सामाजिक विघटन के कारण और लक्षण - saamaajik vighatan ke kaaran aur lakshan

सामाजिक विघटन का सामान्य अर्थ सामाजिक व्यवस्था में असन्तुलन उत्पन्न हो जाना है। विघटन, संगठन का विपरीतार्थक शब्द है। विघटन की स्थिति में समाज की संरचना के विभिन्न अंगों की स्थितियाँ स्पष्ट नहीं रहतीं। अतः उनके कार्य भी अनिश्चित एवं असम्बद्ध हो जाते हैं। इस स्थिति में उन पर किसी निश्चित सत्ता का नियन्त्रण नहीं रहता।

सामाजिक विघटन, समाज के विभिन्न अंगों में पारस्परिक सम्बद्धता का टूटना है। उनकी स्थितियों एवं कार्यों का अनिश्चित और स्पष्ट हो जाना है। उनका अनियन्त्रित हो जाना और स्वीकृत उद्देश्यों की प्राप्ति में असफल हो जाना है।

समाज के निर्माणात्मक तत्व- व्यक्तिसमूह, संस्थाएँ, समुदाय आदि जब किन्हीं कारणों से सामूहिक प्रतिमान के साथ प्रकार्यात्मक सम्बन्ध स्थापित करने में असफल रहते हैं तो विघटन की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। 

सामूहिक प्रतिमान, व्यक्तिके जीवन को सन्तुलित और व्यवस्थित रखने में बहुत रखते हैं। जब ये प्रतिमान टूट जाते हैं तो समाज विघटन की ओर जाने लगता है।

महत्व सामाजिक विघटन का अर्थ तथा परिभाषाएँ

सामाजिक नियन्त्रण, सामाजिक संगठन का आधारभूत तत्व है। मनुष्य के व्यवहारों पर जब नियन्त्रण नहीं रहता तो अनुरूपता नष्ट हो जाती है और व्यक्तिगत हित, सामाजिक हित की अपेक्षा प्रधान हो जाता है। 

ऐसी स्थिति में प्रत्येक व्यक्तिमनचाहा कार्य करने के लिए प्रयत्न करने लगता है। इसका दुष्परिणाम सामाजिक विघटन होता है। विद्वानों ने सामाजिक विघटन की परिभाषाएँ निम्नलिखित प्रकार से दी हैं

(1) पी. एच. लैण्डिस है के अनुसार सामाजिक विघटन, मुख्यतया सामाजिक नियन्त्रण के भंग होने को कहते हैं जिससे अव्यवस्था तथा गड़बड़ी उत्पन्न होती है।

(2) रॉबर्ट फैरिस के अनुसार - कोई भी समाज उस समय विघटन का अनुभव करता है। जब उसके अंग अपनी एकता को खो बैठते हैं तथा अपने अन्तर्निहित उद्देश्यानुसार कार्य करने में असफल हो जाते हैं।

(3) इलियट तथा मैरिल के अनुसार - सामाजिक विघटन वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा एक समूह के सदस्यों के मध्य स्थापित सम्बन्ध या तो टूट जाते हैं अथवा समाप्त हो जाते है। 

(4) ऑगबर्न तथा निमकॉफ के अनुसार - सामाजिक तात्पर्य किसी इकाई के यथा समूह, संस्था अथवा समुदाय के कार्यों में विच्छेद से है।

(5) फेयरचाइल्ड ने कहा है सामाजिक विघटन, समूह के स्थापित व्यवहार प्रतिव्यवहार संस्थाओं या नियन्त्रणों की अव्यवस्था और अकार्यात्मकता है।

सामाजिक विघटन के प्रमुख लक्षण

(1) व्यक्तिवाद एवं स्व की अनुभूति - किसी समाज में जब कभी व्यक्तिवाद का महत्व बढ़ जाता है, तब परहित के स्थान पर स्वार्थ भी बढ़ जाता है। 

सामूहिक हित तथा सामाजिक कल्याण सम्बन्धी कार्यों की उपेक्षा की जाने लगती है और इस प्रकार व्यक्तिवादी भावना तथा स्वार्थ की सन्तुष्टि सम्बन्धी प्रवृत्ति के फलस्वरूप समाज में विघटन होने लगता है।

(2) नये तथा पुराने मूल्यों का संघर्ष  – प्रत्येक समाज की परिवर्तनशीलता ही उसके सामाजिक आदर्शों, मूल्यों, प्रतिमानों तथा मान्यताओं के परिवर्तन का प्रतीक होती है जो सामाजिक मूल्य समाज की पूर्व अवस्था में प्रचलित रहे हैं। 

उनकी अवमानना करना वर्तमान समाजों में सम्भव नहीं है। रूढ़ियों के आधार पर प्रत्येक समाज का धर्म तथा उसकी व्यवस्थाएँ निर्धारित होती हैं। 

फिर भी इन रूढ़ियों तथा पुराने सामाजिक मूल्यों और नवीनतम सामाजिक मूल्यों में समन्वय नहीं हो पाता। फलस्वरूप समाज में विघटनकारी समस्याओं का जन्म होता है। समाज के नवीन और पुरातन सामाजिक मूल्यों में संघर्ष होने लगता है।

(3) सामाजिक स्थितियों के विरुद्ध अन्याय – प्रत्येक समाज में व्यक्तिकी पूर्व निश्चित सामाजिक स्थिति होती है। उनके कार्य करने के लिए उनका एक निर्धारित पद भी होता है। 

व्यक्ति कतिपय स्थितियों को जन्म के आधार पर और कुछ स्थितियों को अपनी योग्यता तथा प्रयासों के आधार पर प्राप्त करता है। 

व्यक्ति जब इन स्थितियों तथा पदों के सन्दर्भ में प्रक्रियावादी दृष्टिकोण रखता है, तब तक सामाजिक व्यवस्था, सुव्यवस्थित एवं सुचारु रूप से संचालित होती रहती है। 

किन्तु जिस समय व्यक्तिवैयक्तिक स्वार्थों की परिपूर्ति में लिप्त होकर अपनी स्थितियों के प्रति अक्रियात्मक प्रवृत्ति  धारण कर लेता है, तब सामाजिक एकता व व्यवस्था को आघात लगना प्रारम्भ हो जाता है ।

(4) सामाजिक समितियों के प्रकार्यों का सहयोग - समाज में व्यक्ति स्वयं को पूर्णरूपेण सन्तुष्ट रखने हेतु विभिन्न प्रकार की आवश्यकताओं से सम्बन्धित समितियों की स्थापना करते हैं तथा व्यक्ति इन्हीं विभिन्न समितियों के माध्यम से अपनी-अपनी असंख्य आवश्यकताओं की पूर्ति व सन्तुष्टि करते हैं। 

व्यक्तियों द्वारा स्थापित प्रत्येक समिति के अपने-अपने उद्देश्य तथा कार्य भी निश्चित होते हैं। 

जब यह विभिन्न समितियाँ अन्य दूसरी समितियों के उद्देश्यों तथा कार्यों को अपनाने लगती हैं अथवा उनके उद्देश्यों व कार्यों के प्रति अन्याय करती हैं, तब सम्पूर्ण सामाजिक व्यवस्था में अव्यवस्था व असन्तुलन उत्पन्न हो जाता है।

(5) सामाजिक नियन्त्रण का अभाव - सामाजिक विघटन की यह अवस्था विषम तथा वीभत्स स्थितियों की जन्मदायक होती है। मानव मनो-मस्तिष्क स्वभावतः अन्तर्मुखी और स्वार्थी होता है। 

यदि उसकी उस स्वार्थपरक प्रवृत्ति पर अंकुश और नियन्त्रण न रखा जाये, तो वह उच्छृंखल होता जायेगा और सम्पूर्ण समाज में 'शक्ति ही अधिकार है' का सिद्धान्त लागू हो जायेगा ।

(6) विघटनकारी समस्याओं का जन्म – किसी भी समाज में विघटनकारी स्थिति का जन्म उस समय होता है। 

जबकि समाज में निर्धनता, बेरोजगारी, मद्यपान, वेश्यावृत्ति, किशोरापराध, व्यभिचार, भ्रष्टाचार तथा भिक्षावृत्ति आदि अत्यधिक बढ़ जाती हैं। वर्तमान युग में बेरोजगारी की समस्या विकराल रूप धारण कर चुकी है। 

जिसके फलस्वरूप शिक्षित नवयुवक तथा नवयुवतियाँ आये दिन विभिन्न प्रकार के आन्दोलन तथा हड़ताल आदि का आयोजन करके सामाजिक व्यवस्था के प्रति अपना असन्तोष प्रकट करते हैं। ।

(7) सामाजिक संरचना में परिवर्तन – समाज में जन्म, वर्ग, लिंग एवं आयु के अनुसार ही व्यक्ति के पद व कार्य निश्चित होते हैं। सामाजिक विघटन की अवस्था में इसमें परिवर्तन होने लगता है। 

व्यक्ति अपनी पूर्व निश्चित पद तथा भूमिकानुसार कार्य नहीं करते। प्राचीनकाल के सरल समाजों में स्त्री के कार्य परिवार के अन्दर तक ही सीमित होते थे। 

किन्तु वर्तमान जटिल औद्योगिक समाजों में स्त्री, पुरुषों के साथ कन्धे से कन्धा भिड़ाकर अनेक पुरुषोचित कार्य करने लगी हैं। इससे स्पष्ट होता है कि सामाजिक विघटन के फलस्वरूप सामाजिक संरचना में भी परिवर्तन होता है।

सामाजिक विघटन के कारण

सामाजिक विघटन की प्रक्रिया के लिए मात्र एक या दो कारणों को ही उत्तरदायी नहीं माना जा सकता है। सामाजिक विघटन हेतु निम्नलिखित कारण उत्तरदायी हैं

(1) सामाजिक परिवर्तन - इलियट तथा मैरिल के अनुसार, सामाजिक परिवर्तन से विभिन्न सामाजिक शक्तियों का सन्तुलन बिगड़ जाता है। पूर्ण स्थापित आदर्श सर्वथा मूल्यहीन और अप्रभावी हो जाते हैं तथा नवीन आदर्श सक्रिय नहीं रह पाते। 

इस प्रकार की संक्रात्मक अवस्था में सामाजिक परिवर्तन के आधार पर सामाजिक विघटन हो जाता है। एक अन्य समाजशास्त्री ऑगबर्न एण्ड निमकॉफ के अनुसार - भौतिक संस्कृति में परिवर्तन अपेक्षाकृत शीघ्रतापूर्वक होता है। जिससे अभौतिक संस्कृति प्रायः पिछड़ जाती है ।

(2) आर्थिक संरचना में परिवर्तन  - आर्थिक संरचना में हुए परिवर्तनों का स्पष्ट प्रभाव, सामाजिक संरचना पर भी पड़ता है। बेकारी, उद्योग-व्यवसाय में गिरावट, उत्पादन में ह्रास तथा औद्योगिक विवादों के परिणामस्वरूप समाज में अनेकानेक सामाजिक व्यक्तियों का जन्म होता है। जिसकी परिणति अन्ततोगत्वा सामाजिक विघटन ही है ।

(3) सामाजिक मूल्यों में परिवर्तन  – सामाजिक मूल्य ही सामाजिक संगठन को शक्तिप्रदान करते हैं। इलियट एण्ड मैरिल के शब्दों में सामाजिक मूल्यों की अनुपस्थिति में सामाजिक संगठन अथवा सामाजिक विघटन का कोई अस्तित्व ही नहीं होता है। 

सामाजिक मूल्यों में घटित परिवर्तनों के परिणामस्वरूप वर्तमान सामाजिक संस्थाएँ तथा समितियाँ सर्वथा प्रभावहीन हो जाती हैं। सामाजिक मूल्यों तथा संस्थाओं में संघर्ष उत्पन्न होने लगता है और सामाजिक विघटन हो जाता है। 

(4) युद्ध  - युद्ध को भी कुछ विद्वानों ने सामाजिक विघटन के लिए उत्तरदायी घोषित किया है। इसके कारण सम्पूर्ण देश में भ्रम और अव्यवस्था का प्रसार होता है। युद्ध की स्थिति में प्रायः सामाजिक सन्तुलन बिगड़ जाता है और देश की सम्पूर्ण शक्ति युद्ध की दिशा में मुड़ जाती है। 

युद्ध के कारण परिवारों पर आर्थिक बोझ बढ़ जाता है, सामाजिक मूल्यों का ह्रास होने लगता है। युद्ध के परिणामस्वरूप घटित मूल्यों से बेरोजगारी, अनाथपन, यौन व्यभिचार तथा वेश्यावृत्ति बढ़ जाती है। सम्पूर्ण आर्थिक सामाजिक ढाँचा नष्ट होकर सामाजिक विघटन हो जाता है।

(5) सांस्कृतिक संघर्ष - कतिपय विद्वानों का यह दृढ़ मत है कि प्रत्येक संस्कृति में निरन्तर प्रसार की प्रक्रिया क्रियाशील रहती है। जब कभी पृथक्-पृथक् संस्कृतियाँ एक-दूसरे के समीप आती हैं, तब उनमें संघर्ष होता है। 

चूँकि दोनों संस्कृतियों के मूल्य तथा आदर्श भिन्न होते हैं इसलिए उनमें भ्रम तथा तनाव की स्थिति जन्म लेती है और इस प्रकार से उत्पन्न सांस्कृतिक संघर्ष के फलस्वरूप अन्ततोगत्वा सामाजिक विघटन की प्रक्रिया जन्म लेती है।

(6) सामाजिक मनोवृत्ति  - व्यक्ति में सामाजिक मनोवृत्ति का उद्भव और विकास समाज के अन्तर्गत ही सम्भव होता है। भिन्न-भिन्न समाजों में विभिन्न स्थितियों तथा वस्तुओं के सन्दर्भ में व्यक्तियों की मनोवृत्ति भी भिन्न-भिन्न होती है। 

उदाहरणार्थ, वर्तमान समय में विश्व के सर्वाधिक समुन्नत राष्ट्र में अभी तक गोरे अमेरिकन काले हब्शियों के प्रति कोई अच्छी मनोवृत्ति नहीं रखते हैं। इसी प्रकार भारत के सवर्ण जाति के लोग हरिजनों के प्रति अभी तक पुरानी मनोवृत्ति का ही परिचय देते हैं। 

इस प्रकार की मनोवृत्तियों के परिणामस्वरूप समाज में संघर्ष तथा तनाव उत्पन्न होता है, जिसकी अन्तिम परिणति वस्तुतः सामाजिक विघटन होती है।

(7) सामाजिक संकट  - सामाजिक संकट भी सामाजिक विघटन में सहायक सिद्ध होते हैं। उदाहरणार्थ, बाढ़, गम्भीर महामारियाँ, भूचाल, सूखा अथवा नहान् राष्ट्रीय नेता की मृत्यु आदि। इस कोटि के संकट एकाएक उत्पन्न होकर समाज की सम्पूर्ण व्यवस्था को असन्तुलित कर देते हैं। 

संचयी अथवा पूर्व नियोजित संकट विभिन्न प्रकार की घटनाओं के परिणामस्वरूप, शनैः शनैः उत्पन्न होता रहता है और कालान्तर में उचित सतर्कता न किये जाने के कारण भविष्य में एक बड़ी संकटापन्न स्थिति को जन्म दे बैठता है। 

भारतवर्ष में प्रतिवर्ष लाखों स्नातक शैक्षिक बेकारी की वृद्धि कर रहे हैं। इससे सम्पूर्ण सामाजिक व्यवस्था में अत्यधिक गम्भीर असन्तुलन उत्पन्न होगा।

(8) जातिवाद और सम्प्रदायवाद - जातिवाद तथा सम्प्रदायवाद भी अनिवार्य रूप से सामाजिक विघटन के लिए उत्तरदायी होते हैं। हिन्दू-मुस्लिम दंगे, शिया-सुन्नी विवाद, जातिवाद और सम्प्रदायवाद समान रूप से सामाजिक व्यवस्था के लिए घातक होते हैं। जातियों की श्रेष्ठता के आधार पर तो विश्व में कई बार युद्ध और सामूहिक नरसंहार तक किये जा चुके हैं। 

गौ हत्या करना, मस्जिदों का अनादर करना तथा मुसलमानों और ईसाइयों की वृद्धि करना अथवा पिछड़ी जातियों को मुसलमान या ईसाई धर्म में दीक्षित करना आदि अन्ततोगत्वा साम विघटन के लिए ही उत्तरदायी हैं।

(9) आधुनिकता  - आधुनिकता भी सामाजिक विघटन के लिए एक महत्वपूर्ण और प्रभावी कारण है। भारतवर्ष में विश्वास, श्रद्धा, त्याग, सम्मान, स्नेह तथा नम्रता आदि गुणों का स्थान शनैः-शनैः पाश्चात्यीकरण से प्रभावित होता जा रहा है। 

भारतीय समाज अध्यात्मवाद के स्थानं पर भौतिकवाद से अधिक प्रभावित हो रहा है। समाज में भाई-बहिन, पति-पत्नी, माता-पिता तथा मित्रों की परिभाषाएँ तक बदल गई हैं। परिणामस्वरूप भारतीय समाज में सामाजिक विघटन सक्रिय हो चुका है।

(10) अन्य कारण - राजनैतिक उथल-पुथल भी समाज को विघटित करती है। नेतागणों का भ्रष्ट आचरण, मिथ्या आश्वासन, जनता का शोषण करना तथा सामाजिक समस्याओं के प्रति राज्य द्वारा उदासीनता बरतना आदि किसी भी समाज की व्यवस्था के लिए हानिप्रद ही सिद्ध होता है। 

चलचित्र तथा संचार माध्यम भी व्यक्तियों का चारित्रिक पतन करके सामाजिक विघटन में अपनी भूमिका का निर्वाह कर रहे हैं। इसलिए नवयुवकों द्वारा समाज में विचलनकारी व्यवहार का सर्वप्रमुख कारण चलचित्र और दूरदर्शन माना जा सकता है।

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