मुद्रास्फीति के कारण - mudraaspheeti ke kaaran

मुद्रास्फीति के कारण

मुद्रा स्फीति का मुख्य कारण मौद्रिक आय का वस्तुओं एवं सेवाओं की पूर्ति की तुलना में माँग का अधिक होना हैइसलिए मुद्रा स्फीति के कारणों को प्रमुख रूप से दो भागों में बाँटा जा सकता है -

मौद्रिक आय में वृद्धि करने वाले कारण 

मौद्रिक आय में वृद्धि निम्न कारणों से होती हैं -

1. सरकार की मुद्रा तथा साख नीति - जब सरकार प्राकृतिक आपदा, युद्ध, आर्थिक विकास आदि के लिए केन्द्रीय बैंक के माध्यम से नई मुद्रा के निर्गमन का निरन्तर सहारा लेती है, तो अर्थव्यवस्था में मुद्रा स्फीति की दशा उत्पन्न हो जाती है। इसी प्रकार, जब केन्द्रीय बैंक ऐसी साख नीति अपनाता है कि ऋण सुविधाओं में वृद्धि हो जाती है, तब भी मुद्रा आपूर्ति बढ़ जाने के कारण अर्थव्यवस्था में मुद्रा स्फीति उत्पन्न हो जाती है। 

2. घाटे की वित्त व्यवस्था - जब सरकार अपने बजट के घाटे को पूरा करने के लिए नये नोट छापती है, तो इससे देश में मुद्रा की पूर्ति बढ़ जाती है और कीमतें बढ़ने लगती है। इस प्रकार मुद्रास्फीति उत्पन्न हो जाती है।

3. मुद्रा की चलन गति में वृद्धि - मुद्रा की चलन गति में तीव्र वृद्धि हो जाने पर भी मुद्रा की पूर्ति बढ़ जाती है। इसी प्रकार लोगों की उपभोग प्रवृत्ति एवं पूँजी की सीमान्त कुशलता के बढ़ जाने पर मुद्रा की चलन गति बढ़ जाती है। चलन गति में वृद्धि होने से मुद्रा की पूर्ति बढ़ जाती है। इससे कीमतें बढ़ जाती हैं और अर्थव्यवस्था में मुद्रास्फीति उत्पन्न हो जाती है। 

4. वाणिज्यिक बैंकों की साख नीति - साख की माँग अधिक होने पर व्यापारिक बैंक अपनी जमा राशियों के पीछे रखे जाने वाले नकद कोषों के अनुपात को कम करके अत्यधिक साख का निर्माण करते हैं। इस प्रकार साख के विस्तार से भी अर्थव्यवस्था में मुद्रास्फीति उत्पन्न हो जाती है।

5. अनुत्पादक व्यय में वृद्धि - सरकार द्वारा अनुत्पादक कार्यों में अत्यधिक व्यय करने से भी मुद्रा की पूर्ति अर्थव्यवस्था में बढ़ जाती है। वस्तुओं की पूर्ति सम्बन्धी व्यय, प्रशासन पर व्यय, अनुत्पादक व्यय के अन्तर्गत आते हैं। इससे चलन में मुद्रा की पूर्ति बढ़ जाती जाती है, लेकिन इनसे वस्तुओं व सेवाओं की पूर्ति बाजार में नहीं बढ़ती। इससे कीमतें बढ़ने लगती हैं और देश में मुद्रास्फीति उत्पन्न हो जाती है।

6. सार्वजनिक ऋणों का भुगतान - जब सरकार लोगों के लिये गये ऋणों का भुगतान करती हैं, तब उनकी क्रयशक्ति में वृद्धि हो जाती है। लोग अधिकाधिक मात्रा में उपभोग वस्तुओं को क्रय करते हैं, जिससे कीमतें बढ़ जाती हैं और मुद्रास्फीति की दशा उत्पन्न हो जाती है।

उत्पादन में कमी लाने वाले कारण 

उत्पादन में कमी लाने वाले प्रमुख कारण निम्नांकित हैं - 

1. जनसंख्या में वृद्धि - जब देश में तीव्र गति से जनसंख्या बढ़ने लगती है, तब वस्तुओं एवं सेवाओं की माँग बढ़ जाती है, लेकिन उत्पादन में जनसंख्या के समान वृद्धि न होने के कारण कीमतें बढ़ने लगती हैं और मुद्रास्फीति उत्पन्न हो जाती है।  

2. प्राकृतिक कारण - बाढ़, भूकम्प, सूखा आदि प्राकृतिक आपदाएँ उत्पादन की मात्रा को कम कर देती हैं। कृषि उत्पादन में कमी होने से उद्योगों को कच्चे माल की पूर्ति नहीं होती और औद्योगिक उत्पादन भी घट जाता है । इस प्रकार अनाज और औद्योगिक वस्तुओं के उत्पादन में कमी हो जाने पर कीमतें बढ़ने लगती हैं और देश में मुद्रा स्फीति उत्पन्न हो जाती है।

3. उत्पत्ति ह्रास नियम के अन्तर्गत उत्पादन - जब वस्तुओं का उत्पादन उत्पत्ति ह्रास नियम के अन्तर्गत होता है, तब प्रत्येक अतिरिक्त इकाई का उत्पादन करने में सीमान्त लागत बढ़ जाती है । लागत में वृद्धि होने से मूल्य भी बढ़ते जाते हैं तथा मुद्रा स्फीति की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।

4. सरकार की करारोपण नीति - जब सरकार अतिरिक्त आय कमाने के लिए वस्तुओं एवं सेवाओं पर नये-नये कर लगाती हैं अथवा पुराने करों में वृद्धि कर देती है, तो वस्तुओं की कीमतें बढ़ जाती हैं। वस्तुओं की कीमतें बढ़ने पर लोग इनका उपभोग कम न करके बढ़ा देते हैं, तब मुद्रास्फीति की दशा उत्पन्न हो जाती हैं।

5. सरकार की व्यापार नीति - जब सरकार विदेशी मुद्रा अर्जित करने के लिए निर्यात को प्रोत्साहन देती है, तब देश में वस्तुओं एवं सेवाओं का अभाव हो जाता है और कीमतें बढ़ने लगती हैं। वहीं दूसरी ओर, विदेशी मुद्रा की कमी के कारण आयातों पर प्रतिबन्ध लगा दिया जाता है। इससे देश में वस्तुओं का अभाव हो जाता है और कीमतें बढ़ने लगती हैं। 

6. औद्योगिक अशान्ति - मालिकों और श्रमिकों के बीच मधुर एवं सौहार्द्रपूर्ण सम्बन्ध न होने के कारण श्रमिक संघ अपनी माँगों को पूरा कराने के लिए हड़ताल, घेराव, धीरे काम करो आदि नीतियों का पालन करता है। वहीं दूसरी ओर मालिक वर्ग भी अपनी शर्तों पर श्रमिकों से काम कराने के लिए तालाबन्दी का सहारा लेता है। इससे उत्पादन में कमी आती है और कीमतें स्वाभाविक रूप से बढ़ने लगती हैं।

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