न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर एक निबंध लिखिए। - nyaypalika ki swatantrata per nibandh likhen

न्यायपालिका शासन का वह अंग है जो कानूनों की व्याख्या करता है और न्याय की व्यवस्था करता है। यदि शासन का यह अंग किसी अन्य सत्ता के अधीन हो तो वह निष्पक्षता के साथ निर्णयन देने में असमर्थ होगा। न्यायपालिका की स्वतन्त्रता के अभाव में न्याय व्यवस्था का कोई अर्थ नहीं होता। 

इस सम्बन्ध में गार्नर लिखते हैं यदि न्यायाधीशों में प्रतिभा, सत्यता और निर्णय देने की स्वतन्त्रता न हो, तो न्यायालय का वह ढांचा खोखला प्रतीत होगा और उस अभीष्ट की सिद्धि नहीं होगी जिसके लिए उसका निर्माण किया गया है । 

न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर एक निबंध लिखिए

(1) न्यायाधीशों की योग्यता- न्यायपालिका की स्वतन्त्रता के लिए न्यायाधीशों की योग्यता महत्वपूर्ण तथ्य है। न्यायाधीश योग्य, प्रशिक्षित तथा अनुभवी होना चाहिए। न्यायाधीशों में कानून का गम्भीर ज्ञान होना चाहिए। उन्हें निष्पक्ष, ईमानदार तथा बाह्य प्रभाव से मुक्त होना चाहिए।

इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए भारत में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के लिए यह योग्यता रखी गयी है कि वे कम-से-कम दस वर्ष तक उच्च न्यायालय के वकील अथवा पाँच वर्ष तक वहां न्यायाधीश के पद पर कार्य कर चुके हों।

(2) न्यायाधीशों का वेतन- न्यायपालिका की स्वतन्त्रता के लिए यह भी आवश्यक है कि न्यायाधीशों को समुचित वेतन-भत्ता मिले जिससे वे निश्चिन्त होकर अपने कर्तव्यों का पालन कर सकें। यही नहीं, एक बार उनके वेतन-भत्ते के नियत हो जाने पर फिर किसी दशा में उसमें कमी नहीं की जानी चाहिए। 

उन्हें प्राप्त अन्य सुविधाओं में भी कोई कमी नहीं होनी चाहिए। ऐसा होने पर ही वे निश्चिन्त, निष्पक्ष और निर्भीक होकर अपने उत्तरदायित्वों को निभा सकते हैं। उनके वेतन, भत्ते, आदि पर्याप्त एवं यथेष्ट होने चाहिए ताकि योग्य व्यक्ति इन पदों की ओर आकर्षित हो सकें।

(3) न्यायाधीशों का कार्यकाल - न्यायाधीशों का कार्यकाल निश्चित होना चाहिए। निश्चित कार्यकाल से उन्हें वैधानिक संरक्षण प्राप्त हो जाता है। पदावधि छोटी होने से कोई भी न्यायाधीश अपने पद का दुरुपयोग कर नाजायज लाभ उठा सकते हैं। उनका कार्यकाल लम्बा होना चाहिए।

 न्यायाधीशों का कार्यकाल स्थायी अथवा जीवनपर्यन्त भी हो सकता है। अवकाश ग्रहण करने की आयु पर्यन्त वे अपने पद पर रह सकते हैं । केवल शारीरिक या मानसिक दुर्बलता या गम्भीर अपराधों के कारण ही उन्हें अपने पद से हटाया जा सकता है।

(4) न्यायाधीशों की बर्खास्तगी- न्यायाधीशों को पद से हटाने की सरल प्रक्रिया नहीं होनी चाहिए। उनकी बर्खास्तगी किसी व्यक्ति की इच्छानुसार मनमाने ढंग से नहीं होनी चाहिए। न्यायाधीशों को अपदस्थ करने की कठोर व्यवस्था होनी चाहिए जिससे इसका दुरुपयोग न किया जा सके।

न्यायाधीशों को उस समय तक अपने पद पर बनाये रखना चाहिए जब तक उनमें कुशलता के साथ कार्य सम्पादन की क्षमता हो । विधायिका तथा कार्यपालिका से स्वतन्त्र होना न्यायाधीशों को विधायिका तथा कार्यपालिका से स्वतन्त्र रखा जाना चाहिए। यदि कार्यपालिका उनके कार्यों में हस्तक्षेप करेगी तो नागरिक स्वतन्त्रता प्रभावित होगी

न्यायाधीशों को राजनीतिक दलों से दूर रहना चाहिए ताकि उनके विचार तटस्थ रह सकें। यदि न्यायाधीश किसी भी अंश तक कार्यपालिका के अधीन या दबाव में होगा तो वह अपना निर्भीकता एवं निष्पक्षता की रक्षा नहीं कर सकता। 

न्यायपालिका का महत्व

न्यायपालिका शासन का अत्यन्त महत्वपूर्ण अंग है । लोकतन्त्र का आधार स्वतन्त्रता और समानता के सिद्धान्त हैं, इन सिद्धान्तों की रक्षा समुचित न्याय व्यवस्था के बिना नहीं हो सकती । न्यायपालिका नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करती है। यह विधायिका द्वारा निर्मित कानूनों की व्याख्या करती है और कानून का उल्लंघन करने वालों को उचित दण्ड देती है। 

यदि किसी राज्य में उचित और निष्पक्ष न्यायपालिका नहीं है तो अधिकारों की सुरक्षा खतरे में रहती है। रॉले के शब्दों में, “अधिकारों का निश्च और उन पर निर्णय देने के लिए न्याय विभाग नितान्त आवश्यक है।" लॉर्ड ब्राइस के शब्दों में, "किसी शासन की उत्तमता जांच करने की सर्वश्रेष्ठ कसौटी उसकी न्याय व्यवस्था की कार्यक्षमता है।" राज्य का अस्तित्व ही न्याय व्यवस्था पर निर्भर होता है। 

न्याय विभाग की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए गार्नर ने लिखा है बिना विधायिनी अंगों के समाज की कल्पना की जा सकती है किन्तु बिना न्यायिक अंगों व न्यायाधिकरण के एक सभ्य राज्य की कल्पना नहीं की जा सकती।" जिस देश में न्यायांग सुचारू रूप से कार्य नहीं करता, यदि वह अन्धकार के गर्त में समा जाये तो कोई आश्चर्य की बात नहीं। 

मेरियट के अनुसार, यदि नागरिकों को न्याय पाने में देर लगती है अथवा न्याय की सन्तोषजनक व्यवस्था नहीं है, तो नागरिकों का जीवन दुःखद बन जाता है। ब्राइस के अनुसार - यदि न्याय का दीपक अंधेरे में बुझ जाये और वह अंधेरा कितना गहन होगा इसकी कल्पना नहीं की जा सकती।

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