सीमेंट उद्योग क्या है - cement industry

Post Date : 04 August 2022

 सीमेंट उद्योग क्या है

उद्योग का विकास एवं वर्तमान स्थिति - सीमेंट उद्योग भारत का एक महत्वपूर्ण आधारभूत उद्योग है। प्राय: एक देश में सीमेंट का उत्पादन एवं उपभोग, उस देश के औद्योगिक विकास का सूचक होता है। सीमेंट को मानव निर्मित पत्थर कहा जाता है। यह शुष्क होने पर पत्थर की भाँति कठोर हो जाता है। इसे आवश्यकतानुसार विभिन्न आकृतियों में परिवर्तित किया जा सकता है। 

इसी गुण के कारण भवनों, बाँधों, कारखानों, सड़कों आदि में इसका प्रयोग तेजी से बढ़ रहा है। वर्तमान में चीन, जापान एवं अमरीका के पश्चात् भारत विश्व का चौथा बड़ा सीमेंट उत्पादक देश है।

भारत में सीमेंट का प्रथम कारखाना सन् 1904 में चेन्नई में साऊथ इण्डिया इण्डस्ट्रियल लिमिटेड द्वारा स्थापित किया गया था। प्रथम महायुद्ध के दौरान सीमेंट की माँग बढ़ जाने के कारण मध्य प्रदेश एवं राजस्थान में सीमेंट के कारखाने खोले गये। इसी के साथ सीमेंट का देश में आयात भी किया गया। सन् 1924 में देश में 10 सीमेंट कारखाने थे।  

जिनकी उत्पादन क्षमता 5.81 लाख टन थी। माँग की तुलना में पूर्ति अधिक हो जाने के कारण इन उद्योगों में कड़ी प्रतियोगिता होने लगी, अतः सन् 1963 में तत्कालीन चार सीमेंट उत्पादकों ने अपने 10 सीमेंट कारखानों का विलय करके एक नयी कम्पनी ‘ऐसोसिएटेड सीमेंट कम्पनी' (ACC) की स्थापना की। द्वितीय महायुद्ध में पुन: सीमेंट की माँग बढ़ गयी। 

स्वतंत्रता से पूर्व भारत में 23 सीमेंट कारखाने थे। देश विभाजन के फलस्वरूप इनमें से 5 कारखाने पाकिस्तान में चले गये। सन् 1949 में तीन तथा 1950 में दो नवीन कारखाने खोले गये। इस प्रकार देश में सन् 1950 में 23 सीमेंट के कारखाने थे, जिनकी उत्पादन क्षमता 23 लाख टन थी।

सीमेंट का उत्पादन 1950-51 में 27 लाख टन था। जो कि बढ़कर 1970-71 में 143 लाख टन तथा 2005-06 में 1,478 लाख टन हो गया। एक दशक पूर्व देश में सीमेंट की कमी थी। माँग को पूरा करने के लिए सीमेंट का आयात करना पड़ता था, लेकिन मार्च, 1989 में सीमेंट की कीमतों एवं वितरण से नियंत्रण हटा लेने तथा अन्य नीतियों में सुधार करने से सीमेंट उद्योग की उत्पादन क्षमता एवं उत्पादन दोनों में वृद्धि हो गयी है।.

मार्च 2006 तक देश में 130 बड़े कारखाने थे। जिनकी स्थापित क्षमता 1,634 लाख टन है। इसके अतिरिक्त लगभग 332 छोटे सीमेंट कारखाने हैं। जिनकी अनुमानित क्षमता 111 लाख टन है। इस प्रकार कुल प्रतिस्थापित क्षमता 1,745 लाख टन है। देश में कई किस्म का सीमेंट उत्पादित होता है।  

जैसे- सामान्य पोर्टलैण्ड सीमेंट (OPC), पोर्टलैण्ड पोजालाना सीमेंट (PPC), सफेद सीमेंट आदि। सीमेंट उद्योग न केवल घरेलू माँग को पूरा कर रहा है, बल्कि निर्यात भी कर रहा है। 199091 में 3.6 लाख टन सीमेंट निर्यात किया गया था, जो बढ़कर 2004-05 में 100.6 लाख टन हो गया ।

सीमेंट उद्योग का स्थानीयकरण 

सीमेंट उद्योग के स्थानीयकरण में निम्नलिखित तथ्य उल्लेखनीय हैं - 

1. सीमेंट उद्योग का मुख्य कच्चा पदार्थ लाईमस्टोन है। यह पदार्थ देश के विभिन्न भागों में पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है। इस दृष्टि से मध्य प्रदेश, बिहार तथा तमिलनाडु की स्थिति सर्वोत्तम है, लेकिन आन्ध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान आदि क्षेत्रों में भी कारखाने स्थापित हुए हैं।

2. कोयला सीमेंट उद्योग का दूसरा महत्वपूर्ण कच्चा पदार्थ है। सीमेंट के लिए उच्च श्रेणी के कोयले की आवश्यकता होती है। यह कोयला बिहार एवं पश्चिम बंगाल में पाया जाता है, अतः अधिकांश सीमेंट कारखाने इन क्षेत्रों से दूर रहे। अब इस उद्योग में विद्युत शक्ति का भी प्रयोग होने लगा है।

3. जिप्सम देश के अनेक भागों में मिलता है, लेकिन इसकी आवश्यकता सीमेंट के उत्पादन में कम पड़ती है, अतः जिप्सम की उपलब्धता इसके स्थानीयकरण को प्रभावित नहीं करती है ।

4. सीमेंट उद्योग भार खोने वाला उद्योग होने के कारण बाजार की उपलब्धता इसके स्थानीयकरण को प्रभावित नहीं करती है। 

सीमेंट उद्योग की समस्याएँ

सीमेंट उद्योग की प्रमुख समस्याएँ निम्नांकित हैं -

1. यातायात की समस्या - सीमेंट उद्योग एक भारी कच्चे पदार्थ वाला उद्योग होने के साथ-साथ भारी निर्मित पदार्थ उद्योग भी है, अतः इस उद्योग को पर्याप्त मात्रा में यातायात सुविधाएँ प्राप्त होना अत्यन्त आवश्यक है। लेकिन पह उद्योग यातायात संबंधी कठिनाइयों में उलझा रहता है, जिससे उपभोक्ता एवं उद्योग दोनों को ही कठिनाई का सामना करना पड़ता है।

2. कोयला क्षेत्रों से दूरी - भारत में सीमेंट के कारखाने स्थान-स्थान पर फैले हुए हैं, अतः जो कारखाने राजस्थान, गुजरात दक्षिण राज्यों में स्थित है, उन्हें पूर्वी राज्यों से कोयला मँगाना पड़ता है जिससे इन क्षेत्रों में स्थित सीमेंट कारखानों में उत्पादन लागत अधिक बैठती है।

3. क्षमता का अपूर्ण प्रयोग - एक सरकारी रिपोर्ट के अनुसार, विगत् कुछ वर्षों से बिजली, कोयला एवं माल के डिब्बों के आवागमन पर बाहरी दबाव के कारण सीमेंट के कारखाने अपनी पूर्ण क्षमता का प्रयोग नहीं कर पा रहे हैं। यही कारण है कि सीमेंट की माँग में निरंतर वृद्धि के बावजूद विभिन्न योजनाओं में सीमेंट के उत्पादन के निर्धारित लक्ष्य को प्राप्त नहीं किया जा सका है।

4. विनियोगों का अभाव - सीमेंट उद्योग एक पूँजीगत उद्योग होने के कारण इस उद्योग की स्थापना के लिए बहुत अधिक मात्रा में पूँजी की आवश्यकता होती है। चूँकि भारत में पूँजी का अभाव है। अतः सीमेंट उद्योग को पूँजी के अभाव की समस्या का सामना भी करना पड़ रहा है। 

5. आधुनिकीकरण की समस्या - देश की लगभग 35 सीमेंट मिलें 30 वर्षों से अधिक पुरानी हो चुकी हैं तथा अनेक इकाइयाँ सीमेंट उत्पादन के लिए Wet Process का प्रयोग कर रही हैं। जिसमें ऊर्जा का अधिक व्यय होता है। इन मिलों के आधुनिकीकरण, पुनर्स्थापन एवं तकनीकी सुधार की आवश्यकता है।

6. क्षेत्रीय असंतुलन - सीमेंट उद्योग की एक महत्वपूर्ण समस्या क्षेत्रीय असंतुलन की भी है, जिसके कारण सीमेंट की आपूर्ति पर भारी यातायात व्यय का भार भी पड़ता है।

7. मूल्य एवं लागत में संतुलन का अभाव - अन्य उद्योगों की भाँति सीमेंट उद्योग में भी उत्पादन लागत बढ़ रही है, लेकिन आवश्यक पदार्थ होने के कारण सरकार सीमेंट की कीमतों में अधिक वृद्धि नहीं होने देना चाहती, अतः लागतों में वृद्धि होने के कारण सीमेंट उत्पादकों के लाभ घटते जा रहे हैं, जिसके कारण उत्पादन वृद्धि के लिए उन्हें कोई प्रोत्साहन प्राप्त नहीं हो पा रहा है।

सीमेंट उद्योग की समस्याओं के समाधान हेतु सुझाव

सीमेंट उद्योग की समस्याओं के समाधान हेतु निम्नांकित सुझाव दिये जा सकते हैं -

1. यातायात की सुविधाएँ - सीमेंट उद्योग को यातायात की सुविधाएँ उपलब्ध कराने के लिए भारतीय रेलवे द्वारा पर्याप्त कदम उठाये जाने चाहिए, क्योंकि यदि रेलमार्ग के अतिरिक्त अन्य मार्गों का प्रयोग किया जाता है तो यातायात व्यय बहुत अधिक आता है ।

2. क्षमता का पूर्ण प्रयोग - सरकार द्वारा सीमेंट उद्योगों को अपनी पूर्ण क्षमता का उपयोग करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। इसके लिए सीमेंट कारखानों को बिजली, कोयला एवं परिवहन संबंधी सुविधाएँ समय पर उपलब्ध करवाने की व्यवस्था की जानी चाहिए।

3. मूल्य वृद्धि - सरकार द्वारा सीमेंट उत्पादकों को लागत के अनुपात में सीमेंट के मूल्यों में वृद्धि करने की छूट प्रदान की जानी चाहिए। इससे उद्योग को लागत बढ़ने के साथ-साथ मूल्य वृद्धि की अनुमति स्वतः ही प्राप्त हो जायेगी।

 4. विकास प्रोत्साहन - सीमेंट के उत्पादक में वृद्धि करने एवं इसके मूल्यों पर नियंत्रण रखने वाले प्रत्येक कारखाने को अतिरिक्त उत्पादन पर कुछ सहायता का प्रावधान होना चाहिए। इससे उत्पादन में वृद्धि को प्रोत्साहन मिलेगा तथा मूल्य भी नियंत्रण में रह सकेंगे।

5. आधुनिकीकरण के लिए सुविधाएँ - सीमेंट उद्योग में लागतों को घटाने तथा उत्पादकता एवं लाभदायकता में वृद्धि करने के लिए इसका आधुनिकीकरण किया जाना आवश्यक है। अतः सीमेंट उद्योग के आधुनिकीकरण से संबंधित सुविधाओं की व्यवस्था की जानी चाहिए तथा आधुनिकीकरण पर व्यय की गई राशि को कर मुक्त घोषित कर देना चाहिए। 

6. वित्तीय सुविधाएँ - सीमेंट उद्योग में पूँजी के अभाव को दूर करने के लिए सरकार एवं विशिष्ट वित्तीय संस्थाओं द्वारा नीची ब्याज दरों पर दीर्घकालीन पूँजी उपलब्ध करवायी जानी चाहिए।

7. क्षेत्रीय संतुलन - सरकार द्वारा सीमेंट उद्योग के संतुलित विकास को ध्यान में रखा जाना चाहिए। इसके लिए यह आवश्यक है कि उत्तरी एवं पूर्वी क्षेत्रों में स्थापित कारखानों को अनुदान व क्षतिपूर्ति राशि दी जाय। 

8. अनुसंधान कार्य को बढ़ावा - सीमेंट के उत्पादन के अनुसंधान कार्यों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। सीमेंट उत्पादन की उचित तकनीक के विकास द्वारा इसकी उत्पादन लागत को कम किया जा सकता है।