राजनीतिक दल की विशेषताएं क्या है - raajnitik dal ki visheshtayen

वर्तमान समय में शासन के विविध रूपों में प्रजातन्त्र सर्वाधिक लोकप्रिय है और प्रजातन्त्रीय शासन के दो प्रकार होते हैं - (1) प्रत्यक्ष प्रजातन्त्र, और (2) अप्रत्यक्ष या प्रतिनिध्यात्मक प्रजातन्त्र। राज्यों की वृहत् जनसंख्या और क्षेत्र की विशालता के कारण वर्तमान समय में विश्व के लगभग सभी राज्यों में प्रतिनिध्यात्मक प्रजातन्त्रीय शासन-व्यवस्था ही प्रचलित है। 

इस शासन-व्यवस्था के अन्तर्गत जनता अपने प्रतिनिधियों को चुनती है और इन प्रतिनिधियों के द्वारा शासन कार्य किया जाता है। जनता द्वारा अपने-अपने प्रतिनिधियों के निर्वाचन और प्रतिनिधियों द्वारा शासन-व्यवस्था के संचालन की इस सम्पूर्ण प्रक्रिया को पूर्ण करने के लिए राजनीतिक दलों का अस्तित्व अनिवार्य है। 

राजनीतिक दल की विशेषताएं क्या है 

इसके अतिरिक्त प्रजातन्त्रात्मक शासन-व्यवस्था लोकमत पर आधारित होती है और राजनीतिक दल लोकमत के निर्माण और उसकी अभिव्यक्ति के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण साधन होते हैं। मैकाइवर ने ठीक कहा है कि बिना दलीय संगठन के किसी सिद्धान्त का एक होकर प्रकाशन नहीं हो सकता। 

किसी भी नीति का क्रमबद्ध विकास नहीं हो सकता है।  संसदीय चुनावों की वैधानिक व्यवस्था नहीं हो सकती और न ऐसी मान्य संस्थाओं की व्यवस्था ही हो सकती है। 

जिनके द्वारा कोई भी दल शक्ति प्राप्त करता और स्थिर रहता है।” इसी प्रकार ब्राइस ने लिखा है कि, “राजनीतिक दल अनिवार्य हैं और कोई भी बड़ा स्वतन्त्र देश उनके बिना नहीं रह सकता है। किसी व्यक्ति ने यह नहीं बताया कि प्रजातन्त्र उनके बिना कैसे चल सकता है।

ये मतदाताओं के समूह की अराजकता में से व्यवस्था उत्पन्न करते हैं। यदि दल कुछ बुराइयाँ उत्पन्न करते हैं तो वे दूसरी ओर बुराइयों को दूर या कम भी करते हैं। साधारणतया एक देश के विधान या कानून के अन्तर्गत राजनीतिक दलों का उल्लेख नहीं होता है, किन्तु व्यवहार में राजनीतिक दलों का अस्तित्व भी उतना ही आवश्यक और उपयोगी होता है, जितना कि विधान या कानून । 

अमेरिकी संविधान निर्माता अपने देश में किसी भी रूप में राजनीतिक दलों को पनपने नहीं देना चाहते थे, लेकिन संविधान को लागू किए जाने के साथ ही दलीय संगठन अमेरिकी राजनीतिक जीवन की एक प्रमुख विशेषता बन गये।

प्रजातन्त्रीय शासन के अन्तर्गत केवल शासक दल का ही नहीं, वरन् विरोधी दल का भी महत्त्व होता है। विरोधी दल शासन करने वाले राजनीतिक दल को मर्यादित तथा नियन्त्रितं रखने का कार्य करता है। 

इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि आधुनिक राजनीतिक जीवन के लिए दलीय संगठनों का बड़ा महत्त्व है और इसके बिना लोकतन्त्र की सफलता सम्भव ही नहीं है। बर्क के शब्दों में कहा जा सकता है कि “दलीय प्रणाली चाहे पूर्ण रूप से भले के लिए हो या बुरे के लिए, प्रजातन्त्रात्मक शासन-व्यवस्था के लिए अपरिहार्य है।

 राजनीतिक दल की परिभाषाएँ

मानव एक विवेकशील प्राणी है और मानव की इस विवेकशीलता के कारण एक ही प्रकार की समस्याओं के सम्बन्ध में भिन्न-भिन्न व्यक्तियों द्वारा विभिन्न प्रकार से विचार किया जाता है। विचारों की इस भिन्नता के साथ-ही-साथ अनेक व्यक्तियों में आधारभूत बातों के सम्बन्ध में विचारों की सभ्यता भी पाई जाती है।

विचारों की समानता रखने वाले ये व्यक्ति अपनी सामान्य विचारधारा के आधार पर शासन शक्ति प्राप्त करने और अपनी नीति को कार्यरूप में परिणित करने के लिए प्रयत्नशील रहते हैं और इस उद्देश्य को दृष्टि में रखकर उनके द्वारा जिन संगठनों का निर्माण किया जाता है, उन्हें ही राजनीतिक दल कहा जाता है। राजनीतिक दल की परिभाषा के सम्बन्ध में विभिन्न विचारकों ने अलग-अलग विचार व्यक्त किए हैं।

(1) एडमण्ड बर्क के मतानुसार - राजनीतिक दल ऐसे लोगों का एक समूह होता है जो किसी ऐसे सिद्धान्त के आधार पर जिस पर वे एकमत हों, अपने सामूहिक प्रयत्नों द्वारा जनता के हित में काम करने के लिए एकता में बँधे होते हैं।

(2) गैटल के अनुसार - राजनीतिक दल न्यूनाधिक संगठित उन नागरिकों का समूह होता है जो राजनीतिक इकाई के रूप में कार्य करते हैं और जिनका उद्देश्य अपने मतदान बल प्रयोग द्वारा सरकार पर नियन्त्रण करना व अपनी सामान्य नीतियों को क्रियान्वित करना होता है।

(3) गिलक्राइस्ट के शब्दों में - राजनीतिक दल की परिभाषा उन नागरिकों के संगठित के रूप में की जा सकती है जो राजनीतिक रूप से एक विचार के हों और जो एक समूह राजनीतिक इकाई के रूप में कार्य कर सरकार पर नियन्त्रण करना चाहते हों।

(4) इसी प्रकार मैकाइवर के शब्दों में - राजनीतिक दल एक ऐसा समुदाय है जो किसी ऐसे सिद्धान्त अथवा ऐसी नीति के समर्थन के लिए संगठित हुआ हो, जिसे वह वैधानिक साधनों से सरकार का आधार बनाना चाहता हो।  

राजनीतिक दल के आवश्यक तत्त्व

एडमण्ड बर्क, गैटल, गिलक्राइस्ट, मैकाइवर, आदि विद्वानों द्वारा राजनीतिक दल की जो परिभाषाएँ दी गई हैं, उनके आधार पर इन दलों के निम्नलिखित आवश्यक तत्त्व बताए जा सकते हैं

(1) संगठन - राजनीतिक दल का प्रथम आवश्यक तत्त्व यह है कि वे संगठित होने चाहिए। आधारभूत समस्याओं के सम्बन्ध में एक ही प्रकार का विचार रखने वाले व्यक्ति जब तक संगठित न हों उस समय तक उन्हें राजनीतिक दल नहीं कहा जा सकता। राजनीतिक दलों की शक्ति उनके संगठन पर निर्भर करती है और संगठन के आधार पर ही उनके द्वारा शासन शक्ति प्राप्त कर अपनी नीति को कार्यरूप में परिणित करने का प्रयत्न किया जा सकता है।

(2) सामान्य सिद्धान्तों की एकता - राजनीतिक दल का संगठित रूप से कार्य करना उसी समय सम्भव है, जबकि राजनीतिक दल के सदस्य किन्हीं सामान्य सिद्धान्तों के सम्बन्ध में एक ही प्रकार का विचार रखते हों। मूल प्रश्नों पर इस प्रकार की एकमतता के अभाव में वे परस्पर सहयोग नहीं कर सकते। 

यदि कुछ व्यक्ति अपने किन्हीं विशेष स्वार्थों के आधार पर संगठन की स्थापना कर भी लेते हैं, तो इस प्रकार के सिद्धान्तहीन संगठनों को राजनीतिक दल न कहकर गुट ही कहा जा सकता है।

(3) सवैधानिक साधनों में विश्वास - राजनीतिक दल के लिए यह आवश्यक है कि वह अपनी नीति या विचारों को कार्यरूप में परिणित करने के लिए संवैधानिक मार्ग का अनुसरण करें। मतदान और मतदान के निर्णय में उनका आवश्यक रूप से विश्वास होना चाहिए। 

गुप्त उपाय या सशस्त्र क्रान्ति जैसे असंवैधानिक साधनों में विश्वास रखने वाले संगठनों को राजनीतिक दल नहीं कहा जा सकता। उदाहरणार्थ, नाजी दल या फासी दल विशुद्ध राजनीतिक दल न होकर क्रान्तिकारी सैनिक संगठन थे।

(4) शासन पर प्रभुत्व की इच्छा - राजनीतिक दल का एक तत्त्व यह होता है कि उनका उद्देश्य शासन पर प्रभुत्व स्थापित कर अपने विचारों और नीतियों को कार्यरूप में परिणत करना होता है। यदि कोई संगठन शासन के बाहर रहकर कार्य करना चाहता है, तो इसे राजनीतिक दल नहीं कहा जा सकता।

(5) राष्ट्रीय हित - राजनीतिक दल के लिए यह आवश्यक है कि उनके द्वारा किसी विशेष जाति, धर्म या वर्ग के हित को दृष्टि में रखकर नहीं, वरन् सम्पूर्ण राज्य के हित को दृष्टि में रखकर कार्य किया जाना चाहिए। बर्क ने राजनीतिक दल की परिभाषा करते  हुए उन्हें राष्ट्रीय हित की वृद्धि के लिए संगठित राजनीतिक समुदाय ही कहा है। 

उपर्युक्त तत्त्वों के आधार पर राजनीतिक दल की अपने शब्दों में परिभाषा करते हुए कहा जा सकता है कि राजनीतिक दल आधारभूत समस्याओं के सम्बन्ध में विचारों की एकता पर आधारित ऐसे संगठित समुदाय होते हैं। 

जिनके द्वारा अपने विचारों को कार्यरूप में परिणित करने के लिए केवल संवैधानिक साधनों को ही अपनाकर शासन शक्ति पर प्रभुत्व स्थापित करने का प्रयत्न किया जाता है और जिसका उद्देश्य राष्ट्रीय हित में वृद्धि होती है। 

राजनीतिक दलों के कार्य

राजनीतिक व्यवस्था में राजनीतिक दल अनेक प्रकार से सक्रिय रह सकता है। रॉबर्ट सी. बोन के अनुसार, राजनीतिक दल तीन प्रकार की भूमिका एक साथ निभाने की क्षमता रखता है। राजनीतिक दल की परिवर्त्य के रूप में इन तीनों भूमिकाओं का पृथक्-पृथक् वर्णन निम्नलिखित प्रकार से किया जा सकता है

(1) मध्यवर्ती परिवर्त्य के रूप में दल की भूमिका - इस रूप में दल सरकारी तन्त्र तथा राजनीतिक समाज के मध्य आदान-प्रदान की कड़ी का काम करता है। मध्यवर्ती परिवर्त्य के रूप में दल की अग्रलिखित भूमिकाएँ होती हैं

(i) सत्ता में बने रहने के लिये या सत्ता में आने के लिये लोकमत की परख में लगा रहता है।

(ii) राजनीतिक व्यवस्था में उठने वाली माँगों को सरकार तक पहुँचाता है। 

(iii) दल सरकार की नीतियों की अपने समर्थकों व आम जनता के लिये व्याख्या करता है और सरकार के कार्यों के बारे में जनता को समझाता है।

(2) आश्रित परिवर्त्य के रूप में दल की भूमिका - राजनीतिक दल राजनीतिक व्यवस्था में कार्यरत रहते हैं। इनका कार्य सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक व सांस्कृतिक पर्यावरण में ही निम्नलिखित प्रकार से संचालित होता है

(i) पर्यावरण में होने वाले परिवर्तनों के अनुरूप अपने को ढालते हुये समाज की सम्पूर्ण समूह व्यवस्था के अनुकूलन में योग देना।

(ii) समाज की संरचनाओं व उप-व्यवस्थाओं में समन्वय स्थापित करना । (iii) राजनीतिक समाज की संरचना व समाज के सांस्कृतिक प्रतिमान को प्रभावित करने वाली राजनीतिक प्रक्रिया को जोड़ना, सरल करना और स्थिर बनाना।

(3) स्वतन्त्र परिवर्त्य के रूप में दल की भूमिका - इस रूप में दल सम्पूर्ण समाज का नियामक बन जाता है। राजनीतिक दल सामाजिक व राजनीतिक व्यवस्था को नियन्त्रित करने की अवस्था में होने के कारण इन दोनों से स्वतन्त्र बन जाता है । वह विचारधारा कार्यक्रम की रूपरेखा के अनुसार न्यायोचित समाज की स्थापना करने के लिये समाज व सरकार दोनों का ही नियन्त्रक, निर्देशक व निरीक्षक रहता है। दल की भूमिका अग्रलिखित प्रकार की रहती है-

(i) कार्यक्रम की क्रियान्विति में आने वाली सभी प्रक्रियात्मक व संरचनात्मक बाधाओं को दूर करना।

(ii) विचारधारा के अनुसार सम्पूर्ण संस्थात्मक व्यवस्थाओं को ढालना।

 (iii) समाज व सरकार, दोनों का निर्देशन करना व उन पर नियन्त्रण रखना । पीटर एच. मर्कल ने राजनीतिक दल के कार्यों को इस प्रकार व्यक्त किया है।

( 1 ) सरकार के लिये कार्यक्रमों और नीतियों का प्रजनन।

(2) विभिन्न सरकारी कार्यालयों के लिये नेतृत्व कार्मिकों की भर्ती और उसका चयन । (3) सरकारी अंगों का समन्वय और नियन्त्रण।

(4) समूह की माँगों को सन्तोष प्रदान करके और उनमें सामंजस्य लाकर सामाजिक एकता का विकास।

(5) विरोधी प्रतिसंगठन बनाना अथवा उच्छेदन अर्थात् या तो विरोधी दल के रूप में शक्ति संयुक्त करना या सत्तारूढ़ दल को अपदस्थ करके स्वयं सरकारी नियन्त्रण प्राप्त करना।

(6) अपने पक्ष में समर्थन अर्जित करके और राजनीतिक समाजीकरण द्वारा व्यक्तियों में सामाजिक एकता लाना, अर्थात् उन्हें एक राजनीतिक समूह के रूप में परिवर्तित करना । प्रजातन्त्र में राजनीतिक दलों का महत्व

प्रजातान्त्रिक प्रणाली वाले देशों में राजनीतिक दलों का विशेष महत्व है। प्रजातन्त्र में जनता के प्रतिनिधियों को चुनने, सरकार बनाने तथा शासन चलाने में राजनीतिक दलों द्वारा महत्वपूर्ण योगदान दिया जाता है। प्रजातन्त्र का मुख्य आधार ये राजनीतिक दल ही हैं। 

प्रजातन्त्र में राजनीतिक दल के महत्व को बताते हुए लार्ड ब्राइस ने कहा, “राजनीतिक दल अनिवार्य हैं, कोई भी बड़ा स्वतन्त्र देश उनके बिना नहीं रह सकता । किसी व्यक्ति ने यह नहीं बताया कि प्रजातन्त्र उसके बिना कैसे चल सकता है। 

शासन को संगठित तथा व्यवस्थित बनाये रखने के लिए राजनीतिक दल अपरिहार्य हैं। यदि राजनीतिक दल नहीं होंगे तो संसद में कोई विरोधी दल भी नहीं होगा, जो शासन की गलतियों को जनता के समक्ष स्पष्ट कर सके। इससे सत्तारूढ़ दल के निरंकुश होने की सम्भावना बढ़ जाती है।

प्रजातन्त्र के लिए आवश्यक जागरूक नागरिकों का निर्माण भी राजनीतिक दलों द्वारा किया जाता है। जैसा कि ब्राइस ने कहा लोकतन्त्र में राजनीतिक दल अनिवार्य हैं। वे मतदाताओं की उदासीनता को नष्ट करने में सफल होते हैं और उनमें राजनीतिक चेतना उत्पन्न करते हैं।

चुनाव के समय राजनीतिक दल ही अपने प्रत्याशी की योग्यता तथा अपने सिद्धान्तों, नीतियों तथा कार्यक्रमों का प्रचार करते हैं तथा उन्हें जनता तक पहुँचाते हैं। इससे जनता प्रत्येक उम्मीदवार के बारे में पूरी जानकारी प्राप्त करके अपनी पसन्द के व्यक्ति को चुन सकती है।

फाइनर के शब्दों में दलों के बिना मतदाता ऐसी असम्भव नीतियों का अनुसरण करने लगेंगे जो उन्हें शक्तिहीन या विनाशकारी बना देगी और जिनसे राजनीतिक तन्त्र ध्वस्त हो जायेगा।

प्रजातान्त्रिक देश के नागरिकों की सुरक्षा की दृष्टि से भी राजनीतिक दल महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि विरोधी दल की निरंकुशता से सुरक्षित रखते हैं। इसलिए लॉस्की ने कहा है राजनीतिक दल देश में अधिनायकवाद से हमारी रक्षा करने के सर्वश्रेष्ठ कवच हैं।

इस प्रकार प्रजातन्त्र में राजनीतिक दलों का अत्यधिक महत्व है। मैकाइवर का कथन है बिना राजनीतिक दल के न तो सम्यक् नीति निर्धारित की जा सकती है, न संवैधानिक आधार पर विधान मण्डलों के लिए निर्वाचन की उचित व्यवस्था की जा सकती है,न ही बिना राजनीतिक दलों के ऐसी मान्य राजनीतिक संस्थाओं की स्थापना की जा सकती है। 

जिनके द्वारा दलों को सत्ता और अधिकार प्राप्त होते हैं। राजनीतिक दलों के अत्यधिक महत्व के कारण ही उसे अदृश्य सरकार तथा शासन का चतुर्थ अंग कहा जाता है।

प्रजातान्त्रिक राजनीतिक दलों के कार्य

न्यूमैन ने प्रजातान्त्रिक राजनीतिक दलों के मुख्य कार्य इस प्रकार बतलाये हैं

(1) अस्त-व्यस्त एवं बिखरे जनमत को संगठित करना। 

(2) नागरिकों को राजनीतिक उत्तरदायित्व की दृष्टि से शिक्षित बनाना।

(3) शासन और जनमत को जोड़ने वाली कड़ी का प्रतिनिधित्व करना । 

(4) नेताओं का चुनाव। 

न्यूमैन के अनुसार, प्रजातान्त्रिक राजनीतिक व्यवस्था में राजनीतिक दलों के कार्य निरंकुश व सर्वाधिकारी शासन व्यवस्थाओं में उनके कार्यों के समान नहीं हो सकते। 

सर्वाधिकारी शासनों में दल का एकाधिकार होने के कारण न केवल उसकी कार्यशैली में अन्तर आता है, वरन् उसकी कार्यक्षमता की असीमता के कारण उसके कार्य भी भिन्न हो जाते हैं।

लोकतान्त्रिक व्यवस्थाओं में राजनीतिक दल

(1) नागरिकों को राजनीतिक उत्तरदायित्व की दृष्टि से शिक्षित बनाने।

(2)अस्त-व्यस्त एवं बिखरी जन-इच्छा को संगठित करने।

(3) शासन और जनमत को जोड़ने वाली कड़ी का प्रतिनिधित्व करने।

(4) नेताओं के चुनाव का कार्य करते हैं।

न्यूमैन के अनुसारअधिनायकवादी दल बाहर से लोकतान्त्रिक दलों से भिन्न नहीं दिखाई देते हैं। उनके सिद्धान्त और कार्य लोकतान्त्रिक धारणा लिये रहते हैं । 

सर्वाधिकारी दल

(1) व्यक्तियों पर एकरूपता का लादना। 

(2) जन-इच्छा पर एकाशय नियन्त्रण। 

(3) समाज व राज्य के मध्य सम्पर्क के लिये केवल मात्र ऊपर की ओर से इकतरफा प्रचार व निर्देश,

(4) नेताओं के चुनाव का कार्य करते हैं । 

सर्वाधिकारी दल मोटे तौर पर वही कार्य करते हैं, जो लोकतान्त्रिक व्यवस्था में दलों द्वारा सम्पादित होते हैं । अन्तर केवल कार्यविधि, कार्य क्षमता तक कार्य-उद्देश्यों का होता है।

राजनीतिक दल निम्नलिखित कार्यों को सम्पन्न करते हैं

(1) सार्वभौम नीतियों का निर्माण - राजनीतिक दल जनता का समर्थन प्राप्त करने के लिये लोकप्रिय सिद्धान्तों पर आधारित नीतियों का निर्माण करते हैं। वे विभिन्न प्रकार के विचारों और योजनाओं का जनता में प्रचार करते हैं। अतः राजनीतिक दलों को 'विचारों के दलाल कहा जा सकता है।

(2) जनता का नेतृत्व - सभी साधारण व्यक्तियों के लिये यह सम्भव नहीं कि वे सम्पूर्ण राष्ट्र की समस्याओं को समझ सकें और उनके समाधान के उपाय निकाल सकें। राजनीतिक दल जन सम्पर्क में जनसभाओं प्रचार माध्यमों, जैसे- रेडियो, टेलीविजन, समाचार-पत्र एवं पत्रिकाओं के माध्यम से करते हैं।

न्यायालय में जिस प्रकार वकील अपने तथ्यों को प्रस्तुत कर न्यायाधीश से सत्य जानने का प्रयत्न करते हैं, उसी प्रकार राजनीतिक दल भी अपने विचार जनता के समक्ष रखते हैं और यह अवसर प्रदान करते हैं कि जनता अपना सही मार्ग चुन ले। इसके अतिरिक्त विधानमण्डलों में शासक दल के सदस्य जनता की इच्छाओं और भावनाओं का सच्चा प्रतिनिधित्व करते हैं।

(3) जनमत का निर्माण- राजनीतिक दलों का यह परम कर्त्तव्य है कि वे अपनी नीतियों एवं कार्यक्रमों को जनता के समक्ष प्रस्तुत करके जनमत जानने और उसे संगठित करने का प्रयत्न करें। प्रत्येक दल अपने पक्ष में जनमत को करने की सोचता है। इससे जनमत संगठित होता है। 

न्यूमैन के शब्दों में राजनीतिक दलों का प्रमुख कार्य अव्यवस्थित जनमत को संगठित करना होता है। वे विचारों के दलाल होते हैं तथा निरन्तर रूप से दल के सिद्धान्तों को स्पष्ट एवं उनकी व्याख्या करते रहते हैं। वे सामाजिक हित-समूहों के प्रतिनिधि होते हैं तथा व्यक्तिगत एवं सामूहिक के मध्य अन्तर को कम करते हैं।”

(4) चुनावों का संचालन - आधुनिक युग में सार्वभौम वयस्क मताधिकार के कारण मतदाताओं की संख्या में अत्यधिक वृद्धि हुई है। ऐसी स्थिति चुनाव का संचालन बड़ा जटिल हो गया है। राजनीतिक दल अपने-अपने उम्मीदवार प्रत्येक क्षेत्र से खड़ा करते हैं और चुनाव का संचालन करके अपने उम्मीदवारों को विजयी बनाने का प्रयास करते हैं। 

साधारण जनता के लिये प्रत्येक व्यक्ति के विचारों, चरित्र एवं क्षमताओं का ज्ञान प्राप्त करना बड़ा कठिन है, लेकिन एक दल से सम्बद्ध होने पर इस प्रकार की कोई समस्या नहीं रहती। दल की विचारधारा एवं नीतियाँ स्पष्ट होती हैं। डॉ. फाइनर के शब्दों में राजनीतिक दल बिना निर्वाचन या तो नितान्त असहाय हो जायेंगे या उनके द्वारा असम्भव नीतियों को अपनाकर राजनीतिक तन्त्र को ही नष्ट कर दिया जायेगा।

(5) शासन का संचालन व आलोचना-प्रजातान्त्रिक शासन व्यवस्था में बहुमत प्राप्त दल ही सरकार है। सरकार के विभिन्न अंगों (कार्यपालिका तथा व्यवस्थापिका) में उसी का नियन्त्रण रहता । (अध्यक्षात्मक शासन में ऐसा भी हो सकता है कि कार्यपालिका किसी दल की हो और व्यवस्थापिका में किसी दूसरे दल का बहुमत हो)। समस्त शासन का कार्यभार इसी राजनीतिक दल पर होता है। 

विरोधी दल भी प्रजातन्त्र में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। वह शासन की नीतियों की आलोचना करता है तथा जनमत को अपने पक्ष में करने का प्रयत्न करता है। इससे शासक दल की निरंकुशता पर प्रतिबन्ध लगता है। लोकतन्त्र की सफलता के लिये एक सशक्त विरोधी दल का अस्तित्व आवश्यक है।

प्रो. मैरियम के शब्दों में सत्तारूढ़ दल का कार्य अधिकारी वर्ग का चुनाव करना, लोकनीति का निर्धारण करना तथा सरकार का संचालन करना है। विरोधी दल कार्य उसकी आलोचना करना। राजनीतिक शिक्षण तथा व्यक्ति एवं सरकार के मध्य एक बड़ी कार्यवाही करना होता है।”

(6) सरकार तथा जनता के मध्यस्थ का कार्य करना - राजनीतिक दल सरकार और जनता के मध्य मध्यस्थता करते हैं। वे जनता की कठिनाइयाँ, समस्याएँ एवं आकांक्षाएँ सरकार के समक्ष रखते हैं और सरकार की नीतियों एवं योजनाओं की सूचना जनता को देते हैं। इस प्रकार राजनीतिक दल सरकार और जनता के बीच सेतु का कार्य करते हैं। 

( 7 ) सरकार के विभिन्न अंगों में सामंजस्य- सम्पूर्ण सरकार एक सावयव की भाँति होती है। अतः उसके अंगों व्यवस्थापिका एवं कार्यपालिका में सामंजस्य होना आवश्यक है। संसदीय शासन में चूँकि कार्यपालिका एवं व्यवस्थापिका दोनों में एक ही दल का प्रभुत्व होता है इसलिये दल इनमें सामंजस्य एवं सहयोग पैदा करने में पूर्ण सफल हो जाता है। 

अध्यक्षात्मक शासन में सरकार के अंगों में शक्ति पृथक्करण होता है। इसके बावजूद भी राजनीतिक दल दोनों में सामंजस्य स्थापित करता है। यह कहना अतिशयोक्तिपूर्ण न होगा कि अध्यक्षात्मक शासन का दल ही वह कारक है जो शासनांगों में सामंजस्य स्थापित करता है।

(8) दलीय कार्य- अपना अस्तित्व बनाये रखने के लिये राजनीतिक दल मतदाताओं को अपने दल का सदस्य बनाते हैं। मतदाताओं की सूची तैयार करते हैं, दल के लिये चन्दा इकट्ठा करते हैं, सार्वजनिक सभाओं का आयोजन करते हैं। 

देश के प्रत्येक भाग में अपने दल की शाखाएँ खोलते हैं जिनके माध्यम से वे जनता की स्थानीय समस्याओं को जानते हैं तथा उनका समाधान करते हैं। रैली आयोजित करना, जुलूस निकालना, सत्याग्रह द्वारा विरोध करना आदि कार्य भी राजनीतिक दल करते हैं।

(9) सामाजिक एवं सांस्कृतिक कार्य - राजनीतिक दलों के मुख्य कार्य राजनीतिक होते हैं, परन्तु जनमत को अपने पक्ष में करने के लिये कभी-कभी वे सामाजिक एवं सांस्कृतिक कार्य भी करते हैं। बाढ़, सूखा, महामारी एवं अन्य संकटों के समय दल अपने स्वयं सेवकों को सहायतार्थ भेजता है।

वह छुआछूत, रंग-भेद, दहेज प्रथा आदि सामाजिक बुराइयों के विरुद्ध प्रचार करते हैं तथा सफाई, विकलांगों की सहायता तथा अन्य समाज-सुधार सम्बन्धी कार्य भी करते हैं। प्रत्येक देश में दल इस प्रकार के कार्य आवश्यक रूप से करते हैं {

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