भारत में लोहे की प्राचीनता - Antiquity of Iron in India

 भारत में लोहे की प्राचीनता 

मानव जाति के इतिहास में दूसरी महत्वपूर्ण प्रगति लोहे की खोज और उसके उपयोग के कारण हुई। लोहा, ताँबे और काँसे से अधिक कठोर और सस्ता होता है। लोहा , ताँबे और काँसे की तुलना में अधिक मात्रा में है। लोहे की खोज से विभिन्न प्रकार के कृषि औजारों जैसे हल के फाल, हसियों, कुदालों आदि का निर्माण संभव हो पाया। 

लोहे से बनी कुल्हाड़ियों से पेड़ों को काटकर गिराना, जंगलों को साफ करना संभव हो गया। इस प्रकार खेती के लिए अधिक जमीन उपलब्ध हो गई। अन्य शिल्पों पर भी लोहे का महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा क्योंकि उसकी सहायता से विविध प्रकार के औजार और उपकरण बनने लगे जिनका उपयोग विशेष प्रकार के कार्यों के लिए होने लगा। 

खुदाई में लोहे से बनी कई प्रकार की वस्तुएँ पायी है। जिनमें हथौड़े, निहाई, चिमटें, कील, रूखानी, आरी और गोल रूखानी शामिल है। इनसे स्पष्ट है कि अनेक प्रकार के विशेष कौशल वाले कार्य किए जाते थे। लड़ाई में लोहे के हथियारों का उपयोग अधिक होने लगा था।

लोहे के उपयोग से कतिपय समुदाय 2000 ई.पू. के लगभग परिचित हो गए मगर 1400 ई.पू. के आसपास ही लोगों ने लोहे की गढाई का काम सीखा। लोहा बनाने की तकनीक के विकास का श्रेय हिटाइट्स लोगों को है जो एशिया माइनर (तुर्की) में रहते थे। 

घोड़ा पालने का श्रेय भी उन्हीं को है। लौह युग 1200 ई.पू. उस समय प्रारंभ हुआ जब फिलीस्तीन, सीरिया, तुर्की, ईराक, ईरान और यूनान में लोहे के और होने लगा जल्दी ही लोहे का उपयोग यूरोप के एक बड़े भाग में भी किया जाने लगा। आसपास का उपयोग

भारत में लौहयुग 1000 ई. पू. के आसपास प्रारंभ हुआ इस काल के बाद ही गंगा यमुना के दोआब के मैदानों में बस्तियाँ बनी। ऐसी धारणा है कि गंगा के मैदानों में लोहे के उपकरणों का प्रयोग घने जंगलों को साफ करने के लिए किया गया। भारत के आदि लौहयुग के जो भौतिक अवशेष पाए गए है उनसे संस्कृति के उच्चस्तर का संकेत नहीं मिलता फिर भी छठी शताब्दी ई.पू. में हम अनेक शहरी केन्द्र की स्थापना पाते हैं उनमें से आगे कुछ चलकर शक्तिशाली साम्राज्य बन गए।

लोहे की खोज और प्रयोग से सभ्यता के विकास से संसार के नये क्षेत्रों में उसके प्रसार में सहायता मिली।

सभ्यता के उदय का प्रभाव - लोहे की खोज और प्रयोगों से जो सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन आया वह था सभ्यता का प्रसार। यह इसलिए संभव हो पाया कि विश्व के अनेक क्षेत्रों में अब खेती की जा सकती थी। सभ्यताओं के प्रसार के साथ पहले की अपेक्षा अधिक संख्या में संसार के अनेक हिस्सों में नगरो का उदय हुआ शासक और उच्च वर्गों के लोग इन नगरों में रहते थे।  

वे स्थान उन अनेक शिल्पों के केन्द्र भी थे जिनका उदय सभ्यता के साथ हुआ सभ्यता के प्रसार के परिणाम स्वरूप विश्व के विभिन्न भागें के बीच व्यापार भी आरंभ हुआ और इस प्रकार एक पर बनी वस्तुओं का विनिमय दूसरी जगहों पर बनी वस्तुओं के साथ होने लगा। परिवहन के साधनों विशेषकर जहाजरानी में सुधार हुआ। 

व्यापार के विस्तार में एक और परिवर्तन हुआ, पहले व्यापार वस्तु विनिमय के आधार पर होता था। अब अनेक सभ्यताओं में मुद्रा का प्रचलन आरंभ हुआ। इससे खरीदी बिक्री पूर्व की अपेक्षा सरल हो गई। वस्तुओं का उत्पादन अब स्थानीय समुदाय के लिए न होकर बड़े बाजार के लिए हो गया जिससे व्यापार बढ़ा क्योंकि विभिन्न सभ्यताओं के मध्य आवश्यकताओं को पूर्ण करने के लिए यह आवश्यक था। युद्धों ने भी संस्कृति के विस्तार पर प्रभाव डाला, इस युग की सभी सभ्यताएँ लोगों के मिलने से विकसित हुई।

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