भारतीय गाँवों की सामाजिक संरचना - bhartiya gaon ki samajik sanrachna

Post Date : 22 July 2022

भारत में ग्रामीण अध्ययनों का श्रेय सुप्रसिद्ध समाजशास्त्री प्रो. श्यामाचरण दुबे को दिया जाता है। इनकी पुस्तक 'एक भारतीय ग्राम' एक अमरकृति मानी जाती है। यह कृति हैदराबाद और सिकन्दराबाद के जुड़वाँ नगरों से लगभग 25 मील की दूरी पर बसे शामीरपेट गाँव के अध्ययन पर आधारित है। 

भारतीय गाँवों की सामाजिक संरचना पर डॉ. एस. सी. दुबे के विचारों की व्याख्या कीजिए। 

यह अध्ययन 1951-52 ई. में किया गया था और पुस्तक का प्रकाशन 1955 ई. में लन्दन से हुआ। इस अध्ययन की दो महत्वपूर्ण विशेषताएँ हैं- प्रथम, यह शामीरपेट गाँव का सर्वांगीण अध्ययन है और सरल ढंग से गाँव के जनजीवन को गहराई से प्रस्तुत करने में सफल रहा है तथा द्वितीय, पद्धति की दृष्टि से यह एक नवीन प्रयास था। 

क्योंकि इसमें प्रो. दुबे के निर्देशन में एक अन्तर्शास्त्रीय दल ने सामग्री संकलन का कार्य किया था। 3 वर्ष बाद दुबे ने 'इण्डियाज चेंजिंग विलेजेज' शीर्षक के अन्तर्गत एक दूसरी पुस्तक लिखी जिसमें इन्होंने ग्रामीण समाज में होने वाले परिवर्तनों तथा इसके लिए उत्तरदायी शक्तियों को प्रमुखता दी ।

शामीरपेट एक स्वतन्त्र सामाजिक, आर्थिक एवं धार्मिक इकाई के रूप में सामुदायिक जीवन के कई पक्षों में अंशतः आत्मनिर्भर पाया गया। ग्रामीण समुदाय के व्यापक संगठन में यह अंशतः स्वायत्त भी था। 

किन्तु व्यापक सामाजिक अर्थ में शामीरपेट के घनिष्ठतम सम्बन्ध आस-पड़ोस के गाँवों के साथ भी थे और उन गाँव में घटने वाली घटनाओं में शामीरपेट के निवासी गहरी रुचि रखते थे। 

जीवन की प्रमुख संकटावस्थाओं, जैसे- जन्म, विवाह तथा मृत्यु के समय बहुधा शामीरपेट के निवासी इन पास के गाँवों में रहने वाले अपने मित्रों एवं सम्बन्धियों के यहाँ आते-जाते रहते थे। 

आपस में मिले गाँव के एक समूह के लिए विभिन्न जातियों की अपनी जाति पंचायत होती थी जिनमें केवल जाति से सम्बन्धित मामले ही निर्णीत किए जाते थे।

शामीरपेट में मुसलमान अल्पसंख्यक होने के नाते एक सुसंगठित समूह का निर्माण करते थे। वे सभी सुन्नी मुसलमान थे। गाँव में उनकी स्थिति खेतिहर जातियों के बराबर गिनी जाती थी लेकिन हिन्दुओं ने धर्म की दृष्टि से उन्हें सदैव ही अपने से नीचे माना था। 

हिन्दुओं की कठोर एवं सोपानिक जाति व्यवस्था से घिरे ये मुसलामन जाति सोपानक्रम की परिधि में फँसे दिखाई पड़ते थे और उनकी स्थिति अर्द्धजातीय हो गई थी। 

हिन्दुओं में पाया जाने वाला सोपानिक प्रारूप अखिल भारतीय स्तर पर पाई जाने वाली वर्ण व्यवस्था से मिलता-जुलता था - ब्राह्मण ( पुरोहित और विद्वान्), . क्षत्रिय (शासक और योद्धा), वैश्य (व्यापारी) तथा शूद्र (सेवकगण )। 

परन्तु समय के साथ-साथ इनमें पाँच विभाजन हो गए। तीन पूर्ववत् थे जिन्हें द्विज वर्ण कहा जाता था, केवल वही उपनयन संस्कार करते थे और जनेऊ पहनते थे। इनके बाद चौथे समूह में कई व्यावसायिक जातियाँ सम्मिलित थीं। 

जिन्हें अपेक्षाकृत 'स्वच्छ' माना जाता था और इसके बाद पाँचवाँ समूह उन जातियों का था जो अस्वच्छ तथा अस्पृश्य कही जाती थीं । हिन्दुओं की विभिन्न जातियों की एक जटिल एवं सोपानिक संरचना पाई जाती थी जिसमें ब्राह्मणों का सर्वोच्च स्थान था । अधिकांश जातियाँ अन्तर्विवाही समूहों एवं बहिर्विवाही गोत्रों में विभाजित थीं।

शामीरपेट में पारिवारिक संरचना पितृवंशीय एवं पितृस्थानीय थी। संयुक्त परिवार आदर्श तो माने जाते थे परन्तु विवाह के पश्चात् पिता से अलग रहने की और पिता की मृत्यु के पश्चात् भाई से अलग रहने की प्रवृत्ति पाई जाती थी। परिवार का सबसे बड़ा पुरुष ही परिवार का मुखिया माना जाता था।

सामाजिक-धार्मिक दृष्टि से देशमुख पूरे गाँव का मुखिया होता था। यह पद वंशानुगत था और एक ही परिवार के वंशज इस पद पर करीब 300 वर्षों से चला आ रहा था। 

धन, पद और सरकारी अधिकारियों से सम्पर्क के कारण देशमुख की स्थिति सर्वोपरि एवं प्रभावशाली थी। वह झगड़ों का निपटारा करने हेतु पंचायत की भी सलाह लेता था। 

यद्यपि पंचायत के अधिकांश निर्णय सर्वसम्मति से लिए जाते थे तथापि नवीन शक्तियों ने गाँव में परिवर्तन की जो लहर प्रारम्भ की थी उससे पंचायत में कुछ निर्णय बहुमत के आधार पर ही लिए जाने लगे थे। इससे पंचायत की सत्ता पहले से थोड़ी कमजोर हुई थी। 

विभिन्न जातियों की पंचायतें तथा अन्तर- ग्रामीण पंचायतें शामीरपेट को आस-पास के गाँव को जोड़ने की महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थीं।

प्रो. दुबे के अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि भारतीय ग्रामीण सामाजिक संरचना इतनी सरल नहीं है जितनी ऊपर से दिखाई देती है । परम्परागत हितों एवं आधुनिक परिवर्तनशील समूहों के हितों ने सक्रिय होकर इसे और भी जटिल बना दिया है। 

टी. बी. बॉटोमोर ने प्रो. दुबे के शामीरपेट के अध्ययन पर टिप्पणी करते हुए सही ही लिखा है कि “यातायात के विकास ने सामाजिक गतिशीलता को बढ़ा दिया है और नगरीय शैक्षिक सुविधाओं की ओर आकर्षण बढ़ा है। 

इसके अतिरिक्त सरकार की कल्याण सम्बन्धी एजेन्सियों एवं राष्ट्रीय राजनीतिक दलों की गतिविधियों ने भी शामीरपेट के सामाजिक जीवन को प्रभावित किया है और वहाँ के सामाजिक एवं राजनीतिक सोपानक्रम में परिवर्तन आया है। 

यद्यपि प्रभाव और प्रतिष्ठा के स्रोतों में धन, शिक्षा, सरकारी सेवा में पद का भी समावेश हो गया है, तथापि परिवर्तन बहुत धीमा है और परम्परागत व्यवस्था की पकड़ अब भी मजबूत बनी हुई है।