दंड के प्रमुख सिद्धांत - dand ke siddhaant

Post Date : 17 July 2022

प्रत्येक काल एवं परिस्थिति में विद्वानों ने दंड की अनिवार्यता को स्वीकार किया हैं। इसके साथ ही इन विद्वानों ने दण्ड की प्रकृति, मात्रा एवं प्रकार के सम्बन्ध में भी अपने विचार व्यक्त किये है।

दंड के प्रमुख सिद्धांत

समकालीन परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए दण्ड की प्रकृति और स्वरूप के सम्बन्ध में विद्वानों ने जो विचार व्यक्त किये हैं, उन्हें दण्ड के सिद्धान्त के नाम से जाना जाता है। दंड के सिद्धान्तों को निम्नलिखित पाँच प्रमुख भागों में वर्गीकृत किया गया हैं -
  1. प्रायश्चित का सिद्धान्त
  2. निरोधात्मक सिद्धान्त
  3. प्रतिशोधात्मक सिद्धान्त
  4. सुधारात्मक सिद्धान्त
  5. प्रतिरोधात्मक सिद्धान्त

1. प्रायश्चित का सिद्धान्त 

व्यक्ति के पाप करने के परिणामस्वरूप भगवान उस व्यक्ति को उनके पाप के आधार पर दंड देता हैं। प्रायश्चित का सिद्धान्त प्राचीन सिद्धान्त है। इसके अनुसार व्यक्ति जो अपराध करता है वह पाप होता है। पाप करने के परिणामस्वरूप मरणोपरान्त व्यक्ति को ईश्वर के सामने पापी के रूप में उपस्थित होना पड़ेगा। 

ईश्वर उसके पाप के अनुसार उसे दण्ड देगा। इसके अतिरिक्त इस जन्म में ईश्वर का प्रतिनिधि धर्मगुरु भी पापी को दण्ड देने के लिए किसी प्रकार के प्रायश्चित का विधान निर्मित कर सकता है। यह सिद्धान्त पिछड़ी और अन्य जातियों में आज भी क्रियान्वित होता हुआ पाया जाता है।

आलोचना - यह सिद्धान्त पूर्णरूपेण अन्धविश्वास पर आधारित है। अतः भले ही इसका समाज में कुछ महत्व हो परन्तु वैज्ञानिकता के अभाव में यह सिद्धान्त व्यर्थ प्रतीत होता है परन्तु समाज में अपराध रोकने में इसका महत्वपूर्ण स्थान है।

2. प्रतिशोधात्मक सिद्धान्त - 

यदि कोई आपकी आँख फोड़ता है या दाँत तोड़ता है तो तुम भी उसकी आँख फोड़ दो या दाँत तोड़ दो। यह सिद्धान्त आँख के लिए आँख और दाँत के लिए दाँत के सिद्धान्त पर आधारित है। इसके अनुसार व्यक्ति ने जैसा अपराध किया है वैसा ही उसे दंड मिलना चाहिए। 

यदि उसने किसी की हत्या की तो उसे प्राण-दण्ड मिलना चाहिए। हम्मूरवी के कोड ने लिखा है यदि कोई किसी अच्छे व्यक्ति की आँख को क्षति पहुँचाता है तो उसकी भी आँख को क्षति पहुँचानी चाहिए। इस सिद्धान्त का समर्थन अरस्तु , काण्ट, ब्रेडले  आदि दार्शनिकों ने किया है। 

अरस्तु ने इस सिद्धान्त पर जोर देते हुए लिखा है, "यह उसका अधिकार है और उसे मिलना चाहिए। समाज जो दंड देता है उसके अधिकार से वंचित नहीं करता बल्कि जो उसे मिलना चाहिए, जो वह कर चुका है। वही उसे देता है।

आलोचना - आधुनिक युग में प्रतिशोधात्मक सिद्धान्त का बड़ा विरोध हुआ। इस सिद्धान्त के अनुसार दण्ड देने से लोगों में यह भावना बनी रहती है कि जितना हमने पाया यदि पकड़े गये तो उतना दे देंगे घर से क्या जायेगा। 

इसके अतिरिक्त आधुनिक मनोवैज्ञानिकों और समाजशास्त्रियों ने इस बात को भली-भाँति समझा कि समाज में अनेक ऐसे कारण उत्पन्न हो जाते हैं जिनसे बाध्य होकर व्यक्ति को अपराध करना पड़ता है। 

अतः अपराध को रोकने के लिए अपराध बनाने वाले करणों को समाप्त करना चाहिए न कि अपराधी से बदला लेने का प्रयास करना चाहिए। टॉलस्टाय के अनुसार, “बदला लेना जंगली न्याय है। इसी प्रकार गाँधीजी ने लिखा है पाप से घृणा करो पानी से नहीं।

3. प्रतिरोधात्मक सिद्धान्त

तुम्हें भेड़ चुराने के लिए दण्ड नहीं दिया जाता बल्कि इसलिए कि भेड़ न चुराई जाये। यह सिद्धान्त इस तथ्य पर आधारित है कि अपराध करने वाले को इतना कठोर और भयंकर दण्ड देना चाहिए कि दूसरे लोग अपराध करने से डरने लगें। इस प्रकार इस सिद्धान्त के अनुसार छोटे से छोटे अपराध के लिए कठोर से कठोर दण्ड देना चाहिए जिससे - एक तो अपराध करने वाला भविष्य में अपराध न करेगा और न दूसरे अन्य लोग अपराध के भय से अपराध करेंगे। इस सिद्धान्त का जोरदार समर्थन दार्शनिक हेगेल ने किया। 

आलोचना - प्रतिशोधात्मक सिद्धान्त की तरह इस सिद्धान्त का भी आधुनिक युग में कड़ा विरोध हुआ। इसके विरुद्ध अनेक तर्क प्रस्तुत किये जा सकते हैं - मनुष्य स्वयं साध्य होता है फिर उसे दूसरों का साधन बनना सर्वथा अनुचित है। अतीत काल से इस सिद्धान्त का बहुत उपयोग होता रहा है।

4. निरोधात्मक सिद्धान्त

न रहेगा बाँस न बजेगी बाँसुरी। निरोधात्मक सिद्धान्त को फेरिस महोदय ने 'अयोग्यता का सिद्धान्त कहा है। इस सिद्धान्त के अनुसार अपराधियों को किसी प्रकार के अपराध करने से रोका नहीं जा सकता है। ऐसी स्थिति में अपराधी को समाज से विलग कर देना चाहिए। न होगा बाँस न बजेगी बाँसुरी' इसके लिए दो उपाय हैं - आजन्म कारावास तथा मृत्यु-दण्ड। 

आलोचना - निरोधात्मक सिद्धान्त भी अन्य सिद्धान्तों की तरह युक्तिसंगत प्रतीत नहीं होता है । यदि समस्त अपराधियों को बन्दीगृहों में जीवन भर के लिए रख दिया जायेगा तो विश्व समाज  का बहुत बड़ा भाग बन्दीगृहों में परिवर्तित हो जायेगा। जैसा कि भारत के अपराधियों को अण्डमान तथा निकोबार क्षेत्रों में रखने से हुआ है। यदि अपराधियों को मृत्युदण्ड दिया जायेगा तो उनके सुधरने का कोई प्रश्न नहीं उठ पाता है और वास्तविक दण्ड उन लोगों को मिलेगा जो अपराधियों के सहारे हैं।

5. सुधारात्मक सिद्धान्त

अपराधी को दण्ड न देकर उसको सुधारना चाहिए ताकि भविष्य में वह सुयोग्य नागरिक बन जाये। आधुनिक युग में मनोवैज्ञानिकों और समाजशास्त्रियों ने यह निष्कर्ष निकाला है कि अपराध एक मानसिक रोग है जो विभिन्न सामाजिक परिस्थितियों के कारण हो जाता है। अतः अपराधी की मानसिक चिकित्सा होनी चाहिए। इस प्रकार इस सिद्धान्त के अनुसार अपराधी को सुधारना चाहिए ताकि वह भविष्य में एक अच्छा नागरिक बन जाये। 

गाँधीजी ने दण्ड के सुधारात्मक सिद्धान्त का समर्थन करने के सन्दर्भ में लिखा है। अपराधियों का कारावासों में उसी तरह इलाज करना चाहिए जिस तरह अस्पतालों में मरीजों का होता है और कारावासों में अपराधियों का प्रवेश अपराध के इलाज के लिए किया जाना चाहिए।

आलोचना - अनेक विद्वानों ने इस सिद्धान्त की आलोचनाएँ की हैं। उनके अनुसार इस सिद्धान्त में यह दोष पाये जाते हैं - सुधारात्मक सिद्धान्त नैतिक विकास की एक भ्रमात्मक व्याख्या है। यदि अपराधी के हृदय में सुधार की इच्छा नहीं होगी तो लाख समझाने तथा सुविधाएँ उपलब्ध कराने पर भी वह अपना सुधार नहीं कर पायेगा। यदि सभी अपराधियों को छोड़ दिया जायेगा तो समाज में शक्ति एवं सुरक्षा की भावना ही समाप्त हो सकती है।

निष्कर्ष - 

उपर्युक्त वर्णित विभिन्न सिद्धान्तों में वर्तमान समय में प्रथम चार सिद्धान्तों को अनुपयुक्त माना जाता है और अन्तिम सिद्धान्त अर्थात् सुधारात्मक सिद्धान्त को अधिक उचित समझा जाता है। 

क्योंकि वर्तमान समय में दण्ड का उद्देश्य अपराधी से प्रतिशोध लेना या उसे समाज से पृथक् कर देना नहीं है बल्कि उसका सुधार कर उसे सुयोग्य नागरिक बनाना है। 

सुधारात्मक सिद्धान्त अपराधियों को शिक्षित, कुशल, आत्मनिर्भर व सभ्य नागरिक बनाने के लिए कार्यक्रम प्रस्तुत करने पर विशेष बल दता है। फिर भी सुधारात्मक सिद्धान्त को सभी परिस्थितियों पर लागू नहीं किया जा सकता है।

अतः सबसे अच्छा उपाय तो यह है कि अपराध एवं अपराधी की प्रकृति के अनुसार दण्ड के सुधारात्मक के सिद्धान्त के साथ-साथ आवश्यकतानुसार सीमित रूप में दण्ड के प्रायश्चित प्रतिशोधात्मक, प्रतिरोधात्मक तथा निरोधात्मक सिद्धान्त का भी यथास्थान प्रयोग किया जाना चाहिए।