भारत में पुलिस की भूमिका - bharat mein police ki bhumika

पुलिस शब्द से अभिप्राय उस व्यवस्था से है जिसके द्वारा राज्य में शान्ति बनाये रखने, राज्य द्वारा पारित नियमों को मनवाने अथवा दण्ड प्रक्रिया संहिता के प्रावधानों का प्रवर्तन कराने का कार्य किया जाता है।

काडवेल के अनुसार - सामान्य रूप से पुलिस का कार्य सामाजिक सुरक्षा करना है। उनका प्रारम्भिक कर्तव्य समाज में व्यवस्था बनाए रखना व कानून को लागू करना है।

मोरपार्टी के शब्दों में - यह सिविल अधिकारियों की उस संस्था की ओर संकेत करती है। जो शान्ति और व्यवस्था को स्थापित करना। अपराध का पता लगाने व उसकी रोकथाम करने एवं कानून को लागू करने में लगे हुए हैं। 

सदरलैण्ड के मतानुसार - पुलिस शब्द प्रारम्भिक रूप से राज्य के उन एजेण्टों की ओर संकेत देता है जिनका कार्य कानून और व्यवस्था को बनाए रखना तथा नियमित अपराधी-संहिता को लागू करना है। 

भारत में पुलिस की भूमिका

राज्य में राज्य का कार्य क्षेत्र बहुत अधिक विस्तृत हो जाता है और राज्य व्यक्ति और समाज के हित में कई प्रकार के कार्य करता है, जिसे एक सूची में संकलित करना श्रम साध्य है। 

चूँकि राज्य के कार्यों का सम्पादन राज्य के अधिकारी व कर्मचारी करते हैं। अतएव इस आधार पर पुलिस की भूमिका को निम्नानुसार व्यक्त किया जा सकता हैं।

(1) कानून और व्यवस्था की स्थापना - यह पुलिस का प्राथमिक कार्य है। समाज में कई प्रकार के लोग रहते हैं, उनमें कुछ लोगों की प्रवृत्ति कानून और व्यवस्था के प्रतिकूल आचरण करने की होती हैं।

यदि ऐसे तत्वों को रोका जाए तो समाज की पूरी व्यवस्था ही नष्ट हो जाएगी। पुलिस इस काम को भली-भाँति सम्पन्न करते हुए कानून व व्यवस्था की स्थापना में मुख्य भूमिका निभाती है।

( 2 ) शान्ति की स्थापना - यह उपर्युक्त कानून व व्यवस्था की स्थापना का दूसरा पक्ष है। कानून व व्यवस्था, समाज में जितनी अच्छी होगी, शांति भी अपने आप आ जाएगी। पुलिस सामाजिक तत्वों के विरुद्ध, आवश्यक कार्यवाही कर समाज में शांति की स्थापना को सुनिश्चित करती है ।

(3) अपराधों की रोकथाम - पुलिसशब्द में अपराधों की रोकथाम का तत्व भी निहित है। पुलिस अधिनियम 1861 की धारा 23 के अनुसार - प्रत्येक पुलिस अधिकारी का यह कर्त्तव्य होगा कि वह किसी सक्षम प्राधिकारी द्वारा उसे विधिपूर्ण जारी किए गए सभी आदेशों और वारण्टों का पालन और निष्पादन करे। 

लोक शान्ति को प्रभावित करने वाली गुप्त वार्ताओं का संग्रहण करे और उच्चाधिकारियों को संसूचित करे, अपराधों की रोकथाम करे व लोक न्याय के लिए भेजने हेतु अपराधियों का पता चलाए और उन्हें पकड़े।

इस अधिनियम में यह भी प्रावधान किया गया था कि "पुलिस अधिकारियों के लिए इस धारा 23 में वर्णित प्रयोजनों में से किसी के लिए किसी मदिरालयनुमा घर या भ्रष्ट या उच्छृंखल व्यक्तियों के एकत्रित होने के अन्य स्थान में प्रवेश कर सकेगा और उसका निरीक्षण कर सकेगा एवं उसका यह कार्य विधिपूर्ण होगा।

(4) जनसेवा-लोक-कल्याणकारी राज्य में पुलिस का यह कार्य उसे जनता से जुड़ने का एक अच्छा अवसर देता है और भारत में व्याप्त धारणा के ठीक विपरीत उसकी भूमिका को सकारात्मक मोड़ देता है। 

भारत में पुलिस का आदर्श जन-सेवा देशभक्ति है। पुलिस जन-सेवा का कार्य कई प्रकार से कर सकती है; 

जैसे- उपद्रवों और उपद्रवियों से जनता की रक्षा, भीड़, यातायात, अव्यवस्था को नियन्त्रित करना, शोषण रोकना, निर्धन, निर्बलों की सम्पीडन से रक्षा करना, जन स्वास्थ्य की रक्षा करना। अग्निशमन का कार्य, प्राकृतिक आपदा के समय जनता की सहायता आदि अन्य करते हुए जनता से जुड़ सकती है और अपने को जनता की पुलिस साबित कर सकती है। 

(5) राष्ट्र सेवा की सुरक्षा - पुलिस व्यवस्था का संगठन सेना की भाँति होता है, जिसमें अनुशासन का सर्वाधिक महत्व है। आन्तरिक शांति में व्यवधान से अन्ततः राष्ट्र की सुरक्षा और व्यवस्था खतरे में पड़ जाती है। 

असामाजिक तत्वों को पकड़कर पुलिस राष्ट्र की सेवा करती है, साथ ही पुलिस बल का उपयोग आवश्यकता पड़ने पर राष्ट्र की सुरक्षा के निमित्त भी किया जा सकता है। देश में स्थित सीमा सुरक्षा बल, असम रायफल्स आदि पुलिस संगठन के प्रकार ही हैं, जो आज राष्ट्र की सुरक्षा के काम में लगे हुए हैं।

वस्तुतः आज पुलिस का कार्य क्षेत्र एक लोक-कल्याणकारी राज्य में असीम और विशाल है। मनुष्य का आचरण नियन्त्रित करने के लिए जो कुछ भी आवश्यक होता है। वह पुलिस के अधिकार क्षेत्र के अन्तर्गत आता है। 

पुलिस को अपराधों की रोकथाम कर अपराधियों का पता लगाना होता है, शांति व व्यवस्था बनाये रखनी होती है और किसी भी प्रकार के उपद्रव को रोकना होता है। जुलूसों, सभाओं और यातायात को नियन्त्रित करना पड़ता है। 

किसी धर्म या धर्म स्थान के असम्मान का प्रतिरोध करना पड़ता है, मनोरंजन के स्थानों तथा अनैतिकता के अड्डों पर नियन्त्रण रखना पड़ता है। 

मादक द्रव्यों के क्रय-विक्रय और तस्करी पर रोक लगानी होती है। व्यापार, उद्योग, नाप-तौल तथा खाद्यान्न के वितरण और आबंटन में भ्रष्टाचार को रोकना पड़ता है, सड़कों, रेलमार्गों, खेतों, जंगलों, खानों, संचार साधनों, औद्योगिक संयंत्रों, नहरों तथा देश की उन्नति के लिए आवश्यक अन्य साधनों की रक्षा करनी होती है। 

जन-स्वास्थ्य के साधनों की देख-रेख करनी होती है, हिंसक पशुओं को नष्ट करना पड़ता है, साथ ही पशुओं के प्रति निर्दयता को रोकना पड़ता है। अग्निशमन का कार्य करना होता है तथा प्राकृतिक संकट के समय लोगों की सहायता करनी पड़ती है। 

निर्धनों व निर्बलों की सभी प्रकार के शोषण और सम्पीडन से रक्षा करनी होती है। शासकीय मुद्रा और टिकटों की कालाबाजारी को रोकना होता है। 

विरोधी विदेशियों की घुसपैठ को रोकना पड़ता है और जासूसी व विध्वंसक कार्यवाहियों का प्रतिरोध करना होता है। पुलिस को देश की सुरक्षा के लिए तथा जन-कल्याण के लिए शासन द्वारा बनाए गए सभी विधानों और विनियमों का पालन कराना पड़ता है।

इस प्रकार पुलिस समाज का एक आवश्यक अंग है। जिसके अभाव में सुव्यवस्थित समाज और अन्ततः राष्ट्र की कल्पना नहीं की जा सकती। पुलिस समाज को व्यक्ति को जीवन साधन करने लायक बनाती है। 

जहाँ व्यक्ति अपने जीवन के सर्वोच्च विकास और लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है। एक लोक-कल्याणकारी राज्य में पुलिस की भूमिका नकारात्मक कम और सकारात्मक अधिक हो जाती है। 

यह सम्भव है कि किसी देश में पुलिस का सकारात्मक या नकारात्मक पक्ष के अनुपात में विभिन्नता हो, तथापि पुलिस का सकारात्मक कार्य पुलिस को जनता से जोड़ना है। पुलिस जनता की जाती है और जनता की पुलिस व्यवस्था होने पर एक लोक-कल्याणकारी राज्य सार्थक होता है।

 पुलिस की असफलता के कारण

यह सच है कि सामान्यतः अधिकांश व्यक्ति पुलिस को सम्मान की निगाह से नहीं देखते। जिसके परिणामस्वरूप पुलिस का वास्तविक व्यवहार उनके लिए निर्धारित कर्त्तव्यों के अनुरूप नहीं होता तथा पुलिस को कोई जन सहयोग प्राप्त नहीं हो पाता। 

पुलिस की असफलता के कारणों को निम्नांकित रूप से समझा जा सकता है -

(1) अनियन्त्रित भ्रष्टाचार - सामान्यतः आम लोगों की यह धारणा है कि पुलिस राज्य का सबसे भ्रष्ट संगठन है। एक और अपराधियों को पकड़ने के लिए पुलिस को काफी अधिकार मिले होते हैं। परन्तु इन अधिकारों का उपयोग अपराधियों को पकड़ने के लिए उतना नहीं किया जाता जितना कि जरूरी है। 

कभी-कभी पुलिस की कठोरता के कारण निरपराधी को सजा भुगतनी पड़ती है। पुलिस आपराधिक मामलों की छानबीन तब तक नहीं करती है, जब उसे अपराधी के विरोधी व्यक्ति से रिश्वत न मिल जाये। 

पुलिस के विषय में यह कहा गया है कि जिस क्षेत्र में पुलिस थाने होते हैं, उन क्षेत्रों में अपराधों की दर अधिक होती है। क्योंकि पुलिस का अपराधी तत्वों से एक अनैतिक समझौता रहता है।

(2) क्रूरता तथा उत्पीड़न - पुलिस के अपराधी सूत्रों का पता लगाने के लिए पकड़े गये अभियुक्तों से पूछताछ के तरीके अत्यन्त क्रूर होते हैं। सामान्य व साधारण व्यक्ति से पूछताछ के लिए भी वे कठोरता से पूछताछ करते हैं, जिससे निरपराध व्यक्ति भारी उत्पीड़न का शिकार हो जाते हैं। 

ऐसी घटनाओं की भी कमी नहीं है। जब पूछताछ के लिए पुलिस द्वारा थर्ड डिग्री मेथड्स का इस तरह प्रयोग किया जाता है कि अभियुक्त अपंग बन जाता है। इसके विपरीत पुलिस पर यह आरोप लगाया जाता है कि क्रूर और अमानवीय व्यवहार केवल उन्हीं व्यक्तियों के साथ किया जाता है। जो पुलिस को आर्थिक लाभ देने की स्थिति में नहीं होते।

(3) पुलिसकर्मियों की दुराचारिता - अनेक अध्ययनों और सर्वेक्षणों के आधार पर बुद्धिजीवियों का भी यह मानना है कि वर्तमान में पुलिस कर्मियों की दुराचारिता में तेजी से वृद्धि हो रही है। एक ओर चतुर्थ श्रेणी के पुलिसकर्मी अपराधियों को पकड़ने के लिए तैनात किये जाते हैं।  

लेकिन दूसरी ओर इन्हीं के द्वारा अक्सर अपराधी गिरोहों से राहजनी, तस्करी, लूट और चोरियाँ करवाकर उनमें से एक निर्धारित हिस्सा वसूलने का काम किया जाता है। जनसाधारण की सामान्य धारणा यह है कि ट्रेनों और बसों में होने वाली लूट पुलिसकर्मियों द्वारा ही आयोजित की जाती है। 

सम्भवतः यही कारण है कि जिस थाने के क्षेत्र में विभिन्न अपराधिक कृत्यों के द्वारा जितने अधिक आर्थिक लाभ की सम्भावना होती है, उस थाने में अधिकारी या सिपाही के रूप में नियुक्ति पाने के लिए पुलिस के लोग उतना ही अधिक प्रयत्न करते हैं। 

उनके पाशविक और हिंसक कार्यों के विरुद्ध थानों में रिपोर्ट दर्ज कराना भी सरल नहीं होता। इसी कारण पुलिस का एक मामूली सिपाही भी अपना यह अधिकार समझने लगता है कि वह किसी से भी दुराचार करके उसे थाने में यातना देने का भय दिखा सके।

(4) बुद्धि का निम्न स्तर - ऐसे अधिकांश कर्मचारी कम शिक्षित होते हैं तथा उनकी बुद्धि का स्तर भी सामान्य से निम्न होता है। साधारणतया शिक्षित, ईमानदार और प्रतिभाशाली व्यक्ति सामान्य पुलिसकर्मी के रूप में नियुक्त होना नहीं चाहते। यह भी आलोचना की जाती है कि सामान्य पुलिसकर्मी जिस परिवेश से आते हैं, वे अपने आप में निम्न स्तर का होते हैं ।

(5) जन-सहयोग का अभाव - पुलिस की असफलता का एक प्रमुख कारण जन-सहयोग न मिलना है। सामान्य लोगों का यह मानना है कि पुलिस उनकी मित्र और सुरक्षा का माध्यम नहीं, बल्कि समाज-विरोधी गतिविधियों का केन्द्र है। 

फलस्वरूप अधिकांश व्यक्ति पुलिस को सहयोग देकर स्वयं किसी तरह के खतरे में नहीं पड़ना चाहते। सड़क दुर्घटनाओं में घायल व्यक्ति को उठाकर अस्पताल तक पहुँचाने अथवा उसकी रिपोर्ट थाने में करने से भी लोग इसलिए डरते हैं कि उन्हें कोई प्रशंसा मिलने की जगह उन्हें पुलिस द्वारा की जाने वाली छानबीन का शिकार न होना पड़े, जन-सहयोग के अभाव में पुलिसकर्मी भी अपने कर्त्तव्यों का निर्वाह नहीं कर पाते।

(6) खाना-पूर्ति पर अधिक बल - अधिकांश पुलिस अधिकारियों तथा सामान्यकर्मियों का समय कागजी कार्यवाही करने में व्यतीत हो जाता है। बड़े अधिकारियों को प्रभावित करने के लिए पुलिस द्वारा अक्सर निरपराध लोगों को पकड़कर खाना-पूर्ति कर ली जाती है। 

जन-सामान्य का पुलिस द्वारा की जाने वाली कार्यवाही में काई विश्वास नहीं होने से थाने में लोग मामला दर्ज कराना जरूरी नहीं समझते।

(7) राजनीतिक दबाव - राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण पुलिस कार्य-कुशलता को प्रभावित किया जाता है। जैसेजब कोई अपराधी बड़ा राजनेता होता है, तो पुलिस ऐसे अपराधी को दोषी नहीं मान पाती है। 

ऊपरी दबाव के कारण उन्हें नहीं पकड़ पाती है। राजनीतिक हस्तक्षेप की वजह से अपराध के लिए केवल वही व्यक्ति पकड़े जाते हैं, जिनके पास राजनीतिक साधनों की कमी होती है।

(8) सुविधाओं की कमी - पुलिस की असफलता का एक प्रमुख कारण पुलिस को प्राप्त होने वाली सुविधाओं की कमी होना है। प्रति व्यक्ति एक हजार की संख्या पर पुलिस कर्मचारियों का औसत केवल 1.6 है। पुलिस से यह आशा नहीं की जा सकती कि वह अपराधों की बढ़ती हुई संख्या के बाद भी सभी तरह के अपराधियों को सफलतापूर्वक पकड़ सके। 

एक ओर अपराध करने के नये-नये तरीके विकसित हो रहे हैं, तो दूसरी ओर पुलिकर्मियों के पास इतने पुराने उपकरण हैं जिनसे वे अपराधियों का सामना सफलतापूर्वक नहीं कर सकते हैं।

(9) सिद्धान्त तथा व्यवहार में अन्तर - सैद्धान्तिक रूप से यह आशा की जाती है कि पुलिस अधिकारी तथा सामान्य कर्मचारी उच्च नैतिक मानदण्डों के अनुसार व्यवहार करेंगे। उनसे यह भी आशा की जाती है कि उन्हें मानसिक रूप से अनुशासित न्यायपूर्ण और कानूनों का ज्ञान रखने वाला होना चाहिए। 

इसके विपरीत, व्यवहार में पुलिस में नैतिक मानदण्डों का लगभग पूरी तरह अभाव होता है। वे थोड़े-से पैसों के लालच में अवैध वसूलियाँ करते हैं, रात के समय इनकी गतिविधियाँ और बढ़ जाती हैं। शायद ही कोई दो-चार पुलिसकर्मी ऐसे मिलें, जिन्हें अपने व्यावसायिक आचारों का ज्ञान हो।

(10) प्रशिक्षण की कमी  – पुलिस की असफलता का एक मुख्य कारण इन्हें समुचित प्रशिक्षण न मिल पाना है। साधारणतया उनकी नियुक्ति के समय शारीरिक शक्ति पर ही अधिक ध्यान दिया जाता है, इस बात पर ध्यान नहीं दिया जाता कि पुलिसकर्मी मानसिक रूप से स्वस्थ और जागरूक हों।

नियुक्ति के बाद पुलिसकर्मियों को न नैतिक आचारों का ज्ञान कराया जाता है और न ही उन्हें कानून और व्यवस्था के बारे में कोई जानकारी दी जाती है। यही मानसिकता पुलिसकर्मियों को इतना उद्दण्ड और अनुशासित बना देती है कि अनेक अवसरों पर पुलिस अधिकारी भी उनके व्यवहारों को नियन्त्रित करने में असफल रहते हैं।

सफलता के सुझाव

पुलिस अपने कर्त्तव्यों का सफलतापूर्वक निर्वाह तभी कर सकती है, जब उसे जनता का विश्वास प्राप्त हो । निम्नांकित सुझावों के आधार पर पुलिस की कार्य-कुशलता को बढ़ाकर समाजोपयोगी बनाने में सहायता दी जा सकती है -

(1) स्वतन्त्रता के इतने वर्षों के पश्चात् भी पुलिस के स्वरूप में कोई सुधार नहीं किया जा सका, सुधार लाने के लिए अनेक आयोग नियुक्त किये जा चुके हैं। लेकिन कुल मिलाकर पुलिस के ढाँचे में ऐसा परिवर्तन नहीं आ सका, जो हमारे देश की आवश्यकता के अनुकूल हो । 

अतः यह आवश्यक है कि पुलिस की संरचना को इस तरह बदला जाय जिससे इसे सामाजिक सुरक्षा के एक साधन के रूप में देखा जा सके।

(2) पुलिस कार्यवाही में कोई राजनीतिक दबाव नहीं होना चाहिए। जब किसी देश की राजनीति भ्रष्ट होती है, तब प्रशासन के एक अंग के रूप में पुलिस को भी भ्रष्टाचार का साथ देना पड़ता है। अनेक राजनेता अपनी कुर्सी को बचाने के लिए भ्रष्टाचार का सहारा लेते। 

इन भ्रष्ट राजनेताओं का साथ पुलिस को भी देना ही पड़ता है। इस दिशा में यह जरूरी है कि पुलिस भ्रष्ट राजनीति के एक भ्रष्ट साधन के रूप में काम न करे बल्कि जन-कल्याण में अधिक रुचि ले।

(3) केवल भारत में ही नहीं, बल्कि लगभग सभी देशों में जनता पुलिस की आलोचक होती है। इस दशा में जन-सहयोग में वृद्धि करने के लिए जरूरी है कि पुलिस विभाग में जन सम्बन्ध प्रखण्ड स्थापित करके लोगों को पुलिस द्वारा की जाने वाली कार्यवाही के औचित्य को समझाया जाय। 

समाचार-पत्रों और मीडिया को पुलिस के कार्य से जनता को अवगत कराकर जनता तथा पुलिस में मैत्री सम्बन्ध स्थापित कराने में सहायक होना चाहिए।

(4) वर्तमान में पुलिस का आधुनिकीकरण करना बहुत आवश्यक है, जिससे पुलिस की कार्यक्षमता बढ़ेगी। सभी थानों में कम्प्यूटर के द्वारा विभिन्न आपराधिक मामलों तथा उनसे सम्बन्धित प्रगति का विवरण तैयार रहना आवश्यक है। वैज्ञानिक शोधों पर आधारित अपराधों को पकड़ने की प्रविधियों का ज्ञान भी पुलिसकर्मियों को होना चाहिए।

(5) पुलिसकर्मी को आचार संहिता का पालन करना अनिवार्य है। कोई पुलिसकर्मी क्रूरता, सार्वजनिक जीवन में अभद्रता, नैतिक पतन अथवा कानून के उल्लंघन का दोषी पाया जाय, तो उसे दूसरे अपराधियों से भी अधिक कठोर दण्ड दिया जाना चाहिए।

(6) अन्त में पुलिसकर्मियों में भ्रष्टाचार पर प्रभावी नियन्त्रण रखना आवश्यक है। सभी पुलिस अधिकारी जानते हैं कि पुलिसकर्मियों द्वारा किस स्थानों से किस प्रकार धन की अवैध वसूली की जाती है।

(7) विभिन्न पुलिस संगठनों के बीच समन्वय होना आवश्यक है। अनेक अपराधी इसलिए पकड़ में नहीं आते कि पुलिस से सम्बन्धित विभिन्न थानों के बीच कार्य क्षेत्र को लेकर मतभेद रहता है। 

(8) वर्तमान में पुलिस के सामान्य कर्मचारियों के लिए बहुत नियोजित और अनैतिक आधार पर प्रशिक्षण की व्यवस्था की जाये। 

प्रशिक्षण के दौरान उन्हें आपराधिक कानूनों की विभिन्न धाराओं की जानकारी देने के साथ ही नागरिकों की प्रत्याशाओं से परिचित करना जरूरी है। पुलिस को उन नैतिक मूल्यों का भी ज्ञान कराना आवश्यक है, जिनका सम्बन्ध कल्याणकारी कार्यों से होता है।

(9) पुलिस में अपराध विशेषज्ञों की नियुक्ति करने से पुलिस संगठन की कार्यक्षमता में काफी वृद्धि हो सकती है। अपराधियों की मानसिकता को समझने के कारण यह व्यक्ति अपराध होने से पहले ही अपराधियों को पकड़ने में सफल हो सकते हैं।

(10) कुछ अपराशास्त्रियों का सुझाव है कि निरोधक पुलिस का गठन करने से पुलिस की भूमिका अधिक प्रभावपूर्ण बन सकती है।

(11) कार्मिक समस्याओं का समाधान करना भी पुलिस की कार्यक्षमता को बढ़ाने के लिए आवश्यक है। आपराधिक सूत्रों के आधार पर अपराधियों को पकड़ने के लिए यातना और उत्पीड़न देना आवश्यक है। 

भारत भी अन्तर्राष्ट्रीय मानवाधिकार कार्यक्रम का सदस्य है तथा मानवीय अधिकार देने के लिए भारत ने अनेक क्षेत्रों में पहल की है। सन् 1993 में न्यायमूर्ति रंगनाथ मिश्रा की अध्यक्षता में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग नियुक्त कर देना ही पर्याप्त नहीं। 

सन् 1861 के पुलिस एक्ट में ऐसे परिवर्तन किये जायें, जिनसे पुलिस की संरचना को प्रभावी ढंग से बदला जा सके।

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