जापान का इतिहास - history of japan

जापान का इतिहास

एशिया के इतिहास में जापान की एकता का राष्ट्रीय महत्व है। यूरोप की विशाल साम्राज्यवादी शक्तियों के चंगुल से जापान बचा रहा। जापान एशिया का ऐसा छोटा देश है जिसने आधुनिक औद्योगिकरण का मार्ग अपनाया। 

जापान सैकड़ों छोटे द्वीपों से बना हैं, जिनमें चार प्रमुख है - होंशू, क्यूशू शिकोकू और होक्काइड़ों। जापानी द्वीपों और एशिया की भूमि के मध्य भाग लगभग 150 किलोमीटर का अंतर है। इस अन्तर ने जापान और पड़ोसी देशों के बीच के संपर्कों में तो बाधा नहीं डाली, लेकिन इसके कारण जापानी लोग लंबी अवधियों तक अपने को शेष दुनिया से अलग रख पाए।

सातवीं सदी तक जापान का एकीकरण हो चुका था। आठवीं शताब्दी में नारा नगर को राजधानी बनाया गया। नारा, जापान की सभ्यता और संस्कृति की केन्द्र बनी रही। फिर नारा से क्योंटो नगर को राजधानी बनाया गया। आगामी एक हजार वर्षों तक जापानी साम्राज्य की राजधानी क्योटो रही। जापान की वास्तविक सत्ता एक कुलीन परिवार के हाथों रही। 

12वीं सदी के अंतिम वर्षो में शोगुन नामक राजनैतिक सत्ता अस्तित्व में आई। जापान में शोगुन पद्धति से शासन प्रबन्ध चलने लगे। शोगुन जापानी सेना के सेनाध्यक्ष थे। शोगुन का पद पैतृक हो गया था। 1867 ई. में जापानी सम्राट के स्थान पर वास्तविक शासक शोगुन थे।

जापान का इतिहास - history of japan

17वीं शताब्दी के आरम्भ में तोकुगावा इयासू शोगुन बना। वह तोकुगावा राजवंश का संस्थापक था। 1967 ई. में अंतिम शोगुन को अपदस्थ कर पुनः सम्राट को गद्दी पर बिठाया गया, तब आधुनिकीकरण ने जापान को यूरोपीय देशों की श्रेणी में पहुँचा दिया था। जापान ने उद्योग, व्यापार, राजनीति, सामाजिक तथा सांस्कृतिक क्षेत्र में अद्भूत वृद्धि हुई। ताँबे के सिक्के चलाए गए। 

जापान सोना, चाँदी ताम्र, अयस्क का निर्यातक था। शोगुनों ने विदेशी व्यापार पर रोक लगा दी। किसी भी व्यक्ति को जापान से बाहर जाने की इजाजत नहीं थी। अतः जापान इस दौरान शेष दुनिया से अलग रहा।

जापान का सामाजि जीवन- तोकुगावा शोगुनों ने समाज को वर्ग व्यवस्था में विभाजित कर रखा था।

पहला वर्ग- समुराई अर्थात् योद्धा का था इन्हें समाज में विशेषाधिकार प्राप्त थे। जापान में एक कठोर शासन था। 

दूसरा स्थान - कृषकों को था जो कर के बोझ से दबा हुआ था। सरदारों की बेगारी, उनका उत्पीड़न भी उसे ही सहना पड़ता था। 

तीसरा स्थान- दस्तकारों और कारीगरों का था। चौथा वर्ग- व्यापारियों का था। उद्योग और व्यापार में वृद्धि के कारण समाज में इनका स्थान ऊँर्चा हुआ। सबसे नीचे अछूत थे। यहाँ मुख्य भोजन मछली है।

मध्ययुगीन संस्कृति, साहित्य और धर्म - जापानी लिपि पर चीनी लिपि का स्पष्ट प्रभाव दृष्टिगोचर होता है। दोनों भाषाओं में अंतर है। जापानियों ने इस लिपि को 400 ई. के आसपास अपनाया था, इसमें हर्वान संकेतों को जोड़ा गया।

साहित्य- चीनी साहित्य से जापानी साहित्य प्रभावित था। कविताओं के लेखन के साथ-साथ जापानी साहित्य का विकास हुआ। उच्च परिवार की महिलाओं ने काव्य और उपन्यास लिखे। जिन्हें जापान में प्रसिद्धि मिली। 

हैंकू नामक काव्य शैली जापानी साहित्य की विशिष्ट उपलब्धि है। काबूकी नामक नाट्य शैली का भी विकास हुआ। जिसने अनेक देशों की आधुनिक नाट्य कला को प्रभावित किया। 

जापानी कलाकार वास्तुकला, चित्रकला, संगीत, नृत्य और मिट्टी के पात्र, वस्त्र, लाख की वस्तुएँ बनाने में कुशल कारीगर थे। फूलों को सजाने की विशेष कला का विकास हुआ था जिसे इकेबाना थानी कला कहते हैं। इस कला को विश्व ख्याति प्राप्त है।

धर्म की स्थिति- जापान के प्राचीन धर्म को शिंतों कहते हैं। छठी सदी में बौद्ध धर्म जापान में खूब फला-फूला। बौद्ध धर्म ने शिंतों के प्रभाव कोकाफी कम कर दिया और जापानी संस्कृति के विकास में बौद्ध धर्म में विशेष भूमिका निभाई। 

जापानी भिक्षु और विद्वान बौद्ध ग्रंथों के गहन अध्ययन करने के लिए चीन भी गए । जापानी कला मूर्तियों तथा मंदिरों के निर्माण में बौद्ध धर्म की गहरी छाप है। 16वीं सदी में ईसाई धर्म जापान पहुॅचा और जापानी इसके अनुयायी बने । 17वीं सदी में तोकूगाना वंश के शासकों ने ईसाई धर्म पर प्रतिबंध लगा दिया।

Search this blog