वित्त एवं वाणिज्य की भाषा-vitt awam vanijya ki bhasha।

वित्त का अर्थ - धन मानव जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक है । इसके अभाव में न व्यक्ति का जीवन सुचारू रूप से चल पाता है और न ही किसी संस्था का आरंभ या संचालन ही किया जा सकता है। जीवन तथा उद्योग में वित्त का महत्व शरीर के रक्त की तरह है।  

क्योंकि जिस प्रकार शुद्ध रक्त के अभाव में शरीर का कोई भी अंग गतिशील नहीं हो सकता। ठीक उसी प्रकार वित्त के अभाव में कोई भी संस्था -फूल नहीं सकती इसीलिए शायद कहा गया है- वित्त, उद्योग का जीवन रक्त है। वित्त की महत्ता को ध्यान में रखते हुए ही इरविन फ्रैन्ड ने कहा है। 

एक फर्म (उद्योग) की सफलता यहाँ तक कि उसका अस्तित्व, उसकी कार्यक्षमता और काफी बड़ी सीमा तक उसके भूतकालीन एवं वर्तमान वित्तीय नीतियों द्वारा ही निर्धारित होती है।

वित्त एवं वाणिज्य की भाषा को समझाइये।

वाणिज्यिक क्षेत्र में हिन्दी भाषा का प्रयोग का क्षेत्र जहाँ काफी विस्तृत है वहीं वह लोकप्रिय भी है वाणिज्यिक क्षेत्र के अंतर्गत व्यापार, वाणिज्य, व्यवसाय, बैकिंग, शेयर बाजार, बीमा, परिवहन, आयात-निर्यात आदि क्षेत्र आते हैं। इन क्षेत्रों में विषय एवं संदर्भ के अनुसार पारिभाषिक शब्दावली तथा भाषिक संरचना का प्रयोग किया जाता है। 

इन क्षेत्रों से सम्बन्धित शब्दावली निश्चित है तथा इन क्षेत्रों में वह निश्चित अर्थ में प्रयुक्त होती है। जैसे–चाँदी चमका, सोना गिरा या सोने में उछाल, अरहर सुस्त, काबुली उछला इस तरह की भाषा वाणिज्य - व्यापार के क्षेत्र में एक अलग अर्थ को समेटे होते हैं ।

वाणिज्यिक क्षेत्र के अंतर्गत आयात-निर्यात और शेयर बाजार में प्रयुक्त होने वाली भाषा विशिष्ट तरह की होती है। यह जनसामान्य की समय से परे होती है। वित्त एवं वाणिज्य की भाषा की वाक्य रचना साहित्यिक वाक्य रचना से काफी भिन्न रहती है। आजकल वित्त एवं वित्तीय कारोबार व इससे जुड़ी गतिविधियों का महत्व बढ़ता ही जा रहा है।

वाणिज्यिक भाषा का उदाहरण 

भारत और सोवियत संघ ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की रूस यात्रा के दौरान आर्थिक सहयोग के समझौते पर हस्ताक्षर किये। इनमें से एक समझौते के तहत सोवियत संघ भारत को 100 करोड़ रुपये का कर्ज देगा । इस राशि से बिजली, तेल, रक्षा संबंधी मशीन निर्माण की संयुक्त परियोजनाओं के लिए सोवियत संघ से साज सामान खरीदे जायेंगे | दूसरा समझौता सन् 2020 तक आर्थिक, व्यापारिक, वैज्ञानिक व तकनीकी सहयोग से संबंधित है।

इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि वाणिज्यिक भाषा, वित्त प्रबंधकीय क्रियाओं के सफल संपादन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। साथ ही इससे जुड़ी भाषिक शब्दावली का नित नवीन प्रयोग भी देखने को मिल रहा है। जीवन में वित्त के महत्व को निम्नलिखित बिंदुओं के आधार पर समझा जा सकता है -

 वित्त का महत्व या विशेषताएँ

(1) निश्चयीकरण का केन्द्र बिन्दु - वर्तमान समय में व्यवसाय का आकार बढ़ गया है व नियमों का विकास हो रहा है। ऐसी स्थिति में किसी भी व्यवसाय से संबंधित निर्णय अनुमान के आधार पर लेना उचित नहीं माना जाता अपितु वैज्ञानिक आधार लिए जाते हैं। वित्त के आधार पर ही व्यवसाय का चयन, उसका आकार प्रकार, फैलाव आदि का निर्णय लिया जाता है । इस प्रकार वित्त व्यावसायिक निश्चयीकरण का केन्द्र बिन्दु सिद्ध होता है ।

(2) व्यावसायिक सफलता का निर्णय - किसी भी व्यावसायिक सफलता के लिए वित्तीय आधार महत्वपूर्ण होता है। यदि समय पर वित्त उपलब्ध नहीं हो पाता है तो व्यवसाय की सफलता संदिग्ध हो जाती है । व्यावसायिक गतिविधियों के संचालन में कठिनाई नहीं आती।

(3) कार्य निष्पादन में सहायक - वित्त कार्य निष्पत्ति के मापक के रूप में कार्य करता है, वित्त व्यवसाय का साधन मात्र नहीं अपितु साध्य भी है। 'वेस्टन व बीशम' के अनुसार पर्याप्त वित्त होने पर ही वित्तीय निर्णय आय की मात्रा तथा व्यावसायिक जोखिम इन दोनों को प्रभावित करते हैं। 

दूसरे शब्दों में, नीति विषयक निर्णय जोखिम एवं लाभदायकता पर प्रभाव डालते हैं तथा ये दोनों कारक सम्मिलित रूप से फर्म के मूल्य को निर्धारित करते हैं।

(4) औद्योगीकरण का आधार - वित्त औद्योगीकरण का आधार है। वित्त के अभाव में न तो उद्योगों एवं कल-कारखानों की स्थापना की जा सकती है और न ही वस्तुओं का उत्पादन । हमारे देश में प्राकृतिक व मानव संसाधन प्रचुर मात्रा में है, उसके बावजूद उचित दोहन न होने से देश की वित्तीय व्यवस्था सोचनीय है। 

यही वजह है कि हमारे देश में वित्त को बढ़ावा देने हेतु सरकार ने औद्योगिक वित्त निगम, राष्ट्रीय औद्योगिक विकास बैंक एवं राज्य में वित्त निगम की स्थापना की है। जिससे वित्तीय व्यवस्था मजबूत हो सके।

(5) आर्थिक नीतियाँ - विदेशी सहायता संबंधी नीति, राष्ट्रीय आय नीति, कर नीति, व्यय नीति, औद्योगिक नीति आदि सभी आर्थिक नीतियाँ वित्त से प्रभावित होती हैं। भारत में वित्त की कमी के कारण विदेशी पूँजी निवेश को बढ़ावा मिला है। वित्तीय व्यवस्था के लिए देश में घाटे की अर्थव्यवस्था को अपनाया गया है।

(6) अन्य पक्षों को महत्व - वित्त का महत्व न केवल व्यावसायिक प्रबंधन के क्षेत्र में है अपितु वित्तीय संस्थाएँ, समाजशास्त्री, राजनैतिक सरकार आदि सभी पक्षों की दृष्टि से भी वित्त का महत्व है। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि मानव जीवन में समाज व व्यावसायिक प्रबंधन के वित्त का होना आवश्यक है। 

इसके अभाव में अव्यवस्था पनप जाती है। शायद यही कारण है कि भारतीय दर्शन में अर्थ को पुरुषार्थ चतुष्टय में दूसरा स्थान दिया गया है।

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