व्यक्तिवाद क्या है - vyaktivad kya hai

व्यक्तिवाद क्या है

जे. एस. मिल के व्यक्तिवादी विचारों के अध्ययन से पूर्व व्यक्तिवाद का अर्थ समझ लेना आवश्यक है। राजनीतिक विचारधारा के रूप में व्यक्तिवाद राज्य के कार्यक्षेत्र का सिद्धान्त है। 

व्यक्तिवाद यह बताने का प्रयास करता है कि व्यक्ति के हित में राज्य को क्या कार्य करने चाहिए और कौन-से कार्य नहीं करने चाहिए। व्यक्तिवाद राज्य के कार्यक्षेत्र को कम-से-कम कर देने के पक्ष में है, जिससे व्यक्ति अधिकतम स्वतन्त्रता का उपयोग कर सके। 

व्यक्तिवादी विचारधारा के अनुसार व्यक्ति अपने हितों का श्रेष्ठ निर्णायक है अतः राज्य को उसके कार्यों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। व्यक्तिवाद 'व्यक्ति साध्य है और राज्य एक साधन' मात्र हैं के अनुसार, व्यक्ति 'साध्य' और राज्य 'साधन'( व्यक्तिवाद को 'लासाफेयर' सिद्धान्त के नाम से भी जाना जाता है, 

जिसका अर्थ है, “व्यक्ति को अकेला छोड़ दो, जिससे वह चाहे जो कर सके।” राज्य को व्यक्ति के मामलों में उसी समय हस्तक्षेप करना चाहिए, जबकि व्यक्ति दूसरे व्यक्ति की स्वतन्त्रता में हस्तक्षेप करे। इस प्रकार व्यक्तिवादियों के अनुसार, राज्य एक 'आवश्यक बुराई'  है। 

दूसरे शब्दों में, राज्य मनुष्य के लिए आवश्यकता तो है, परन्तु वह स्वयं एक बुराई भी है क्योंकि उसके पास सर्वोच्च शक्ति है और उसका दुरुपयोग राज्य करता है। अतः इस बुराई को कम करने के लिए व्यक्तिवाद राज्य के कार्यक्षेत्र को सीमित कर देना चाहता है। 

व्यक्तिवाद के अनुसार, "राज्य केवल एक पुलिसमैन है और राज्य का कार्य डाकाजनी, हत्याओं को रोकने और समझौते को लागू करने के अलावा अधिक कुछ भी नहीं है ।” 

व्यक्तिवाद के सिद्धान्त

राज्य की व्यक्तिवाद के प्रमुख सिद्धान्तों की विवेचना निम्न प्रकार से की जा सकती है - 

(1) राज्य आवश्यक बुराई है- अराजकतावादियों की भाँति ही व्यक्तिवादी भी 'टु निन्दा तो करते हैं, किन्तु वे अराजकतावादियों के सदृश उसको समूलतः नष्ट करने के पक्ष में नहीं हैं। व्यक्तिवादियों के अनुसार मानव स्वभाव में निहित स्वार्थ और संघर्ष की आधारभूत बुराइयों के कारण राज्य एक विकार होते हुए भी आवश्यक है। 

राज्य मानव की अपरिपक्वता का द्योतक है। फ्रीमैन के शब्दों में, "किसी भी रूप में सरकार का अस्तित्व मनुष्य की अपूर्णता का प्रतीक है। आदर्श अवस्था वह है जिसमें सरकार बिलकुल न हो । ”

भी एक आदर्शवादियों की भाँति व्यक्तिवादी राज्य को एक चिरस्थायी या आदर्श संस्था के रूप में स्वीकार नहीं करते, उनके अनुसार वरन् तो राज्य आवश्यक होते हुए दुर्गुण ही है। राज्य का अस्तित्व उसी भाँति आवश्यक है, जिस प्रकार युद्ध एक विकार होते हुए भी आवश्यक है अथवा रोगग्रस्त होने की स्थिति में व्यक्ति को औषधि का सेवन करना होता है।

(2) व्यक्तिवादी राज्य को उद्देश्य पूर्ति का साधन - मात्र मानते हैं - व्यक्तिवादियों की यह निश्चित धारणा है कि राज्य व्यक्ति के लिए है न कि व्यक्ति राज्य के लिए । 

व्यक्तिवादी राज्य को एक साधन मानते हैं। उनके अनुसार, मानव जीवन राज्य का परिणाम नहीं, वरन् राज्य की स्थापना मनुष्यों ने अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करने के लिए की है। स्पेन्सर के शब्दों में, "राज्य एक संयुक्त सुरक्षा कम्पनी है जिसका उद्देश्य पारस्परिक हित-रक्षा एवं कल्याण है । "

व्यक्तिवादी राज्य के व्यक्तित्व या इच्छा सिद्धान्त को मान्यता नहीं देते। वे राज्य को व्यक्तियों का समूह मात्र मानते हैं। उनके अनुसार व्यक्तियों के सुख में ही राज्य की उन्नति है। अतः व्यक्तिवादी राज्य को भी अन्य संस्थाओं की तरह मानव-हित का साधन मानते हैं ।

(3) व्यक्तिवादी व्यक्ति को पूर्ण स्वतन्त्रता देने के पक्ष में हैं - व्यक्तिवाद के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति अपने हितों का सर्वोत्तम निर्णायक होता है और व्यक्तित्व के विकास हेतु यह नितान्त आवश्यक है कि व्यक्तिको अधिकाधिक और लगभग पूर्ण स्वतन्त्रता प्रदान कर दी जाये। 

व्यक्तिवाद न केवल राजनीतिक, वरन् आर्थिक क्षेत्र में भी व्यक्ति की स्वतन्त्रता का प्रतिपादन करता है। आर्थिक क्षेत्र में यह चाहता है कि राज्य को 'यद्भाव्यम् नीति' का पालन करना चाहिए और उसे उद्योग-धन्धों, व्यापार और व्यवसाय में कोई हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। 

राज्य के द्वारा स्वतन्त्र प्रतियोगिता, समझौते की स्वतन्त्रता तथा बाजार में माँग और पूर्ति के सिद्धान्त को मान्यता प्रदान की जानी चाहिए।

(4) व्यक्तिवादी राज्य को केवल निषेधात्मक कार्य सौंपने के पक्ष में हैं - व्यक्तिवादी व्यक्ति को अधिकाधिक स्वतन्त्रता प्रदान करने के इच्छुक हैं और उनका विचार है कि राजकीय हस्तक्षेप से स्वतन्त्रता की रक्षा या वृद्धि नहीं होती, वरन् उसका लोप होता है। व्यक्तिवादियों के अनुसार राज्य का कार्यक्षेत्र सकारात्मक की अपेक्षा नकारात्मक ही होना चाहिए। 

व्यक्तिवादी सुख प्राप्ति को एक व्यक्तिगत वस्तु मानते हैं, जिसकी प्राप्ति मनुष्य केवल व्यक्तिगत रूप में ही कर सकता है। व्यक्तिवादियों के अनुसार इतिहास इस सत्य को प्रमाणित करता है कि राज्य के सकारात्मक कार्यों से कभी भी मानव कल्याण सम्भव नहीं हो पाया है और न ही उससे कभी मानव की तुष्टि हुई है। इस प्रकार व्यक्तिवाद का आदर्श एक पुलिस राज्य है, जन-कल्याणकारी राज्य नहीं ।

व्यक्तिवाद का कार्यक्षेत्र

व्यक्तिवाद का दूसरा नाम 'लासा फेयर' भी है जिसका अर्थ है 'उसे अकेला रहने दो' । व्यक्तिवादी विचारक चाहते हैं कि राज्य व्यक्ति को अकेला रहने का अधिकतम अवसर दे । इन विचारकों का मत है कि यदि मानव स्वभाव श्रेष्ठ होता, तो राज्य की कोई आवश्यकता नहीं थी, लेकिन मानव स्वभाव और जीवन में विद्यमान स्वार्थ और संघर्ष की प्रवृत्ति पर अंकुश रखने के लिए राज्य की आवश्यकता है। 

इनके अनुसार यद्यपि राज्य एक बुरी संस्था है, किन्तु मानव जीवन की कुप्रवृत्तियों पर नियन्त्रण रखने के लिए आवश्यक होने के कारण इसे एक ‘आवश्यक बुराई'  के रूप में स्वीकार करना होगा। 

क्योंकि राज्य के अस्तित्व की विवशता के कारण स्वीकार किया गया है, इसलिए व्यक्तिवादी चाहते हैं कि राज्य के कार्यक्षेत्र को अधिक-से-अधिक सीमित कर दिया जाय और व्यक्ति अपनी उन्नति के लिए अधिकाधिक कार्य स्वयं ही करें। 

राज्य के उचित एवं वैध कर्त्तव्य क्या हैं इस विषय पर सभी व्यक्तिवादी एकमत नहीं हैं। उग्र व्यक्तिवादी स्पेन्सर राज्य का कार्यक्षेत्र निम्नलिखित कार्यों तक सीमित करना चाहते हैं। 

  • बाहरी आक्रमण से रक्षा करें।
  • आन्तरिक क्षेत्र में शान्ति और व्यवस्था स्थापित करना । 
  • चोरी डकैती, आदि से सम्पत्ति की रक्षा करना। 
  • व्यक्तियों द्वारा किये गये वैध समझौतों को लागू करना।

किन्तु मिल और अन्य व्यक्तिवादी उपर्युक्तकार्यों में निम्न दो कार्य और सम्मिलित करना चाहते हैं

  • असहाय और असमर्थ व्यक्तियों की सहायता करना।
  • संक्रामक रोगों और आपदाओं से व्यक्तिकी रक्षा करना।

उपरोक्त मतभेद के होते हुए सभी व्यक्तिवादी इस बात को स्वीकार करते हैं कि राज्य के कार्यों में वृद्धि समाज या व्यक्ति किसी के हित में नहीं है। उनका विचार है कि राज्य के अनावश्यक हस्तक्षेप के अभाव में ही व्यक्ति का चरित्र गठन एवं उसके व्यक्तित्व का विकास सम्भव है। 

राज्य के कार्यों के सम्बन्ध में व्यक्तिवादी दृष्टिकोण को अभिव्यक्त करते हुए फ्रीमैन कहता है कि वही सरकार सबसे अच्छी है जो कम-से-कम शासन करती है और व्यक्ति को वे कार्य करने देती है, जो वे करना चाहते हैं।

एक अन्य व्यक्तिवादी हम्बोल्ट लिखता है कि, "राज्य को नागरिकों की उन्नति से अलग रहना चाहिए और उन कार्यों के अतिरिक्त अन्य कोई कार्य नहीं करना चाहिए जो नागरिकों की सुरक्षा और विदेशी शत्रु से रक्षा करने के लिए आवश्यक है। 

व्यक्तिवाद का समर्थन

व्यक्तिवाद व्यक्तिगत स्वतन्त्रता का सर्वोत्तम दर्शन है। व्यक्तिवादी विचारकों ने इस विचारधारा का समर्थन अनेक दृष्टिकोणों से किया है, जिनमें निम्न मुख्य है

1. नैतिक तर्क - इस तर्क का प्रतिपादन करने वालों में मिल का नाम उल्लेखनीय है। इस तर्क के अनुसार मनुष्य का वास्तविक लक्ष्य अपने चरित्र तथा शक्तियों का उच्चतम और सन्तुलित विकास करना है और इसके लिए आत्मविश्वास, आरम्भ और साहस की आवश्यकता होती है, जिन्हें व्यक्ति स्वातन्त्र्य के आधार पर ही प्राप्त किया जा सकता है। 

आत्मनिर्भरता और आरम्भ के इन गुणों के विकास के लिए राज्य को मानव जीवन में कम-से-कम हस्तक्षेप करना अपेक्षित है। नैतिक विकास व्यक्तिके जीवन का आन्तरिक पहलू है और व्यक्ति के जीवन की विभिन्न आन्तरिक प्रेरणाओं का विकास तभी सम्भव है। 

जब राज्य उसे निर्बाध स्वतन्त्रता और प्रतियोगिता का अधिकार प्रदान करे। मिल के शब्दों में, "अपनी इच्छानुसार कार्य करने से मनुष्य का चरित्र समुन्नत होता है और मानवता की प्रगति होती है-राज्य द्वारा किया गया कार्य व्यक्ति के आत्मविश्वास के भाव को समाप्त कर देता है। उसके उत्तरदायित्व को दुर्बल बनाता और चरित्र को कुण्ठित करता है।

2. आर्थिक तर्क - आर्थिक तर्क का प्रतिपादन प्रमुख रूप से क्वीन्से, एडम स्मिथ, माल्थस, रिकार्डो और फरग्यूसन, आदि अर्थशास्त्रियों द्वारा किया गया है। यह कहा गया है कि स्वतन्त्र प्रतियोगिता और निजी साहस  उत्पादन में वृद्धि करते हैं, कार्यकुशलता बढ़ाते हैं और अधिकतम आर्थिक कल्याण का विकास करते हैं। 

अतः आर्थिक क्षेत्र में राज्यों को अहस्तक्षेप की नीति का अनुसरण करना चाहिए। अनियन्त्रित प्रतियोगिता उत्पादकों को कम-से-कम मूल्य पर वस्तुओं का उत्पादन करने योग्य, उपभोक्ताओं को कम-से-कम भाव पर वस्तुएँ खरीदने योग्य और श्रमिकों को अधिकतम पारिश्रमिक कमाने योग्य बनाती है। 

एडम स्मिथ आर्थिक क्षेत्र में अहस्तक्षेप की नीति का महानतम् समर्थक था। उसका विचार था कि यदि व्यापार और उद्योग को निजी हाथों में छोड़ा जाय, तो इससे अधिकतम विकास हो सकता है। स्वतन्त्र प्रतियोगिता में मूल्य अपने आप सर्वोत्तम रीति से निर्धारित हो जाते हैं। 

अतः वेतन किराया, ब्याज और कीमतों को अनियन्त्रित रहने देना चाहिए, जिससे वे परिस्थितियों के अनुकूल अपने आपको ढाल सकें। विदेशी व्यापार पर भी नियन्त्रण नहीं होना चाहिए और राज्य का आर्थिक क्षेत्र में केवल इतना कार्य होना चाहिए कि वह छल और विश्वासघात से लोगों की रक्षा करे।

3. प्राणी-वैज्ञानिक तर्क - इस तर्क के प्रमुख प्रतिपादक हर्बर्ट स्पेन्सर हैं। स्पेन्सर के अनुसार प्रकृति के अन्तर्गत अनवरत रूप से 'जीवन संघर्ष' और 'योग्यतम की विजय' की प्रक्रिया जारी है और यह प्रक्रिया ऊपर से देखने पर निर्दयी प्रतीत होने पर भी सम्पूर्ण मानव सृष्टि के हित में है।

हुए वे कहते 'योग्यतम की विजय' के सिद्धान्त को मानव समाज पर लागू करते हैं कि विकास और प्रगति का स्वाभाविक मार्ग यह है कि दीन, दुर्बल, अयोग्य एवं अशक्त व्यक्तियों के जीवन का अन्त होता जाय, ताकि उनके जीवन पर किये जाने वाले साधनों का उपयोग समर्थ और योग्य व्यक्तियों द्वारा किया जा सके, जिससे सम्पूर्ण मानव जाति को लाभ पहुँचे। 

स्पेन्सर के शब्दों में यद्यपि ऊपर से देखने पर यह अत्यन्त अन्यायपूर्ण प्रतीत होता है कि विधवाओं और अनाथों को जीवन और मृत्यु के संघर्ष के लिए अकेला छोड़ दिया जाय, परन्तु सम्पूर्ण मानव जाति के कल्याण का विचार रखते हुए यह अत्यन्त लाभप्रद है।

यदि हमें एक योग्य, सुदृढ़ और सशक्त संतति का विकास करना है तो हमें मनुष्यों को उनके ही हाल पर छोड़ देना चाहिए, ताकि शक्तिशाली व्यक्तियों की उन्नति और अयोग्य व्यक्तियों की समाप्ति हो सके। समनर भी प्राणी - वैज्ञानिक तर्क का समर्थक हैं। 

हमारे सामने दो विकल्प हैं- प्रथम स्वतन्त्रता, असमता और योग्यतम का जीवित रहना तथा दूसरा अस्वतन्त्रता, समता और अयोग्य व्यक्तियों का जीवित रहना। प्रथम विकल्प से समाज आगे बढ़ता है और यह सभी श्रेष्ठ सदस्यों के पक्ष में है। दूसरा विकल्प समाज को गिराता है और केवल सबसे बुरे व्यक्तियों के पक्ष में है।

4. राज्य की अयोग्यता का तर्क-व्यक्तिवादियों का तर्क है कि राज्य आर्थिक, सामाजिक, आदि कार्यों को करने की न तो योग्यता रखता है और न ही सामर्थ्य राज्य कार्यों की सफलता राज्य कर्मचारियों पर निर्भर करती है और इन कर्मचारियों का राजकीय कार्यों में कोई निजी हित न होने के कारण वे उनकी सफलता में कोई विशेष रुचि नहीं लेते। 

एक ओर सरकारी उद्योगों व व्यवसायों का प्रबन्ध निजी उद्योगों के प्रबन्ध की अपेक्षा महँगा पड़ता है, दूसरी ओर सरकारी दायित्व भी निश्चित नहीं होता क्योंकि 'प्रत्येक व्यक्ति का कार्य किसी का कार्य नहीं होता है'और नौकरशाही की सभी बुराइयाँ आर्थिक क्षेत्र में प्रवेश कर जाती हैं। 

इस सम्बन्ध में जॉन स्टुअर्ट मिल ने कहा है कि, "राज्य को प्रत्येक अतिरिक्त कार्य सौंपने का अर्थ अतिशय भार से लदी हुई संस्था पर नया बोझ डालना है। इसका परिणाम यह होता है कि बहुत से कार्य अनुचित ढंग से किये जाते हैं और बहुत से कार्य इसलिए नहीं हो पाते कि सरकार देर किये बिना उन्हें कर ही नहीं सकती।"

5. मनोवैज्ञानिक तर्क - मनोवैज्ञानिक आधार पर यह कहा जाता है कि सम्पत्ति का स्वामी होना मानव स्वभाव की एक आधारभूत प्रवृत्ति है और इसके आधार पर व्यक्ति अधिक-से-अधिक उत्पादन करने और लाभ पाने का प्रयत्न करते हैं। 

वास्तव में मनुष्यों में प्रतिस्पर्द्धा समता के लिए नहीं, अपितु एक-दूसरे से आगे बढ़ने के लिए होती है और आधुनिक सभ्यता का विकास इस प्रतिस्पर्द्धा के आधार पर ही हुआ है । 

ऐसी स्थिति में यदि सरकार अपनी नीति द्वारा असमान क्षमता और परिश्रम वाले व्यक्तियों में धन का समान वितरण कर देगी, तो मनुष्यों में अधिक उत्पादन और लाभ की प्रेरक शक्ति समाप्त हो जायेगी।

जिससे समुदाय को आर्थिक और सामाजिक क्षेत्रों में स्वाभाविक नेताओं से वंचित होना पड़ेगा। परिश्रमी, मितव्ययी, सूझवान और आविष्कारक मनुष्य व्यक्तिवादी समाज का ही परिणाम हो सकते हैं।

6. अनुभव का तर्क - इतिहास मानव अनुभवों की खान है और इतिहास इस बात का साक्षी है कि आर्थिक एवं सामाजिक क्षेत्र में राज्य का हस्तक्षेप सदैव ही मूर्खतापूर्ण रहा है। जब कभी राज्य ने वस्तुओं के मूल्य, मजदूरी की दर और आयात- निर्यात पर रोक की चेष्टा की है, वह पूर्णतया असफल रहा है। 

नेपोलियन के पतन का मुख्य कारण फ्रांस व अन्य यूरोपियन देशों में ब्रिटिश माल के बहिष्कार का प्रयत्न था। भारत में अलाउद्दीन खिलजी और मुहम्मद तुगलक की आर्थिक नीति भी असफल रही है। अन्य भी अनेक उदाहरण दिये जा सकते हैं। 

बक्ल के अनुसार - राज्य के अधिकारी इस प्राचीन सिद्धान्त का आश्रय लेकर कि उनकी सहायता के बिना व्यापार तथा उद्योग-धन्धों की उन्नति नहीं हो सकती, बराबर गलती करते रहे हैं। वे समाज पर जुल्म लादते रहे हैं और व्यर्थ के प्रतिबन्धों द्वारा व्यापार की अवनति करते रहे हैं। इन अंकुशों के रहते हुए सभ्यता का विकास कैसे हो सकता था।

इस प्रकार व्यक्तिवादी कहते हैं कि अनुभव के आधार पर भी राज्यों को व्यक्तिगत जीवन में अनावश्यक हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

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