सामाजिक समस्या क्या है - samajik samasya kya hai

सामाजिक समस्या अर्थ और परिभाषाएँ -  सामाजिक समस्या को परिभाषित करना यद्यपि कठिन अवश्य है, परन्तु फिर भी बहुत से विद्वानों अपने-अपने दृष्टिकोण से इसे परिभाषित किया है। 

डब्ल्यू. वेलेस वीवर के अनुसार सामाजिक समस्या एक ऐसी दशा है जो चिन्ता, तनाव, संघर्ष या नैराश्य उत्पन्न करती है और आवश्यकता की पूर्ति में बाधा डालती है।

सामाजिक समस्या क्या है ? इसके प्रमुख कारणों की विवेचना कीजिए। 

सामाजिक समस्या उद्वेगात्मक अथवा मानसिक व्याकुलता के लिए उत्तरदायी है। चिन्ता, समस्या में गतिशील तत्व के रूप में पायी जाती है। एक समस्यामूलक परिस्थिति उन व्यक्तियों को इसका हल खोजने के लिए बाध्य करती है जो इससे प्रभावित हों। 

सामाजिक समस्या क्या है - samajik samasya kya hai

समस्या से छुटकारा प्राप्त करने के लिए परिस्थिति को सामाजिक परिवर्तनों के माध्यम से बदलना आवश्यक होता है। सामाजिक समस्याओं के अध्ययन में ध्यान सामाजिक परिस्थितियों पर केन्द्रित किया जाता है।

(1) राव तथा सेल्जनिक ने सामाजिक समस्या को मानवीय सम्बन्धों से सम्बन्धित एक समस्या माना है जो समाज के लिए गम्भीर खतरा पैदा करती है अथवा जो व्यक्तियों की महत्वपूर्ण आकांक्षाओं की प्राप्ति में बाधाएँ उत्पन्न करती है।

(2) पॉल लैण्डिस के अनुसार सामाजिक समस्याएँ व्यक्तियों की कल्याण सम्बन्धी अपूर्ण आकांक्षाएँ हैं।

(3) क्लेरेंस मार्शकेस के मतानुसार सामाजिक समस्या का तात्पर्य किसी ऐसी सामाजिक परिस्थिति से है जो एक समाज में काफी संख्या में योग्य अवलोकनकर्त्ताओं के ध्यान को आकर्षित करती है। और सामाजिक अर्थात् सामूहिक, किसी एक अथवा दूसरे किस्म की क्रिया के द्वारा पुनः सामंजस्य या हल के लिए उन्हें आग्रह करती है।

(4) रिचार्ड सी. फुल्लर तथा रिचार्ड मायर्स के अनुसार व्यवहार के जिन प्रतिमानों या परिस्थितियों को किसी समय समाज के बहुत से सदस्य आपत्तिजनक अथवा अवांछनीय मानते हों।

वे ही सामाजिक समस्याएँ हैं। इन सदस्यों की यह मान्यता रहती है कि इन समस्याओं को हल करने और उनके कार्यक्षेत्र को कम करने के लिए सुधार - नीतियों, कार्यक्रमों एवं सेवाओं की आवश्यकता होती है।

सामाजिक समस्याओं के कारण

व्यक्तिगत और सामाजिक विघटन सामाजिक समस्याओं को जन्म देते हैं। इस सम्बन्ध में प्रो. टिम्स का कहना है कि सामाजिक समस्याओं को जन्म देने वाली अवस्थाओं को सामाजिक रोग, सामाजिक विघटन, मतभेद और विचलन की अवस्थाएँ कहा गया है।

वीबर के अनुसार सामाजिक समस्याओं का प्रमुख कारण, जैसा कि समाजशास्त्रियों ने पाया है। समाज में अन्तर्निहित मानवीय आवश्यकताओं का नैराश्य है।

जिसने प्रौद्योगिकी को प्रायः क्रान्तिकारी अंकों में परिवर्तित कर दिया है। बिना सामाजिक संगठन में तुलनात्मक परिवर्तन किये। समाजशास्त्रियों की मान्यता है कि प्रौद्योगिक परिवर्तनों के प्रभाव के फलस्वरूप संस्कृति का भौतिक पक्ष बदल जाता है।

डब्ल्यू. बी. ऑगबर्न ने इसे सांस्कृतिक विलम्बना माना है। संस्कृति के विभिन्न पक्षों में परिवर्तन की अलग-अलग दर चिन्ता अथवा तनाव उत्पन्न करती है जो सामाजिक विघटन की दशा के लिए उत्तरदायी है। 

अतः यह कहा जा सकता है कि सामाजिक परिवर्तन, सांस्कृतिक विलम्बना तथा सामाजिक विघटन सामाजिक समस्याओं के कारणों की व्याख्या प्रस्तुत करने में अत्यन्त महत्वपूर्ण है। 

आजकल यह माना जाता है कि सभी सामाजिक समस्याएँ पारस्परिक रूप से सम्बन्धित हैं और किसी भी समस्या को अन्य समस्याओं से पूर्णतः पृथक् करके नहीं समझा जा सकता है। 

अतः सामाजिक समस्याओं का विश्लेषण एक सामाजिक संरचना में चल रही सामाजिक प्रक्रियाओं के सन्दर्भ में किया जाना चाहिए। सामाजिक प्रक्रिया का तात्पर्य एक समूह के जीवन में होने वाले परिवर्तनों से है।

राव तथा सेल्जनिक ने सामाजिक समस्याओं के पाँच कारणों का उल्लेख किया है जो निम्नलिखित है 

(1) जब किसी संगठित समाज के सदस्यों के सम्बन्धों को व्यवस्थित करने की योग्यता समाप्त होने लगती है अथवा समाप्त होती प्रतीत होती है तो सामाजिक समस्याएँ उत्पन्न हो जाती हैं।

(2) जब समाज की संस्थाएँ विचलित होने लगती हैं तो सामाजिक समस्याएँ उठ खड़ी होती हैं।

(3) जब किसी समाज के लोग कानूनों का उल्लंघन करने लगते हैं तो सामाजिक समस्याएँ उभरने लगती हैं।

(4) जब लोगों की अपेक्षाओं का ढाँचा लड़खड़ाने लगता है तो सामाजिक समस्याएँ पैदा हो जाती है। 

(5) जब समाज के मूल्यों का एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तान्तरित होना रुक जाता है तो ऐसी दशा में सामाजिक समस्याएँ उत्पन्न होने लगती हैं।

पॉल लैण्डिस ने सामाजिक समस्याओं के चार कारण बताये हैं जो निम्न प्रकार हैं

(1) व्यक्तिगत समायोजन में असफलता। 

(2) सामाजिक संरचनाओं में दोष पैदा होना। 

(3) संस्थागत समायोजन में असफलता। 

(4) सामाजिक नीति में संस्थात्मक विलम्बनाएँ।

भारत में सामाजिक समस्याएँ

वर्तमान समय में भारत में अनेक सामाजिक समस्याएँ पायी जाती हैं। यद्यपि भारतवर्ष एक स्वतन्त्र गणराज्य है जिसने धर्म निरपेक्ष, प्रजातन्त्र तथा आर्थिक समानता के प्रगतिशील मूल्यों को स्वीकार किया है, परन्तु यहाँ निर्धनता पायी जाती है।

गरीब-अमीर के बीच एक बहुत बड़ी खाई दिखलायी पड़ती है। यहाँ धर्म, भाषा, प्रजाति, जाति तथा क्षेत्रीयता के आधार पर अनेक भेद-भाव पाये जाते हैं। 

व्यक्ति-व्यक्ति में सामाजिक और आर्थिक आधार पर ऊँच-नीच का एक संस्तरण पाया जाता है। जातिवाद, अस्पृश्यता, भाषावाद, प्रान्तीयता, साम्प्रदायिकता, युवाविक्षोभ तथा बेकारी आदि समस्याएँ यहाँ मौजूद हैं। 

यहाँ बाल-अपराधी और प्रौढ़-अपराधी भी पाये जाते हैं जो समाज के सम्मुख उत्पन्न करते हैं। यहाँ जनसंख्या की बढ़ोत्तरी भी तेजी के साथ होती जा रही है। 

निरक्षरता, निम्न जीवन-स्तर, शराबखोरी, जुआ, वेश्यावृत्ति और राजनीतिक एवं प्रशासनिक भ्रष्टाचार की समस्याओं का भी देशवासियों को सामना करना पड़ रहा है। यहाँ औद्योगीकरण एवं नगरीकरण से सम्बन्धित समस्याएँ भी गम्भीर रूप धारण करती जा रही हैं।

यहाँ इतना कहना काफी है कि भारतवर्ष काफी लम्बे समय तक अंग्रेजों के अधीन रहा जिन्होंने इस देश की समस्याओं को हल करने और विकास कार्यक्रमों को आगे बढ़ाने में अपने निहित स्वार्थों के कारण विशेष रुचि नहीं ली। स्वतन्त्र भारत में भी जितना ध्यान इन समस्याओं पर दिया जाना चाहिए था, नहीं दिया जा सका। 

समस्याओं का निवारण इस तथ्य पर आधारित है कि किसी समाज विशेष का नेतृत्व उन समस्याओं को हल करने के प्रति कितना दृढ़ संकल्प और देशवासियों में समस्याओं के प्रति जनचेतना जाग्रत करने में कितना समर्थ है। 

कानून बना देने मात्र से सामाजिक समस्याओं से छुटकारा प्राप्त नहीं किया जा सकता। आज देश में दहेज विरोधी कानून है परन्तु समाज दहेज- -प्रथा से छुटकारा प्राप्त नहीं कर सका है।

यहाँ एक प्रश्न उठता है कि क्या सामाजिक समस्याओं को हल किया जा सकता है, क्या इनका निवारण सम्भव है ? इसका उत्तर हाँ में दिया जा सकता है। 

विश्व के सामाजिक समस्याओं के इतिहास का अवलोकन करने पर ज्ञात होता है कि वास्तव में बहुत-सी सामाजिक समस्याओं को समय-समय पर हल किया गया। 

गुलामी की प्रथा से लोगों को मुक्त कराया जा सका। प्रतिदिन बारह घण्टे तथा सप्ताह में सात दिन तक मजदूरों से काम लेने की समस्या को हल किया जा सका। 

इसी प्रकार बाल-श्रम की समस्या का निवारण सम्भव हुआ। आज अनेक देशों ने निर्धनता अथवा अभाव की स्थिति पर काफी नियन्त्रण प्राप्त कर लिया है और बहुत से देश इस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। 

वर्तमान में अनेक बीमारियों की रोकथाम का भी सफलतापूर्वक प्रयत्न किया जा सका है। कुछ विद्वानों की यह भी मान्यता है कि परिस्थितियों के बदलने के साथ-साथ नवीन समस्याएँ उठ खड़ी होती हैं। 

ऐसी स्थिति में पुरानी समस्याओं का स्थान नवीन समस्याएँ ले लेती हैं। इस दृष्टि से सामाजिक समस्याएँ हल नहीं होतीं, बल्कि उनके स्थान पर नवीन समस्याएँ उठ खड़ी होती हैं। 

यहाँ इस सम्बन्ध में इतना कहना ही पर्याप्त है कि सामाजिक समस्याओं को हल करने के लिए काफी कुछ किया जा सकता है लेकिन यह सब कुछ निश्चित सीमाओं में ही सम्भव है |

Subscribe Our Newsletter