष्टि ही नहीं है। बल्कि सांस्कृतिक दृष्टि से जीवन के आनन्द का उपभोग भी है। 

काम की एक पुरुषार्थ के रूप में इस दृष्टि से महत्ता है कि यह मनुष्य की प्राणिशास्त्रीय आवश्यकता की पूर्ति, सन्तानोत्पत्ति द्वारा माता-पिता के ऋण से उऋण होने और समाज की निरन्तरता को बनाये रखने में योग देता है। उपर्युक्त प्रथम तीन पुरुषार्थ को प्राप्त करने के पश्चात् व्यक्ति चौथे पुरुषार्थ मोक्ष की प्राप्ति का प्रयत्न करता है। मोक्ष का अर्थ पूर्ण सन्तुष्टि की स्थिति से लिया गया है। 

इस स्थिति में व्यक्ति ब्रह्मानन्द की अनुभूति और परम आनन्द की प्राप्ति करता है और जीवन-मरण के बन्धनों से छूट जाता है। पुरुषार्थ के सिद्धान्त ने व्यक्ति को अनुशासित जीवन व्यतीत करते हुए चारों को प्राप्त कर अपने जीवन में पूर्णता प्राप्त करने और समाज के जीवन को उन्नत बनाने में अपूर्व योग दिया है। 

(3) कर्म तथा पुनर्जन्म - भारतीय समाज के एक आधार के रूप में कर्म-सिद्धान्त का महत्व पाया जाता है। यहाँ व्यक्ति को संसार से विरक्त होने का उपदेश नहीं दिया गया। बल्कि संसार में रहते हुए फल की इच्छा किये बिना कर्म करते रहने या दायित्वों को निभाते रहने पर जोर दिया गया है। 

यह सिद्धान्त व्यक्ति में नैतिक उत्तरदायित्व की भावना को विकसित करता है, उसे कर्त्तव्य बोध कराता है। व्यक्ति अपने 'कर्म' के प्रति सजग रहे और दायित्व की भावना से कार्य करता रहे, इसके लिए पुनर्जन्म की धारणा पर जोर दिया गया। 

आज व्यक्ति जो कुछ है - चाहे धनी है या निर्धन, सुखी है या दुःखी, उच्च पद पर आसीन है या निम्न पद पर, सब कुछ उसके पूर्वजन्म में किये गये कर्मों का ही फल है। सद्कर्मों से व्यक्ति का आगामी जीवन अच्छा और दुष्कर्मों से बुरा बनता है। यह सिद्धान्त व्यक्ति को अपने परिवार, वर्ण और आश्रम से सम्बन्धित कर्त्तव्यों के पालन हेतु अपूर्व प्रेरणा प्रदान करता है।

(4) ऋण तथा यज्ञ – हिन्दू जीवन-व्यवस्था पर पाँच के ऋण माने गये हैं - देव ऋण, ऋषि ऋण, पितृ ऋण, अतिथि ऋण तथा भूत ऋण व्यक्ति जो कुछ है, उसका जैसा भी विकास हुआ है। उसने जो कुछ प्राप्त किया है उसके लिए वह दूसरों का ऋणी है। 

वह देवताओं, ऋषियों, माता-पिता, अतिथियों तथा पशु- - पक्षियों तक का ऋणी है। अतः इनके प्रति अपने दायित्व का निर्वाह करके ही वह पाँच प्रकार के ऋणों से छुटकारा प्राप्त कर सकता है। इसी हेतु पंच महायज्ञों की व्यवस्था की गयी है। 

साथ ही व्यक्तिवाद पर अंकुश रखने और जीवन को त्याग के आदर्श में ढालने के लिए भी इन यज्ञों का विधान किया गया। ये यज्ञ व्यक्ति को सभी प्राणियों के प्रति अपने दायित्व को निभाने की शिक्षा देते हैं। यहाँ यज्ञ का तात्पर्य अन्य के प्रति दायित्व निर्वाह से लिया गया है। कर्त्तव्यों की पूर्ति को ही यज्ञ कहा जाता है।

(5) संस्कार - संस्कार का तात्पर्य शुद्धिकरण की प्रक्रिया से है। भारतीय सामाजिक व्यवस्था में व्यक्ति को सामाजिक प्राणी बनाने, उसके व्यक्तित्व का पूर्ण विकास करने तथा उसकी नैसर्गिक प्रवृत्तियों को समाजोपयोगी बनाने के लिए व्यक्ति का शारीरिक, मानसिक और नैतिक परिष्कार आवश्यक माना गया है। 

परिष्कार या शुद्धिकरण की पद्धति को ही यहाँ संस्कार की संज्ञा दी गयी है। जीवन को परिष्कृत करने की प्रक्रिया जीवन-पर्यन्त चलती रहती है। यद्यपि यहाँ संस्कारों की संख्या काफी बतायी गयी है, परन्तु प्रमुख संस्कार 16 ही माने गये हैं। इन संस्कारों का उद्देश्य एक विशेष स्थिति और आयु में व्यक्ति को उसके सामाजिक कर्त्तव्यों का ज्ञान कराना है। 

(II) संगठनात्मक आधार- मौलिक विशेषताएँ 

उपर्युक्त दार्शनिक आधारों के अनुरूप भारतीय समाज को संगठित करने के उद्देश्य से यहाँ कुछ ऐसी सामाजिक व्यवस्थाओं को निर्मित किया गया जो व्यक्ति और समाज दोनों के सर्वांगीण विकास में योग देने की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। इन्हें ही भारतीय समाज के संगठनात्मक आधारों के नाम से जाना जाता है। ये आधार निम्न प्रकार हैं

(1) वर्ण व्यवस्था - वर्ण व्यवस्था भारतीय सामाजिक संगठन की आधारशिला के रूप में है। यहाँ आर्थिक आधार के बजाय व्यक्ति के गुण तथा स्वभाव के आधार पर समाज को चार वर्णों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र) में विभाजित किया गया। 

प्रत्येक वर्ण के अधिकार, दायित्व और व्यवसाय एक-दूसरे से भिन्न थे। प्रत्येक व्यक्ति के लिए यह आवश्यक था कि वह अपने वर्ण-धर्म के अनुरूप कर्त्तव्यों का पालन करे। वर्ण व्यवस्था के अन्तर्गत ब्राह्मण वर्ण की स्थिति सबसे उच्च थी। परन्तु इस व्यवस्था के प्रारम्भ में जन्म पर आधारित नहीं होकर गुण तथा स्वभाव पर आधारित होने के कारण व्यक्ति का वर्ण- परिवर्तन सम्भव था। 

व्यक्ति अपने व्यवहार से किसी उच्च या निम्न वर्ण का सदस्य हो सकता था। ऐसे उदाहरण भी पाये जाते हैं जहाँ लोगों ने अपने गुण तथा स्वभाव को बदलकर एक वर्ण से दूसरे वर्ण की सदस्यता प्राप्त की थी। यद्यपि वर्ण व्यवस्था में मुक्तप्रणाली की कुछ विशेषताएँ अवश्य पायी जाती हैं।  

परन्तु व्यवहार रूप में वर्ण-परिवर्तन उतना आसान नहीं था, जितना साधारणतः समझा जाता है। समाज में विभिन्न कार्यों की समुचित व्यवस्था की दृष्टि से वर्ण व्यवस्था का भारतीय समाज के आधार के रूप में विशेष महत्व था ।

(2) आश्रम व्यवस्था - वर्ण-व्यवस्था का उद्देश्य समाज के जीवन को और आश्रम व्यवस्था का उद्देश्य व्यक्ति के जीवन को सन्तुलित एवं संगठित बनाये रखना था। आश्रम व्यवस्था के माध्यम से व्यक्ति के जीवन में भोग, त्याग दोनों के महत्व को स्वीकार किया गया है। 

इस व्यवस्था के अन्तर्गत व्यक्ति की आयु 100 वर्ष मानकर उसे 25-25 वर्ष के चार भागों में विभाजित किया गया है जिनमें से प्रत्येक को एक आश्रम कहा गया है। ये आश्रम चार हैं- 

(i) ब्रह्मचर्य आश्रम, (ii) गृहस्थ आश्रम, (iii) वानप्रस्थ आश्रम, तथा (iv) संन्यास आश्रम। 

अपनी आयु के प्रथम 25 वर्ष ब्रह्मचर्य आश्रम में बिताकर व्यक्ति अपने व्यक्तित्व का विकास करता था, अपने आप में सद्गुणों को विकसित करता था, शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक दृष्टि से अपने को सबल बनाता था। फिर वह विवाह संस्कार के द्वारा गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करता था। 

जहाँ वह धर्म की मर्यादा के अनुरूप अर्थ और काम का उपभोग करता, धन कमाता और अपनी काम इच्छाओं पूर्ति करता हुआ सन्तानोत्पत्ति करता था। वहाँ वह प्रतिदिन पंच महायज्ञ करता हुआ समाज के अन्य सदस्यों एवं पशु-पक्षियों तक के प्रति अपने कर्त्तव्य का पालन करता। 50 वर्ष की आयु प्राप्त कर लेने पर वह वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश करता। 

वह परिवार की सीमा से बाहर निकलकर सम्पूर्ण समाज के कल्याण हेतु कार्य करता। वह ज्ञान का प्रसार और समाज की सांस्कृतिक परम्पराओं को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तान्तरित करता तथा योग्य व्यक्तियों के निर्माण में योग देता हुआ आध्यात्मिक चिन्तन में अपने आपको लगा देता। 

75 वर्ष की आयु प्राप्त करने पर वह संसार से विरक्त होकर संन्यास आश्रम में प्रवेश कर अन्तिम पुरुषार्थ - मोक्ष प्राप्ति का प्रयत्न करता। इस प्रकार आश्रम व्यवस्था के माध्यम से व्यक्ति अपने जीवन काल में चार पुरुषार्थों- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को प्राप्त करने की दिशा में आगे बढ़ता।

(3) जाति व्यवस्था - भारतीय सामाजिक संगठन के एक महत्वपूर्ण आधार के रूप में जाति व्यवस्था का महत्व रहा है। भारतीय समाज हजारों ऐसे जातीय और उप-जातीय समूहों में बँटा है। जिनकी सदस्यता का आधार व्यक्ति के एवं स्वभाव नहीं होकर जन्म है। 

भारतीय समाज में कालान्तर में स्तरीकरण के आधार के रूप में गुण तथा स्वभाव का स्थान जन्म ने ले लिया। परिणाम यह हुआ कि वर्ण व्यवस्था जाति व्यवस्था के रूप में बदल गयी । प्रत्येक वर्ण में जातियाँ बढ़ती गयीं और जाति की सदस्यता पूर्णतः जन्म पर आधारित हो गयी। 

यद्यपि वर्ण-परिवर्तन तो फिर भी सम्भव था। परन्तु एक जाति की सदस्यता छोड़कर किसी अन्य जाति में पहुँचना प्रायः असम्भव था। धीरे-धीरे एक ही वर्ण की विभिन्न जातियों तक में ऊँच-नीच की भावना पनपने लगी। उच्च जातियों को अनेक विशेषाधिकार प्राप्त रहे हैं तो निम्न जातियों को कुछ निर्योग्यताओं से पीड़ित रहना पड़ा है। 

जाति व्यवस्था के अन्तर्गत प्रत्येक जाति ने अन्तर्विवाह की नीति को अपनाया। प्रत्येक जाति की अपनी जातीय पंचायतें भी रही हैं जो जाति से सम्बन्धित नियमों का पालन नहीं करने वालों को कठोर दण्ड देती रही हैं। यह व्यवस्था बन्द वर्ग - प्रणाली का उदाहरण प्रस्तुत करती है। 

वर्तमान में जाति व्यवस्था के स्वरूप एवं कार्यों में विभिन्न कारणों से अनेक परिवर्तन आये हैं। इनके बावजूद भी अधिकांश भारतीयों के जीवन को जाति व्यवस्था आज भी अनेक रूपों में प्रभावित कर रही है ।

(4) संयुक्त परिवार - भारतीय समाज के परम्परागत आधार के रूप में संयुक्त परिवार का विशेष महत्व रहा है। मैक्समूलर ने संयुक्त परिवार को भारत की 'आदि-परम्परा' माना है जो सदियों से भारतीयों को सामाजिक विरासत के रूप में प्राप्त होती रही है।

बहुत प्राचीनकाल से ही भारतीय समाज की इकाई वास्तव में संयुक्त परिवार ही रहा है। न कि व्यक्ति संयुक्त परिवार भारतीय संस्कृति के आदर्श तत्वों और समूह-कल्याण के सुन्दर आदर्श को प्रस्तुत करता है। एक संयुक्त परिवार उन लोगों का एक समूह है जो साधारणतः एक ही मकान में साथ-साथ रहते हैं।  

एक ही रसोई में बना हुआ भोजन करते हैं। सभी परिवार की आय का सम्मिलित रूप से उपभोग करते हैं, सभी सम्पत्ति के संयुक्त स्वामी होते हैं तथा सभी सामान्य पूजा या धार्मिक क्रियाओं में भाग लेते हैं। इसमें साधारणतः तीन-चार पीढ़ियों के रक्त सम्बन्धी होते हैं। 

यद्यपि कुछ ऐसे सदस्य भी होते हैं जो रक्तसम्बन्धी नहीं होते। संयुक्त परिवार का एक 'कर्त्ता' होता है जिसकी आज्ञा का पालन अन्य सभी सदस्य करते हैं। संयुक्त परिवार जातिगत नियमों के पालन एवं परम्परागत आदर्शों के अनुरूप कार्य करने का विशेषतः प्रयत्न करता है।

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि भारतीय समाज के कुछ ऐसे परम्परागत आधार रहे हैं जिन्होंने समाज में समन्वयकारी प्रवृत्तियों के विकास में योग दिया। इन आधारों ने व्यक्ति की उन्नति के साथ-साथ समाज के विकास में भी सहायता पहुँचायी। 

भारतीय सामाजिक व्यवस्था से सम्बन्धित उपर्युक्त बातों ने व्यक्ति को समन्वित जीवन व्यतीत करने हेतु प्रोत्साहित किया, उसे यह सोचने और समझने में सहायता प्रदान की कि वह केवल स्वयं के लिए ही नहीं जीता है। उसका एकमात्र उद्देश्य रोटी, कपड़ा और मकान ही नहीं है। 

वह यह जानता है कि इस जीवन के आगे भी कुछ है। वह आत्मा की अमरता, कर्मवाद और पुनर्जन्म के सिद्धान्त में विश्वास करता है। पंच महायज्ञों की धारणा पर जोर देता है तथा पुरुषार्थ के सिद्धान्त के अनुरूप लक्ष्यों की प्राप्ति का प्रयत्न करता है।

निष्कर्ष - भारत की सभ्यता और संस्कृति अति प्राचीन है। यहाँ ऋषि-मुनियों, विचारकों एवं धर्म-गुरुओं ने अपने चिन्तन के परिणामस्वरूप समाज की सर्वांगीण प्रगति में अपना अपूर्व योग दिया है। प्राचीनकाल में शास्त्रीय परम्परा को व्यक्त करने वाले अनेक ग्रन्थों की भी रचना हुई। 

ऐसे ग्रन्थों में वेद, पुराण, उपनिषद्, रामायण, महाभारत, गीता आदि प्रमुख हैं। यहाँ कई प्रकार की स्मृतियों की भी रचना की गई। इन ग्रन्थों में परम्परागत भारतीय सामाजिक व्यवस्था को दर्शाया गया है। इनमें वर्ण व्यवस्था, आश्रम व्यवस्था, कर्म और पुनर्जन्म का सिद्धान्त, धर्म, परिवार, जाति आदि का उल्लेख मिलता है। 

अपने परम्परागत रूप में यह समाज को सदियों तक प्रभावित करते रहे और व्यक्ति इनके अन्तर्गत अपने कर्त्तव्यों का पालन करते रहे। शास्त्रीय दृष्टिकोण में न तो व्यक्ति को और न ही समाज को पूर्णतः प्रमुखता दी गई है। 

व्यक्ति समाज पर निर्भर है और समाज अपने विकास और प्रगति के लिए व्यक्ति पर निर्भर है। दोनों को पग-पग पर एक-दूसरे की आवश्यकता पड़ती है। साथ ही शास्त्रीय दृष्टिकोण के अन्तर्गत इस बात का भी विशेष ध्यान रखा गया कि समाज में सब प्रकार के कार्यों की समुचित व्यवस्था हो, प्रत्येक कार्य का सम्पादन ठीक प्रकार से हो। 

इस हेतु समाज को चार वर्णों में विभाजित किया गया और यह वर्ण व्यवस्था व्यक्ति के कार्यों पर आधारित थी, न कि जन्म पर। इस व्यवस्था में वर्णों को एक-दूसरे से ऊँचा अथवा नीचा नहीं माना गया है, बल्कि प्रकार्यात्मक दृष्टि से प्रत्येक वर्ण की उपयोगिता को दर्शाया गया है।

शास्त्रीय दृष्टिकोण के अन्तर्गत व्यक्ति को भी प्रमुखता दी गई है, व्यक्ति समाज-व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण घटक है, जो जीवन में विभिन्न परिस्थितियों के माध्यम से अपनी भूमिका निभाता है। वह समाज के विकास और प्रगति में उसी समय योग दे सकता है। 

जब उसके स्वयं के व्यक्तित्व का सही प्रकार से विकास हुआ हो। अतः यहाँ समाज चिन्तकों ने आश्रम व्यवस्था की बात कही है। मनुष्य के जीवन को 100 वर्ष का मानकर उसे 25-25 वर्ष के चार भागों में बाँटा गया। मनुष्य अपने जीवन का प्रत्येक भाग एक विशेष प्रकार के आश्रम में व्यतीत करता है और अपने व्यक्तित्व निर्माण की दिशा में आगे बढ़ता है। 

यहाँ ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ एवं संन्यास आश्रम की व्यवस्था की गई है। व्यक्ति से अपेक्षा की गई कि वह प्रत्येक आश्रम से सम्बन्धित अपने दायित्वों का निर्वाह करते हुए समाज की व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने में योग दे।

यहाँ भारतीय चिन्तक इस बात से भली-भाँति परिचित थे कि जब तक समाज को ठोस आधार प्रदान नहीं किया जाता तब तक समाज-व्यवस्था के स्थायित्व की आशा नहीं की जा सकती। इस हेतु यहाँ कर्म के सिद्धान्त को प्रतिपादित किया गया। 

कर्म का सिद्धान्त मनुष्य को सतत् अपने कर्त्तव्य का पालन करने की प्रेरणा देता रहता है। यह सिद्धान्त मनुष्य को बताता है कि उसने अपने पिछले जीवन में जो कुछ अच्छे और बुरे कार्य किए हैं। यह जीवन उसी का परिणाम है। यदि मनुष्य इस जीवन में अपने लिए निर्धारित दायित्वों का समुचित ढंग से निर्वाह करेगा तो उसका अगला जीवन और भी उन्नत होगा।

इस प्रकार कर्म का और पुनर्जन्म का सिद्धान्त एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। गीता में स्पष्टतः बताया गया है कि मनुष्य का अधिकार कर्म पर है, फल पर नहीं। मनुष्य को तो हर स्थिति में अपने कर्त्तव्य का पालन करते रहना चाहिए और फल ईश्वर की इच्छा पर छोड़ देना चाहिए। 

शास्त्रीय दृष्टिकोण के अन्तर्गत धर्म को सर्वत्र प्रधानता दी गई है, धर्म को व्यक्ति और समाज के जीवन का पथ-प्रदर्शक माना गया है। धर्म ही व्यक्ति, समूह और समाज का समय-समय पर मार्गदर्शन करता है। यह सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखने की दृष्टि से सामाजिक नियन्त्रण का एक प्रमुख माध्यम भी है। धर्म व्यक्ति की आध्यात्मिक प्रगति में सहायक भी है।

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