मुद्रास्फीति के प्रभाव - mudraaspheeti ke prabhaav

 मुद्रास्फीति के प्रभाव

मुद्रास्फीति के प्रभावों को निम्नलिखित चार भागों में विभाजित किया जा सकता है -

 आर्थिक प्रभाव 

इसके अन्तर्गत निम्न प्रभावों को शामिल किया जाता है - 

(I) समाज के विभिन्न वर्गों पर मुद्रा स्फीति के प्रभाव

1. उत्पादक एवं व्यापारी वर्ग - मुद्रास्फीति से उत्पादक एवं व्यापारी वर्ग को लाभ होता है। क्योंकि मुद्रास्फीति के कारण बिक्री के रूप में उत्पादकों को अधिक धन प्राप्त होता है जबकि उन्हें अपेक्षाकृत कम मजदूरी का भुगतान करना पड़ता है। जिससे उन्हें लाभ होता है। व्यापारी वर्ग को स्फीति-काल में चोरबाजारी का अवसर प्राप्त हो जाता है।  

स्फीतिकाल में उपभोक्ताओं की क्रयशक्ति बढ़ जाने के कारण उनकी वस्तुओं और सेवाओं की माँग बढ़ जाती है।  लेकिन उनकी पूर्ति में एकाएक वृद्धि न हो पाने के कारण उनके मूल्य बढ़ जाते हैं, जिससे उत्पादकों के लाभ बढ़ जाते हैं। उत्पादकों द्वारा कच्चा माल तथा मशीनें प्राय: कम महँगाई के समय खरीदी गई होती है, बाद में स्फीतिकाल में उनसे निर्मित माल बेचकर उत्पादक लाभ कमाते हैं।

2. उपभोक्ता वर्ग - कुछ उपभोक्ता ऐसे होते हैं जिनकी आय मुद्रास्फीति के कारण बढ़ जाती है। ऐसे उपभोक्ताओं को स्फीति से कोई हानि नहीं होती। लेकिन अधिकांश उपभोक्ता ऐसे होते हैं। जिनकी आय प्राय: स्थिर होती है। मुद्रास्फीति के कारण इनके आय की तुलना में वस्तुओं के मूल्यों में निरन्तर वृद्धि होते रहने से इनको बहुत कष्ट उठाना पड़ता है और अनेक वस्तुओं का उपभोग स्थगित करना पड़ता है। 

3. ऋण एवं ऋणदाता - स्फीतिकाल में ऋणियों को लाभ होता है। क्योंकि वे अब पहले से कम मात्रा में वस्तुओं को बेचकर अपने ऋणों का भुगतान कर सकते हैं अर्थात् उन्हें ऋण लेने के समय की तुलना में क्रयशक्ति का भुगतान करना पड़ता है। इसके विपरीत, ऋणदाताओं को स्फीति से हानि होती है, क्योंकि वे ऋणों के भुगतान की राशि से उतनी वस्तुएँ नहीं खरीद सकते हैं। जितनी कि ऋण प्रदान करते समय उस राशि से खरीद सकते थे।

4. श्रमिक वर्ग - स्फीतिकाल में श्रमिक वर्ग पर अच्छे एवं बुरे, दोनों प्रकार के प्रभाव पड़ते हैं। लाभ के दृष्टिकोण से स्फीतिकाल में उद्योगों का विस्तार होने से श्रमिक के परिवार के अन्य सदस्यों को भी रोजगार प्राप्त होता है। 

दूसरे, श्रमिकों की माँग बढ़ने के कारण श्रमिकों की सौदा करने की शक्ति में वृद्धि हो जाती है और वे अधिक मजदूरी प्राप्त करने में सफल हो जाते हैं। हानि के दृष्टिकोण से यह कहा जा सकता है कि निरन्तर मूल्य वृद्धि के कारण उनकी मजदूरी की दर पिछड़ जाती है और उनके लिए दैनिक जीवन में अनेक आर्थिक कठिनाइयाँ उत्पन्न होना प्रारम्भ हो जाती हैं।

5. विनियोक्ता वर्ग - स्फीतिकाल में निश्चित आय वाले विनियोगकर्ताओं को हानि होती है, क्योंकि इन्हें एक निश्चित मात्रा में ही लाभांश प्राप्त होता है। स्फीतिकाल में एक ओर जहाँ विनियोग के मूल्य बढ़ जाते हैं, वहीं दूसरी ओर वस्तुओं के मूल्यों में वृद्धि होने पर भी मौद्रिक आय में वृद्धि नहीं हो पाती। 

इससे विनियोगकर्ताओं की वास्तविक आय कम हो जाती है । इसके विपरीत, जिन विनियोगकर्ताओं की आय परिवर्तनशील होती है एवं व्यवसाय की आय पर निर्भर होती है। उन्हें स्फीतिकाल में कोई हानि नहीं होती तथा व्यवसाय के लाभ बढ़ने के साथ-साथ उनका लाभांश बढ़ता जाता है जिससे उन्हें लाभ प्राप्त होता है।

6. कृषक वर्ग - मुद्रा- स्फीति के कारण कृषकों को भी लाभ प्राप्त होता है, क्योंकि स्फीतिकाल में कृषि वस्तुओं के मूल्य भी बढ़ते हैं और अधिक मूल्य मिलने के कारण कृषक कृषि की उन्नति अपेक्षाकृत अधिक सरलता से कर सकते हैं एवं सुगमतापूर्वक अपने ऋणों का भुगतान कर सकते हैं। कृषकों को स्फीति से व्यापारियों एवं उद्योगपतियों के समान लाभ प्राप्त नहीं होते, क्योंकि कृषि वस्तुओं की तुलना में निर्मित वस्तुओं के मूल्य अधिक तेजी से बढ़ते हैं।

(II) मुद्रा स्फीति के अन्य आर्थिक प्रभाव 

मुद्रा स्फीति के अन्य आर्थिक प्रभावों में मुख्य हैं -

1. धन एवं आय का असमान वितरण - मुद्रा स्फीति में व्यापारी एवं धनी वर्ग को अधिक लाभ प्राप्त होता है, जबकि श्रमिक एवं वेतनभोगी वर्ग की आर्थिक स्थिति में गिरावट आती है। इससे देश में धन एवं आय का वितरण असमान तथा अन्यायपूर्ण हो जाता है।

2. करों में वृद्धि - मुद्रास्फीति में करों की मात्रा में वृद्धि होती है, क्योंकि एक तो सरकारी व्ययों में हुई वृद्धि को पूरा करने के लिए सरकार को अतिरिक्त आय की आवश्यकता होती है तथा दूसरे, देश में मुद्रा के चलन वेग को कम करने एवं धनी वर्ग के अतिरिक्त लाभों में से हिस्सा प्राप्त करने के लिए भी प्राय: सरकार करों की मात्रा को बढ़ा देती है।

3. सार्वजनिक व्ययों में वृद्धि - मुद्रास्फीति में प्राय: सरकार का व्यय बढ़ जाता है, क्योंकि उसे कर्मचारियों के वेतन पर पहले से अधिक राशि व्यय करनी पड़ती है तथा वस्तुओं एवं सेवाओं के मूल्य बढ़ जाने के कारण सरकार का निर्माण कार्यों पर होने वाला व्यय भी बढ़ जाता है।

4. बचत की प्रवृत्ति में कमी - मध्यम वर्ग एवं निम्न वर्ग की जनता को अपने द्वारा बचाये गये धन का मूल्य स्फीति काल में कम प्राप्त होता है, जिससे उनकी भविष्य में बचत करने की प्रवृत्ति कम हो जाती है तथा धन का संचय रुक जाता है। 

5 . व्यापार सन्तुलन पर विपरीत प्रभाव - मुद्रास्फीति के कारण वस्तुओं के मूल्य बढ़ जाते हैं। परिणामस्वरूप विदेशों में इनकी माँग कम हो जाती है, जिससे देश के निर्यात कम हो जाते हैं। इसके विपरीत, आयात सस्ते पड़ने के कारण उनकी संख्या में वृद्धि हो जाती है। इससे देश का व्यापार सन्तुलन प्रतिकूल हो जाता है।

6. नियन्त्रण प्रणाली का प्रयोग - मुद्रा स्फीति के कारण देश में मूल्य स्तर एवं सट्टे की क्रियाओं में वृद्धि हो जाती है। इसे रोकने के लिए सरकार को नियन्त्रण प्रणाली का प्रयोग करके राशनिंग एवं नियन्त्रण का सहारा लेना पड़ता है। 

 नैतिक प्रभाव 

  1. स्फीतिकाल में निश्चित आय वर्ग वाले व्यक्तियों को अनेक कठिनाइयाँ उठाकर भी निम्न स्तर की अथवा घटिया किस्म की वस्तुएँ प्राप्त होती हैं।
  2. मुद्रास्फीति से सामान्यतः भ्रष्टाचार की स्थिति उत्पन्न हो जाती है तथा कर्मचारियों के कार्य करने का स्तर गिर जाता है।
  3. स्फीतिकाल में जनता के नैतिक स्तर में काफी गिरावट आ जाती है तथा चोरी एवं डकैतियों की संख्या में वृद्धि हो जाती है।
  4. स्फीतिकाल में सट्टे की क्रियाओं में अपार वृद्धि हो जाती है।
  5. तेजी के कारण अनेक व्यापारी वस्तुओं का अनुचित संग्रह करके चोरबाजारी को प्रोत्साहित करते हैं। 

 सामाजिक प्रभाव 

  1. स्फीति के कारण लाभ का अधिकांश भाग धनी वर्ग को प्राप्त होने से आर्थिक असमानता निरन्तर बढ़ती है, जिससे समाज में असन्तोष उत्पन्न होता है।
  2. स्फीतिकाल में देश की मुद्रा से जनता का विश्वास उठने लगता है और वह धीरे-धीरे वस्तुओं का संग्रह प्रारम्भ कर देती है, जिससे देश में वस्तुओं का कृत्रिम अभाव उत्पन्न हो जाता है।
  3. स्फीति के कारण न केवल मुद्राओं के मूल्य में कमी आ जाती है, बल्कि भविष्य में मुद्रा की क्रयशक्ति में और कमी की आशंका बनी रहती है। इससे जनता में मुद्रा के संचय की प्रवृत्ति कम हो जाती है और वह मुद्रा को वस्तुओं पर व्यय करना ही श्रेष्ठ समझती है।
  4. स्फीति के कारण व्यवसायों की उन्नति एवं रोजगार में वृद्धि के कारण आय में वृद्धि होती है, जिससे देश की जनता का जीवन स्तर पहले से बेहतर हो जाता है।
  5. स्फीतिकाल में अनेक नवीन उद्योग-धन्धों की स्थापना होने से देश में बेरोजगारी की मात्रा में कमी आती है। 
  6. स्फीतिकाल में जनता की आय में वृद्धि के फलस्वरूप बैंकों में अधिक धन जमा किया जाता है, जिससे बैंकिंग सुविधाओं का विस्तार होता है एवं उद्योग-धन्धों की उन्नति के कारण देश में उपलब्ध बैंकिंग सुविधाओं का अधिक मात्रा में प्रयोग होने लगता है।

 राजनीतिक प्रभाव 

मुद्रास्फीति के प्रमुख राजनीतिक प्रभाव निम्नांकित हैं -

  1. स्फीतिकाल में सरकार द्वारा निर्गमित की गई अतिरिक्त मुद्रा के प्रभाव को कम करने के लिए सरकार द्वारा करों की मात्रा में वृद्धि की जाती है, जिससे देश की जनता में असन्तोष उत्पन्न हो जाता है।
  2. मुद्रास्फीति के कारण देश में महँगाई बढ़ जाती है जिसके विरुद्ध देश की जनता द्वारा आवाज उठायी जाती है। वेतन वृद्धि के लिए हड़तालों एवं तालाबन्दी का सहारा लिया जाता है, जिससे देश में राजनीतिक अस्थिरता तथा अशान्ति का वातावरण उत्पन्न हो जाता है।

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