ग्रीन के अधिकार तथा स्वतंत्रता संबंधी विचार । - green ke adhikar tatha swatantrata sambandhi vichar

प्रसिद्ध दार्शनिक एवं राजनीतिज्ञ टी. एच. ग्रीन ने मानव स्वतन्त्रता को मानव की 'इच्छा' और मानव के नैतिक विकास के सन्दर्भ में प्रयुक्त किया है। उसके लिए बाह्य चेतना जिसमें मानव चेतना भी भाग लेती है, स्वतन्त्रता द्वारा ही चित्रित होती है। राज्य इसी मानव चेतना की उपज है।

 ग्रीन के अधिकार तथा स्वतंत्रता संबंधी विचार बताइए। 

बार्कर का कथन है कि - मानव चेतना, स्वतन्त्रता का पूर्ण निर्धारण करती है।  स्वतन्त्रता में अधिकार निहित है, अधिकार राज्य की माँग करते हैं।" उसकी स्वतन्त्रता सम्बन्धी अवधारणा को स्पष्ट करता है, जिसे निम्नानुसार समझाया जा सकता है - 

1. मानव चेतना  - ग्रीन ने मनुष्य का एक विशिष्ट गुण आत्म-चेतना माना है। मनुष्य एक चेतना युक्त प्राणी है तथा उसमें विचार करने की शक्ति है। मनुष्य इसी दृष्टि से अन्य प्राणियों से भिन्न है। अन्य प्राणियों में चेतना तो होती है परन्तु उनमें विचार करने की शक्ति नहीं होती। 

अपने इसी गुण के कारण मानव विभिन्न विषयों, परिस्थितियों और प्रतिक्रियाओं के बारे में सोचता है। उनसे सम्बन्धित आत्म-अनुभवों पर विचार करता है, उन अनुभवों के आधार पर निर्णय लेता है तथा उन निर्णयों को कार्यरूप में परिणित करता है।

ग्रीन ने रूसो से प्रभावित होकर सामान्य इच्छा के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया है। उसके अनुसार व्यक्ति की दो प्रकार की इच्छाएँ होती हैं- यथार्थ इच्छा तथा वास्तविक इच्छा  वास्तविक इच्छा मनुष्य की विवेकपूर्ण इच्छा है। 

इस इच्छा से मनुष्य सद्कार्य करने की प्रेरणा ग्रहण करता है। इन प्रेरणाओं को ग्रीन ने नैतिक आदेश कहकर सम्बोधित किया है। सद्इच्छा की आज्ञाओं का पालन जो व्यक्ति करता है, वही व्यक्ति नैतिक है। जो मनुष्य निरन्तर इन आज्ञाओं का पालन करता है वह आत्मपूर्णता को प्राप्त कर लेता है। तब उसकी चेतना का पूर्ण विकास होता है। 

यह आत्म-चेतना चिरन्तन आत्म-चेतना को प्राप्त करने के लिये प्रयत्नशील रहती है। परिणाम यह होता है एक सामाजिक चेतना की उत्पत्ति होती है तब उसके पश्चात् राज्य की उत्पत्ति होती है ।

मानव चेतना सम्बन्धी विचारों को अभिव्यक्त करने के पश्चात् ग्रीन इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि मनुष्य एक नैतिक प्राणी है जो कि आत्मपूर्णता की ओर प्रयत्नशील रहता है। मनुष्य नैतिक प्राणी होने के साथ ही सामाजिक प्राणी भी है। 

अतः वह इस बात का भी ध्यान रखता है कि अन्य व्यक्ति भी पूर्णता की प्राप्ति की ओर प्रयत्नशील है । अतः व्यक्तिगत हित और सामाजिक हित एक-दूसरे से सम्बद्ध हैं इसलिये मनुष्य अपना विकास करने के साथ ही समाज का विकास करने के लिये भी प्रयत्नशील होता है तथा आत्मपूर्णता को प्राप्त करता हुआ सामाजिक हित की बुद्धि की भी इच्छा रखता है।

प्रो. बार्कर के अनुसार, “यह बात ध्यान में रखनी चाहिये कि राज्य के इस विचार के पीछे चिरन्तन आत्म की भावना है जो मानवीय चेतना को सामाजिक हित के विचारों से परिचित कराती है। मानवीय चेतना इस सामाजिक हित की पूर्णता के लिये सदैव प्रयत्नशील रहती है । "

2. मानव चेतना स्वतन्त्रता चाहती है –हीगल की मान्यता है कि मनुष्य की आत्मा सदैव स्वतन्त्रता चाहती है। यदि उसे स्वतन्त्रता प्राप्त न हो तो वह किसी अन्य शक्ति द्वारा संचालित किये जाने वाला यन्त्रमात्र बन जाता है। 

भण्डारी ने इस मान्यता का विवेचन करते हुए लिखा है, “व्यक्तिगत चेतना, सार्वभौमिक चेतना का माध्यम है। सार्वभौमिक एवं शाश्वत चेतना की विशेषता स्वतन्त्रता है। व्यक्ति अपनी चेतना द्वारा आत्मानुभूति के लिए प्रेरित किया जाता है। अतः व्यक्ति को स्वतन्त्रता की आवश्यकता है।”

 ग्रीन ने जिस स्वतन्त्रता का समर्थन किया है वह नकारात्मक स्वतन्त्रता नहीं है । उसकी दृष्टि से स्वतन्त्रता सकारात्मक है जिसका अर्थ स्वच्छन्दता नहीं है अपितु इसका सम्बन्ध सद्च्छा से है। इसका अर्थ है मानव नैतिक चेतना को स्वतन्त्रता की आवश्यकता होती है। 

पाशविक इच्छाओं का पालन करना स्वतन्त्रता नहीं है। इनका पालन करने से मनुष्य न तो स्वतन्त्र रह सकता है और न ही मानव का उद्देश्य पूर्ण हो सकता है अतः स्वतन्त्रता का अर्थ है - उन कार्यों को करना जिनका निर्देशन व्यक्ति की नैतिक चेतना द्वारा होता है। 

अनैतिक कार्यों को करना स्वतन्त्रता नहीं है क्योंकि इसका निर्देशन पाश्विक चेतना द्वारा होता है। ग्रीन ने स्वतन्त्रता को परिभाषित करते हुए लिखा है, “व्यक्ति तभी स्वतन्त्र है जब वह उस परिस्थिति में है जिसमें वह अपने व्यक्तित्व आदर्श को प्राप्त कर सके, कानूनों का पूर्ण रूप से पालन करे और यह स्वीकार करे कि उसे उनका पालन करना चाहिये, अपने में विद्यमान क्षमताओं का पूर्ण विकास कर सके और इस प्रकार अपने जीवन को सार्थक बना सके।" 

ग्रीन स्पष्ट शब्दों में कहता है अच्छे काम करने की प्रेरणा देने वाली, भली इच्छा के आदेशों का पालन करने की स्वतन्त्रता ही सच्ची स्वतन्त्रता है। 

ग्रीन ने व्यक्तिवादियों की स्वतन्त्रता सम्बन्धी धारणा की आलोचना निम्नलिखित शब्दों में की है एथेन्स के दासों से, जिनका उपयोग स्वामी अपनी वासना की तृप्ति के लिये करता था राज्य की स्वतन्त्रता से साक्षात्कार करने का कहना एक विडम्बना होती है और सम्भवतः इसी प्रकार की बात बिना छत के बाड़े में रहने वाले लन्दन के अनपढ़ तथा अधमूर्ख व्यक्तियों को कहने में घटेगी जिनको अपनी बाईं और दाईं ओर मदिरा की दुकानें मिलती हैं।

ग्रीन ने स्वतन्त्रता के आन्तरिक एवं बाह्य दो पक्ष बताए हैं। आन्तरिक स्वतन्त्रता नीतिशास्त्र का विषय है। इसका तात्पर्य है कि व्यक्ति को इन्द्रियों तथा छुद्र स्वार्थों का दास न बनकर उन्हें अपने वश में रखना चाहिये। 

बाह्य स्वतन्त्रता का अर्थ ऐसी परिस्थितियों का निर्माण है जो व्यक्ति के आत्म-विकास एवं आत्महित के कार्यों में बाधा उपस्थित न करे।

इस प्रकार ग्रीन ने आन्तरिक एवं बाह्य स्वतन्त्रता का उल्लेख करके व्यक्ति के लिये उसकी आवश्यकता पर बल दिया। वह शाश्वत चेतना को स्वतन्त्र मानता है। इस चेतना का अंश मानव चेतना में विद्यमान है। 

इसलिये मानव चेतना भी स्वतन्त्रता चाहती है अपने इन तर्कों के आधार पर ग्रीन ने स्वतन्त्रता को व्यक्ति का प्राण तथा अनिवार्य तत्व बताया जिसके अभाव में व्यक्ति पूर्णता को प्राप्त नहीं कर सकता। ।

3. स्वतन्त्रता के लिए अधिकार आवश्यक है   -ग्रीन की मान्यता है कि स्वतन्त्रता में अधिकार निहित है। स्वतन्त्रता के लिये मानव चेतना जिन सुविधाओं की माँग करती है वे अधिकारों का रूप धारण कर लेती हैं। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। 

अतः वह अन्य व्यक्तियों के हितों को ध्यान में रखकर आत्म-विकास करने की ओर प्रेरित होता है। अपने इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये वह अनेक सुविधाएँ चाहता है। 

इसके लिए वह ऐसी बाह्य परिस्थितियों की कामना करता है जो उसे अपने व्यक्तित्व तथा क्षमताओं के विकास में सहायता प्रदान करती है। इन सुविधाओं अथवा परिस्थितियों का नाम ही अधिकार है।

ग्रीन ने अधिकारों के पक्ष बताए हैं - वैयक्तिक तथा सामाजिक  ग्रीन के अनुसार अधिकारों का उद्देश्य व्यक्ति के हित के साथ ही साथ सम्पूर्ण समाज का हित भी है। अतः समाज के बाहर या समाज के विरुद्ध व्यक्ति के अधिकारों का कोई अस्तित्व नहीं है।

मैक्सी के शब्दों में यद्यपि अधिकार के इन दोनों पक्षों में अन्तर है पर उनको पृथक् नहीं किया जा सकता।" ग्रीन ने कहा है, "हम अपनी माँग को अधिकार तभी कह सकते हैं जब हम यह बता सकें कि हमारी उस माँग से किसी प्रकार का सामाजिक हित होगा और उस हित को सामान्य रूप में स्वीकार किया जाये ।

यहाँ यह जान लेना भी उचित होगा कि ग्रीन सामाजिक समझौतावादियों के प्राकृतिक अधिकारों के सिद्धान्त से सहमत नहीं है। ग्रीन यह तो मानता है कि व्यक्ति किसी समय में प्राकृतिक अवस्था में रहा होगा, परन्तु वह यह मानने के लिये तैयार नहीं है कि प्राकृतिक अवस्था में किसी प्रकार के अधिकारों का अस्तित्व था। 

कोकर के शब्दों में ग्रीन इस बात को अस्वीकार करता है कि समाज से पृथक् और पूर्व भी अधिकारों के समान कोई चीज होती है । "ग्रीन के अनुसार, "प्राकृतिक अधिकार वे अधिकार होते हैं जो कि व्यक्ति के नैतिक विकास के लिये आवश्यक होते हैं।

प्रो. बार्कर के अनुसार - ये आदर्श या प्राकृतिक अधिकार उन वास्तविक अथवा वैधानिक अधिकारों की अपेक्षा अधिक विस्तृत होते हैं जो किसी विशेष राज्य में किसी विशेष समय में उस राज्य की प्राकृतिक अधिकार सम्बन्धी धारणा की आवश्यक रूप से और अर्पूण अभिव्यक्ति होती है । 

ग्रीन नैतिकता तथा अधिकार में भी अन्तर मानता है। ग्रीन का विचार है कि अधिकारों का सम्बन्ध केवल बाह्य परिस्थितियों से है, जबकि नैतिकता व्यक्ति के आन्तरिक विवेक को संचालित करती है। 

अधिकारों को कानूनी मान्यता प्राप्त होती है परन्तु नैतिकता के पालन के लिये व्यक्ति को राज्य द्वारा बाध्य नहीं किया जा सकता। गैटल के शब्दों में, “ग्रीन ने कानूनी अधिकारों एवं नैतिक अधिकारों में अन्तर माना है और यह अनुभव का है कि कानून में नैतिक आदर्शों की सदैव अपूर्ण अभिव्यक्ति होती है।"

4. अधिकार के लिए राज्य की आवश्यकता  - मनुष्य अपनी चेतना के अनुकूल तथा अपनी इच्छा के अनुसार अपने व्यक्तित्व का विकास करना चाहता है। इसके लिये उसे स्वतन्त्रता चाहिये। स्वतन्त्रता का महत्त्व तभी है जबकि समाज उसे स्वीकार कर ले तथा उसे अधिकार के रूप में मान्यता प्रदान कर दे। 

फिर भी अधिकारों के पालन के लिये कोई शक्ति चाहिये। ऐसी शक्ति जो अधिकारों का अतिक्रमण करने वाले को दण्डित कर सके। यह शक्ति राज्य है। यदि राज्य न हो में तो व्यक्ति के अधिकारों को लागू करने वाली सत्ता का अभाव रहेगा। 

चूँकि मनुष्य यथार्थ इच्छाएँ भी होती हैं। इनके प्रकट होने पर दमन करना आवश्यक नहीं है तो उससे व्यक्ति अपनी अन्य व्यक्तियों के अधिकार का अतिक्रमण होगा। ऐसी स्थिति स्वतन्त्रता का उपयोग नहीं कर सकता।

व्यक्ति को अपने अधिकारों का उपयोग करने का आश्वासन राज्य द्वारा ही प्राप्त क्योंकि होता है। राज्य के अभाव में व्यक्ति के अधिकारों का अस्तित्व नहीं हो सकता, व्यक्ति अपने अधिकारों का उपभोग तभी कर सकता है, जबकि राज्य उसकी रक्षा करे तथा उनका उल्लंघन करने वाले व्यक्तियों को दण्डित करे। 

ग्रीन ने इस आधार पर अधिकार और कर्त्तव्य को एक-दूसरे के साथ घनिष्ठ रूप से सम्बन्धित माना है। व्यक्ति यदि यह अपेक्षा करता है कि उसके अधिकारों में कोई हस्तक्षेप न करे तो उसका भी यही दायित्व है कि वह दूसरों के अधिकारों का अतिक्रमण न करे।

ग्रीन के विचारों में इस दृष्टि से विरोधाभास प्रतीत होता है। एक ओर तो उसका विश्वास है “शक्ति नहीं इच्छा राज्य का आधार है” परन्तु दूसरी ओर वह स्वतन्त्रता और अधिकारों की रक्षा के लिये राज्य की शक्ति को अनिवार्य मानता है। 

परन्तु बार्कर का मत है यदि राज्य नैतिकता के मार्ग में हस्तक्षेप नहीं करता है तो इसलिये कि वह नैतिकता के हित में ही अपने को प्रतिबन्धित रखता है। यदि वह बाह्य कार्यों में हस्तक्षेप करता है तो भी नैतिकता के हित में ही ऐसा करता है। 

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