राष्ट्रीय आय की अवधारणा को समझाइए - Explain the concept of national income

 राष्ट्रीय आय की अवधारणा को समझाइए

राष्ट्रीय आय लेखांकन की कुछ आधारभूत अवधारणाएँ निम्नांकित हैं -

1. चालू कीमतों तथा स्थिर कीमतों पर राष्ट्रीय आय 

राष्ट्रीय आय की गणना दो कीमतों पर जाती हैं। 

1. चालू कीमतों पर राष्ट्रीय आय - जब किसी देश में राष्ट्रीय आय की गणना उस वर्ष बाजार में प्रचलित कीमतों के आधार पर देश में उत्पादित अंतिम वस्तुओं एवं सेवाओं के मूल्यों के योग के आधार पर की जाती है तो उसे चालू कीमतों पर राष्ट्रीय आय कहा जाता है। 

जैसे, यदि भारत की राष्ट्रीय आय की गणना वर्ष 2007-08 में बाजार में प्रचलित कीमतों पर देश में उत्पादित अंतिम वस्तुओं एवं सेवाओं के योग के आधार की जाती है तो यह वर्ष 2007-08 में भारत की चालू या प्रचलित कीमतों पर राष्ट्रीय आय कहलायेगी।

2. स्थिर कीमतों पर राष्ट्रीय आय - जब किसी देश में एक वर्ष में उत्पादित सभी अंतिम वस्तुओं एवं सेवाओं का मूल्य किसी आधार वर्ष की कीमत के अनुसार आँका जाता है, तो उसे स्थिर कीमतों पर राष्ट्रीय आय कहते हैं। अर्थव्यवस्था की वास्तविक आर्थिक वृद्धि को जानने के लिए अर्थव्यवस्था में उत्पादित अंतिम वस्तुओं एवं सेवाओं का मूल्य किसी आधार वर्ष की कीमत के आधार पर ज्ञात किया जाता है। 

इससे राष्ट्रीय आय से सम्बन्धित आँकड़ों की तुलना विश्वसनीय बन जाती है। इसीलिए दुनिया के समस्त देशों में एक आधार वर्ष का चुनाव किया जाता है। इसी आधार वर्ष के मूल्यों के आधार पर सभी वर्षों में उत्पादित वस्तुओं एवं सेवाओं के मूल्यों की गणना करके राष्ट्रीय आय ज्ञात की जाती है। राष्ट्रीय आय की गणना दुनिया के लगभग सभी देशों में चालू कीमतों तथा स्थिर कीमतों पर की जाती है। 

भारत में राष्ट्रीय आय की गणना वर्ष 1949–50, 1960–61, 1970–71 एवं 1980-81 कीमतों को आधार वर्ष मानकर की गयी और अब राष्ट्रीय आय की नई शृंखला के अन्तर्गत 1993-94 को आधार वर्ष मानकर राष्ट्रीय आय की गणना की जा रही है। भारत में राष्ट्रीय आय से सम्बन्धित आँकड़े चालू कीमतों एवं स्थिर कीमतों दोनों के आधार पर संकलित किये जाते हैं।

2. एक देश की घरेलू सीमा 

राष्ट्रीय आय लेखांकन में एक देश की घरेलू सीमा का विशेष महत्व होता है। सामान्यतया, एक देश की राजनैतिक सीमाओं में स्थित भौगोलिक क्षेत्र को घरेलू सीमा कहा जाता है। लेकिन राष्ट्रीय आय लेखांकन में इसका विस्तृत अर्थ होता है। एक देश की घरेलू सीमा में निम्नांकित तथ्यों को शामिल किया जाता है। 

  • एक देश की राजनैतिक सीमाओं के अन्तर्गत स्थित भौगोलिक क्षेत्र जिसमें समुद्री क्षेत्र भी सम्मिलित है। 
  • एक देश के निवासियों द्वारा दो या दो से अधिक देशों के बीच चलाये जाने वाले जलयान तथा वायुयान । 
  • मछली पकड़ने वाली नौकाएँ, तेल एवं प्राकृतिक गैस यान, तैरते प्लेट फार्म तथा जल सीमाओं के अर्न्तगत दोहन कार्य ।
  • एक देश के विदेशों में स्थित दूतावास, सैनिक प्रतिष्ठान तथा वाणिज्य दूतावास भी उस देश की घरेलू सीमा में आते हैं। अण्टार्टिका में स्थित भारतीय प्रतिष्ठान भी भारत की घरेलू सीमा में शामिल हैं।

3. देश के सामान्य निवासी 

राष्ट्रीय आय लेखांकन के अन्तर्गत एक देश के सामान्य निवासी की अवधारणा भी महत्वपूर्ण है। एक देश के सामान्य निवासी से अभिप्राय ऐसे व्यक्ति से होता है, जो सामान्यतः एक देश में निवास करता है तथा उसके हित उस देश से सम्बन्धित होते हैं, इसलिए इसे सामान्य निवासी कहते हैं। 

सामान्य निवासी में एक देश की नागरिकता रखने वाले निवासी के साथ ऐसे भी व्यक्ति शामिल होते हैं जिनके पास उस देश का पासपोर्ट है।चाहे उनके पास उस देश की नागरिकता न हो। इस प्रकार, सामान्य निवासी में एक देश की घरेलू सीमाओं में रहने वाले नागरिकों एवं गैर-नागरिकों को शामिल किया जाता है। एक देश के सामान्य निवासी' में निम्न व्यक्तियों को शामिल नहीं किया जाता है - 

  • विदेशी नागरिक जो एक देश में पर्यटन, गोष्ठी अथवा इलाज के लिए आते हैं। 
  • विदेशी जहाजों के सदस्य, व्यावसायिक यात्री तथा मौसमी श्रमिक,
  • अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों, जैसे- विश्व बैंक, अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय आदि में कार्यरत विदेशी नागरिक । लेकिन ऐसे कर्मचारियों की वहाँ निवास की अवधि एक वर्ष से कम होनी चाहिए।
  • विदेशी नागरिक जो कि गैर-निवासी उद्यमों में कार्यरत हैं और मशीन लगाने अथवा संयंत्र खरीदने देश में आये हैं, 
  • विदेशों के राजदूत, प्रशासनिक अधिकारी, सैन्य बल के सदस्य । 

4. स्टॉक एवं प्रवाह 

है राष्ट्रीय आय लेखांकन में स्टॉक एवं प्रवाह की अवधारणा का भी महत्वपूर्ण स्थान है। स्टॉक वह मात्रा है, जिसे किसी समय विशेष पर मापा जाता है, लेकिन दोनों धारणाओं के अन्तर्गत मापी गयी मात्रा में 'समय तत्व' अलग-अलग होता है। किसी निश्चित तिथि पर व्यक्ति के पास जो कुछ है अथवा किसी स्थान पर किसी एक व्यक्ति के पास जो कुछ पड़ा है, वह 'स्टॉक' कहलाता है। 

स्टॉक का कोई 'समयकाल नहीं होता है। लेकिन जब हम प्रवाह की बात करते हैं तो इसका सम्बन्ध एक 'समय काल' से होता है। स्टॉक के उदाहरण हैं, जैसे- व्यक्ति की सम्पत्ति, जनसंख्या, पूँजी, देश में मुद्रा-पूर्ति, ऋण, पेड़, तालाब का पानी, मशीनों की संख्या, दूरी, राष्ट्रीय सम्पत्ति, कारों की संख्या, मुद्रा की मात्रा इत्यादि। वहीं प्रवाह के उदाहरण हैं। 

जैसे - व्यक्ति की आय, प्रतिवर्ष जन्मे बच्चों की संख्या, पूँजी निर्माण, देश में मुद्रा पूर्ति में परिवर्तन, ब्याज, फल, नदी का पानी, घिसावट, गति, राष्ट्रीय आय, कारों का उत्पादन, मुद्रा का व्यय इत्यादि । -

5. बन्द एवं खुली अर्थव्यवस्था 

1. बन्द अर्थव्यवस्था - जब किसी देश का अन्य दूसरे देशों से कोई आर्थिक सम्बन्ध नहीं होता है, तो उसे बन्द अर्थव्यवस्था कहते हैं। ऐसी अर्थव्यवस्था का विश्व की अन्य अर्थव्यवस्थाओं से कोई सम्बन्ध नहीं रहता है। 

ऐसी स्थिति में बन्द अर्थव्यवस्था वाले देश के सामने न तो आयातों के भुगतान की समस्या होती है और न ही निर्यातों से प्राप्त होने वाली आय की समस्या होती है। ऐसी अवस्था में विदेशों से ऋण न तो लिया जाता है और न ही दिया जाता है।

बन्द अर्थव्यवस्था में उपभोग तथा उत्पादन दोनों ही घरेलू सीमाओं के भीतर होता है। एक वर्ष की अवधि में जितनी मात्रा में उपभोग वस्तुओं की आवश्यकता पड़ती है। उतनी ही वस्तुएँ उत्पादित की जाती हैं। इस अर्थव्यवस्था में पूँजीनिर्माण एवं विनियोग के लिए बहुत कम वस्तुएँ बचती हैं, जिससे अर्थव्यवस्था सदैव गरीबी के कुचक्र में फँसी रहती हैं। बन्द अर्थव्यवस्था का सकल घरेलू उत्पाद, सकल राष्ट्रीय उत्पाद के बराबर होता है।

2. खुली अर्थव्यवस्था - जब किसी भी देश का अन्य देशों से आर्थिक सम्बन्ध स्थापित हो जाता है, तो उसे खुली अर्थव्यवस्था कहा जाता है। खुली अर्थव्यवस्था वाले देशों में दूसरे देशों से वस्तुओं एवं सेवाओं का आयात किया जाता है। इसी प्रकार, दूसरे देशों को वस्तुओं तथा सेवाओं का निर्यात किया जाता है। किसी भी देश के उपभोग, उत्पादन तथा पूँजीनिर्माण पर अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक सम्बन्धों का गहरा प्रभाव पड़ता है।

एक खुली अर्थव्यवस्था के अन्तर्गत सकल घरेलू उत्पाद एवं सकल राष्ट्रीय उत्पाद में अन्तर होता है। यदि किसी देश का निर्यात उसके आयातों से अधिक है, तो उसकी राष्ट्रीय आय उसके घरेलू उत्पाद से अधिक होगी। इसी प्रकार, निर्यात उसके आयातों से कम है तो उस देश की राष्ट्रीय आय उसके घरेलू उत्पाद से कम होगी।

6. राष्ट्रीय पूँजी

राष्ट्रीय पूँजी से अभिप्राय, उन सभी वस्तुओं से है, जो किसी देश की रचना से लेकर अद्योपर्यन्त तक उत्पादित की गई हं, लेकिन जो न तो उपभोग की गयी हो और न ही नष्ट हुई हो, अर्थात "राष्ट्रीय पूँजी से तात्पर्य, वस्तुओं के स्टॉक से है। जिसमें व्यक्तिगत पूँजी, सार्वजनिक पूँजी तथा स्टॉक शामिल हैं। व्यक्तिगत पूँजी से तात्पर्य, उस पूँजी से है जो विभिन्न फर्मों, नागरिकों के स्वामित्व में है तथा जिनका प्रयोग उत्पादन के कार्यों में किया जाता है। 

जैसे - भवन, मशीन, उपकरण, तैयार एवं मध्यवर्ती वस्तुएँ, कच्चामाल आदि। इसी प्रकार, सार्वजनिक पूँजी का आशय, उस पूँजी से है जिस पर सरकार या समाज का सामूहिक स्वामित्व होता है, जैसे- वन, नदी, खान, रेल आदि।

राष्ट्रीय पूँजी के घटक - राष्ट्रीय पूँजी के प्रमुख घटक निम्नांकित हैं -

1. भवन तथा इमारतें - राष्ट्रीय पूँजी के अन्तर्गत निजी आवास गृहों, व्यावसायिक भवनों एवं सरकारी इमारतें व भवन शामिल किये जाते हैं। भवन तथा इमारतें अत्यधिक महत्वपूर्ण सेवाएँ करती हैं। इसलिए इनका आरोपित किराया राष्ट्रीय पूँजी में शामिल किया जाता है 

2. उपकरण - राष्ट्रीय पूँजी के अन्तर्गत टिकाऊ उत्पादक वस्तुएँ, जैसे- मशीन, औजार, फैक्टरी आदि, टिकाऊ उपभोक्ता वस्तुएँ, जैसे- रेडियो, टी. वी. आदि तथा सार्वजनिक सम्पत्ति जैसे- राष्ट्रीय रेलवे, राजमार्ग, सड़क, पुल, बाँध आदि को शामिल किया जाता है।

3. स्वर्ण एवं चाँदी के भण्डार - राष्ट्रीय पूँजी के अन्तर्गत देश के ऐसे स्वर्ण एवं चाँदी के स्टॉक को शामिल किया जाता है जिसका प्रयोग विदेशी सौदों को सुलझाने में किया जाता है। 

4. सभी प्रकार की वस्तुएँ - विभिन्न उत्पादकों एवं विक्रेताओं के पास उत्पादन तथा विक्रय हेतु जो कच्चामाल, अर्द्ध-निर्मित माल, निर्मित माल आदि जो स्टॉक में है, वह सभी राष्ट्रीय पूँजी का भाग होता है।

5. शुद्ध विदेशी सम्पत्तियाँ - शुद्ध विदेशी सम्पत्तियों से आय का सृजन होता है, इसलिए यह भी राष्ट्रीय पूँजी का घटक होती है। हमारे देश के निवासी दूसरे देशों में कुछ विनियोग करते हैं तथा विदेशी व्यक्ति कुछ विनियोग हमारे देश में करते हैं, अतः देशवासियों की विनियोग राशि में से विदेशियों के विनियोग को घटाने के बाद जो शेष बचता है, उसे शुद्ध विदेशी सम्पत्तियाँ कहते हैं ।

7.  राष्ट्रीय सम्पत्ति 

एक दिये गये समय पर एक देश में सभी भौतिक वस्तुओं का योग उस राष्ट्र की सम्पत्ति कहलाती है । इस प्रकार, एक देश की भूमि तथा उसकी उर्वरता, खनिज संसाधन, फैक्ट्रियाँ, मशीनें, वस्तुओं का स्टॉक, भवन, निवासियों की व्यक्तिगत प्रतिभाएँ आदि सभी राष्ट्रीय सम्पत्ति में शामिल होते हैं। 

राष्ट्रीय सम्पत्ति की गणना करते समय विदेशियों के पास देश की कम्पनियों के बॉण्ड तथा बाह्य ऋणों को घटा दिया जाता है तथा देशवासियों के पास विदेशी कम्पनियों के अंश या बॉण्ड की राशि को जोड़ दिया जाता है। देश के अन्दर व्यक्तियों के आपसी दायित्वों को राष्ट्रीय सम्पत्ति में शामिल नहीं किया जाता है, क्योंकि इससे दोहरी गणना की संभावना बन जाती है। 

इस प्रकार, देश में कम्पनियों के अंश या ऋणपत्र आदि राष्ट्रीय सम्पत्ति में शामिल नहीं होते हैं। बल्कि यह व्यक्तिगत सम्पत्ति होती है।

किसी वस्तु में सम्पत्ति कहलाने के लिये निम्नांकित विशेषताएँ होनी चाहिए -

  • वस्तु में उपयोगिता होनी चाहिए अर्थात् वस्तु में मानवीय आवश्यकताओं को संतुष्ट करने की क्षमता होनी चाहिए। 
  • वस्तु में सीमितता का गुण होना चाहिए अर्थात् वस्तु की पूर्ति, वस्तु की माँग से कम होनी चाहिए। 
  • वस्तु का मूल्य होना चाहिए अर्थात् वस्तु को एक निश्चित कीमत पर सुगमता से विनिमय किया जा सके। 
  • वस्तु में हस्तांतरण का गुण होना चाहिए अर्थात् वस्तु को सुगमता से एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति अथवा एक स्थान से दूसरे स्थान पर हस्तांतरित किया जा सके।

उपर्युक्त विशेषताओं के आधार पर कहा जा सकता है कि जिन वस्तुओं में विनिमय मूल्य होता है, वह सम्पत्ति कहलाती है।

राष्ट्रीय सम्पत्ति के अंग - राष्ट्रीय सम्पत्ति के प्रमुख अंग निम्नलिखित हैं

1. प्राकृतिक संसाधन - प्रकृति द्वारा प्रदान किये गये सभी निःशुल्क साधनों को राष्ट्रीय सम्पत्ति में रखा जाता है। भूमि, वन, जल, उर्वरता, पर्वत, पशु आदि सभी प्राकृतिक संसाधन राष्ट्रीय सम्पत्ति में शामिल होते हैं। प्राकृतिक संसाधनों के लिए राष्ट्र को कोई भी भुगतान नहीं करना पड़ता है।

2. श्रम शक्ति - एक देश में मानव संसाधन (जनसंख्या) बहुत महत्वपूर्ण होता है। स्वस्थ एवं कुशल जनसंख्या देश की राष्ट्रीय सम्पत्ति का प्रमुख अंग है। श्रम उत्पादन का सर्वाधिक महत्वपूर्ण साधन होने के कारण इसे राष्ट्रीय सम्पत्ति में रखा जाता है।

3. सार्वजनिक भौतिक परिसम्पत्ति - राष्ट्रीय सम्पत्ति में सभी प्रकार की सार्वजनिक भौतिक परिसम्पत्तियों, जैसेसड़कें, नहरें, भवन आदि को शामिल किया जाता है।

4. स्थिर पूँजी - एक देश में मशीनें, उपकरण, परिवहन के साधन, संचार, विद्युत आदि उत्पादन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिये इन आधारभूत संरचनाओं में लगी पूँजी को राष्ट्रीय सम्पत्ति का अंग माना जाता है। 

5. स्टॉक - स्टोरों में रखा तैयार माल, कच्चामाल, अर्धनिर्मित माल आदि के स्टॉक को भी राष्ट्रीय सम्पत्ति में शामिल किया जाता है।

8. आय सृजन की प्रक्रिया

किसी भी देश में आय का सृजन उत्पादन प्रक्रिया के दौरान ही होता है। उत्पादन वास्तव में उत्पत्ति के साधनों का सामूहिक परिणाम होता है। उत्पादित वस्तु के मौद्रिक मूल्य को विभिन्न साधनों में वितरित कर दिया जाता है। 

जैसे भूस्वामी को लगान, श्रमिक को मजदूरी, पूँजीपति को ब्याज, साहसी को लाभ तथा संगठनकर्ता को वेतन के रूप में पारिश्रमिक प्राप्त होता है। मुद्रा के अभाव में यही पुरस्कार वस्तुओं एवं सेवाओं के रूप में दिया जाता था।

चूँकि आधुनिक अर्थव्यवस्था में मुद्रा का प्रादुर्भाव हो चुका है। अतः उत्पादन कार्य बड़े पैमाने पर किया जा रहा है। उत्पादन के प्रत्येक क्षेत्र में श्रम विभाजन एवं विशिष्टीकरण लागू हो गया है। इससे उत्पत्ति के विभिन्न साधनों के बीच पारिश्रमिक का वितरण करना सरल हो गया है। मुद्रा के आविष्कार से प्रत्येक साधन को उनकी सेवाओं की आय उत्पत्ति के विभिन्न साधनों के बीच बाँट दी जाती है। 

इस प्रकार, जब एक उत्पादनकर्ता अपने द्वारा उत्पादित वस्तुओं व सेवाओं के बदले मुद्रा प्राप्त करता है, तो उस उत्पादनकर्ता के द्वारा आय का सृजन होता है। इस प्रकार, अर्थव्यवस्था के अन्तर्गत मुद्रा का यह प्रवाह निरंतर चलता रहता है। इस प्रवाह में परिवार एवं सरकार भी शामिल होते हैं। प्रो. लिट्से के अनुसार का चक्रीय प्रवाह घरेलू फर्मों एवं घरेलू परिवारों के बीच भुगतानों और प्राप्तियों का प्रवाह होता है। 

चूँकि आधुनिक अर्थव्यवस्था में मुद्रा का प्रादुर्भाव हो चुका है, अतः उत्पादन कार्य बड़े पैमाने पर किया जा रहा है। उत्पादन के प्रत्येक क्षेत्र में श्रम विभाजन एवं विशिष्टीकरण लागू हो गया है। इससे उत्पत्ति के विभिन्न साधनों के बीच पारिश्रमिक का वितरण करना सरल हो गया है। 

मुद्रा के आविष्कार से प्रत्येक साधन को उनकी सेवाओं की आय उत्पत्ति के विभिन्न साधनों के बीच बाँट दी जाती है। इस प्रकार, जब एक उत्पादनकर्ता अपने द्वारा उत्पादित वस्तुओं व सेवाओं के बदले मुद्रा प्राप्त करता है, तो उस उत्पादनकर्ता के द्वारा आय का सृजन होता है। 

इस प्रकार, अर्थव्यवस्था के अन्तर्गत मुद्रा का यह प्रवाह निरंतर चलता रहता है। इस प्रवाह में परिवार एवं सरकार भी शामिल होते हैं। प्रो. लिट्से के अनुसार - आय का चक्रीय प्रवाह घरेलू फर्मों एवं घरेलू परिवारों के बीच भुगतानों और प्राप्तियों का प्रवाह होता है। 

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