मुद्रा संकुचन के प्रभाव - mudra sankuchan ke prabhaav

 मुद्रा संकुचन के प्रभाव

मुद्रा संकुचन के प्रभावों को निम्न बिन्दुओं के रूप में स्पष्ट किया जा सकता है - 

1. उपभोक्ता वर्ग पर प्रभाव - मुद्रा संकुचन के कारण वस्तुओं के मूल्यों में आने वाली कमी से उपभोक्ताओं को लाभ मिलता है, क्योंकि वे पहले से कम मात्रा में मुद्रा व्यय करके उतनी ही वस्तुओं को खरीद सकते हैं, जितनी वस्तुओं को पहले खरीद रहे थे, लेकिन उपभोक्ताओं को यह लाभ तभी प्राप्त होता है, जबकि उनकी आय स्थिर रहे।

2. उत्पादक वर्ग पर प्रभाव - मुद्रा संकुचन का उत्पादक वर्ग पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। मुद्रा संकुचन काल में औद्योगिक वस्तुओं की माँग कम होने लगती है, जिसके परिणामस्वरूप व्यापार एवं औद्योगिक क्षेत्र में मन्दी का वातावरण छा जाता है, अतः उत्पादकों को हानि उठानी पड़ती है।

3. विनियोजक वर्ग पर प्रभाव - मुद्रा संकुचन काल में निश्चित आय प्राप्त करने वाले विनियोजकों (ऋणपत्रधारक, सरकारी बॉण्ड्स धारक विनियोजकों) को लाभ होता है, क्योंकि आय निश्चित होने के कारण मुद्रा संकुचन काल में वे पहले से अधिक मात्रा में वस्तुएँ व सेवाएँ खरीद सकते हैं। 

इसके विपरीत, अस्थायी आय वाले विनियोजकों को मुद्रा संकुचन से हानि होती है, क्योंकि वस्तुओं के मूल्य घटने के कारण उनके अंशों पर प्राप्त होने वाला लाभांश कम हो जाता है।

4. ऋणी एवं ऋणदाता वर्ग पर प्रभाव - मुद्रा संकुचन में ऋणदाता वर्ग को लाभ होता है तथा ऋणी वर्ग को हानि होती है, क्योंकि संकुचन काल में मुद्रा का मूल्य बढ़ जाता है, अतः ऋणदाता वर्ग को मूलधन व ब्याज के रूप में जो राशि प्राप्त होती है, उसकी वस्तुओं एवं सेवाओं के रूप में अधिक क्रयशक्ति होती है, जबकि ऋणी वर्ग को वस्तुओं व सेवाओं के रूप में अधिक क्रयशक्ति का त्याग करना पड़ता है।

5. कृषक वर्ग पर प्रभाव - मुद्रा संकुचन काल में कृषक प्रायः ऋणग्रस्त हो जाते हैं, क्योंकि मूल्यों में कमी आने के कारण उन्हें कृषि पदार्थों का मूल्य भी कम मिल पाता है।

6. रोजगार पर प्रभाव - मुद्रा संकुचन काल में उत्पादकों को हानि होती है, जिसके कारण वह उत्पादन बन्द कर देते हैं अथवा उत्पादन की मात्रा को कम कर देते हैं जिसके फलस्वरूप श्रमिकों की छँटनी की जाती है तथा देश में बेरोजगारी फैल जाती है ।

7. भुगतान सन्तुलन पर प्रभाव - मुद्रा संकुचन के समय देश के भुगतान सन्तुलन प्राय: अनुकूल हो जाते हैं, क्योंकि वस्तुओं की कीमतें गिरने के कारण देश के आयात हतोत्साहित होते हैं तथा निर्यातों को प्रोत्साहन मिलता है। इस प्रकार देश की मुद्रा का बाह्य मूल्य बढ़ जाता है।

8. बैंकिंग विकास पर प्रभाव - मुद्रा संकुचन के समय व्यापार एवं उद्योगों में मंदी के कारण न केवल वित्तीय संस्थाओं से प्राप्त होने वाले ऋणों की माँग कम हो जाती है, बल्कि पुराने ऋणों की वापसी भी बन्द हो जाती है। इस प्रकार मुद्रा संकुचन के समय में वित्तीय संस्थाओं का अस्तिव भी खतरे में पड़ने की सम्भावना रहती है।

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