सामाजिक संरचना क्या है - सामाजिक संरचना की विशेषताएं

समाज व्यक्तियों के बीच पाई जाने वाली सामाजिक सम्बन्धों की व्यवस्था है ये सम्बन्ध आपस में सामाजिक अन्तः क्रिया के फलस्वरूप स्थापित होते हैं तथा व्यक्तियों में पारस्परिक निर्भरता पाई जाती है फलस्वरूप वे आपस में सम्बद्ध और सुव्यवस्थित रहते हैं।

इसी प्रकार समाज के विभिन्न अंग आपस में पारस्परिक निर्भरता के आधार पर सम्बद्ध और सुव्यवस्थित रहते हैं जिससे समाज की सामाजिक व्यवस्था सुदृढ़ होती है। यही समाज की संरचना का मूलाधार है। अतएव यह कहा जा सकता है कि सामाजिक सम्बन्धों का व्यवस्थित जाल ही सामाजिक संरचना है।

सामाजिक संरचना क्या है

जिस प्रकार से भौतिक वस्तुओं के बाह्य ढाँचे को उसकी संरचना कहते हैं, ठीक उसी प्रकार समाज का भी अपना एक बाहरी ढाँचा होता है जिसे सामाजिक संरचना कहा जाता है। सामाजिक संरचना की धारणा अत्यन्त व्यापक और जटिल होती है क्योंकि समाज अत्यन्त जटिल व्यवस्था है। 

कुछ भी हो जहाँ कहीं भी सामाजिक संरचना शब्द का प्रयोग किया जाता है वहाँ समाज के विभिन्न अंगों के बीच पाई जाने वाली सुव्यवस्था का बोध होता है। 

इसी आधार पर प्रसिद्ध मानवशास्त्री ब्राऊन ने सामाजिक संरचना को परिभाषित करते हुए कहा है कि- सामाजिक संरचना का अंग मनुष्य ही है तथा स्वयं संरचना संस्थात्मक रूप से परिभाषित तथा नियमित व्यक्तियों के बीच पाई जाने वाली सम्बन्धों की एक व्यवस्था है। 

जिन्सबर्ग  के शब्दों में सामाजिक संगठन के प्रमुख स्वरूपों अर्थात् समूहों, समितियों और संस्थाओं के संकुल से होता है। 

कार्ल मानहीम के अनुसार - सामाजिक संरचना पारस्परिक अन्तः क्रियात्मक शक्तियों का जाल है। जिससे अवलोकन और चिन्तन की विविध पद्धतियों का जन्म होता है। मैकाइवर और पेज के शब्दों में समूह निर्माण के विभिन्न तरीके सम्मिलित रूप में सामाजिक संरचना के जटिल प्रतिमान का निर्माण कहते हैं। 

सामाजिक संरचना के विश्लेषण में सामाजिक प्राणियों की विविध प्रकार की मनोवृत्तियों तथा अभिरुचियों के कार्य प्रकट होते हैं।

टालकॉट पार्सन्स के शब्दों में सामाजिक संरचना का तात्पर्य परस्पर सम्बन्धित संस्थाओं, एजेन्सियों, सामाजिक प्रतिमानों और समूहों में प्रत्येक व्यक्ति द्वारा ग्रहण किये जाने वाले पदों एवं भूमिकाओं की क्रमबद्धता है। 

हैरी एम. जॉनसन के अनुसार - किसी भी वस्तु की संरचना उसके अंगों में पाये जाने वाले अपेक्षाकृत स्थायी अन्तः सम्बन्धों को कहते हैं। साथ ही अंग शब्द में स्वयं ही कुछ न कुछ स्थिरता की मात्रा का समावेश है। 

चूँकि सामाजिक व्यवस्था लोगों की अन्तःसम्बन्धित क्रियाओं से बनती है। इस कारण उसकी संरचना को इन क्रियाओं में पायी जाने वाली नियमितता की मात्रा या पुनरुत्पत्ति में खोज करना चाहिए।

सामाजिक संरचना की विशेषताएं लिखिए

सामाजिक संरचना की धारणा को समझाने के पश्चात् इसकी प्रमुख विशेषताओं को सरलता से समझा जा सकता है। सामाजिक संरचना की कुछ मूलभूत विशेषताएँ निम्नलिखित हैं -

1. सामाजिक संरचना एक अमूर्त धारणा है - चूँकि सामाजिक संरचना की निर्मायक इकाइयाँ संस्थायें, एजेन्सियों तथा प्रतिमान आदि होती हैं जो अमूर्त होते हैं। अतः सामाजिक संरचना भी अमूर्त होती है। 

चूँकि सामाजिक संरचना कोई वस्तु या व्यक्तियों का संगठन न होकर यह मात्र प्रतिमानों, नियमों, कार्य प्रणालियों तथा पारस्परिक सम्बन्धों की एक क्रमबद्धता स्वरूप है। अतएव यह अमूर्त होती है। इस सम्बन्ध में राइट महोदय का भी कथन है कि सामाजिक संरचना का अर्थ एक दशा या स्थिति से है। 

अतएव निश्चित रूप से अमूर्त होती है। इस प्रकार मैकाइवर और पेज का विचार है कि जिस प्रकार हम समाज को नहीं देख सकते हैं ठीक उसी प्रकार हम किसी समाज की सामाजिक संरचना को मूर्त रूप से नहीं देख सकते हैं अतः स्पष्ट है कि सामाजिक संरचना का अमूर्त धारणा है। 

2. सामाजिक संरचना समाज के बाह्य ढाँचे का बोध कराती है - सामाजिक संरचना मात्र समाज के बाह्य स्वरूप का बोध कराती है। इनका सम्बन्ध समाज के क्रियाशील अंगों के कार्यों से न होकर सामाजिक संरचना की निर्मायक इकाइयों की एक क्रमबद्धता है। 

जिस प्रकार शारीरिक संरचना का तात्पर्य शरीर के विभिन्न अंगों की क्रमबद्धता से होता है उनके क्रियाकलापों से नहीं ठीक उसी प्रकार सामाजिक संरचना से भी समाज के बाह्य ढाँचे या बाह्य स्वरूप का बोध होता है।

3. प्रत्येक समाज की सामाजिक संरचना भिन्न-भिन्न होती है - सभी समाजों की सामाजिक संरचना एक-सी न होकर भिन्न-भिन्न होती है क्योंकि प्रत्येक समाज के सामाजिक मूल्य, प्रतिमान, संस्थाएँ तथा एजेन्सियाँ एक-सी नहीं होती हैं इनमें कुछ न कुछ भिन्नता अवश्य होती है। 

अतएव इनके द्वारा निर्मित होने वाली सामाजिक संरचना स्वाभाविक रूप से भिन्न-भिन्न होगी। जिस प्रकार से प्रत्येक शरीर की बाह्य बनावट एक-दूसरे से कुछ न कुछ भिन्न होती है ठीक उसी प्रकार प्रत्येक समाज की सामाजिक संरचना भिन्न-भिन्न होती है।

4. सामाजिक संरचना अपेक्षाकृत एक स्थिर धारणा है - सामाजिक संरचना अपेक्षाकृत एक स्थिर धारणा है। इस बात से लगभग सभी विचारक सहमत हैं। इसकी स्थिर धारणा को दो प्रमुख आधारों पर स्पष्ट किया जा सकता है। 

प्रथम जॉनसन के मतानुसार, सामाजिक संरचना का निर्माण जिन समूहों से होता है वे अधिक स्थाई होते हैं भले ही इन समूहों की निर्माणक इकाइयों में परिवर्तन होता रहे। जैसे परिवार के कर्ता की मृत्यु हो जाती है तो उनके स्थान पर परिवार का अन्य सदस्य कर्ता बन जाता है किन्तु परिवार में परिवर्तन नहीं होता। 

अतएव सामाजिक संरचना में जल्दी परिवर्तन नहीं होता। दूसरे नैडेल के विचार से सामाजिक संरचना तुलनात्मक रूप से एक स्थिर धारणा है क्योंकि इसके अन्तर्गत किसी सम्पूर्ण समाज के विभिन्न अंगों के पारस्परिक सम्बन्धों पर हम विचार करते हैं। 

जो समाज के स्थायी प्रतिमानों से प्रभावित होते हैं न कि परिवर्तनशील विशेषता से। अतः सामाजिक संरचना अपेक्षाकृत एक स्थिर धारणा होती है।

5. सामाजिक क्रियाओं की महत्ता - सामाजिक संरचना के अन्तर्गत सामाजिक प्रक्रियाएँ अत्यन्त महत्वपूर्ण तत्व होती हैं। ओल्सन का तो कथन है कि सामाजिक संरचना, प्रक्रियाओं का मात्र एक बाह्य रूप है। वास्तविकता यह है कि सामाजिक प्रक्रियाओं की क्रियाशीलता के परिणामस्वरूप ही सामाजिक संरचना का निर्माण होता है। 

इन प्रक्रियाओं का जैसा भी संगठनात्मक या विघटनात्मक स्वरूप होगा उसी के अनुरूप एक विशेष समाज की संरचना का निर्माण होगा। अतः सामाजिक संरचना के अन्तर्गत सामाजिक प्रक्रियाओं की विशेष महत्ता होती है।

6. सामाजिक संरचना, सामाजिक व्यवस्था की आधार स्तम्भ होती है - सामाजिक संरचना, सामाजिक व्यवस्था की मूलाधार होती है। किसी भी समाज की स्थिरता और निरन्तरता उसके निर्मायक अंगों के उत्तरदायित्वों पर आधारित होती है। 

जब समाज तथा सामाजिक संरचना के निर्मायक अंग अपने पद के अनुरूप भूमिका निभाते हैं तो सामाजिक व्यवस्था बनी रहती है और जहाँ पद के अनुरूप भूमिका निभाना बन्द कर देते हैं वही सामाजिक व्यवस्था अस्त-व्यस्त हो जाती है। अतः स्पष्ट है कि सामाजिक संरचना सामाजिक व्यवस्था की आधार स्तम्भ होती है।

7. सामाजिक संरचना विभिन्न उपसंरचनाओं से बनती है - सामाजिक संरचना कोई अखण्ड इकाई या व्यवस्था नहीं, इसका निर्माण अनेक छोटी-छोटी इकाइयों से होता है तथा सामाजिक संरचना का निर्माण करने वाली प्रत्येक इकाई की भी अपनी-अपनी एक अलग उपसंरचना होती है। 

जैसे- संस्था, समिति, परिवार, क्लब आदि की अपनी पृथक संरचना होती है। इसी प्रकार सामाजिक प्रतिमानों, जैसे नातेदारी, विवाह आदि की भी पृथक एक संरचना होती है। इन समस्त इकाइयों की उप संरचनाओं से मिलकर सम्पूर्ण समाज की सामाजिक संरचना का निर्माण होता है।

8. सामाजिक संरचना संगठन को सुदृढ़ बनाती है - प्रत्येक समाज में निरन्तर अन्तः क्रियाएँ होती हैं। इन्हीं अन्तःक्रियाओं के द्वारा सामाजिक संरचना के विभिन्न अंग क्रमबद्ध रूप से सुव्यवस्थित होकर सामाजिक संगठन को सुदृढ़ तथा शक्तिशाली बनाये रखने का प्रयत्न करते हैं। 

सामाजिक संरचना के अभाव में सामाजिक संगठन की कल्पना नहीं की जा सकती क्योंकि सामाजिक संरचना के अन्तर्गत प्रत्येक अंग अपने- अपने पद के अनुरूप भूमिका निभाते हैं जिससे समाज में संगठन बना रहता है। इस प्रकार सामाजिक संरचना समाज को संगठित रखकर उसे स्थायित्व और निरन्तर प्रदान करती है।

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