उद्योगों का वर्गीकरण कीजिए - classification of industries in hindi

Post Date : 08 July 2022

विनिर्माण उद्योग स्थान विशेष में की जाने वाली उस सम्पूर्ण प्रक्रिया का नाम है, जिसमें उपलब्ध पदार्थों कच्चा माल को अधिक उपयोगी एवं मूल्यवान बनाने के लिए उनका रूप परिवर्तन किया जाता है।

भूमि से प्राप्त पत्थर, खदान से प्राप्त अयस्क, कृषि उपज के रूप में प्राप्त जूट का पौधा आदि जिस स्वरूप में प्राप्त होता है, वह व्यावहारिक रूप से उस स्वरूप में व्यर्थ होता है।

परन्तु पत्थर को तराश कर ऐच्छिक आकार देकर, अयस्क को साफ व गलाकर धातु के रूप में यन्त्रों-औजारों आदि का रूप देकर, जूट के पौधे को सड़ाकर रेशा प्राप्त कर टाट, गलीचा आदि में रूपान्तरित कर उसके महत्व को बढ़ाया जाता है, जिनसे ये उपयोगी एवं मूल्यवान बन जाते हैं।

उद्योगों का वर्गीकरण कीजिए

विनिर्माण उद्योगों का वर्गीकरण कई आधारों पर किया जाता है। जैसे- आकार, स्वामित्व, कच्चे माल की प्रकृति, निर्मित माल की प्रकृति, उपयोगिता आदि, परन्तु यहाँ पाठ्यक्रम को ध्यान में रखते हुए अग्रांकित प्रकारों का वर्णन किया जा रहा है 

1. कुटीर उद्योग - कुटीर उद्योगों में वस्तुओं का निर्माण परिवार के सदस्यों द्वारा घर पर ही किया जाता है। इसमें कच्चा माल स्थानीय होता है तथा निर्मित वस्तुओं का उपयोग परिवार के सदस्यों द्वारा किया जाता तथा उन्हें स्थानीय बाजार में बेचा जाता है । यातायात एवं पूँजी जैसे कारकों का प्रभाव इन उद्योगों में नहीं के बराबर होता है ।

कुटीर उद्योग भारत का प्राचीनतम उद्योग है। यह अधिकतर ग्रामीण अंचलों में विकसित है। इसके द्वारा कृषकों की खाली समय में काम मिल जाता है और आय भी बढ़ती है। यहाँ कुटीर उद्योगों द्वारा निर्मित प्रमुख वस्तुएँ जैसे—खाद्य पदार्थ, कपड़े, दरियाँ, चंटाइयाँ, मछली पकड़ने के जाल, टोप, नावों के पाल, सूत, रेशम, लेम्प, पटसन, लकड़ी, विभिन्न प्रकार के थैले, चर्मशोधक पदार्थ, जूते, चप्पल, चीनी मिट्टी के बर्तन, रस्सी, ईटें तथा सोना, चाँदी, कीमती पत्थर, हाथी दाँत और पीतल एवं काँसे के आभूषण हैं। - 

2. छोटे पैमाने के उद्योग – कुटीर उद्योग का बड़ा रूप छोटे पैमाने का लघु उद्योग कहलाता है। इसमें कम पूँजी और कम मशीनों की आवश्यकता होती है । इन उद्योगों में प्रयुक्त मशीनें छोटी किन्तु विद्युत् चलित होती हैं, कच्चा माल दूर स्थित प्रदेशों से मँगाया जाता है तथा निर्मित माल की बिक्री भी स्थानीय एवं दूर-दूर के बाजारों में की जाती है।

भारत और जापान में छोटे पैमाने के उद्योग औद्योगिक विकास के अभिन्न अंग हैं, स्वतंत्रता के पश्चात् देश में छोटे पैमाने के उद्योगों का तेजी से विकास हो रहा है। 

इन उद्योगों में खाद्य।  पदार्थ, लवण, सिगार, बीड़ी, खांडसारी, चीनी, गुड़, मसाले, लट्ठों का आरा मिलों में काटना, तेल निकालना, जूते, चप्पल, चमड़े की अन्य वस्तुएँ ताँबे, पीतल एवं काँसे के बर्तन बनते हैं। वास्तव में छोटे पैमाने के उद्योग घनी जनसंख्या वाले देशों में अधिकाधिक लोगों को रोजगार दिलाते हैं ।

3. मध्यम पैमाने के उद्योग - ये उद्योग आकार में लघु उद्योग से बड़े किन्तु वृहत् उद्योगों से छोटे होते हैं। इनमें अपेक्षाकृत अधिक पूँजी एवं बड़ी मशीनों का प्रयोग किया जाता है, काम करने वाले मजदूरों की संख्या भी अधिक होती है । 

कच्चा माल दूसरे देशों या राज्यों से मँगाया जाता है एवं निर्मित माल की बिक्री भी दूरस्थ बाजारों में की जाती है । इसके अन्तर्गत ऊनी, रेशमी वस्त्र, साबुन, चीनी, कागज आदि उद्योग शामिल हैं।

4. वृहत् पैमाने के उद्योग - इसमें बड़ी-बड़ी मशीनों द्वारा कम समय में बड़े पैमाने पर वस्तुओं का निर्माण किया जाता है। विभिन्न प्रकार का कच्चा माल, बड़ी मात्रा में विद्युत् शक्ति या ईंधन, बहुत अधिक पूँजी, बहुसंख्यक कुशल श्रमिक, उच्च तकनीक, जटिल प्रबंधन बड़े पैमाने के उद्योगों की विशेषताएँ हैं। 

इन उद्योगों का विकास सर्वप्रथम पश्चिमी यूरोप के देशों एवं संयुक्त राज्य अमेरिका में हुआ लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध के बाद दुनिया के अन्य देशों में भी फैल गए। 

भारत में लौहइ-इस्पात उद्योग, सूती वस्त्र उद्योग, मशीनें एवं औजार बनाना, विद्युत उपकरण, पेट्रोरसायन उद्योग, तेल शोधन उद्योग, चीनी उद्योग आदि वृहत पैमाने के उद्योगों की श्रेणी में आते हैं। ये उद्योग निजी एवं  सार्वजनिक दोनों क्षेत्रों में होते हैं।

कोई उद्योग किस श्रेणी में आयेगा, यह उद्योग में प्रयुक्त होने वाले कच्चे माल, पूँजी, मशीनें, काम करने वाले श्रमिकों की संख्या, प्रयुक्त शक्ति के साधन एवं तैयार माल की प्रकृति एवं मात्रा पर निर्भर करता है, उदाहरण के लिए भारत में वस्त्र उद्योग, कुटीर उद्योग, लघु उद्योग एवं वृहत् उद्योग तीनों श्रेणियों में आता है।

आधारभूत उद्योग - आधारभूत उद्योग को पूँजीगत माल के उद्योग भी कहते हैं। ये ऐसे उद्योग होते हैं, जिनके उत्पादों का उपयोग अन्य प्रकार से उत्पादन करने के लिए किया जाता है। 

ऐसे उद्योगों में दूसरे उद्योगों के लिए मशीन, औद्योगिक सामान, विशिष्ट उपकरण एवं अन्य उद्योगों की कार्यकुशलता एवं क्षमता बढ़ाने वाले उपकरण आदि तैयार किये जाते हैं। आधारभूत उद्योग का सर्वोत्तम उदाहरण लोहा एवं इस्पात उद्योग है। 

इस्पात से मशीनें बनती हैं। ये मशीनें अन्य उत्पादों को बनाने के लिए उपयोग में लायी जाती हैं। इस प्रकार लौह-इस्पात का उत्पादन उपभोग द्वारा उसी समय समाप्त नहीं हो जाता अपितु वह आगे उत्पादन प्रक्रिया में योगदान देता है।

अतः ऐसे सभी उद्योग जिनसे पूँजीगत माल एवं ऐसे आधारभूत उपकरण बनते हैं, जिनका अन्य कारखानों के निर्माण एवं निरन्तर विकास में उपयोग होता रहता है, उन्हें आधारभूत उद्योग कहा जा सकता है। 

लौह-इस्पात उद्योग के अतिरिक्त इन्जीनियरिंग एवं रसायन उद्योग, आधारभूत इलेक्ट्रॉनिक्स एवं भारी विद्युत् सामग्री बनाने वाले उद्योग, पेट्रो-रसायन उद्योग, अन्य धातु शोधन आदि आधारभूत उद्योग के उदाहरण हैं। भारत में आधारभूत उद्योग के अंतर्गत इस्पात उद्योग का प्रारंभ सन् 1907 में हुआ जब जमशेदपुर में टाटा का इस्पात कारखाना स्थापित हुआ। 

स्वतंत्रता के पश्चात् भारत में लौह-इस्पात, धातु-शोधन, रसायन, सीमेंट, मशीन, भारी विद्युत् उद्योगों का विकास तेजी से हुआ है। वास्तव में आधारभूत उद्योगों की स्थापना से अन्य उद्योगों के विकास का मार्ग प्रशस्त होता है, अतः स्वावलंबन तथा वास्तविक विकास के लिए आधारभूत उद्योगों का होना आवश्यक है।

उपभोक्ता वस्तु उद्योग   - उपभोक्ता वस्तु उद्योग के अंतर्गत उन उद्योगों को रखा जाता है, जो व्यक्ति, संस्थाओं, आदि की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए विभिन्न प्रकार की वस्तुओं का निर्माण करते हैं। ये उद्योग घरेलू व दैनिक उपभोग की वस्तुएँ तैयार करते हैं। 

जैसे- सभी प्रकार के वस्त्र, खाद्य तेल, चाय, ब्रेड, रेडियो, दवाइयाँ, साबुन, टेलीविजन, घरेलू उपकरण, घरेलू उपयोग के रसायन, पुस्तक, कॉपी, जूट, डेयरी आदि उद्योग इसी श्रेणी में आते हैं। 

वस्तुतः उपभोक्ता वस्तुओं की लंबी श्रृंखला है। आज विश्व में हजारों प्रकार के उपभोक्ता उद्योग संचालित हैं, जो अनेक प्रकार की सामग्रियों का निर्माण कर रहे हैं।

औद्योगिक अवस्थिति एवं समूहीकरण

जब किसी क्षेत्र में कच्चे माल, पूँजी, ऊर्जा के साधन, परिवहन, तकनीकी, श्रम एवं बाजार आदि की सुविधा उपलब्ध हो जाती है तो वहाँ पर उद्योगों की स्थापना हो जाती है। 

वस्तुतः उद्योग की स्थापना के लिए उपर्युक्त तत्व आधारभूत ढाँचे का निर्माण करते हैं। इन तत्वों की विविधता होने पर ऐसे स्थानों पर अनेक प्रकार के उद्योगों की स्थापना होने लगती है और उद्योगों की एक श्रृंखला स्थापित हो जाती है। 

ऐसे प्रदेश स्पष्ट रूप से औद्योगिक प्रदेश कहे जाते हैं। उद्योगों के इस केन्द्रीयकरण को उद्योगों का समूहीकरण कहा जाता है। उद्योगों के स्थानीयकरण एवं समूहीकरण को प्रभावित करने वाले कारक

भारत के औद्योगिक मानचित्र को देखने से स्पष्ट होता है कि अधिकांश उद्योगों का स्थानीयकरण एवं विकास मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, बंगलौर, दिल्ली व जालंधर नगर के आस-पास ही हुआ है। 

जबकि मध्यप्रदेश, राजस्थान, जम्मू-कश्मीर, उड़ीसा एवं पूर्वोत्तर भारत के विस्तृत क्षेत्रों में नाम मात्र का उद्योग स्थापित है। प्रश्न यह उठता है कि उद्योगों का विकास देश के सभी क्षेत्रों में समान रूप से क्यों नहीं हुआ है ? 

इस बात का सूक्ष्म अध्ययन करने पर ज्ञात होता है कि किसी भी उद्योग की स्थापना एवं विकास के लिए आधारभूत ढाँचा का होना आवश्यक है। सामान्यतः उद्योगों के स्थानीयकरण एवं समूहीकरण को निम्नांकित कारक प्रभावित करते हैं

1. कच्चा माल उद्योग की सबसे बड़ी आवश्यकता कच्चा माल है। कच्चा माल दो प्रकार का होता है - (i) सर्वसुलभ पदार्थ, जो हर स्थान पर पाये जाते उद्योगों के स्थानीयकरण के कार हैं; जैसे- मिट्टी, पानी आदि (ii) स्थानीय पदार्थ, जो कुछ विशेष , स्थानों पर ही प्राप्त होते हैं; जैसे- खनिज पदार्थ या कोई विशेष कृषि उपज आदि। कच्चे माल की अपनी प्रकृति होती है। 

वह सस्ता, बहुमूल्य, अधिक स्थान घेरने वाला, हल्का, तरल, ठोस, आसानी से एक स्थान से दूसरे स्थान ले जा सकने वाला या न ले जा सकने वाला, जल्दी नष्ट हो जाने वाला, किसी भी प्रकार की प्रकृति का हो सकता है। कच्चे माल की यह प्रकृति किसी उद्योग को उसी स्थान पर या उससे हट कर दूर स्थापित किये जाने को निर्धारित एवं प्रभावित करती है। 

यदि इसे अनदेखा कर किसी उद्योग की स्थापना की जाय, तो उस उद्योग की सफलता पर प्रश्न चिन्ह लग जाता है। जैसेहुगली घाटी पर जूट उद्योग; उत्तर प्रदेश में चीनी उद्योग; बिहार, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़ क्षेत्र में लौह इस्पात उद्योग आदि अपने कच्चे पदार्थों के क्षेत्र के निकट अवस्थित हैं। 

2. ऊर्जा - उद्योगों का मशीनीकरण हो चुका है जिसे गति प्रदान करने के लिए किसी-नकिसी प्रकार की ऊर्जा की आवश्यकता पड़ती है। 

ऊर्जा की अपनी प्रकृति होती है जो ताप, विद्युत्, भाप, सौर, अणु एवं खनिज तेल आदि के रूप में प्राप्त होते हैं। जिन उद्योगों में ऊर्जा के रूप में कोयला उपयोग होता है वे कोयले की खानों के निकट ही अवस्थापित होती है। जैसे- लौह इस्पात उद्योग की स्थापना कोयला उत्पादक क्षेत्रों के निकट हुई है। 

उदाहरणार्थ- राऊरकेला, बोकारो, दुर्गापुर, जमशेदपुर आदि लौह इस्पात उद्योग, जो छोटा नागपुर के पठार कोयला क्षेत्र में अवस्थित हैं। उसी प्रकार रसायन, धातुकर्मी आदि उद्योगों को ऊर्जा की अधिक आवश्यकता होती है। इसीलिये ये सस्ते ऊर्जा केन्द्रों के निकट स्थापित किये जाते हैं। 

जैसे-ऐल्यूमिनियम उद्योग मध्य प्रदेश के कोरबा एवं उत्तरप्रदेश के रेणुकोट ताप विद्युत् ऊर्जा केन्द्रों के निकट अवस्थापित हैं। विद्युत शक्ति व खनिज तेल को हम तारों एवं पाइप लाइनों द्वारा दूर तक ले जा सकते हैं। अतः दूर-दूर तक औद्योगिक स्थानीयकरण केन्द्रित होने लगा है।

3. परिवहन  – कच्चे माल व निर्मित माल को उद्योगों तक लाने व बाजारों तक पहुँचाने के लिए परिवहन सुविधा उद्योगों के लिए एक अनिवार्य आवश्यकता है। जो स्थान सभी प्रकार के स्थल, जल एवं वायु परिवहन सुविधाओं से सम्पन्न हैं, वे स्थान उद्योगों की स्थापना व विकास के लिए आदर्श वातावरण तैयार करते हैं। 

इसलिए भारत के मुंबई, कोलकाता एवं चेन्नई नगर आज वृहत् औद्योगिक क्षेत्र बन गये हैं। सस्ते जल यातायात के कारण ही हुगली नदी के दोनों ओर जूट उद्योग केन्द्रित हुआ है। कानपुर में उद्योगों के स्थानीयकरण का प्रमुख कारण रेलवे केन्द्र का होना है।

4. श्रम की उपलब्धता – उद्योगों को चलाने व उसमें काम करने के लिए कुशल व सस्ती जन-शक्ति की आवश्यकता होती है। कुछ उद्योग ऐसे होते हैं जो श्रम प्रधान होते हैं। ऐसी स्थिति में सस्ते, व अधिक संख्या में श्रमिकों का मिलना एक अनिवार्य आवश्यकता होती है। 

इसलिए चूड़ी व काँच के समान कुशल बनाने के उद्योग फिरोजाबाद में, बनारसी साड़ी बनाने का उद्योग बनारस (वाराणसी) में, ताला उद्योग अलीगढ़ में, पीतल के बर्तन बनाने के उद्योग मुरादाबाद में तथा चन्दन की लकड़ी के सामान बनाने का उद्योग कर्नाटक में केवल श्रमिकों की विशिष्ट कार्यकुशलता के कारण केन्द्रित हुए हैं।

5. जल - उद्योगों के लिए जल एक महत्वपूर्ण आवश्यक तत्व है। कुछ उद्योगों में जल की अत्यधिक आवश्यकता होती है। जैसे-जूट उद्योग में जल एक प्रमुख आवश्यक तत्व है। 

इसमें पटसन को डुबाकर सड़ाया जाता है। तत्पश्चात् इसे स्वच्छ जल में धोया जाता है। इसी कारण जूट उद्योग हुगली नदी के तट पर केन्द्रित है। उसी प्रकार लौह इस्पात उद्योग में तप्त इस्पात को शीतल करने हेतु जल की आवश्यकता होती है। 

जल की आवश्यकता वाले प्रमुख उद्योगों में कागज, लुग्दी, रसायन परमाणु ऊर्जा संयन्त्र आदि उद्योग हैं। ऐसे स्थानों पर स्थापित किये जाते हैं जहाँ से पर्याप्त मात्रा में स्वच्छ जल की आपूर्ति हो सके।

6. बाजार की निकटता - तैयार माल की खपत के लिए बाजार की निकटता एक प्रमुख कारक है। यही कारण है कि बाजार की निकटता उद्योगों की स्थापना को प्रभावित करता है। प. बंगाल में सूती वस्त्र उद्योग के विकसित होने का प्रमुख कारण बाजार की निकटता है।

7. प्राकृतिक तथा जलवायु सम्बन्धी दशाएँ - उद्योगों का विकास ऐच्छिक जलवायु क्षेत्र में हो सकता है। जैसे सूती वस्त्र उद्योग, इन्हें समुद्री ठण्डी हवाओं एवं नम जलवायु की आवश्कता होती है जिससे इनके धागे कम या नहीं टूटते । इसलिये सूती वस्त्र उद्योग मुंबई के आसपास केन्द्रित हैं जो आवश्यकता की पूर्ति करता है। इसके अतिरिक्त कुछ स्थानों की प्राकृतिक दशाएँ जैसे- भूमि की सतह, भूमि की रचना आदि उद्योगों की स्थापना को प्रभावित करते हैं।

8. सार्वजनिक सेवाएँ – ऐसे स्थानों पर उद्योग-धन्धे स्थापित हो जाते हैं जहाँ उद्योगों के लिए सस्ते मूल्य पर सार्वजनिक सेवाएँ जैसे- सड़क, पानी, अस्पताल, स्कूल, अग्नि शमन सुविधाएँ आदि उपलब्ध होती हैं। 

9. शासकीय नीति – यदि राज्य सरकार किसी विशेष क्षेत्र में उद्योग-धन्धे स्थापित करने के लिए करों -में छूट, कम दर पर यातायात की सुविधा, कम ब्याज पर ऋण आदि देने की सुविधाएँ प्रदान करती हैं, तो ऐसे क्षेत्र उद्योग-धन्धों के स्थानीयकरण का आकर्षण बन जाते हैं। वर्तमान में अनेक राज्य अपने पिछड़े हुए क्षेत्रों में उद्योग स्थापित करने की अनेक प्रकार की सुविधाएँ दे रहे हैं।

10. पूरक एवं प्रतिस्पर्द्धक उद्योगों का होना - अनेक उद्योग उन स्थानों पर केन्द्रित होते हैं जहाँ पूरक उद्योगों की अधिकता हो । जैसे- बड़े उद्योग के लिए पूरक उद्योग के रूप में स्पेयर पार्ट्स के उद्योग पहले से केन्द्रित हों। इसके अतिरिक्त कुछ उद्योग उन्हीं स्थानों पर स्थापित किये जाते हैं जहाँ पहले से उसी प्रकार का उद्योग प्रतिस्पर्द्धक के रूप में विद्यमान या केन्द्रित हो। 

11.पूँजी की सुलभता – उद्योगों की स्थापना में भारी पूँजी का निवेश आवश्यक होता है। यही कारण है कि नगरों के समीप उद्योगों का अधिक केन्द्रीयकरण है जहाँ पूँजीपति और बैंकों की अधिकता होती है। 

उद्योगों का समूहीकरण

“वह विस्तृत क्षेत्र जहाँ विविध वृहद् उद्योगों के साथ अनेक सहायक एवं पूरक उद्योग स्थापित हो जाते हैं तथा जिनका आपस में घनिष्ठ संबंध होता है, औद्योगिक समूह कहलाते हैं।" उद्योगों का जमाव उस क्षेत्र की भू-दृश्य में व्यापक परिवर्तन ला देता है । 

उद्योगों की शृंखलाबद्धता तथा संश्लिष्टता से औद्योगिक भू-दृश्य दिखाई देता है। इस प्रकार के विकसित औद्योगिक समूहीकरण वाले क्षेत्र में निम्नलिखित विशेषताएँ पायी जाती हैं -

  1. ऐसे क्षेत्रों में कई छोटे-बड़े नगर एवं कस्बे आपस में मिल जाते हैं।
  2. ग्रामीण आबादी बहुत कम होती है।
  3. ऐसे क्षेत्रों की जनसंख्या मुख्यतः नगरीय व्यवसाय पर निर्भर होती है। 
  4. नगरों का उद्योगों से घनिष्ठ सम्बन्ध होता है। 
  5. ऐसे क्षेत्रों में उद्योगों की संख्या प्रायः अधिक होती है। 
  6. विविध उद्योगों का सम्बन्ध आपस में घनिष्ठ होता है। 
  7. इन क्षेत्रों में परिवहन का पर्याप्त विकास पाया जाता है। 

भारत के प्रमुख औद्योगिक समूह

कृषि प्रदेशों की भाँति औद्योगिक समूह का क्षेत्र अधिक विस्तृत नहीं होता है और न ही औद्योगिक उत्पादन में कृषि उत्पादन के समान एकरूपता पायी जाती है । औद्योगिक समूह का केन्द्र देश के किसी एक भाग में होता है। 

इस केन्द्र के चारों ओर उद्योगों का विस्तार होता है, जिससे औद्योगिक भू-दृश्य विकसित होते हैं। इसी आधार पर औद्योगिक समूह का निर्धारण किया जाता है। भारत में अब तक तीन प्रकार के औद्योगिक समूह का विकास हुआ है।

समूहीकरण के प्रकार

  1. वृहत औद्योगिक समूह 
  2. लघु औद्योगिक समूह 
  3. औद्योगिक जनपद 

वृहत औद्योगिक समूह

  • पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखण्ड औद्योगिक प्रदेश या हुगली दामोदर औद्योगिक समूह 
  • आगरा-लुधियाना औद्योगिक समूह 
  • अहमदाबाद - बड़ोदरा औद्योगिक समूह 
  • मुंबई-पुणे औद्योगिक समूह 
  • बंगलौर-कोयम्बटूर-मदुराई औद्योगिक समूह 

हुगली दामोदर औद्योगिक समूह - यह औद्योगिक क्षेत्र हुगली व दामोदर नदी के किनारों व पश्च क्षेत्रों में फैला है। इसका विस्तार पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखण्ड व उड़ीसा जैसे घने बसे राज्यों में है। 

खनिज सम्पन्न छोटा नागपुर का पठार, गंगा-ब्रम्हपुत्र की समृद्ध भूमि, असम व पश्चिम बंगाल के चाय की पहाड़ियाँ एवं समुद्री किनारों ने उद्योगों के लिए आदर्श स्थल की रचना कर उद्योगों को अपनी ओर आकर्षित किया। 

नौकागम्य नदियों ने अन्तर्देशीय तथा कोलकाता बंदरगाह ने अन्तर्राष्ट्रीय सस्ते जल मार्ग सम्बन्ध स्थापित किये जिन्हें सड़कों व रेल मार्गों ने जोड़कर इस क्षेत्र को और अधिक महत्वपूर्ण बना दिया। 

अंग्रेजों ने इसकी व्यापारिक स्थिति को जाना समझा और पूँजी निवेश कर हुगली में प्रथम आधुनिक जूट मिल की स्थापना कर औद्योगीकरण की प्रक्रिया की शुरुआत की। कुछ ही वर्षों में हुगली के दोनों तटों पर जूट उद्योगों की श्रृंखला बन गई। 

आगरा- लुधियाना औद्योगिक समूह - स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् उत्तर प्रदेश में आगरा, मथुरा, मुरादाबाद, मेरठ, सहारनपुर, उत्तरांचल, देहरादून, राजस्थान में अलवर, हरियाणा में फरीदाबाद, गुड़गाँव, अम्बाला, कुरुक्षेत्र, पंजाब में चण्डीगढ़, पटियाला, लुधियाना, जालंधर, अमृतसर एवं दिल्ली में उद्योगों का विस्तार हुआ। 

प्रारम्भ में ये औद्योगिक क्षेत्र दो समूहों में विकसित हुए, पहला आगरा दिल्ली-सहारनपुर देहरादून पट्टी के रूप में तथा दूसरा अम्बाला - चण्डीगढ़ लुधियाना-अमृतसर पट्टी के रूप में। 

बाद में दोनों औद्योगिक क्षेत्र धीरे-धीरे विस्तृत होकर एक वृहत् औद्योगिक समूह में बदल गये जिनका केन्द्र दिल्ली महानगर हो गया इस औद्योगिक समूह की रचना में सतलज-यमुना नदी के उपजाऊ मैदान का विशेष योगदान है जिसमें भाखड़ा नांगल बाँध ने सोने में सुहागा का काम किया। 

भाखड़ा से सस्ती जल विद्युत् शक्ति एवं फरीदाबाद व हरदुआगंज से ताप विद्युत् शक्ति यहाँ के उद्योगों को प्राप्त होती है। यहाँ के मुख्य उद्योग चीनी, सूती वस्त्र,होजियारी, कागज, शीशा, ऊनी वस्त्र, सिगरेट, दियासलाई, वनस्पति घी हैं। 

इनके अतिरिक्त इंजीनियरिंग, इलेक्ट्रॉनिक्स, रासायनिक, कृषि औजार व मशीनें, ट्रैक्टर, कीटनाशक दवाएँ, साइकिल आदि उद्योग हैं । इन उद्योगों को दिल्ली महानगर से वित्तीय व वृहत बाजार की सुविधाएँ उपलब्ध हैं।

अहमदाबाद-बड़ोदरा औद्योगिक समूह - इस औद्योगिक समूह का विस्तार सूरत, भरुच से अहमदाबाद तक एक लम्बी पट्टी के रूप में हुआ है। यह प्रमुख कपास उत्पादक क्षेत्र है । इसीलिये सूती वस्त्र उद्योग विकास सर्वाधिक हुआ है। वहीं निकट खम्भात की खाड़ी में खनिज तेल की खोज हो जाने से वहाँ पेट्रोउद्योग का विकास हुआ है। 

इनके अतिरिक्त इंजीनियरिंग, ट्रैक्टर, साइकिल, जरी, बर्तन, कलात्मक वस्तुएँ, बीड़ी, चीनी तथा आनन्द डेयरी उद्योग आदि की इकाइयाँ विकसित हुई हैं । इस औद्योगिक समूह के प्रमुख केन्द्र अहमदाबाद, नाडिआद, गोधरा, भरुच, सूरत एवं कोयली आदि हैं। 

मुंबई - पुणे औद्योगिक समूह - मुंबई के पृष्ठ भाग में लावा निर्मित काली पठारी मिट्टी वाला क्षेत्र जो कपास उत्पादन के लिए विख्यात है की निकटता, समुद्र तट पर स्थित होने से बंदरगाह एवं आयात निर्यात की सुविधा है, इसके अतिरिक्त+0<। +यह देश के भीतरी भागों से रेल व सड़क मार्गों द्वारा जुड़ा हुआ है।

मुंबई महानगर होने से बैंकिंग एवं बाजार की सुविधा ने इसे प्रमुख औद्योगिक केन्द्र बना दिया है। यहाँ के फिल्म उद्योग ने देश की अधिकांश जनसंख्या को अपनी ओर आकर्षित किया, जिससे यहाँ श्रम की समस्या की कमी कभी नहीं रही। मुंबई हाईवे में खनिज तेल उद्योग ने इसे नया जीवन दिया जिससे औद्योगीकरण की गति तीव्र हो गयी। 

कपास उत्पादन क्षेत्र की निकटता और यहाँ की समुद्री जलवायु ने सूती वस्त्र उद्योग को अधिक प्रोत्साहित किया जिससे यहाँ सूती वस्त्र उद्योग की एक क्रमबद्ध शृंखला विकसित हुई। भारत के सर्वाधिक सूती वस्त्र उद्योग यहीं केन्द्रित हैं।

बैंगलूरू - कोयम्बटूर - मदुराई औद्योगिक समूह – यह मुख्यतः कपास व गन्ना उत्पादक क्षेत्र है। इसलिये यहाँ सूती वस्त्र एवं चीनी उद्योग का सर्वाधिक विकास हुआ है। अन्य प्रमुख रेशमी, ऊनी वस्त्र, इंजीनियरिंग एवं उपभोक्ता वस्तु उद्योग हैं। 

मदुराई व कोयम्बटूर प्रमुख वस्त्र उद्योग हैं। मदुराई में इंजीनियरिंग उद्योग का विकास हुआ है। बैंगलूरू में वायुयान, घड़ी, मशीन, औजार, टेलीफोन यन्त्र, बड़ी-बड़ी मशीनें, सूती, ऊनी, रेशमी एवं कृत्रिम रेशे के वस्त्र उद्योग की कई इकाइयाँ हैं। 

रेल के डिब्बे व डीजल इंजन बनाने के कारखाने हैं। इन्हें शरावती, मैटूर, शिवसमुद्रम से सस्ती जल विद्युत् पूर्ति की सुविधा प्राप्त है। प्रमुख औद्योगिक केन्द्र हैंमदुराई, शिवाकासी, तिरुचिरापल्ली, कोयम्बटूर, मैटूर, बैंगलूरू, मैसूर, बे+.,॥+,।  लोर।

लघु औद्योगिक समूह 

छोटे व सीमित क्षेत्रों में विकसित उद्योगों के समूह को लघु औद्योगिक समूह कहते हैं। इनका विकास भारत में बिखरे हुए रूप में हुआ है। भारत के निम्नलिखित क्षेत्रों में लघु औद्योगिक समूह मिलते हैं - 

1. असम घाटी क्षेत्र – यह चाय उत्पादक क्षेत्र है। यहाँ मुख्यतः चाय, चावल, तिलहन तथा पेट्रोलियम से सम्बन्धित उद्योगों का विकास हुआ है।

2. उत्तरी बिहार तथा पूर्वी उत्तर प्रदेश क्षेत्र – इस क्षेत्र में चीनी, उर्वरक, रसायन, जूट आदि कृषि पर आधारित उद्योगों का विकास हुआ है ।

3. कानपुर क्षेत्र – यहाँ लोहे के सामान, जूट, रसायन, चीनी, चमड़ा, साइकिल, सूती वस्त्र, ऐल्यूमिनियम एवं इंजीनियरिंग आदि के उद्योग स्थापित हैं । यह उत्तर प्रदेश का प्रमुख औद्योगिक नगर है। चमड़ा उद्योग यहाँ का प्रधान उद्योग है।

4. इन्दौर-उज्जैन-नागदा क्षेत्र - कागज, सूती वस्त्र एवं इंजीनियरिंग उद्योग स्थापित हैं, परन्तु यहाँ सूती वस्त्र उद्योग का विकास अधिक हुआ है।

5. कृष्णा- गोदावरी डेल्टा क्षेत्र - यह आंध्र प्रदेश का पूर्वी समुद्र तटीय भाग है जहाँ जूट, चीनी, सीमेण्ट, सूती वस्त्र, कागज, ऐल्यूमिनियम, रबड़, काँच का सामान आदि बनाने के उद्योग स्थापित हैं।

औद्योगिक जनपद

ऐसे क्षेत्रों को जो औद्योगिक विकास में कदम रख रहे हैं, औद्योगिक जनपदों (जिलों) की श्रेणी में रखा गया है। ये पूरे देश में छितरे हुए रूप में फैले हैं। इनका विकास स्थानीय सम्पदाओं एवं बाजार के कारण हुआ है।

किसी भी देश की प्रगति वहाँ के औद्योगिक विकास पर निर्भर करती है। इसलिए जो देश जितना अधिक अपने यहाँ उपलब्ध परन्तु या आयात किए गये कच्चे माल का अधिकतम उपयोग करके विभिन्न प्रकार की वस्तुओं का निर्माण करता है, वह देश विकसित एवं सम्पन्न होता है। 

यद्यपि भारत एक विकासशील देश है, यहाँ उपलब्ध प्राकृतिक एवं मानवीय संसाधनों के आधार पर विकसित देश बनने की पूर्ण सम्भावना है। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् भारत में जब से औद्योगिक विकास प्रारम्भ हुआ है, तभी से देश की आत्मनिर्भरता एवं राष्ट्रीय शक्ति में वृद्धि हुई है।