लगान का आधुनिक सिद्धांत - lagan ka aadhunik siddhant

आधुनिक अर्थशास्त्रियों ने लगान की व्याख्या रिकार्डो के समान एक बचत के रूप में की है। रिकार्डो ने अधिसीमांत एवं सीमांत भूमि के उपज के अन्तर को लगान कहा है। लेकिन आधुनिक अर्थशास्त्री लगान को साधन के अवसर लागत के ऊपर एक बचत मानते हैं। अवसर लागत, उत्पादन के किसी साधन को उसके अपने वर्तमान प्रयोग में बनाए रखने के लिए न्यूनतम पूर्ति मूल्य होता है। 

लगान का आधुनिक सिद्धांत

यदि किसी साधन को अपने वर्तमान प्रयोग में बनाए रखना है तो उसकी न्यूनतम पूर्ति सीमित होती है। इसीलिए भूमि को इसकी न्यूनतम पूर्ति मूल्य अथवा अवसर लागत से अधिक मूल्य प्राप्त होता है। अवसर लागत अथवा हस्तांतरण आय के ऊपर इसी बचत को आधुनिक अर्थशास्त्रियों ने लगान कहा है। 

उदाहरण द्वारा स्पष्टीकरण के मान लीजिए, भूमि के एक टुकड़े से गेहूँ की खेती करने पर 1,000 रु. की आय होती है। यदि उसी भूमि के एक टुकड़े से गन्ने की खेती से आय 800 रु. की आय होगी तो ऐसी स्थिति में उस भूमि के टुकड़े के लिए 800 रु. अवसर लागत अथवा न्यूनतम पूर्ति मूल्य है। उस भूमि के टुकड़े पर गेहूँ की खेती करने के लिए कम से कम 800 रु. न्यूनतम पूर्ति मूल्य देना होगा।  

लेकिन उस भूमि के टुकड़े पर गेहूँ की खेती करने के लिए 1,000 रु. का भुगतान किया जा रहा है। ऐसी स्थिति में उस भूमि के टुकड़े का वर्तमान मूल्य - अवसर लागत (1000-800) = 200 रु लगान होगा। आधुनिक अर्थशास्त्रियों के अनुसार लगान किसी साधन को उसके वर्तमान उपयोग में बनाए रखने के लिए अवसर लागत के ऊपर एक बचत है।

श्रीमती जॉन रॉबिन्सन के अनुसार - लगान के विचार का सार वह बचत है। जो कि एक साधन की एक इकाई उस न्यूनतम मूल्य के ऊपर प्राप्त करती है। जो कि साधन को अपना कार्य करते रहने के लिए आवश्यक है। आधुनिक लगान सिद्धांत का आधार लगान के आधुनिक सिद्धांत का आधार साधनों की विशिष्टता है। इस संबंध में ऑस्ट्रियन अर्थशास्त्री वॉन बीजर ने उत्पादन के साधनों को दो भागों में बाँटा है-

1. पूर्णतया विशिष्ट साधन - पूर्णतया विशिष्ट साधन वे हैं जिनका केवल एक ही प्रयोग किया जा सकता है । इन साधनों का किसी दूसरे प्रयोग में उपयोग नहीं किया जा सकता है, अतः विशिष्ट साधनों की अवसर लागत शून्य होती है। इसके परिणामस्वरूप विशिष्ट साधनों के लिए दिया जाने वाला सम्पूर्ण मूल्य इसका लगान होता है।

2. पूर्णतया अविशिष्ट साधन - अविशिष्ट साधन वे होते हैं। जिनका कई प्रकार से उपयोग किया जा सकता है। अतः ऐसे साधनों के लिए दिए जाने वाले मूल्य के बराबर अवसर लागत अन्य प्रयोगों में भी प्राप्त हो सकता है। चूँकि इन साधनों को अपने वर्तमान मूल्य को उसके अवसर लागत के ऊपर कोई बचत प्राप्त नहीं होती है। इसलिए अविशिष्ट साधनों को कोई लगान प्राप्त नहीं होता है।

उदाहरण द्वारा स्पष्टीकरण मान लीजिए एक बूढ़े नौकर को उसका मालिक 200 रु. प्रतिमाह वेतन देता है। यदि वह अपने नौकर को काम से अलग कर देता है तो उसे अन्य जगहों पर नौकरी नहीं मिल सकती, क्योंकि वह अत्यन्त बूढ़ा है। ऐसी स्थिति में वह बूढ़ा नौकर पूर्णतया विशिष्ट साधन कहलाएगा और उसको मिलने वाला वेतन रु. 200 उसका लगान कहलाएगा। 

इसके विपरीत, मान लीजिए एक इंजीनियर भिलाई इस्पात उद्योग में कार्य करता है और उसे 10,000 रु. मासिक वेतन मिलता है। यदि उसे भिलाई इस्पात कारखानें की नौकरी से अलग कर दिया जाता है तो उसे एलाइड स्टील प्लाण्ट में 10,000 रु. मासिक वेतन पर ही नौकरी मिल सकती है। ऐसी स्थिति में वह इंजीनियर पूर्णत: अविशिष्ट साधन कहलाएगा। 

चूँकि उसे अवसर लागत के ऊपर कोई बचत प्राप्त नहीं हो रही है। अतः उसे कोई लगान प्राप्त नहीं होगा। सामान्यतया, उत्पादन का कोई भी साधन न तो पूर्णतः विशिष्ट होता है और न ही पूर्णतः अविशिष्ट है। इसके विपरीत, वह आंशिक रूप से विशिष्ट एवं आंशिक रूप से अविशिष्ट होता है। साधन जिस अनुपात में विशिष्ट होगा, उसी अनुपात में उसे लगान प्राप्त होगा।

मान लीजिए एक एकड़ भूमि पर यदि कपास की खेती की जाती है तो किसान को 1,000 रु. की आय होती है। यदि उसी भूमि पर गेहूँ की खेती की जाती है तो किसान को 800 रु. की आय प्राप्त होगी, अतः गेहूँ की खेती से प्राप्त होने वाली आय 800 रु. उस भूमि के लिए अवसर लागत होगी तथा उस भूमि पर कपास की ही खेती करने से अतिरिक्त आय 1000 - 800 =  200 रु. होगी, वही उस भूमि का लगान कहलाएगा।

आधुनिक अर्थशास्त्रियों के अनुसार, लगान साधन के अवसर लागत के ऊपर उसकी वर्तमान आय का अतिरेक अतः अथवा बचत है।

सूत्र रूप में,

लगान = वास्तविक लागत - अवसर लागत

इस संबंध में यह ध्यान देने योग्य बात है कि विशिष्टता एक गुण है, जिसे कोई भी साधन प्राप्त कर सकता है। सामान्यत; उत्पादन का प्रत्येक साधन अल्पकाल में विशिष्ट होता है, लेकिन दीर्घकाल में उसमें अविशिष्टता का गुण आ जाता है । यही कारण है कि उत्पादन के किसी भी साधन को अल्पकाल में विशिष्टता के गुण होने के कारण लगान प्राप्त हो सकता है।

लगान के आधुनिक सिद्धांत की विशेषताएँ - लगान के आधुनिक सिद्धांत की प्रमुख विशेषताएँ निम्नांकित हैं -

1. उत्पत्ति का प्रत्येक साधन लगान प्राप्त कर सकता है। यह केवल भूमि से ही संबंधित नहीं होता है।

2. लगान साधन की वर्तमान आय में उसकी अवसर लागत के ऊपर बचत है। 

3. लगान उत्पन्न होने का कारण साधन में विशिष्टता का गुण होना है। अतः लगान विशिष्टता का पुरस्कार है। 

4. साधन के अविशिष्ट होने अथवा साधन की पूर्ति लोचदार होने पर लगान प्राप्त नहीं होता है। 

5. साधन के विशिष्ट होने अथवा पूर्ति पूर्णतया बेलोचदार होने पर साधन की सम्पूर्ण वर्तमान आय उसका लगान होता है।

6. यदि साधन आंशिक रूप से विशिष्ट एवं आंशिक रूप से अविशिष्ट है तो उसकी वर्तमान सम्पूर्ण आय लगान नहीं होता, बल्कि उसका एक भाग ही लगान होता है। साधन जिस अंश तक विशिष्ट होता है। उसी अंश तक उसके वर्तमान आय से लगान प्राप्त होता है।

इस प्रकार लगान का आधुनिक सिद्धांत एक सामान्य सिद्धांत है। जो उत्पत्ति के सभी साधनों पर लागू होता है।

लगान तथा मूल्य में संबंध

लगान तथा मूल्य के संबंध में दो मत हैं -

  1. रिकार्डो का मत तथा 
  2. आधुनिक अर्थशास्त्रियों का मत।

 रिकार्डो का मत 

रिकार्डो के अनुसार - लगान मूल्य का निर्धारण नहीं करता है। बल्कि यह स्वयं इसके द्वारा निर्धारित होता है। लगान एक प्रकार का अतिरेक है जो मूल्य तथा लागत के अन्तर को प्रदर्शित करता है। चूँकि वस्तु का मूल्य सीमांत भूमि पर उत्पादित वस्तु की उत्पादन लागत के बराबर होता है तथा सीमांत भूमि पर किसी प्रकार का लगान उत्पन्न नहीं होता, अतः मूल्य में सम्मिलित नहीं होता। 

रिकार्डो के अनुसार - अनाज का मूल्य इसलिए अधिक नहीं है कि लगान दिया जाता है बल्कि लगान इसलिए दिया जाता है, क्योंकि अनाज का मूल्य अधिक है। इस कथन की विवेचना दो रूपों में की जा सकती है

1. लगान मूल्य को प्रभावित नहीं करता - रिकार्डो के अनुसार, उत्पादन का मूल्य सीमांत भूमि की औसत लागत के बराबर होता है। इस प्रकार सीमांत भूमि को कोई अतिरेक प्राप्त नहीं होता। वह लगान रहित भूमि होती है अर्थात् लगान न वस्तु के मूल्य को प्रभावित करता है और न ही लगान वस्तु के मूल्य में सम्मिलित होता है।

2. मूल्य लगान को प्रभावित करता है - रिकार्डो के अनुसार, लगान श्रेष्ठ भूमियों तथा सीमांत भूमि की लागत का अन्तर है। चूँकि मूल्य सीमांत भूमि की लागत के बराबर होता है अर्थात् यह कहा जा सकता है कि कृषि उपज के मूल्य तथा श्रेष्ठ भूमि की लागत में अन्तर है। यदि किसी वस्तु की माँग बढ़ जाती है तो उसका मूल्य भी बढ़ जाता है। इस स्थिति में उस वस्तु का अधिक मात्रा में उत्पादन करना लाभदायक होता है। 

उत्पादन में वृद्धि करने के लिए निम्न कोटि की भूमि जोत अनिवार्य हो जाती है। परिणामस्वरूप जो भूमि अब तक सीमांत भूमि थी, वह अब अधिसीमांत भूमि बन जाती है। नयी सीमांत भूमि की लागत पहली सीमांत भूमि की अपेक्षा अधिक होगी, अब मूल्य नयी सीमांत भूमि की ऊँची लागत के बराबर होगा अर्थात् मूल्य बढ़ जायेगा। 

मूल्य बढ़ जाने से श्रेष्ठ भूमियों की लागतों में तथा मूल्य में अन्तर बढ़ जायेगा अर्थात् लगान बढ़ जायेगा। स्पष्ट है कि जब वस्तु के मूल्य में वृद्धि होती है, भूमि के लगान में भी वृद्धि होती है। इसके विपरीत, यदि वस्तु के मूल्य में कमी होगी तो लगान में भी कमी हो जायेगी।

उपर्युक्त विवेचना से स्पष्ट है कि लगान मूल्य को प्रभावित नहीं करता, बल्कि मूल्य लगान को प्रभावित करता है। मूल्य के बढ़ने और घटने से लगान में भी घट बढ़ होती रहती है।

आधुनिक अर्थशास्त्रियों का मत

आधुनिक अर्थशास्त्रियों के अनुसार, लगान मूल्य में सम्मिलित होता है अथवा नहीं, इस बात पर निर्भर करता है कि हम लगान को किस आर्थिक इकाई के रूप में देखते हैं, अत: निम्न बातों को ध्यान में रखते हुए सही स्थिति ज्ञात की जा सकती है - 

1. सम्पूर्ण समाज की दृष्टि से - सम्पूर्ण समाज की दृष्टि से भूमि की पूर्ति पूर्णतया बेलोचदार होती है तथा उसका कोई वैकल्पिक प्रयोग नहीं होता। इसकी हस्तांतरण आय अथवा अवसर लागत शून्य होती है, अतः सम्पूर्ण समाज की दृष्टि से समस्त आय एक बचत है अर्थात् लगान है। इसलिए वह लागत में प्रवेश नहीं करती और मूल्य को प्रभावित नहीं करती।

2. एक उद्योग की दृष्टि से - एक उद्योग की दृष्टि से भूमि की स्थानांतरण लागत होती है और इस प्रकार किसी उपयोग में भूमि की समस्त आय लगान नहीं होती। चूँकि लगान में स्थानांतरण लागत शामिल की जाती है। इस कारण एक विशेष उद्योग या प्रयोग में भूमि की वास्तविक आय का उतना भाग ही उत्पादन लागत में जोड़ा जायेगा, जितना कि स्थानांतरण आय के बराबर हो और यह मूल्य निर्धारणों में भी सम्मिलित होगी। 

दूसरे शब्दों में, एक उद्योग की दृष्टि से भूमि की आय (अर्थात् लगान) आंशिक रूप से 'मूल्य निर्धारक' तथा आंशिक रूप से 'मूल्य द्वारा निर्धारित' होती है। 

3. एक व्यक्तिगत उत्पादक की दृष्टि से - एक व्यक्तिगत उत्पादक की दृष्टि से लगान, उत्पादन लागत का एक आवश्यक अंग है और वस्तु के मूल्य में सम्मिलित होता है। क्योंकि एक व्यक्तिगत उत्पादक को लगान का भुगतान एक आवश्यक व्यय के रूप में करना पड़ता है। अतः एक व्यक्तिगत उत्पादक की दृष्टि से लगान-लागत का अंश होता है और में मूल्य को प्रभावित करता है।

डेवनपोर्ट के अनुसार - लगान न तो मूल्य को निर्धारित करता है और न मूल्य द्वारा निर्धारित होता है, बल्कि मूल्य तथा लगान दोनों ही भूमि पर उत्पादित होने वाली वस्तुओं की परस्पर दुर्लभता से प्रभावित होते हैं । आभास लगान के आभास लगान’ शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम डॉ. मार्शल ने प्रस्तुत किया। उन्होंने इस शब्द का प्रयोग उत्पादन के उन साधनों की आय के लिए किया है।  

जिनकी पूर्ति अल्पकाल में निश्चित होती है। उनके अनुसार, भूमि के अलावा उत्पादन कुछ और भी साधन ऐसे हैं। जिनकी पूर्ति स्थिर होती है, लेकिन इन साधनों और भूमि में मुख्य अन्तर यह है कि जहाँ भूमि की पूर्ति अल्पकाल के साथ-साथ दीर्घकाल में भी स्थिर होती है। वहाँ दूसरे साधनों की पूर्ति अल्पकाल में ही स्थिर होती है। 

उनका विचार है कि मशीन, संयंत्र तथा दूसरे पूँजीगत उपकरणों की पूर्ति अल्पकाल में तो स्थिर होती है। लेकिन दीर्घकाल में इनकी पूर्ति में परिवर्तन कर सकना संभव होता है। अतः अल्पकाल में किसी तरह इनकी माँग बढ़ जाती है तो पूर्ति की स्थिरता के कारण इन्हें लागत के ऊपर अतिरिक्त आय प्राप्त होती है। इसीलिए मार्शल ने इसे 'आभास लगान' कहा है। आभास लगान की कुछ परिभाषाएँ निम्न हैं

1. मार्शल के अनुसार - आभास लगान मूल (मौद्रिक) लागत पर कुल प्राप्तियों का वह अतिरेक है, जो कि उस समय तक के लिए माँग व पूर्ति के न्यूनाधिक आकस्मिक संबंध के द्वारा शासित होता है। 

2. सिल्वरमैन के अनुसार - आभास लगान तकनीकी रूप में उत्पत्ति के उन साधनों को किया गया अतिरिक्त भुगतान है जिनकी पूर्ति अल्पकाल में स्थिर तथा दीर्घकाल में परिवर्तनशील होती है। 

उदाहरण द्वारा स्पष्टीकरण - मान लीजिए, एक मशीन की कीमत 10,000 रु. है, उसकी माँग अचानक बढ़ जाती है। स्वाभाविक है कि अल्पकाल में मशीन की पूर्ति को बढ़ाना संभव नहीं होगा अर्थात् उसकी पूर्ति बेलोचदार होगी। ऐसे में मशीन की कीमतें बढ़कर माना कि 12,000 रु. हो जाती है। 

अतः मशीन की अतिरिक्त आय (या बचत 2000 रु.) प्राप्त होगी। मार्शल ने इसे ही आभास लगान कहा है। दीर्घकाल में मशीन की आपूर्ति बढ़ जाने पर यह अतिरिक्त आय समाप्त हो जाती है। पूँजीगत वस्तुओं की अतिरिक्त आय क्योंकि अस्थायी होती है, इसीलिए मार्शल ने इसे आभास लगान कहा है।

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