ब्रिटिश न्याय-व्यवस्था की मुख्य विशेषताएँ- british nyay vyavastha ki visheshtaen

ब्रिटिश सरकार की कार्यपालिका व व्यवस्थापिका के बाद तीसरा अंग न्यायपालिका है जिसका मुख्य कार्य संसद द्वारा पारित अधिनियमों का प्रयोग करना है। वे अपने आप प्रयुक्त नहीं होते हैं, वरन् व्यक्तियों द्वारा प्रयोग में लाये जाते हैं। 

न्यायपालिका विधि के संदिग्ध स्थलों की व्याख्या करती है तथा उन व्यक्तियों को राज्य की विधि के अनुसार दण्ड देती है जो उसका पालन नहीं करते हैं। 

वह नागरिकों के पारस्परिक झगड़ों व वाद-विवादों का भी निर्णय करती है तथा उन व्यक्तियों की रक्षा करती है जिन पर कार्यपालिका की ओर से अन्याय किया गया है ।

ब्रिटिश न्याय-व्यवस्था की मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। 

 ब्रिटिश न्याय व्यवस्था की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित है

1. एकसमान न्याय-पद्धति का स्वभाव - ब्रिटिश न्याय व्यवस्था की सबसे प्रमुख विशेषता यह है कि समस्त न्यायालयों की पद्धति एकसमान नहीं है। इंग्लैण्ड तथा वेल्स में न्यायालयों का संगठन एक समान है, जबकि स्कॉटलैण्ड में इनका संगठन दूसरे ही प्रकार का है । 

2. प्रशासनिक न्यायालयों का अभाव- इंग्लैण्ड में प्रशासकीय न्यायालयों का सर्वथा अभाव है। राजकर्मचारियों के विरुद्ध न्यायिक कार्यवाही साधारण न्यायालयों में ही की जाती है। इसके द्वारा व्यक्तिगत स्वतन्त्रता की रक्षा होती है और सबके लिए समान विधियों की व्यवस्था है।

3. न्याय विभाग का सुसंगठित संगठन-ग्रेट ब्रिटेन में न्याय विभाग का सुसंगठित संगठन है और उसके लिए एक कार्य-विधि को अपना लिया गया है।

4. न्यायिक समीक्षा का अभावग्रेट ब्रिटेन के न्यायालयों को जुडिशियल रिव्यू का अधिकार प्राप्त नहीं है। इसका अभिप्राय है कि यहाँ के न्यायालयों को संसद द्वारा पारित अधिनियमों के विरुद्ध निर्णय करने का अधिकार नहीं है। यहाँ संसद पूर्ण प्रभावशाली संस्था है। 

5. न्यायाधीशों की निष्पक्षता-इंग्लैण्ड के न्यायाधीशों की निष्पक्षता प्रसिद्ध है। इसका अनुकरण विश्व के अन्य देशों ने किया है।

6. न्यायाधीशों की स्वतन्त्रता - ब्रिटेन के न्यायाधीशों पर कार्यकारिणी का कोई नियन्त्रण नहीं है, क्योंकि उनके कार्यकाल में उनके वेतन तथा पद स्थायी हैं। कार्यकारणी उन पर अभियोग लगाये बिना उनको उनके कार्यों में सहायता प्रदान करती है ।

7. जूरी प्रथा- ब्रिटेन में जूरी प्रथा की भी व्यवस्था है। ये मुकदमों की सत्यता तथा न्यायाधीशों को उनके कार्यों में सहायता प्रदान करते हैं।

न्यायालयों का संगठन

ग्रेट ब्रिटेन में न्यायालयों का संगठन एक समान नहीं है। इंग्लैण्ड और वेल्स में एक प्रकार का संगठन है। स्कॉटलैण्ड में दूसरे प्रकार का और उत्तरी आयरलैण्ड में तीसरे ही प्रकार का संगठन है। यहाँ मुख्यतः इंग्लैण्ड और वेल्स की न्याय व्यवस्था का वर्णन किया जायेगा । 

इंग्लैण्ड में न्यायालय तीन प्रकार के होते हैं

1. दीवानी के न्यायालय - इस प्रकार के न्यायालयों में नागरिकों के पारस्परिक वाद-विवादों का निर्णय किया जाता है। इसमें वादी और प्रतिवादी दोनों ही साधारण व्यक्ति होते हैं। ये दीवानी मुकदमे, लेन-देन समझौते का भंग करना, किसी व्यक्ति को धोखा देना, किसी की सम्पत्ति पर कब्जा कर लेना, विरासतं, ऋण आदि के सम्बन्ध में होते हैं। 

2. फौजदारी न्यायालय - इस प्रकार के न्यायालयों में कत्ल, चोरी, डकैती, जालसाजी आदि के मुकदमें होते हैं। ये मुकदमे क्राउन और व्यक्ति के मध्य होते हैं। वादी क्राउन होता है और प्रतिवादी एक या अनेक व्यक्ति होते हैं।

3. प्रिवी परिषद् की न्यायिक समिति - उक्त दोनों न्यायालयों के अतिरिक्त ब्रिटेन में एक अन्य न्यायालय भी होता है जिसको प्रिवी परिषद् की न्यायिक समिति के नाम से सम्बोधित किया जाता है। 

इस समिति में ब्रिटिश साम्राज्य के अधीनस्थ प्रदेशों के उच्चतम न्यायालयों द्वारा किये गये निर्णयों के विरुद्ध अपील सुनी जाती है। इसके अतिरिक्त इसमें अन्य अपीलें भी सुनी जाती हैं, जो इस प्रकार हैं-

(i) ब्रिटेन के चर्च सम्बन्धी न्यायालयों के निर्णय के विरुद्ध अपीलें।

(ii) आईलैण्ड ऑफ मैन और इंगलिश चैनल के द्वीपों के न्यायालयों द्वारा किये गये निर्णयों के विरुद्ध अपीलें ।

(iii) प्राइज न्यायालयों के निर्णय के विरुद्ध अपीलें । इस समिति के सदस्यों की संख्या 20 होती है। इनके सदस्य करीब-करीब वे ही व्यक्ति होते हैं जो इंग्लैण्ड की उच्चतम न्यायालयों के रूप में बैठते हैं ।

उपर्युक्त रेखाचित्रों द्वारा प्रकट हो जाता है कि इंग्लैण्ड में दीवानी तथा फौजदारी के सम्बन्ध में लॉर्ड सभा उच्चतम न्यायालय है । जब लॉर्ड सभा इस दृष्टि से कार्य करती है तो उस समय लॉर्ड चान्सलर अध्यक्ष का आसन ग्रहण करता है। 

इसमें लॉर्ड्स और कुछ ऐसे अन्य पीयर्स बैठते हैं जो उच्च न्यायालय में न्यायाधीश के पद पर कार्य कर चुके हैं। ऐसी ही व्यवस्था प्रिवी परिषद् की न्याय समिति के सम्बन्ध में है। 

इसमें कम-से-कम एक न्यायाधीश किसी उपनिवेश का होता है या उस राज्य का होता है जहाँ से अपील आयी है और इसके द्वारा उसका निर्णय किया जाता है। निम्नांकित शीर्षकों के अन्तर्गत इनके सम्बन्ध में अलग-अलग किन्तु संक्षिप्त रूप में प्रकाश डाला जायेगा

(क) दीवानी के न्यायालय - दीवानी के न्यायालय विभिन्न स्तर के होते हैं। सबसे छोटी दीवानी के न्यायालय काउण्टी कहलाते हैं। 200 पौंड से कम राशि वाले मुकदमों की सुनवाई इन न्यायालयों में की जा सकती है। 

यद्यपि इनका नाम काण्उटी न्यायालय है, किन्तु इससे यह नहीं समझना चाहिए कि एक काउण्टी में एक ही न्यायालय है। न्याय की दृष्टि से इंग्लैण्ड और वेल्स के प्रदेश 500 विभागों में विभाजित हैं। इनमें से प्रत्येक एक विभाग में एक काउण्टी न्यायालय है।

 इन 500 विभागों को 60 सरकिटों में विभाजित किया गया है और प्रत्येक सरकिट के अन्तर्गत 8 या 9 काउण्टी न्यायालय हैं। एक सरकिट का एक न्यायाधीश होता है जो लॉर्ड चान्सलर द्वारा नियुक्त किया जाता है। सरकिट न्यायाधीश को अपने सरकिट की प्रत्येक काउण्टी में कम-से-कम एक बार अपना न्यायालय अवश्य लगाना पड़ता है। 

प्रत्येक सरकिट न्यायालय में एक पेशकार होता है जो मुकदमों को रजिस्टर्ड करता है और उसको छोटे-छोटे मुकदमों का आपस में समझौता करवाकर निर्णय करने का अधिकार है। सरकिट न्यायाधीशों के निर्णय का पुनर्वाद हाई कोर्ट ऑफ जस्टिस के न्यायालय में किया जाता है 

हाईकोर्ट ऑफ जस्टिस - हाईकोर्ट ऑफ जस्टिस के तीन विभाग हैं- (i) चान्सलरी डिवीजन, (ii) किंग्स बैंच डिवीजन, (iii) प्रोबेट डाईवोर्स और एडमिरल्टी डिवीजन काउण्टी न्यायालय के निर्णय का जो पुनर्वाद किया जाता है। 

वह इन तीनों न्यायालयों में से एक में सुना जाता है। मुदकमों की रकम (धनराशि) 200 पौंड से अधिक होती है। वे सीधे हाईकोर्ट ऑफ जस्टिस में सुने जाते हैं।

कोर्ट ऑफ अपील — हाईकोर्ट ऑफ जस्टिस के निर्णयों का पुनर्वाद कोर्ट ऑफ अपील में किया जाता है। पुनर्वाद की सुनवाई में मुकदमे के तथ्यों पर वाद-विवाद नहीं किया जाता है।

हाउस ऑफ लॉर्ड्स - दीवानी मुकदमों की अन्तिम अपील लॉर्ड सभा में की जा सकती है। इसमें केवल कानूनी पहलू पर ही विचार किया जाता है और किसी अन्य बात पर नहीं। उनका निर्णय अन्तिम होता है और उनके निर्णय के विरुद्ध पुनर्वाद नहीं हो सकता है। यह इंग्लैण्ड का अन्तिम तथा उच्चतम न्यायालय है।

(ख) फौजदारी न्यायालय - फौजदारी न्यायालय का ढाँचा इस प्रकार है

1. पैटी सैशन्स या कोर्ट ऑफ समरी जुरिस्डिक्शंस - ये न्यायालय सबसे छोटे न्यायालय होते हैं और इनमें स्थानीय मजिस्ट्रेट जिनको जस्टिसेज ऑफ पीस कहते हैं, न्याय करते हैं। ये इंग्लैण्ड और वेल्स में सर्वत्र विद्यमान हैं। इनका कार्य अवैतनिक होता है इनके लिए कानून का ज्ञान होना आवश्यक नहीं है। 

छोटे-छोटे मुकदमों का निर्णय ये स्वयं कर देते हैं। इनको अभियुक्तों पर 20 शिलिंग से अधिक जुर्माना करने का अधिकार नहीं है और ये 14 दिन से अधिक की जेल नहीं दे सकते हैं। 

अधिक गम्भीर अभियोगों की सुनवाई कम-से-कम दो जस्टिस ऑफ पीस करते हैं। इनको 50 पौंड जुर्माना तथा छः मास का दण्ड देने का अधिकार प्राप्त है।

2. क्वार्टस सेशन्स  - इस न्यायालय में काउण्टी के समस्त जस्टिस ऑफ पीस मिलकर न्याय करते हैं, किन्तु इन सबका आना आवश्यक नहीं है दो ही से गणपूर्ति हो जाती है। इनका सेशन वर्ष में होता है। इनका क्षेत्राधिकार निम्नलिखित है–

(i) गम्भीर विवादों को सुनना - इसके अन्तर्गत हत्या, देशद्रोह, कपट, लेखन आदि नहीं हैं।

(ii) पैटी सेशन्स के निर्णय के विरुद्ध पुनर्वाद सुनना ।

3. एसाइजेज  - एसाइजेज न्यायालयों में हाईकोर्ट ऑफ जस्टिस की किंग्स बैंच डिवीजन के एक या दो न्यायाधीश न्याय का कार्य करते हैं। प्रत्येक काउण्टी के प्रधान नगर में यह कोर्ट समय-समय पर लगता है । 

अभियुक्त को मुकदमे की सुनवाई के लिए जूरी की माँग करने का अधिकार है। यदि जूरी की राय में अभियुक्त निरपराध है तो उसको मुक्त कर दिया जाता है और उसके दोषी मानने पर न्यायाधीश कानून के अनुसार उसको दण्ड देता है। 

जूरी में स्त्री और पुरुष दोनों होते हैं। इनकी संख्या 12 होती है, जिनमें 10 पुरुष और दो स्त्रियाँ होती हैं। इन न्यायालयों के अधिकार निम्नलिखित प्रकार हैं

(i) पैटी या क्वार्टर सैशंस के न्यायालयों द्वारा भेजे गये भीषण अपराधों को सुनना। 

(ii) कुछ दीवानी मामलों को सुनना, जैसे- पृष्ठ निन्दा, बदचलनी, किसी की बदनामी करना आदि । -

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