सिन्धु घाटी सभ्यता की विशेषता - Indus Valley Civilization

 सिन्धु घाटी सभ्यता की विशेषता

करीब 2500 ई.पू. के आसपास भूमध्य सागर और एशियन सागर के आसपास के इलाके सिंधुघाटी, चीन में हवांग-हो-घाटी, इराक, मेसोपोटामिया में दजला और फरात की घाटी और मिस्र में नील नदी सभ्यता के केन्द्र के रूप में सामने आई। इनमें से चार सभ्यताओं का वर्णन इस अध्याय में किया गया है। इन सभ्यताओं की कुछ समान विशेषताएँ थी यद्यपि इनमें से हरेक का अपना एक विशिष्ट चरित्र और उनका मानव प्रगति में अपना विशिष्ट योगदान रहा।

प्रत्येक सभ्यता में एक संगठित राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था, वाणिज्य और व्यवसाय, जटिल धार्मिक धारणाएँ, लेखन पद्धतियाँ, कला और विज्ञान तथा गणित का विकास हुआ।

कृषि में सुधार - हर सभ्यता में किसानों को अपनी जरूरत से ज्यादा अनाज उत्पन्न करना होता है। हल तथा सिंचाई का प्रयोग आरंभ करने के बाद ही बड़े पैमाने पर उत्पादन संभव हो सका। लकड़ी का हल उपयोग करने से पहले की अपेक्षा काफी अधिक जमीन में खेती की जा सकी। आरंभ में हल को आदमी खींचता था मगर बाद में उसे पशु खींचने लगा।

सिंचाई की आवश्यकताओं के कारण भी सभ्यता के विकास में मदद मिली। नदियों के किनारे की जमीन से जंगल काटकर खेती के लायक बनाया गया। दलदलों का पानी निकालने के लिए नालियाँ खोदी गई। बाढ़ों से बस्तियों को बचाने के लिए बाँध बनाए गए। खेतों को नियमित रूप से जरूरत के अनुसार पानी मिलता रहे, इसलिए बहुत-सी नहरें बनाई गई इन सब कार्यों के लिए बड़े पैमाने पर सहकारी प्रयत्नों की आवश्यकता हुई। 

एक छोटा गाँव ऐसा नहीं कर सकता था। इन सारी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए बहुत से समुदायों ने साथ मिलकर एक ऐसी शक्तिशाली केन्द्रीय सत्ता का अधिपत्य स्वीकार किया जो सबसे अपना अधिपत्य स्वीकार करा सकती थी। इस प्रकार सिंचाई की आवश्यकता ने बहुत से लोगों को मिलकर नगर में स्थित एक केन्द्रीय सत्ता अथवा सरकार का अधिपत्य स्वीकार करने में सहायता की। 

जब अन्न का उत्पादन अधिक होने लगा तब बहुत से मनुष्य अपनी आवश्यकता के लिए अन्न उत्पादन के कार्य से मुक्त हो गए। ये लोग शहरों में जाकर रहने लगे और विभिन्न शिल्पों में कुशल हो गए।

नगर, व्यापार और शासन का उदय - जब नगरों का उदय होता है तब कई दूरगामी परिवर्तन होते हैं। नगर का जीवन गाँव के जीवन से बहुत भिन्न होता है आधुनिक नगरों के निवासियों की तरह ही प्राचीन नगरों के निवासी अपने लिए अनाज का उत्पादन नहीं कर पाते थे। सारा भोजन गाँवों में रहने वाले उत्पन्न करते थे। 

उनके उत्पादन का एक हिस्सा शहरों में लाया जाता था इसलिए गाँवों के किसानों को अपनी जरूरत से अधिक भोजन का उत्पादन करना पड़ता था। इस तरह व्यापार विकसित हुआ कि लोग दूसरों द्वारा बनाई वस्तुओं की माँग करने लगे। जिनके बदले उन्हें कुछ न कुछ देना पड़ता था लगता है कि प्रारंभिक काल में वस्तुओं का विनिमय होता था। सभ्यता की उन्नति के साथ ही इन लेनदेनों में किसी प्रकार मुद्रा का प्रयोग होने लगा। इस प्रकार शहरी जीवन के परिणाम स्वरूप व्यापार और मुद्रा का विकास हुआ।

अन्य घटनाएँ भी हुई। चूंकि शहरों के लोगों को अपना भोजन नहीं उत्पन्न करना पड़ता था इसलिए वे दूसरे काम करने के लिए स्वतंत्र थे। धीरे-धीरे जन समूहों ने विभिन्न व्यवसाय अपनाए और कुछ शिल्पों में दक्षता प्राप्त की। शीघ्र ही दस्तकारों, व्यापारियों, सैनिकों और अफसरों का उदय हुआ जो अपना पूरा ध्यान एक ही व्यवसाय की ओर लगाने लगे। 

ऐसा करके उन्होंने नए कौशल और नए औजार विकसित किए। साथ ही उन्होंने कुछ को दूसरों की अपेक्षा अच्छी तरह उपयोग करना सीखा। दूसरे शब्दों में यहीं से विशेषीकरण या श्रम विभाजन प्रारंभ हुआ। प्रविधि के कारण श्रम विभाजन का जन्म हुआ और श्रम विभाजन ने प्रविधि की प्रगति को प्रोत्साहित किया।

जब शहरों के लोग भिन्न-भिन्न व्यवसायों में लगे तब उनके हित समान नहीं थे। दूसरे शब्दों में नगरों का जीवन जटिल हो गया । सार्वजनिक जीवन के नियमन के लिए एक संगठन की जिम्मेदारी के अन्तर्गत व्यवस्था बनाए रखना कानून बनाना तथा नगर के मामलों की देख रेख करना आ गया। उसे यह जिम्मेदारी पूरी करने के लिए जनसमूह की आवश्यकता हुई। 

कालक्रम में समाज में शासकों और राजाओं का उदय हुआ जिसे हम आज सरकार कहते हैं उसका यह प्रारंभिक रूप था। सरकार जैसे अत्यन्त विकसित संगठन को कानून बनाना, हिसाब रखना, झगड़ों के फैसले करना और जनता के साथ संपर्क रखना आदि बहुत से महत्वपूर्ण कार्य करने के लिए किसी न किसी प्रकार की लिपि का विकास करना पड़ता है। इस अध्याय में जिन चार सभ्यताओं का वर्णन किया गया है उनकी कोई न कोई लिपि थी। लिपि से ही ऐतिहासिक काल प्रारंभ होता है। 

मैसोपोटामिया की सभ्यता - मैसोपोटामिया की सभ्यता हड़प्पा संस्कृति से प्राचीन है। जीवन के अनेक क्षेत्रों में मैसोपोटामिया (आधुनिक इराक) ने मार्ग दर्शन दिया तथा अन्य सभ्यताओं ने उनका अनुकरण किया। मैसोपोटामिया का अर्थ है नदियों के बीच की भूमि। इस भूमि को दजला और फरात नदियाँ सिंचती है। 

प्राचीनकाल में इसके बिल्कुल दक्षिणी भाग को सुमेर कहा जाता था, सुमेर के उत्तर पूर्वी ओर एक भाग को बाबुल (बेबीलोन) अक्कद कहा जाता था। उत्तर की उच्च भूमि का नाम असीरिया था। मैसोपोटामिया के निवासियों ने ऐसे तौर तरीकों का आविष्कार किया जिससे वर्ष भर सिंचाई के लिए पानी मिलता रहे और बाढ़ों पर नियंत्रण रखा जा सके।

मैसोपोटामिया के राज्यों का उत्थान और पतन - 3000 ई.पू. के लगभग सुमेर सभ्यता उन्नति के उच्च शिखर पर पहुँच चुकी थी। लगता है कि इस क्षेत्रों में जो शहर थे वे प्रारंभ में सिंचाई योजनाओं के नियंत्रण के केन्द्र थे। वे जल्द ही वाणिज्य और उद्योग के केन्द्र भी बन गए। 

इनमें सबसे प्रसिद्ध नगर एरेक, एरिड लगाश और उर थे इनमें से हरेक किसी न किसी छोटे राज्य की राजधानी था। परंतु उन सबकी संस्कृति का ढाँचा एक-सा था। उनके बीच हमेशा लड़ाई चलती रहती थी। 2600 ई.पू के लगभग उर के राजा अधिक शक्तिशाली हो गए और उनका प्रभाव दूसरे क्षेत्रों में भी फैला।

अक्कद राज्य के निवासियों ने सुमेर के निवासियों के बहुत से रीति-रिवाजों को और उनकी संस्कृति को बहुत कुछ अपना लिया था। 2500 ई.पू के लगभग एक शक्तिशाली राजा ने सुमेर और अक्कद दोनों राज्यों को मिलाकर एक राज्य बना लिया और उसने अगादे को इस राज्य की राजधानी बनाया। किन्तु लगभग सौ वर्षों के अंदर ही आक्रमणकारियों ने इस राज्य को नष्ट कर दिया। 

मैसोपोटामिया के इतिहास की दूसरी प्रमुख घटना है बाबूल एक नये राजवंश का उदय। इसके शासक हम्बुराबी ने वर्तमान ईराक को एक राज्य के रूप में संगठित किया। 1600 ई.पू. तक यह राज्य भी नष्ट हो गया। 

इस बार हिटइट्स नाम के आक्रमणकारियों ने हमला किया। ये आक्रमणकारी एशिया माइनर (जिसे अब तुर्की कहते हैं) से आए थे। हिटइट्स लोगों अपनी बार युद्ध के रथों में घोड़े जोते और लोहे के हथियारों का प्रयोग किया।

मैसोपोटामिया के शहर - उर नगर मैसोपोटामिया के सबसे बड़े शहरों में से एक था प्रत्येक नगर का अपना संरक्षक देवता था। उर नगर का देवता चन्द्रमा था जिसे नन्नार कहते थे। देव मंदिर को जिगुरत कहते थे। जिसका अर्थ है 'स्वर्ण की पहाड़ी।

मैसोपोटामिया के सामाजिक वर्ग - मैसोपोटामिया के राजा को पृथ्वी पर देवों का प्रतिनिधि समझा जाता था। महत्व की दृष्टि में समाज में दूसरा स्थान पुरोहितों का था । आम धारणा है कि राजाओं का पद बनने से पूर्व यहाँ पुरोहित ही शासन चलाते थे। समाज में पुरोहितों के बाद राज कर्मचारियों और लिपिकों का स्थान था। मध्यम वर्ग में व्यापारी, जमीदार, कारीगर और दुकानदार आते थे। समाज में दासों का स्थान सबसे नीचे था। वे अधिकतर युद्धबंदी होते थे।

हम्बूरावी की विधि-संहिता- हम्बूरावी ने अपनी प्रजा के लिए एक विधि संहिता बनाई। उसकी संहिता जीवन के सभी पहलुओं को ध्यान में रखकर बनाई गई थी। यदि एक नागरिक किसी दूसरे राज्य के नागरिक के प्रति कोई अपराध करता है तो वह अपराध सारे राज्य के विरूद्ध समझा जाता था और राज्य अपराधी को दंड देता था। 

इस संहिता में समाज का विभाजन धनी, निर्धन और दास तीनों वर्गों में किया गया था। एक ही अपराध के लिए इन तीनों वर्गों का दंड अलग-अलग था। जिस शिला पर हम्बूरावी की विधि संहिता अंकित है उसमें राजा को अपने देवता के सामने सम्मान की मुद्रा में खड़ा दिखाया गया है और उसके नीचे संहिता दी हुई है।

मैसोपोटामिया के धार्मिक विश्वास तथा रीति-रिवाज - मैसोपोटामिया के निवासी अनेक देवताओं में विश्वास करते थे किन्तु प्रत्येक नगर का अपना संरक्षक देवता था । भू-लगान उसी के नाम पर वसूल किया जाता था और सरकार के सारे नियमों का पालन उसी के नाम पर कराया जाता था। उसके मंदिर पर बड़ी धन राशि व्यय की जाती थी। पुरोहितों को बहुत से अधिकार थे। लोग मृत्यु के बाद के जीवन चक्र में विश्वास रखते थे। वे कब्रों में शव के साथ भोजन और दैनिक जीवन के उपयोग अन्य वस्तुएँ भी रखते थे।

मैसोपोटामिया के व्यवसाय, कला और शिल्प - मैसोपोटामिया के अधिकतर निवासियों का मुख्य व्यवसाय कृषि था। बड़े पैमाने में धातुओं के उपयोग के पहले वे पकाई हुई चिकनी मिट्टी की हंसिया काम में लाते थे। खेतों की सिंचाई के लिए हर समय पानी मिल सके इसलिए मनुष्य बाढ़ का पानी नहरों द्वारा ले जाकर बड़े-बड़े जलाशयों में इकट्ठा कर लेते थे।

वे हल जोतने के लिए मवेशी (पशु) काम में लाते थे और उसकी नस्ल सुधारने पर भी ध्यान रखते थे खेती भी करते थे। कपड़ा बनाने का उद्योग एक विशेष वर्ग के कारीगरों के हाथों में था, जिसमें सूत कातने वाले, जुलाहे और रंगरेज सभी शामिल थे। उर के शाही कब्रिस्तान में धातु की वस्तुओं का एक बड़ा ढेर मिला है। 

उनमें देवताओं की अनेक मूर्तियाँ मिली है जो देव मंदिरों को सुशोभित करती थी। इसमें सोने और चाँदी के बर्तन, चाँदी की वीणाएँ, सोने का टोप, लकड़ी का सुन्दर पच्चीकारी वाला फर्नीचर, अति सुन्दर गले के हार, हाथ के कंगन और अन्य आभूषण मिले हैं। इससे यह स्पष्ट है कि लगभग 2000 ई.पू. तक धातु का काम करने वालों ने बड़े ऊँचे स्तर का तकनीकी ज्ञान और कुशलता प्राप्त कर ली थी।

कुम्हार चाक का प्रयोग सम्भवतः सबसे पहले मैसोपोटामिया में ही हुआ करता था। जब तक चाक का आविष्कार नहीं हुआ था तब मिट्टी के बर्तन हाथ से ही बनाएँ जाते थे। मैसोपोटामिया के मिट्टी के बर्तन इतने अच्छे नहीं थे जितने कि हड़प्पा संस्कृति के निवासियों के है। शीशे के बर्तन भी शायद सबसे पहले मैसोपोटामिया के निवासियों ने ही बनाए।

मैसोपोटामिया का व्यापार तथा वाणिज्य - मैसोपोटामिया के निवासियों की समृद्धि मुख्य रूप से उनके विदेशी व्यापार पर निर्भर थी। उन्हें कच्चा माल विदेशों से मँगाना पड़ता था। इससे वस्तुएँ बनाकर वे अपने देशों में और विदेशों में बेचते थे। कच्चा माल विदेशों से आयात करते थे उनमें पत्थर, अच्छे प्रकार की लकड़ी, सोना, चाँदी और अन्य धातुएँ शामिल थी। उनके बदले वह अपने देश के अतिशेष अनाज भेजते थे। क्योंकि उनके देश में अनाज का उत्पादन प्रचुर मात्रा में होता था।

मैसोपोटामिया में वस्तुओं को ले जाने के लिए पहिए वाली गाड़ियाँ थीं और पानी द्वारा माल ले जाने के लिए नदियाँ और बहुत सी नहरें थीं। जो सिंचाई के लिए बनाई गई थी। जलमार्ग द्वारा सामान को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाया जाता था इस प्रकार से दो सभ्यताओं के बीच परस्पर व्यापार होता था।

कीलाकार लिपि - मैसोपोटामिया की पहली लिपि का विकास सुमेर में हुआ। इसमें वस्तुओं का ज्ञान कराने के लिए लेखों, चिन्हों, संकेतों और चित्रों का प्रयोग किया जाता था। जब यह बात निश्चित हो गई कि अमुक चिन्ह या चित्र में अमुक वस्तु का बोध होता है। सुमेर निवासियों ने कतिपय विचारों को व्यक्त करने के लिए विशेष चित्रों या चिन्हों का प्रयोग करके इस कठिनाई को हल किया। 

एक व्यवस्थित लेखन पद्धति का विकास सबसे पहले सुमेर निवासियों ने किया। इस पद्धति को कीलाकार लिपि कहते हैं। वे तेज औजार से चिकनी मिट्टी के पहियों के चिकने धरातल पर लिखते थे इनमें से अधिकतर व्यापार संबंधी दस्तावेज है जैसे पत्र, बिक्री पत्र और अनुबंध पत्र। दूसरे प्रकार के दस्तावेजों में राज्यों से संबंधित और धार्मिक पुस्तकें है परन्तु इनकी संख्या कम है।

ज्ञान की वृद्धि - मैसोपोटामिया के लोग साठ-साठ की ईकाईयों में गणना करते थे। जैसे आज हम दस की ईकाईयों में गणना करते हैं। हमारी गणना प्रणाली दशमलव प्रणाली कही जाती है।

उनकी गणना प्रणाली राटू दाशमिक प्रणाली थी । 1 से 9 तक के अंकों को आवश्यकतानुसार दोहराते थे। इसी प्रकार वे दस के चिन्ह को जितनी बार जरूरत हो दोहराते थे। 60 के लिए भी उनका वही चिन्ह था जो 1 के लिए। यद्यपि लिखते समय इसका आकार कुछ बड़ा बनाया जाता था। 60 पर आधारित यह गणना प्राणाली अब कहीं भी प्रयोग में नहीं लाई जाती किन्तु समय का विभाजन करने के लिए हम अभी भी इनका प्रयोग करते हैं। 

इसी प्रकार हम एक वृत्त को 360 अंशों में बाँटते हैं। मैसोपोटामिया के निवासियों ने रेखागणित के उन सिद्धांतों को जान लिया जिसे बाद में पाइथागोरस के प्रमेय का नाम दिया गया है। यह प्रमेय मैसोपोटामिया के निवासियों को भवन निर्माण में और दूरी का अनुमान लगाने में काफी सहायक हुआ है।

खगोल विद्या के क्षेत्र में मैसोपोटामिया वालों ने आश्चर्यजनक प्रगति की थी। वे दिन और रात की अवधि का हिसाब लगा सकते थे। वे सूर्योदय, सूर्यास्त और चंद्रोदय तथा चन्द्रोस्त का ठीक समय बता सकते थे। वे पूरे दिन को 24 घंटों में बाँटते थे। यह प्रणाली आज भी सारे विश्व में काम में लाई जाती है। उन्होंने आकाश को 12 भागों में बाँटा और प्रत्येक भाग को अलग-अलग नाम दिए ये नाम आज भी उपयोग में लाए जाते हैं। भारत में हम इन्हें राशियाँ कहते हैं।

मैसोपोटामिया के निवासियों की एक अन्य उल्लेखनीय उपलब्धि पंचाग का आविष्कार थी। पंचाग सूर्य या चन्द्रमा की गति के आधार पर बनाए जाते थे। इसी कारण अब भी इस प्रकार कुछ पंचांग सूर्य पर तथा कुछ चन्द्रमा पर आधारित है मैसोपोटामिया का पंचांग चन्द्रमा पर आधारित था।

मिस्र की सभ्यता - मिस्र को नील नदी का वरदान कहा जाता है। इस नदी के दोनों किनारों की संकरी पट्टी हरी और उपजाऊ है। यह वह क्षेत्र है जहाँ पर मिस्र की सभ्यता विकसित हुई। इतिहासकार मिस्र के इतिहास को तीन कालों में बाँटते हैं। प्राचीन युग को पिरामिडों का युग भी कहते हैं, इस युग में काहिरा के निकट माम्फस नगर इस राज्य की राजधानी थी। 

इस काल ( 3000-2000 ई. पू.) और मध्यकालीन राज्य (2000-1750 ई.पू.) के दौरान मिस्र की सभ्यता कला, धर्म और विज्ञान की प्रगति के कारण विकसित हुई। अठारहवीं शताब्दी ई.पू. में हाइकसोस आक्रमणकारियों ने मिस्र पर हमला किया। वे पूर्व की ओर से आए थे। वे खानाबदोश थे और उनकी सभ्यता मिस्र के निवासियों की सभ्यता की तुलना में बहुत विकसित थी। उनका राज्य थोडे ही दिन चला और जल्द ही मिस्र के राजाओं ने अपने देश को फिर से जीत लिया। इस प्रकार नवीन राज्य की स्थापना हुई।

मिस्र के सामाजिक वर्ग - राजा से दास तक - मिस्र का राजा फराओं कहलाता था उसके पास पूर्ण शक्ति होती थी। फराओं सारी धरती का मालिक था। वह जो कहता था वही कानून हो जाता था। उसे देवता समझा जाता था और उसकी मूर्तियाँ मंदिरों में स्थापित की जाती थी। उसके कार्यों और विजयों का विवरण मंदिरों की दीवारों पर उत्कीर्ण कराया जाता था। 

समाज में फराओं के पश्चात् पुरोहितों, राज कर्मचारियों, कलाकारों और दस्तकारों का स्थान था उनके बाद किसानों का स्थान था जो शहरों से बाहर रहते थे, उनके बाद दास आते थे जो सामान्यतः युद्धबंदी होते थे और राजा उनका मालिक होता था।

प्राचीन मिस्र में व्यवसाय, कला और शिल्प - मिस्र के लोगों का सबसे महत्वपूर्ण व्यवसाय कृषि था। यहाँ की नदियाँ प्रतिवर्ष भूमि को उपजाऊ बनाती थी। वहाँ के निवासी नहरें बनाते थे जिससे वर्ष भर फसल उगाने के लिए पानी मिल सके। ऐसा लगता है कि 3000 ई.पू. में वे बैलों की सहायता से हल चलाते थे।

अन्य प्रारंभिक सभ्यताओं के लोगों की भाँति मिस्र के निवासी भी पशुपालन करते थे। सामान्यतः वे बकरी, कुत्ते, गधे, सुअर और बतख पालते थे। ऐसा लगता है कि उनके पास ऊँट भी थे | मिस्र में घोड़े को पहली बार हाइकसोस लोग लेकर आए थे। घोड़े युद्ध के समय उनके रथों को खींचते थे | मिस्र में सन की खेती बहुत की जाती थी। 

मैसोपोटामिया के निवासी ऊनी कपड़े पहनते थे किन्तु मिस्र के निवासी सन के कपड़े पहनते थे। ये कपड़े मिस्र की जलवायु के बहुत अनुकूल थे | मिस्र के निवासी पत्थर के सुंदर फूलदान बनाकर विदेशों को भी भेजते थे। 

मैसोपोटामिया के निवासियों की भाँति उन्होंने भी शीशे के बर्तन बनाने की कला का विकास किया और वे सुंदर आकृतियों के शीशे बर्तन बनाने लगे। उनके बढ़ई बहुत सुंदर फर्नीचर बनाते थे। हाथी दाँत और बहुमूल्य मणियों को फर्नीचर में जड़ा जाता था इस प्रकार के फर्नीचर को शाही मकबरों में बड़े सुरक्षित ढंग से रखा गया।

धर्म - मिस्र के निवासियों का विश्वास था कि प्रकृति की प्रत्येक लीला के पीछे बड़ी शक्ति विद्यमान होती है। सूर्य उनका सबसे महत्वपूर्ण देवता था । वे इसे सब चीजों का सृष्टा मानते थे और उसकी पूजा अनेक नामों से करते थे। मिस्र वालों के अन्य प्रसिद्ध देवता थे- परलोक का राजा, बाढ़ का देवता और चन्द्र देवता।

मिस्र वालों का मृत्यु के बाद जीवन में दृढ़ विश्वास था | मिस्र वालों की धारणा थी कि मरने के बाद भी शरीर और आत्मा दोनों जीवित रहते हैं। केवल मृत व्यक्तियों का जीवन जीवित मनुष्यों के जीवन से भिन्न कुछ होता है इसलिए वे मृत व्यक्ति के शव की रक्षा बड़ी सावधानी से करते थे। शव को मसालों से पोतकर बढ़िया कपड़ों में लपेटा जाता था। 

प्रकार से सुरक्षित किए गए शव को ममी कहा जाता है, ममी को एक लकड़ी के संदूक में रखा जाता है उसे चित्रों से सजाया जाता था और पत्थर के बाक्स में बंद करके एक मकबरे में दफना दिया जाता था। मकबरे के अन्दर वे सभी वस्तुएँ रखी जाती थीं जो मृत व्यक्ति को पंसद थी और जिनका वह जीवित अवस्था में प्रयोग करता था। 

जब राजाओं और रानियों को दफनाया जाता था तो शव रखने के लिए काफी मूल्यवान संदूक और मकबरे बनाए जाते थे। मगर जब साधारण मनुष्यों को दफनाया जाता था तब वे दोनों वस्तुएँ साधारण होती थी। इन मकबरों में कपड़े, भोजन, पेय पदार्थ, बहुमूल्य फर्नीचर और आभूषण रखे जाते थे। पिरामिड महान राजाओ के मकबरे थे।

मिस्र की वास्तुकला और . मूर्तिकला - प्रारंभिक कला में मिस्र की इमारतों में पिरामिड सर्वश्रेष्ठ थे उस काल की महान उपलब्धियों में से 30 बड़े और बहुत छोटे पिरामिड आज़ तक विद्यमान है। उन सबमें से भव्य है काहिरा के पास गीजा का महान पिरामिड इसका निर्माण 2650 ई.पू. के आसपास प्राचीन राज्य के फराओं सियोफ (खफ्) ने किया था यह बड़ी इमारत पत्थर के बहुत बड़े टुकड़ों को जोड़कर बनाई गई है। 

पिरामिड़ों को प्राचीन संसार के सात आश्चर्यजनक वस्तुओं में गिना जाता है, चूंकि पिरामिडमिस्र के राजाओं के मकबरे थे इसलिए उनमें ममियों को और उनके उपयोग में आने वाले सभी प्रकार की बहुमूल्य वस्तुओं को रखा जाता था। इन पिरामिड़ों को बने शताब्दियाँ हो गई। इस दीर्घकाल में उनको लूटा गया किन्तु वर्तमान शताब्दी के तीसरे दशक में तूतन खामन का मकबरा पूरी तरह सुरक्षित दशा में मिला। 

इस मकबरे की बहुमूल्य वस्तुएँ आज भी काहिरा के संग्रहालय में देखी जा सकती है। इस मकबरे की दीवारों पर कई बड़े और सुन्दर चित्र है। उनसे तात्कालीन मिस्र निवासियों के जीवन के विषय में हमे बहुत सी जानकारी प्राप्त होती है। 

मिस्र की वास्तुकला का एक अन्य विचित्र नमूना स्फिंक्स है। स्फिंक्स पौराणिक कथाओं में वर्णित एक जानवर है जिसका शरीर सिंह का और सिर मनुष्य का है। स्फिंक्स की मूर्ति बड़े ठोस पत्थर की एक चट्टान को तराशकर बनाई गई थी।

रोग्लिफिक लिपि - मिस्र के निवासियों ने शायद लिखने की कला 3000 ई.पू. से पहले ही सुमेर निवासियों से सीखी किन्तु उनकी लिपि कीलाकर लिपि की नकल नहीं है। मिस्र की लिपि हैरोग्लिफिक कहलाती है इसका अर्थ है पवित्र लिपि इसमें 24 चिन्ह थे जिनमें से प्रत्येक व्यंजन का प्रतीक था। इस लिपि में स्वर वर्ण नहीं लिखे जाते थे। बाद में मिस्र निवासियों ने विचारों के लिए संकेतों का प्रयोग करना आरंभ कर दिया। 

इस प्रकार चिन्हों की संख्या बढ़कर 500 हो गई। थोड़े ही दिनों के बाद लोगों को लिपि का महत्व हेरोग्लिकफिक लिपि मालूम हो गया और सुमेर की तरह ही लेखन का विकास एक विशेष कला के रूप में हुआ। लिपिकों का समाज में एक प्रमुख स्थान था वे पेपिरिस नाम के पेड़ के पत्तों पर सरकंडे की कलम से लिखते थे। इसी से अंग्रेजी भाषा का पेपर शब्द बना जिसका अर्थ कागज है । ₹2008170

प्राचीन मिस्र में विज्ञान और गणित - मिस्र वालों ने ज्ञान के अनेक क्षेत्रों में महत्वपूर्ण प्रगति की उन्होंने अंकों की एक दशमलव प्रणाली का विकास किया अभीष्ट संख्या लिखने के लिए 1 से 9 तक के अंक के एक ही चिह्न को बार-बार दोहराया जाता था। 10 और उसकी गुणन संख्याओं के लिए भिन्न-भिन्न चिन्ह थे। मिस्र के निवासी त्रिभुज और आयत का क्षेत्रफल निकाल सकते थे।

मिस्र वालों की सबसे बड़ी उपलब्धि सौर पंचांग थी। लगभग सभी प्राचीन जनगणों ने सुमेर वालों की तरह अपने पंचांग चंद्र मासों के आधार पर बनाए थे किंतु यह प्रणाली उस कृषक जनगण के लिए पर्याप्त नही है जिसे अपने कार्य के पहले ऋतुओं, वर्षा और बाढ़ आने के समय की जानकारी आवश्यक होती है। 

अनेक वर्षों तक सावधानीपूर्वक देखने के बाद मिस्र वालों को मालूम हुआ कि एक वर्षाकाल और दूसरी वर्षाकाल के बीच औसतन 365 दिन होते हैं। उन्होंने यह भी पाया कि सिरियस नामक चमकीला तारा सबसे बाद में क्षितिज पर निकलता था तब वर्षाकाल की बाढ़ काहिरा पहुँच जाती थी और ऐसा हर 365 दिन बाद होता था। 

इन दो स्वतंत्र प्रेक्षणों से मिस्र वाले इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि वर्ष में 365 दिन होते हैं। इसके बाद वर्ष को 12 महीनों में और प्रत्येक महीने को 30 दिनों में बाँटा गया। बचे हुए 5 दिनों को धार्मिक उत्सवों के लिए अलग रखा गया। मिस्र का सौर पंचाग एक महान् उपलब्धि थी।

अपने मृत लोगों के शवों को औषधियों का लेप देकर सुरक्षित रखने की मिस्र निवासियों की प्रथा ने विज्ञान के विकास को प्रोत्साहित किया। इससे मानव शरीर के ढाँचे से संबंधित ज्ञान और शल्यक्रिया के कौशल में वृद्धि हुई। मुख्य रूप से पुरोहित ही चिकित्सा और शल्यक्रिया करते थे।

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