अमेरिका सीनेट और ब्रिटिश लॉर्ड सभा की शक्तियों एवं स्थिति का तुलना

प्रो. लॉस्की ने कहा है कि अपनी विवेकशीलता, स्थायित्व, चतुरता और कार्यकारी व विधायनी शक्तियों के कारण आज सीनेट अमेरिका की आँख का तारा बनी हुई है और विश्व के द्वितीय सदनों की ईर्ष्या का कारण ही नहीं बनी है, वरन उनमें वैसा करने की भावना भी पैदा कर रही है।

अमेरिका सीनेट और ब्रिटिश लॉर्ड सभा की शक्तियों एवं स्थिति का तुलनात्मक वर्णन कीजिए।

ब्रोगन ने कहा है कि सीनेट ने विदेशी पर्यवेक्षक की काफी समय से प्रशंसा प्राप्त की है और उसे आश्चर्यचकित कर रखा है।

प्रो. लिण्डसे रोजर्स के अनुसार, "सीनेट आधुनिक राजनीति का सर्वाधिक प्रशंसनीय आविष्कार है।

सीनेट में निहित दुर्बलताएँ - जहाँ सीनेट की प्रशंसा की गई है, वहाँ विचारकों ने सीनेट में निहित दुर्बलताओं का भी उल्लेख किया है। जैसे

(1) सीनेट में 'फिलिबस्टर' के कारण समय की बर्बादी होती है।

(2) 'सीनेट की उदारता' नामक परम्परा भी प्रशंसनीय नहीं है, क्योंकि इसक कारण सीनेट अपने सम्बन्धियों या मित्रों को पद दिला देते हैं।

(3) लॉग रोलिंग  जिसके द्वारा सीनेटर एक-दूसरे की अनुचित कार्यों में सहायता करते हैं, ठीक नहीं ।

(4) सीनेटर व्यवहार में अपने राज्य का नहीं, वरन अपने दल का प्रतिनिधित्व करत हैं।

(5) सीनेट में राज्यों को बराबर प्रतिनिधित्व देना भी अप्रजान्त्रिक है। लिंडसे के अनुसार आधे से अधिक सीनेटर वहाँ की 1/5 से भी कम जनता के द्वारा निर्वाचित होते हैं। 

(6) सीनेटर अपने राज्यों या राष्ट्रीय हितों का प्रतिनिधित्व न करके विभिन्न हितों या स्वार्थों का प्रतिनिधित्व करते हैं। इस सम्बन्ध में लास्की तो यह कहता है कि पेन्सिलवेनिया के कुछ सीनेटर ऐसे हुए हैं, जिन्हें वाशिंगटन में होने की अपेक्षा जेल में होना चाहिए था।

(7) यद्यपि सीनेट को महत्वपूर्ण कार्यपालिका शक्तियाँ प्राप्त हैं, फिर भी इस सम्बन्ध में उसका कोई उत्तरदायित्व नहीं है।

लॉस्की के अनुसार, "सीनेट अमेरिकन राजनीतिक व्यवस्था की अद्भुत सफलताओं में से एक है। सीनेट राजनीतिक लोकतन्त्र को ऐसी वास्तविकता प्रदान करती है जैसा कि अन्य कोई संस्था नहीं कर पाती है।

ऐसी स्थिति के कई कारण हैं। सीनेट का संगठन न केवल प्रजातान्त्रिक है, वरन् उसे कुछ विशेष शक्तियाँ भी प्राप्त हैं। एफ जे. हरिकन ने इसका उल्लेख इन शब्दों में किया है कुछ कार्य ऐसे हैं। 

जिन्हें राष्ट्रपति और सीनेट बिना प्रतिनिधि सभा की स्वीकृति के कर सकते हैं। कुछ ऐसे कार्य हैं, जिन्हें सीनेट और प्रतिनिधि सभा मिलकर बिना राष्ट्रपति की स्वीकृति के कर सकते हैं, परन्तु राष्ट्रपति और प्रतिनिधि सभा मिलकर भी सीनट की अवहेलना प्रायः नहीं कर सकते हैं।

निष्कर्ष -लार्ड ब्राइस का कहना उचित प्रतीत होता है सीनेट संविधान निर्माताओं के इस मुख्य उद्देश्य में सफल रही है कि वह शासन में आकर्षण का केन्द्र रहे तथा एक ओर प्रतिनिधि सभा की जनतन्त्रीय लापरवाही और दूसरी ओर राष्ट्रपति की राजा के समान बनने की आकांक्षाओं पर प्रतिबन्ध लगाने व ठीक करने में समर्थ एक शक्ति के रूप में कार्य करे। 

सीनेट के सम्बन्ध में डी टाकविल का कथन भी सारगर्भित है, "वाशिंगटन की प्रतिनिधि सभा में प्रवेश करने पर उस महान सभा के गँवारू ढंग पर दृष्टि पड़ती है। इसमें कोई प्रसिद्ध व्यक्ति दिखाई ही नहीं देता। इसके सदस्य अज्ञात लोग होते हैं। इस स्थान से केवल कुछ दूरी पर सीनेट के दरवाजे हैं, जिसके छोटे से स्थान में अमेरिका के अधिकांश प्रसिद्ध व्यक्ति है। 

इसमें शायद ही ऐसा कोई व्यक्ति दिखाई दें, जिसका जीवन परिश्रम व क्रियाशीलता से भरपूर न हो। सीनेट में कुशल वक्ता, एडवोकेट, बड़े-बड़े जनरल मजिस्ट्रेट, प्रसिद्ध राजनीतिज्ञ होते हैं, जिनकी भाषा सदैव यूरोप के महत्वपूर्ण संसदीय वाद-विवादों के लिए आदरणीय होगी।

स्वयं प्रथम राष्ट्रपति वाशिंगटन ने अपने विदेशमन्त्री को सीनेट की आवश्यकता व महत्ता समझाने के लिए कप में से प्लेट में चाय गिराकर जिससे वह ठण्डी हो जाय, उसे सीनेट की संज्ञा दी थी। 

हेनरीमैन के शब्दों में जब से आधुनिक जनतन्त्रीय व्यवस्था का ज्वार आया है। तब से यदि कोई उपयुक्त व पूर्ण सफल संस्था स्थापित हो सकी है, तो वह सीनेट ही है। प्रो. लास्की के अनुसार अमेरिकन सीनेट विश्व के समस्त उच्च सदनों से अधिक सफल संस्था रही है। और अमेरिकन राजनीतिक व्यवस्था में तो यह विशिष्ट रूप से सफल रही है।

लार्ड सभा और सीनेट: एक तुलना

ब्रिटिश संसद के द्वितीय सदन को लार्ड सभा और अमेरिकन कांग्रेस के द्वितीय सदन को सीनेट कहते हैं, परन्तु नाम की समानता के अलावा इनमें असमानताएँ ही अधिक हैं। लार्ड सभा और सीनेट की तुलना निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत की जा सकती है।

(1) स्थापना सम्बन्धी उद्देश्य में अन्तर-ब्रिटेन में द्वितीय सदन लाई सभा की स्थापना संयोगवश हुई है। 1295 ई. में सम्राट एडवर्ड प्रथम ने जो संसद बनायी, जिसे आदर्श संसद कहा जाता है, वह एक सदनात्मक ही थी। 

जिसमें सामन्तों, बैरनों व पादरियों के साथ जनसाधारण के प्रतिनिधि भी थे, परन्तु कालान्तर में सामन्तों व पादरियों (अथवा कहें कि धनिक वर्ग या कुलीन वर्ग) ने अपने हितों की रक्षा के लिए एकत्रित होना प्रारम्भ किया और लार्ड सभा के रूप में अपना एक सदन स्थापित किया।

अमेरिका में द्वितीय सदन की स्थापना का उद्देश्य अमेरिकन संघ में सम्मिलित राज्यों के हितों की गारण्टी करना था। इस संघ में कई राज्य उस समय तक मिलने को तैयार नहीं थे, जब तक कि समानता के आधार पर केन्द्रीय विधानमण्डल (कांग्रेस) में दूसरा सदन स्थापित न कर दिया जाय, क्योंकि प्रथम सदन में जो राज्यों की जनसंख्या के आधार पर प्रतिनिधित्व दिया गया था। 

राज्यों के हितों की सुरक्षा के अलावा, सीनेट की स्थापना का उद्देश्य राष्ट्रपति की हठधर्मी, कुनवापरस्ती और प्रतिनिधि सभा पर भी नियन्त्रण रखना था।

इस सन्दर्भ में यह भी उल्लेखनीय है कि संघात्मक व्यवस्था में द्वितीय सदन अनिवार्य हो गया है। अमेरिका में ही नहीं, स्विस, भारत आदि संघों में भी राज्यों (संघ की इकाइयों) के हितों की देखभाल को लिए केन्द्रीय व्यवस्थापिका में दो ही सदन हैं।

(2) सगठन सम्बन्धी अन्तर- संगठन की दृष्टि से विश्व के द्वितीय सदनों को चार वर्गों में रखा जा सकता है- (i) वंशानुगत, (ii) मनोनीत अथवा नामजद, (iii) अंशत: निर्वाचित, और (iv) पूर्णतः निर्वाचित । ब्रिटिश लार्ड सभा वंशानुगत है, इसके 90 प्रतिशत सदस्य वंशानुगत आधार पर इसके सदस्य हैं, पिता की मृत्यु के बाद ज्येष्ठ पुत्र या पुत्री को लार्ड सभा की सदस्यता मिलती है। 

कनाडा के द्वितीय सदन सीनेट में भी सदस्य नामजद हैं। ये अपने जीवनकाल तक या निर्धारित काल तक इसके सदस्य रहते हैं। भारत की संसद के द्वितीय सदन राज्य सभा में 12 सदस्य नामजद हैं और शेष 238 राज्यों की विधानसभाओं द्वारा निर्वाचित। 

चौथी श्रेणी में अमेरिकन सीनेट (स्विट्जरलैण्ड का द्वितीय सदन भी) आती है, जिसके सभी सदस्यों का निर्वाचन प्रत्यक्ष रूप से होता है। 1913 ई. तक सीनेट के सदस्यों का निर्वाचन भी परोक्ष रूप से होता था। 

परन्तु जैसा कि जार्चर ने कहा है कि, 1885 ई. से और सन् 1910 ई. के बीच में बहुत से धनी व्यक्तियों को सीनेट में स्थान मिल गया, क्योंकि विधानसभा के सदस्यों का समर्थन उसके मूल्य चुकाने के कारण उन्हें प्राप्त हो गया। फलस्वरूप 1913 ई. के 17वें संशोधन द्वारा सीनेटरों का निर्वाचन प्रत्यक्ष रूप से कर दिया गया।

(3) आकार तथा कार्यकाल सम्बन्धी अन्तर-ब्रिटेन की लार्ड सभा में 1000 से भी अधिक सदस्य हैं ( संविधान के द्वारा इसकी सदस्य संख्या निश्चित नहीं है), परन्तु अमेरिकन सीनेट के सदस्यों की संख्या 100 है। 

संविधान में कहा गया है कि प्रत्येक राज्य सीनेट में 2 सदस्य निर्वाचित करके भेजेगा। अमेरिकन संघ में वर्तमान समय में 50 राज्य सम्मिलित हैं। प्रारम्भ में यह 13 राज्यों का ही संघ या और सीनेट में 26 सदस्य ये लार्ड सभा एक स्थायी सदन है। 

जैसा कि कहा जा चुका है कि यह मुख्यतया वंशानुगत है। इसके कुछ सदस्य (जैस न्यायिक लार्ड) आजीवन भर के लिए भी नामजद होते हैं। यों तो अमेरिकन सीनेट भी एक स्थायी सदन है, क्योंकि निचले सदन की तरह यह पूरी तरह कभी-कभी भंग नहीं होता। 

फिर भी सीनेट के एक-तिहाई सदस्य प्रति दूसरे वर्ष रिटायर होते रहते हैं, उनका स्थान नव निर्वाचित सदस्य लेते हैं। इस प्रकार एक सीनेटर का कार्यकाल 6 वर्ष होता है।

(4) शक्तियाँ व कार्य सम्बन्धी अन्तर- जहाँ तक शक्तियों व कार्यों का प्रश्न है, लार्ड सभा विश्व के द्वितीय सदनों में सर्वाधिक कमजोर और सीनेट सर्वाधिक शक्तिशाली द्वितीय सदन है। सीनेट को दो ऐसी महत्वपूर्ण शक्तियाँ प्राप्त हैं, जो किसी भी देश के द्वितीय सदन को प्राप्त नहीं हैं। 

(i) अमेरिकन राष्ट्रपति द्वारा विभिन्न पदों पर की जाने वाली नियुक्तियों में सीनेट की पूर्व अनुमति आवश्यक है।

ऐसा इसलिए कि हैमिल्टन का विचार था कि, "राष्ट्रपति द्वारा की गई नियुक्तियाँ कौटुम्बिक प्रेम से, व्यक्तिगत अनुराग अथवा लोकप्रियता के दृष्टिकोण से प्रभावित हो सकती हैं। अतः जैसा कि मुनरो कहता है कि, "सीनेट का कार्य कार्यक्षमता की गारण्टी करना नहीं है, अयोग्यों को बाहर करना है।

(ii) राष्ट्रपति विदेशों से सन्धियाँ व समझौते भी तभी कर सकता है, जबकि वह सीनेट से पूर्व स्वीकृति ले ले।

1919 ई. में राष्ट्रपति विलसन ने सीनेट की पूर्व अनुमति बिना 'वर्साय की सन्धि' की थी, जिसे सीनेट ने ठुकरा दिया था।

उपर्युक्त के अलावा, सीनेट को विधि-निर्माण, वित्तीय मामलों तथा दूसरे विषयों में भी अधिकार प्राप्त हैं, जो अमेरिका में निचले सदन को प्राप्त हैं। यह ठीक है कि वित्तीय विधेयक पहले निचले सदन में ही पेश होते हैं, जैसे कि ब्रिटेन में। 

परन्तु सीनेट इन विधेयकों में भी साधारण विधेयकों की तरह कोई भी संशोधन कर सकती है। सीनेट की स्वीकृति के बिना कोई भी विधेयक कानून का रूप नहीं ले सकता है। 

जबकि ब्रिटेन में 1949 ई. के संसदीय अधिनियम के अन्तर्गत कॉमन सभा द्वारा पारित साधारण विधेयकों को लाई सभा 1 वर्ष के लिए और धन विधेयक को 30 दिन के ही रोक सकती है। 

अतः यह सदन केवल 'देरी करने वाला सदन' ही है। ब्रिटेन में कार्यपालिका (कैबिनेट) भी केवल कॉमन सभा के प्रति ही उत्तरदायी है। संक्षेप में, ब्रिटेन में संदन का तात्पर्य, कॉमन सभा से ही है।

अमेरिका में, जैसा कि लार्ड ब्राइस कहता है कि, "सीनेट शासन में गुरुत्वाकर्षण का केन्द्र है। एक ओर तो वह प्रतिनिधि सभा की लोकतन्त्रात्मक असावधानी और धृष्टता पर और दूसरी ओर राष्ट्रपति की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं पर रोक लगाने वाली एक सत्ता है।" 

मुनरो कहता है कि सीनेट कांग्रेस की एक समानपदी शाखा है, अधीन नहीं है और निम्न सदन के साथ राष्ट्रीय कानून निर्माण के कार्य में साझेदार है।

(5) लार्ड सभा और सीनेट के कुछ अन्य अन्तर-( (i) अमेरिका में किसी विधेयक के प्रस्ताव पर दोनों सदनों में मतभेद होने पर एक संयुक्त समिति का गठन किया जाता है, जिसमें दोनों सदनों के बराबर-बराबर सदस्य होते हैं, इस समिति का निर्णय ही दोनों सदनों का निर्णय समझा जाता है। ब्रिटेन में संयुक्त समिति का गठन नहीं होता। कॉमन सभा का निर्णय लॉर्ड सभा को देर-सबेर मानना ही होता है।

(ii) अमेरिका में सीनेट को राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, संघीय न्यायाधीशों आदि के विरुद्ध लगाये गये महाभियोगों की सुनवाई का अधिकार है, ब्रिटेन में ऐसी व्यवस्था नहीं है। ब्रिटेन में लार्ड सभा न्यायिक कार्य भी करती है। यद्यपि परम्परा यह है कि न्यायिक कार्यवाहियों में केवल 'कानूनी लार्ड' ही भाग लेते हैं।

(iii) अमेरिका में उपराष्ट्रपति सीनेट का 'पदेन सभापति' होता है, सभाका सभापतित्व लाई चांसलर करता है, जो कि कैबिनेट मंत्री होता है। 

(iv) सीनेट विशेष परिस्थितियों में उपराष्ट्रपति का निर्वाचन। 

(6) संवैधानिक महत्ता सम्बन्धी अन्तर अमेरिकन सीनेट की जो संवैधानिक महत्ता है, वह ब्रिटिश लाई सभा की नहीं। 1911 व 1949 ई. के संसदीय अधिनियमों के बाद तो लार्ड सभा को 'लगाम' लगा दी गयी है।

वह एक 'नपुंसक सदन' बनकर रह गया है। यदि लार्ड सभा को समाप्त भी कर दिया जाय तो ब्रिटिश शासन व्यवस्था में कोई विशेष अन्तर नहीं आयेगा, केवल सर्वोच्च न्यायालय स्थापित करना होगा, परन्तु सीनेट के अभाव में अमेरिकन शासन व्यवस्था को दीमक लग जायेगी और वह धराशायी हो जायेगा।

निष्कर्ष : सीनेट विश्व का सर्वाधिक शक्तिशाली द्वितीय सदन भी करती है।

सीनेट लार्ड सभा ही क्या, विश्व का कोई भी द्वितीय सदन अपने संगठन, शक्तियों, विशेषाधिकारों और संवैधानिक महत्ता में सीनेट का मुकाबला नहीं कर सकता है। 

अपने देश के निचले सदन से भी अधिक शक्तिशाली है। अमेरिका में जैसा कि हरिकन ने कहा है कि, "अनेक कार्य ऐसे भी हैं, जिन्हें सीनेट और प्रतिनिधि सभा कर सकते हैं। 

बिना राष्ट्रपति के सहयोग के, ऐसे भी कार्य हैं, जिन्हें सीनेट और राष्ट्रपति कर सकते है, बिना प्रतिनिधि सभा के सहयोग के, परन्तु ऐसे कोई कार्य नहीं हैं, जिन्हें प्रतिनिधि सभा और राष्ट्रपति कर सकें, बिना सीनेट के सहयोग के।

अमेरिकन सीनेट की जो विशेष शक्तियाँ प्राप्त है- (i) राष्ट्रपति द्वारा की जाने वाली नियुक्तियों और (ii) वैदेशिक सन्धियों व समझौतों पर सीनेट की पूर्व स्वीकृति - ये किसी भी देश में द्वितीय सदन को प्राप्त नहीं है। 

ब्रिटेन में कार्यपालिका पर नियन्त्रण, केवल कॉमन सभा का है, स्विटजरलैण्ड में दोनों सदनों को कार्यपालिका पर नियन्त्रण सम्बन्धी अधिकार समान हैं, परन्तु अमेरिका में इस सम्बन्ध में निचले सदन को नहीं, केवल सीनेट को ही अधिकार प्राप्त है। 

प्रो. लॉस्की ने ठीक कहा है कि "अपने अन्तर्राष्ट्रीय प्रभाव के क्षेत्र में विश्व का कोई भी विधानमण्डल सीनेट की बराबरी नहीं कर सकता है। प्रो. स्ट्रांग के शब्दों में सीनेट को बहुत अधिक शक्तियाँ प्राप्त हैं। 

सम्भवतया विश्व का कोई ऐसा द्वितीय सदन नहीं होगा, जो राष्ट्रीय सरकार के सभी मामलों में वास्तविक और सीधा महत्वपूर्ण प्रभाव रखता हो । विदेशी मामलों से लेकर संघीय कानून निर्माण तथा वित्त तक सरकारी क्षेत्र की प्रत्येक छोटी-से-छोटी बात पर सीनेट का प्रत्यक्ष प्रभाव है।

सीनेट अपने छोटे आकार, लम्बे कार्यकाल, प्रत्यक्ष निर्वाचन, दलबन्दी से दूर, उच्च वाद-विवादों और अपनी शक्तियों के उचित प्रयोग से विश्व के लिये आकर्षण का केन्द्र बनी हुई है। यह स्वीकार करना होगा कि विश्व के द्वितीय सदनों में जो सीनेट का संवैधानिक महत्व है। 

वह किसी भी देश में द्वितीय सदन का नहीं है और जितनी शक्तियाँ उसे प्राप्त है, किसी भी देश में द्वितीय सदन को प्राप्त नहीं हैं। अमेरिकन सीनेट को देखकर विश्व के दूसरे द्वितीय सदनों को अवश्य ही उससे ईर्ष्या होती रहेगी।

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