मैकियावेली के राजनीतिक विचारों को लिखिए

जब मैकियावेली का अभ्युदय हुआ था, तब इटली कई छोटे-छोटे राज्यों में बँटा हुआ था और ये छोटे-छोटे राज्य भी परस्पर संघर्ष में उलझे रहते थे। इटली में एकता स्थापित करने तथा उसे समृद्ध बनाने के लिए मैकियावेली चाहता था कि इटली में एक अत्यन्त शक्तिशाली शासक पैदा हो। 

एक शक्तिशाली नरेश के निर्माण के उद्देश्य से ही उसने 'प्रिंस' की रचना की। इसके माध्यम से उसने राजा को कुछ महत्त्वपूर्ण निर्देश दिये हैं और उसका विश्वास था कि यदि राजा इन निर्देशों के अनुसार शासन करेगा तो वह अवश्य सफल होगा। इसीलिए 'प्रिंस' को शासन-कला पर लिखा गया ग्रन्थ कहा जाता है।

मैकियावेली द्वारा राजा को जो निर्देश दिए गए हैं, उनके द्वारा ही उसके राजा सम्बन्धी विचार स्पष्ट होते हैं, ये निर्देश अथवा परामर्श निम्नलिखित हैं

(1) राजस्व एकत्र करने की कला - प्रत्येक शासक के लिए राजस्व एकत्र करना आवश्यक है। परन्तु मैकियावेली के अनुसार राजा को बड़ी सूझ-बूझ से काम लेना चाहिए। शासक को चाहिए कि वह ध्यान रखे कि लोग अपने पैसे को सरलता से नहीं देना चाहते। 

राजस्व एकत्रित करते समय शासक को प्रजा की सम्पत्ति कभी नहीं छीननी चाहिए, क्योंकि मैकियावेली के अनुसार, "एक व्यक्ति अपने पिता के हत्यारे को क्षमा कर सकता है परन्तु अपनी पैतृक सम्पत्ति छीनने वाले को नहीं ।” 

(2) प्रेम और भय का महत्त्व - राजा को चाहिए कि जनता उसे प्रेम भी करे और उससे भयभीत भी रहे। यदि ये दोनों सम्भव न हो तो जनता को भयभीत रखना अधिक उपयुक्त है। 

राजा के आसपास कृपापात्र लोग राजा से जो स्नेह और प्रेम करते हैं वह तात्कालिक होता है और स्वार्थवश होता है। वह प्रेम राजा के कारण नहीं बल्कि उसकी विशेष स्थिति के कारण होता है। 

लोग विजयी और सफल व्यक्ति की जय-जयकार करते हैं। इस कृत्रिम प्रेम की तुलना में वास्तविक भय ज्यादा अच्छा है। शासक के भय के कारण जनता उसकी आज्ञाओं का पालन करती है। वह भय बना रहना चाहिए ताकि शासक की आज्ञाओं का निरन्तर पालन होता रहे।

(3) युद्ध की तैयारी - एक अच्छे शासक को सदा युद्ध के लिए तैयार रहना चाहिए। जो शासक युद्ध की तैयारी नहीं रखता वह अपने राज्य की रक्षा नहीं कर सकता। राज्य में कानूनों का पालन भी मैकियावेली के अनुसार सैनिक शक्ति पर ही निर्भर करता है। इसलिए शासक को चाहिए कि वह अपने राज्य में मजबूत सेनाओं की व्यवस्था करे । 

मैकियावेली के अनुसार चार प्रकार की सेना होती है-राष्ट्रीय सेना, मिश्रित सेना, सहायक सेना, किराये की सेना। इसमें राष्ट्रीय सेना सर्वोत्तम है और किराये की सेना सबसे बुरी ।

(4) लोमड़ी की तरह चतुर और शेर की तरह बहादुर-मैकियावेली के अनुसार राजा को लोमड़ी की तरह चतुर और शेर की तरह बहादुर होना चाहिए। जनता में अपना विश्वास बनाये रखने के लिए यह आवश्यक है कि राजा ऐसे उपाय करता रहे जिससे जनता की उसके प्रति आस्था बनी रहे। 

दो ही तरीकों से राजा जनता को अपने वश में कर सकता है- पहला कानून के अनुसार चलकर अथवा कानून के पालन द्वारा और दूसरा शक्ति द्वारा। पहला मनुष्यों के लिए और दूसरा जानवरों के लिए है। समाज में मनुष्य और जानवर दोनों ही होते हैं। इसलिए राजा को कानून और शक्ति दोनों का ही सहारा लेना चाहिए ।

राजा को चाहिए वह लोमड़ी की तरह चतुर हो ताकि वह सम्भावित खतरों को पहचान सके और शेर की तरह सशक्त हो ताकि लोग उससे भय करें किन्तु साथ ही राजा को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि लोग उससे भयभीत रहें किन्तु उससे घृणा न करें। 

(5) जनता का ध्यान दूसरे कार्यों में लगाये - जनता का ध्यान शासन और राज्य के कार्यों से हटाना अत्यन्त आवश्यक है। जनता यदि शासक और शासकीय कार्यों के बारे में सोचती रहे तो उसमें दोष निकालने का प्रयत्न कर सकती है। इसलिए जनता का ध्यान वह अन्य कार्यों की ओर लगाये । 

समय-समय पर वह संगीत, नृत्य, नाटक, नोटंकी आदि का आयोजन करता रहे। पुराने रोमन सम्राट सीजर ने कहा भी था, “जनता को दो ही चीजें चाहिए रोटी और तमाशा ।" यह दोनों यदि उसे मिलते रहें तो जनता कभी राजा के बारे में सोचने की धृष्टता नहीं करेगी।

(6) धर्म का महत्त्व समझे - राजा को चाहिए कि वह अनावश्यक रूप से समाज की परम्पराओं और धार्मिक कार्यों में हस्तक्षेप न करे, क्योंकि उसे यह ज्ञात होना चाहिए कि इस सम्बन्ध में जनता बहुत भावुक होती है। हाँ राजा को स्वयं धर्म की शक्ति को राज्य के लिए प्रयोग करने के लिए तत्पर रहना चाहिए। 

इसके लिए वह कभी-कभी धार्मिक उत्सवों में भाग लेने का दिखावा भी कर सकता है, वह कुछ ऐसे कार्य भी कर सकता है जिससे प्रतीत हो कि राजा अत्यन्त धार्मिक है ताकि समय आने पर वह जनता की धार्मिक भावनाओं का राज्य के हित में प्रयोग कर सके।

(7) सफल अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति - राजा को एक अत्यन्त सफल विदेशी नीति का पालन करना चाहिए। कोई भी शासक जो अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति को नहीं समझता, जो दूसरे राज्यों की ताकत और आकांक्षाओं के प्रति सचेत नहीं है वह कभी भी अपने राज्य की रक्षा नहीं कर सकता है, 

इसके लिए आवश्यक है कि राजा अपनी शक्ति बनाये रखे। पड़ौसी राज्यों को आपसी सन्धि न करने दे, दूसरे राज्यों को अपना मित्र बना ले, विरोधी राज्यों के अन्दर फूट डालने का काम भी जारी रखे ।

(8) क्रूर उपायों का प्रयोग-मैकियावेली के अनुसार राजा को एक कुशल प्रशासक होना चाहिए तथा उसे तुरन्त निर्णय लेने की आदत होनी चाहिए। उसे यह ध्यान रखना चाहिए कि कभी भी तुरन्त और अति महत्त्वपूर्ण निर्णय उसे करने पड़ सकते हैं।

इससे भी बढ़कर आवश्यकता पड़ने पर राजा को अत्यधिक शक्ति का प्रयोग करने से कभी नहीं चूकना चाहिए। उसे इस सम्बन्ध में निश्चित रहना चाहिए कि बहुत बर्बरता और पाशविकता का प्रयोग करने पर भी यदि वह अपनी राज्य की एकता बनाए रख सकता है और विजयी रह सकता है, तो जनता उसका आदर करेगी।

मैकियावेली द्वारा राजा को दिये गये सभी परामर्श का सार उसी के एक वाक्य में इस प्रकार व्यक्त किया जा सकता है, “राजा का कार्य राज्य की रक्षा करना है, सभी साधन उचित और सम्मानित होंगे।"

राजा को दिये गये ये परामर्श किसी आदर्शवादी अथवा नीतिवादी व्यक्ति को बुरे लगना बहुत स्वाभाविक है। किन्तु यह भी ध्यान में रखना जरूरी है कि यह संसार केवल आदर्श के सहारे नहीं चलता। 

मैक्सी के शब्दों में, “मैकियावेली के उपदेशों को सैद्धान्तिक रूप से सामान्यतः अस्वीकार किया जाता है, पर व्यवहार में उसका नियमित रूप से अनुसरण किया जाता है।"

मैकियावेली के अनुसार शासक के गुण

राज्य की सुरक्षा का दायित्व राजा पर है। राजा अपने इस कर्त्तव्य की पूर्ति तभी कर सकता है, जबकि वह श्रेष्ठ गुणों और योग्यताओं से युक्त हो । मैकियावेली ने शासक के लिए अनेक गुणों का वर्णन किया है। उसने उन उपायों का भी उल्लेख किया है, जिनके द्वारा राज्य को सुदृढ़ता प्रदान की जा सकती है।

राज्य का निर्माण कर लेने के पश्चात् शासक को बल प्रयोग द्वारा अपने विरोधियों का दमन करना चाहिए। शासक में शीघ्र निर्णय लेने की क्षमता होनी चाहिए। चाहे उसका निर्णय गलत ही क्यों न हो। मैकियावेली ने राजा को निम्नलिखित व्यावहारिक परामर्श दिये हैं

(1) राजा को जहाँ तक हो सके कम राजस्व वसूल करना चाहिए। 

(2) राजा को स्त्रियों पर कुदृष्टि नहीं डालनी चाहिये । 

(3) राजा को चाहिए कि वह प्रजा की सम्पत्ति को नहीं छीने क्योंकि मैकियावेली का विचार है कि कोई व्यक्ति अपने पिता के हत्यारे को क्षमा कर सकता है परन्तु अपनी पैतृक सम्पत्ति छीनने वाले को कभी क्षमा नहीं कर सकता। 

(4) जहाँ तक हो सके राजा को प्रजा की प्रचलित परम्पराओं का आदर करना चाहिए। 

(5) प्रजा के मन में शासक के प्रति इतना भय होना चाहिए कि वह राजा द्वारा निर्मित कानून का उल्लंघन करने का दुस्साहस न करे। 

(6) वह जनता के समक्ष दया, शुभचिन्तकता, मानवीयता, धर्मपरायणता आदि का प्रदर्शन करता रहे परन्तु आवश्यकता पड़ने पर उसके प्रतिकूल आचरण करने से भी न चूके। 

(7) शासक को प्रशासनिक मामलों में गोपनीयता बरतनी चाहिए। उसे अपने परामर्शदाताओं से परामर्श तो लेना चाहिए परन्तु उसका अन्धानुकरण नहीं करना चाहिए। उसे अपने विवेक का प्रयोग करना चाहिए। 

(8) राजा में शेर तथा लोमड़ी दोनों के गुणों का मिश्रण होना चाहिए। उसे लोमड़ी की तरह चतुर तथा शेर के समान वीर होना चाहिए ताकि वह अपने विरुद्ध फैलाये जाने वाले जालों को तुरन्त पहचान ले और अपने विरोधियों पर तुरन्त नियन्त्रण स्थापित कर ले । 

(9) शासक को चापलूसी से सदैव बचना चाहिए। उसे हर किसी पर विश्वास नहीं कर लेना चाहिए। चापलूसों से बचने के लिए उसे लोगों में मन में विश्वास बैठाना चाहिए कि, "सत्य बात कहना किसी व्यक्ति को विपत्ति में नहीं डालता।” 

(10) शासक में अपने शत्रुओं तथा मित्रों में अन्तर करने की क्षमता होनी चाहिए। शत्रुओं को पहचान कर तुरन्त उसका दमन करना चाहिए। 

(11) दण्ड देने जैसे अप्रिय कार्य राजा को स्वयं नहीं करना चाहिए क्योंकि इससे राजा को अपयश प्राप्त होता है। ऐसे कार्य सदैव अपने अफसरों से कराये जाने चाहिये। 

(12) राजा को पुरस्कार तथा उपाधि वितरण जैसे कार्य स्वयं करने चाहिये क्योंकि इससे नरेश की प्रतिष्ठा तथा लोकप्रियता में वृद्धि होती है। 

(13) देश की समृद्धि के लिये राजा को वाणिज्य और व्यवसाय की उन्नति में रुचि लेना चाहिये, परन्तु स्वयं इस चक्कर में नहीं पड़ना चाहिये । 

(14) अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में राजा को शक्ति सन्तुलन बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए। 

(15) राजा को चाहिए कि वह यदा-कदा धार्मिक कार्यों में भाग लेता रहे अथवा भाग लेने का ढोंग करता रहे, क्योंकि धर्म एक सामाजिक दुर्बलता है जिसका बुद्धिमानी से शक्ति के रूप में प्रयोग किया जाना चाहिये ।

यदि मैकियावेली की कल्पना का शासक उपर्युक्त क्षमताओं से युक्त हो तो निःसन्देह वह एक सफल शासक हो सकता है।

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