ग्रीन के राजनीतिक विचार। - green ke rajnitik vichar

रूसो और काण्ट की तरह ही ग्रीन के द्वारा भी अपनी राजनीतिक धारणाओं के प्रतिपादन का आरम्भ स्वतन्त्रता की समस्याओं के साथ किया गया है। ग्रीन स्वतन्त्रता विषयक विचारों के सम्बन्ध में काण्ट की स्वतन्त्र नैतिक इच्छा और हीगल की सकारात्मक स्वतन्त्रता की धारणा से प्रभावित है। 

ग्रीन के मतानुसार स्वतन्त्रता न तो केवल हस्तक्षेप का अभावमात्र है और न ही मनमानी करने की छूट क्योंकि इसके अन्तर्गत कार्य करने की उस प्रवृत्ति पर ध्यान नहीं दिया गया है, जिसमें व्यक्ति की इच्छा सन्तुष्टि प्राप्त करती है। एक ऐसे व्यक्ति को स्वतन्त्र कैसे कहा जा सकता है जो मृत्यु की सीमा तक मद्यपान करता है या जुए द्वारा स्वयं अपने परिवार का विनाश करता है। 

 ग्रीन के राजनीतिक विचारों की व्याख्या कीजिए।

ग्रीन के मतानुसार स्वतन्त्रता न तो केवल हस्तक्षेप का अभाव मात्र है और न ही मनमानी करने की छूट । हस्तक्षेप का अभावमात्र केवल नकारात्मक स्वतन्त्रता होगी और यदि स्वतन्त्रता का अर्थ मनमानी करने की छूट से ले लिया जाए, तो उसमें तथा उच्छृंखलता में कोई अन्तर न रह जाएगा। अतः स्वतन्त्रता के दो लक्षण हैं

(1) स्वतन्त्रता एक निश्चित प्रकार के कार्यों के ही करने की सुविधा है, अर्थात् उचित या विधि-विहित कार्यों के करने की जो हमारी आत्मोन्नति में सहायक हो ।

(2) यह सकारात्मक होती है, अर्थात् वह हस्तक्षेप का अभाव मात्र ही नहीं, वरन् ऐसी परिस्थितियों और वातावरण की उपलब्धि है, जिसमें व्यक्तित्व का विकास सम्पन्न हो सके ।

ग्रीन की स्वतन्त्रता के इन दो लक्षणों को निम्न प्रकार से स्पष्ट किया जा सकता है ।

(1) ग्रीन के अनुसार स्वतन्त्रता का अर्थ नियन्त्रण या अनुशासन से मुक्ति प्राप्त करना नहीं है और हम उसे भी स्वतन्त्रता नहीं कह सकते जब एक व्यक्ति या कोई वर्ग दूसरे की स्वतन्त्रता की बलि देकर स्वतन्त्रता का उपभोग करे। 

हमारे कार्य समाज के अन्य व्यक्तियों के कार्यों से सम्बन्धित होते हैं, इसलिए सामाजिक सन्दर्भ में स्वतन्त्रता का अर्थ यह है कि हमें निश्चित प्रकार के उन कार्यों को करने की स्वतन्त्रता मिले जिसके द्वारा व्यक्ति उस सुख या वस्तु को प्राप्त कर सके, जो सामाजिक और नैतिक दृष्टिकोण से प्राप्त करने के योग्य हो और जिसकी प्राप्ति हम समाज के अन्य व्यक्तियों के साथ मिलकर करते हैं। 

इस प्रकार ग्रीन की स्वतन्त्रता की धारणा स्वतन्त्रता के प्रचलित सामान्य अर्थ से भिन्न है। उदाहरणार्थ, विद्यार्थी अपने आपको तब स्वतन्त्र समझते हैं जबकि विद्यार्थियों को विद्यालय और परीक्षा भवन में मनमाना आचरण करने की छूट हो, किन्तु ग्रीन इसे स्वतन्त्रता नहीं वरन् उच्छृंखलता या अनुशासनहीनता मानता है। 

ग्रीन के मतानुसार विद्यार्थियों की स्वतन्त्रता नहीं वरन् उच्छृंखलता या अनुशासनहीनता मानता है। ग्रीन के मतानुसार विद्यार्थियों की स्वतन्त्रता इसी में निहित है कि वे बड़े मनोयोग से पाठ्य-पुस्तकों का अध्ययन करें, विभिन्न प्रकार के खेलों और व्यायामों से अपने शरीर को सुदृढ़ बनावें तथा चारित्रिक गुणों का विकास करें। 

इसी प्रकार श्रमिक वर्ग की स्वतन्त्रता अपनी माँगें मनवाने के लिए तोड़-फोड़, हड़ताल या विध्वंसात्मक कार्यवाही करने में नहीं,वरन् उत्पादन बढ़ाकर, अपने देश को समृद्ध बनाने में ही है

ग्रीन मानता है कि मनुष्य एक नैतिक प्राणी है, जिसका चरम लक्ष्य अन्य प्राणियों एवं समाज का हित सम्पादन करना है। जो कार्य व्यक्ति के इस उद्देश्य को पूरा करें तथा व्यक्ति के नैतिक और सामाजिक विकास में सहायक हों, उन्हें करना ही स्वतन्त्रता है । 

व्यक्तियों को कुछ बुरे कार्य करने में भी क्षणिक सुख की प्राप्ति हो सकती है, परन्तु वे कार्य आत्मा के विकास में बाधक होते हैं, अतः इन कार्यों को उसे न करने देना ही स्वतन्त्रता है। वस्तुतः इन कार्यों को करने की छूट प्राप्त होने से व्यक्ति स्वतन्त्र नहीं वरन् परतन्त्र हो जाता है। 

ग्रीन के उपर्युक्त मत को स्पष्ट करते हुए बार्कर ने लिखा है कि “अच्छे कार्य करने की प्रेरणा देने वाली, सद्इच्छा के आदेशों का पालन करने की स्वतन्त्रता ही सच्ची स्वाधीनता हो सकती है। "

(2) स्वतन्त्रता का सकारात्मक या भावात्मक रूप-ग्रीन के पूर्ववर्ती उपयोगितावादी तथा व्यक्तिवादी विचारक राज्य के कानून तथा व्यक्ति की स्वतन्त्रता को परस्पर विरोधी मानते थे और उनका विचार था कि राज्य के द्वारा ऐसे सभी कानून रद्द कर दिए जाने चाहिए जिससे व्यक्ति की स्वतन्त्रता पर प्रतिबन्ध लगता हो। 

आदम स्मिथ का मत था कि राज्य के द्वारा आर्थिक क्षेत्र में कोई प्रतिबन्ध नहीं लगाया जाना चाहिए और जॉन स्टुअर्ट मिल जैसे विचारकों का मत था कि व्यक्तिके नैतिक विकास तथा उसके व्यक्तित्व विकास के हित में राज्य के द्वारा व्यक्ति के जीवन में कम-से-कम ही हस्तक्षेप किया जाना चाहिए। 

इन विचारकों के द्वारा प्रतिबन्धों या कानूनों के अभाव पर या इनके हटाए जाने पर बल दिया गया था, अतः इनकी स्वतन्त्रता के विचार को 'नकारात्मक स्वतन्त्रता'  की धारणा कहा जाता है।

किन्तु ग्रीन ने उपयोगितावादियों या व्यक्तिवादियों की नकारात्मक स्वतन्त्रता का प्रतिपादन किया। इसका अभिप्राय यह है कि व्यक्ति द्वारा अपनी योग्यता और गुणों के विकास के लिए राज्य की शक्तिका प्रयोग किया जा सकता है। 

व्यक्ति की स्वतन्त्रता तथा राज्य के कार्यों में परस्पर कोई विरोध नहीं होता, अतः राज्य व्यक्ति की स्वतन्त्रता का शोषक नहीं वरन् पोषक है।

ग्रीन की विचारधारा के अनुसार स्वतन्त्रता केवल एक साधन है और साध्य है सामाजिक कल्याण में समान योगदान के लिए सबकी शक्तियों को मुक्तकरना । इसलिए कोई मनुष्य किसी की सम्पत्ति नहीं हो सकता और न कोई मनुष्य दूसरे का साधन बन सकता है। 

चूँकि श्रम व्यक्ति के व्यक्तित्व से सम्बन्धित है, इसलिए यदि पूँजीपति और मजदूरों के सम्बन्धों से सामाजिक भलाई में स्वतन्त्र योगदान देने से व्यक्ति को कोई बाधा पड़ती है, तो श्रम बेचने पर नियन्त्रण किया जाना आवश्यक है। 

रोशनी और स्वच्छ वायु की कमी वाले कारखाने और अधिक काम के घण्टे व्यक्ति के इस योगदान को सीमित करते हैं, इसलिए कारखानों के अस्वस्थ वातावरण को हटाने वाली, श्रम के घण्टे निर्धारित करने वाली तथा अनिवार्य शिक्षा की व्यवस्था करने वाली विधियाँ व्यक्ति की स्वतन्त्रता सीमित नहीं करतीं, वरन् व्यक्ति को अपनी शक्ति के प्रयोग की . सुविधा देकर उसे स्वतन्त्र करती हैं। 

ग्रीन के ही शब्दों में  हमारा आधुनिक नियमन, जो श्रम, शिक्षा और स्वास्थ्य से सम्बन्ध रखता है और जो हमारे समझौते की स्वतन्त्रता में अधिकाधिक हस्तक्षेप मालूम होता है, इस आधार पर न्यायोचित है कि राज्य का कार्य यद्यपि प्रत्यक्ष रूप से नैतिक अच्छाई बढ़ाना नहीं है। 

फिर भी उन परिस्थितियों को बनाना है जिसके बिना मानवीय शक्तियों का स्वतन्त्र रूप से कार्य करना असम्भव है। इस प्रकार ग्रीन व्यक्ति की स्वतन्त्रता के लिए समाज और राज्य के नियमों को आवश्यक मानता है। यही ग्रीन का सकारात्मक स्वतन्त्रता का विचार है ।

अधिकार - स्वतन्त्रता का प्रतिपादन करने के बाद ग्रीन अधिकारों का विवेचन करता है। वह लॉक की भाँति अधिकारों को प्राकृतिक व स्वाभविक न मानकर समाज द्वारा व्यक्ति को समाज के हित को भली-भाँति सम्पादित करने की दृष्टि से दी गयी ऐसी सुविधाएँ मानता है, जिन्हें समाज ने अपने कल्याण की दृष्टि से स्वीकार किया है। 

ग्रीन अधिकार को इस प्रकार परिभाषित करता है कि “अधिकार व्यक्ति द्वारा अपने ऐसे उद्देश्यों को पूर्ण करने की शक्ति है, जिन उद्देश्यों को वह अपने लिए हितकर समझता है तथा समाज यह अधिकार व्यक्तिको इस आधार पर प्रदान करता है कि इस अधिकार के प्रयोग से समाज को लाभ पहुँचेगा ।"

अधिकारों की सृष्टि कैसे होती है ? प्रत्येक व्यक्ति अपनी स्वाभाविक स्वातन्त्र्य भावना के अनुरूप यह चाहता है कि उसे अमुक बातों को करने की सुविधा प्राप्त हो, जिससे वह उन्नति कर सके। वह समाज से इन सुविधाओं की माँग करता है। 

इसके साथ ही विवेकशील होने के कारण व्यक्ति यह स्वीकार करता है कि जैसे मुझे इन सुविधाओं की आवश्यकता है, वैसे ही अन्य मनुष्यों को भी इनकी आवश्यकता है। इस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति अपने लिए आवश्यक सुविधाओं की माँग करता है और अन्य व्यक्तियों की भी इसी प्रकार की माँगों के औचित्य को स्वीकार करता है । 

अतः इन व्यक्तिगत माँगों के पीछे समाज की स्वीकृति का भाव निहित है। इस प्रकार अधिकार व्यक्ति की वह व्यक्तिगत माँग है, जिसे समाज की स्वीकृति और संरक्षण प्राप्त हो । अतः अधिकार के दो तत्व हैं- (1) व्यक्ति की माँग, और (2) समाज द्वारा माँग की स्वीकृति ।

व्यक्ति की प्रत्येक माँग अधिकार का रूप ग्रहण नहीं कर लेती, इसमें से केवल उन्हीं माँगों को अधिकार कह जा सकता है, जिन्हें समाज की स्वीकृति और संरक्षण प्राप्त हो। 

उदाहरणार्थ, यदि मेरी यह माँग हो कि मुझे भारत के राष्ट्रपति का पद प्राप्त होना चाहिए, तो मेरी यह माँग समाज द्वारा स्वीकृत न होने के कारण मुझे राष्ट्रपति पद प्राप्त करने का अधिकार नहीं हो सकता है ।

अधिकार और वैधिक अधिकार - ग्रीन जब सामाजिक संरक्षण की चर्चा करता है, तो इसका अर्थ यह नहीं है कि राज्य ने इसको मान्यता दे दी है और वे व्यक्ति के वैधिक अधिकार हैं। अधिकारों की समाज द्वारा स्वीकृति के दो चरण हैं। 

प्रथम चरण यह है कि जनमत कुछ अधिकारों का औचित्य स्वीकार कर ले पर उन्हें राज्य या कानून द्वारा स्वीकृति या संरक्षण न मिल पाय हो । भारत में जनमत इस बात को स्वीकार करता है कि प्रत्येक व्यक्ति को रोजगार की सुविधा मिलनी चाहिए पर अभी इस बात को राज्य या कानून द्वारा स्वीकृति नहीं मिली है। 

इस कारण इस अधिकार को क्रियान्वित नहीं किया जा सकता और कोई बेरोजगार मनुष्य सरकार से यह दावा नहीं कर सकता कि उसे रोजगार मिले ही, ऐसे अधिकारों को ग्रीन प्राकृतिक अधिकार कहते हैं। 

जो अधिकार कानून द्वारा संरक्षित हैं और जिन्हें भंग करने वाले को राज्य से दण्ड मिलता है, वे कानूनी या वैधिक अधिकार  कहे जाते हैं। जो आज प्राकृतिक अधिकार मात्र हैं, कल राज्य तथा कानून तथा स्वीकृत व संरक्षित किए जाने पर कानूनी अधिकार के रूप में परिणत हो जाते हैं।

प्राकृतिक अधिकार का अर्थ 

ग्रीन प्राकृतिक अधिकार शब्द का प्रयोग उसी अर्थ में करता है, जिस अर्थ में अरस्तू ने राज्य के लिए प्राकृतिक शब्द का प्रयोग किया है। ग्रीन के अनुसर अधिकार इस अर्थ में प्राकृतिक हैं कि वे व्यक्ति के पूर्ण विकास के लिए नितान्त आवश्यक होते हैं। 

लॉक आदि अनुबन्धवादियों ने प्राकृतिक अधिकार शब्द का प्रयोग दूसरे अर्थ में किया है। इन अनुबन्धवादियों का कहना है कि सामाजिक समझौते से पूर्व मनुष्यों के कुछ जन्मजात अधिकार थे, इसलिए राज्य इनमें हस्तक्षेप नहीं कर सकता, ये अधिकार, जिन्हें हम मूल अधिकार भी कह सकते हैं,। 

राज्य और समाज से पूर्ण स्वतन्त्र हैं, परन्तु अधिकारों के लिए ग्रीन दो बातें आवश्यक मानता है- 

(1) समाज द्वारा मान्यता, और 

(2) आत्मोन्नति के लिए व्यक्ति की माँग । चूँकि मनुष्य की आत्मोन्नति समाज के अन्य व्यक्तियों से सम्बन्धित है, इसलिए ग्रीन समाज के पूर्व की प्राकृतिक अवस्था में इन अधिकारों की कल्पना नहीं कर सकता है।

ग्रीन के प्राकृतिक अधिकार तो आदर्श अधिकार की भाँति हैं। ये ऐसे अधिकार हैं जिन्हें सामान्य जनहित पर आधारित समाज के द्वारा अपने नागरिकों को प्रदान किया जाना चाहिए। 

क्योंकि इस प्रकार का आदर्श समाज भूतकाल में विद्यमान नहीं था और हम भविष्य में ही ऐसे समाज की आशा कर सकते हैं इसलिए प्राकृतिक अधिकार वर्तमान स्थिति से आगे की चीज है। 

ये ऐसे अधिकार नहीं है जोकि संगठित राजनीतिक जीवन में प्रवेश के पूर्व भूतकाल में हमें प्राप्त थे, वरन् ये ऐसे अधिकार हैं जिनकी प्राप्ति की आशा हमारे द्वारा भविष्य के अधिक पूर्ण राज्य में की जा सकती है। वास्तव में, प्रत्येक समाज का यह प्रयत्न होना चाहिए कि वह अपने कानूनों को प्राकृतिक अधिकारों के अधिकाधिक अनुरूप बनाए ।

अधिकार और नैतिकता - ग्रीन अधिकारों का नैतिकता से गहरा सम्बन्ध और भेद मानता है। अधिकारों का नैतिकता से गहरा सम्बन्ध यह है कि इनके बिना नैतिक जीवन व्यतीत किया जाना सम्भव नहीं है, किन्तु इन दोनों में मौलिक भेद भी है। 

अधिकारों का सम्बन्ध केवल बाहरी परिस्थितियों से होता है, जबकि नैतिकता मनुष्य के अन्दर विवेक का संचार करती है। नैतिकता वहाँ कार्य करती है जहाँ राज्य शक्ति की पहुँच ही नहीं होती । 

उदाहरण के लिए, राज्य कानून बनाकर व्यक्तियों को चर्च या धर्म स्थान जाने के लिये बाध्य कर सकता है, लेकिन यह धर्म स्थान में हुए व्यक्तियों को ईश्वर का ध्यान करने के लिए बाध्य नहीं कर सकता। 

अतः अधिकार और नैतिकता में यह भेद है कि प्रथम का सम्बन्ध केवल बाहरी कार्य से होने के कारण उसका बलपूर्वक पालन कराना सम्भव है, किन्तु नैतिकता का सम्बन्ध आन्तरिक मनोभावना से होता है। अतः उसका पालन शक्ति के प्रयोग से नहीं कराया जा सकता है।

अधिकार और कानून - अधिकार और कानून इस दृष्टि से परस्पर सम्बन्धित हैं कि अधिकार को कानूनी रूप दिया जा सकता है और इस प्रकार उसका पालन कराया जा सकता है। 

बच्चों की अनिवार्य प्रारम्भिक शिक्षा का अधिकार आज चाहे प्राकृतिक या नैतिक मात्र ही हो, पर यदि कल इस विषय का कानून बन जाए तो वह कानूनी अधिकार में बदल जाएगा पर अधिकार और कानून में भेद यह है कि सभी विधिसम्मत अधिकार नैतिक अधिकार नहीं कहे जा सकते। 

विधिसम्मत अधिकारों में कुछ अन्यायपूर्ण भी हो सकते हैं जैसे किसी समय लोगों को दास रखने, बेचने या मार डालने तक का कानूनी अधिकार था, परन्तु इसे नैतिक अधिकार नहीं कहा जा सकता। 

इसी प्रकार कुछ अधिकार ऐसे भी होते हैं जो नैतिक तो हैं, पर अभी कानून का संरक्षण प्राप्त न होने से कानून सिद्ध नहीं, किन्तु अधिकांश अधिकार ऐसे होते हैं, जो नैतिक और न्यायपूर्ण भी हैं और कानून द्वारा स्वीकृत भी। वस्तुतः नैतिक अधिकार ही कालान्तर में कानूनी अधिकार का रूप ग्रहण कर लेते हैं ।

राज्य सामान्य इच्छा का परिणाम 

ग्रीन के अनुसार मानवीय चेतना या आत्मा स्वतन्त्रता चाहती है। स्वतन्त्रता के अभाव में मानव, मानव न रहकर अन्य द्वारा संचालित मशीन तुल्य हो जाता है। यह स्वतन्त्रता दो प्रकार की होती है- आन्तरिक तथा बाह्य। आन्तरिक स्वतन्त्रता आचारशास्त्र का विषय है और उसका मुख्य अर्थ होता है अपनी मनोवृत्तियों को वश में रखना तथा उनका दास बन जाना। 

बाह्य जगत की स्वतन्त्रता राजनीति का विषय है और उसका अर्थ है ऐसे वातावरण या परिस्थितियों का होना जिनमें प्रत्येक व्यक्ति अपने वास्तविक हित के कार्य कर सके और उस किसी भी बाधा का सामना न करना पड़े। ऐसी परिस्थितियों की जो शर्ते हैं, उन्हें ही अधिकार कहा जाता है। 

संक्षेप में अधिकार वे व्याख्याएँ या शर्तें हैं जिनके अन्तर्गत ही हमें स्वतन्त्रता की प्राप्ति हो सकती है पर अधिकारों के रक्षण की आवश्यकता होती है और जिन अधिकारों की रक्षा का प्रबन्ध न हो उन्हें अधिकार कहना ही उचित नहीं है । अतः अधिकारों की रक्षा के लिए राज्य की सृष्टि होती है।

इस प्रकार ग्रीन अपने दर्शन के अन्तर्गत स्वतन्त्रता, अधिकार और राज्य की विवेचना करते हुए बार्कर के सुन्दर शब्दों में इस बात का प्रतिपादन करता है कि “मानवीय चेतना स्वतन्त्रता चाहती है, स्वतन्त्रता में अधिकार का भाव निहित है और अधिकार अपनी रक्षा के हेतु राज्य की माँग करते हैं।" 

इस प्रकार ग्रीन इस बात पर बल देता है कि राज्य एक कृत्रिम या मानव जीवन पर थोपी गयी संस्था नहीं, वरन् इसकी सृष्टि तो मानवीय चेतना की मूलप्रवृत्ति स्वतन्त्रता के आधार पर ही हुई है और इस कारण राज्य मानव जीवन की एक स्वाभाविक और नैतिक संस्था है। 

इस प्रकार ग्रीन इस बात का प्रतिपादन करता है कि राज्य का निर्माण व्यक्तियों की सामान्य इच्छा के आधार पर हुआ है और इस सम्बन्ध में ग्रीन की धारणा रूसो के समान ही है।

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