छठी शताब्दी क्या है - sixth century

छठी शताब्दी क्या है

छठी शताब्दी के आसपास नई चिंतन धाराओं ने जन्म लिया। यह चिंतन यज्ञ और वैदिक धर्म के कर्मकाण्डों के विरुद्ध थे क्योंकि वैदिक कर्मकाण्डों में अब पहले जैसी सादगी नहीं रह गई थी। इस युग में जैन धर्म और बौद्ध धर्म सशक्त और प्रमुख धर्मों के रूप विकसित हुए भारतीय संस्कृति के विकास में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।

जैन धर्म - जैन धर्म के आदि तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव थे। जैन परम्परा के अनुसार इस धर्म में कुल 24 तीर्थंकर हुए है। तेईसवें तीर्थंकर पार्श्वनाथ तथा अंतिम 24वें तीर्थंकर वर्द्धमान महावीर इतिहास प्रसिद्ध है। (भगवान महावीर का जन्म ईसा पूर्व 599 में वैशाली के समीप कुण्डग्राम में हुआ था। महावीर ने पाँच महाव्रतों का पालन करने पर जोर दिया - 1. अहिंसा, 2. सत्य, 3. अस्तेय, 4. ब्रम्हाचर्य, 5. अपरिगृह।

जैन धर्म के अनुसार प्रत्येक पदार्थ में चाहे वह पत्थर हो, वृक्ष हो, मनुष्य हो या पशु हो, सबमें आत्मा विद्यमान है। इसी कारण इस धर्म में अहिंसा पर अधिक बल दिया गया है। जीवमात्र को किसी प्रकार का कष्ट न होना ही सच्ची अहिंसा माना गया है। 

छठी शताब्दी क्या है - sixth century

सम्यकदर्शन, सम्यकज्ञान और सम्यक्चरित्र को जैन धर्म में त्रिरत्न कहा गया है। उन्होंने सदाचार तथा सदव्यवहार पर जोर दिया है। महावीर के निर्वाण के कई वर्षों बाद जैनों में दो समुदाय– 1. दिगम्बर, 2. श्वेताम्बर हो गएं। मोक्ष प्राप्त करने के लिए साधु को वस्त्रों का भी परित्याग कर पूर्ण अपरिग्राही होना आवश्यक है।  इस मत के मानने वाले दिगम्बर कहलाए। 

श्वेत वस्त्र धारण करने पर भी साधु मुक्त हो सकता है इस मत के अनुयायी श्वेताम्बर कहे गए। आज भी श्वेताम्बर मुनि श्वेत-वस्त्र धारण करते हैं जबकि दिगम्बर परम्परा के तीर्थकरों की मूर्तियाँ वस्त्ररहित होती है। 

बौद्ध धर्म - ईसा पूर्व छठी शताब्दी में महान धर्म संस्थापक भगवान गौतम बुद्ध भी हुए। वे बौद्ध धर्म के प्रवर्तक थे। उनकी जीवन कथा- गाथाओं, धार्मिक साहित्य - ग्रंथों और चित्रों और मूर्तियों से मिलती है। बुद्ध ने निम्नलिखित चार आर्य सत्यों का उपदेश दिया - 1. दुख है, 2. दुखों का समुदाय, 3. दुखों का कारण तृष्णा है। 4. दुखों से बचने का उपाय है। दुख निरोधागामिनी प्रतिप्रदा। 

अर्थात् (तृष्णा) का वश में करना। आवागमन के बंधन से मुक्ति या दुख की समाप्ति के लिए मनुष्य को सदमार्ग से परिचित होना चाहिए जिसे उन्होंने अष्टांगिक मार्ग कहा इसमें निम्नलिखित आठ बातें सम्मिलित है।

1. सम्यक्दृष्टि, 2. सम्यक्संकल्प, 3. सम्यक्वाक, 4. सम्यकुकर्म, 5. सम्यक्आजीव, 6. सम्यव्यायाम (श्रम), 7. सम्यकस्मृति, 8. सम्यक्समाधि।

बुद्ध ने मध्यम मार्ग के महत्व पर बल दिया। उसके अनुसार पवित्र जीवन बिताने के लिए मनुष्य को दोनों प्रकार की अति से बचना चाहिए। न तो उग्र तप करना चाहिए और न ही सांसारिक सुखों में लगे रहना चाहिए। महावीर की भांति बुद्ध ने भी अहिंसा का उपदेश दिया, किन्तु उन्होंने इस पर इतना बल नहीं दिया जितना महावीर ने।

बुद्ध ने वेदों को प्रमाण नहीं माना और जाति प्रथा पर आधारित सामाजिक विषमताओं को स्वीकार नहीं किया। उनके अनुसार कोई भी व्यक्ति संघ में शामिल हो सकता था। बौद्ध संघ बहुत ही अनुशासनबद्ध और जनतांत्रिक संगठन थे। वर्ष भर बौद्ध भिक्षु और भिक्षुणियाँ अपने धर्म के सिद्धांतों का प्रचार करने के लिए घूमते रहते थे। केवल वर्षा ऋतु में ही वे विहारों में रहते थे।

सम्राट अशोक ने भारत और एशिया के अन्य देशों में बौद्ध धर्म के प्रचार में सहायता दी । कालान्तर में यह धर्म श्रीलंका, बर्मा, पश्चिमी और मध्य एशिया, तिब्बत और चीन तथा वहाँ से कोरिया और जापान में फैल गया। बौद्ध धर्म की कुछ विशेषताएँ बाद में हिन्दू धर्म का अंग बन गई। यहाँ तक कि बुद्ध, विष्णु के अवतारों में शामिल कर लिए गए।

आगे चलकर बुद्ध के अनुयायी दो संप्रदायों हीनयान और महायान में बँट गए। हीनयान संप्रदाय ने आष्टांगिक मार्ग के प्रत्यक्ष अनुसरण द्वारा व्यक्ति के निर्वाण पर बल दिया। दूसरी ओर महायान सम्प्रदाय ने बुद्ध की पूजा ईश्वर के रूप में शुरू कर दी और इस बात पर बल दिया कि न सिर्फ भिक्षु और भिक्षुणियाँ बल्कि सभी लोग निर्वाण प्राप्त कर सकते हैं। 

बुद्ध की मूर्ति पूजा शुरू होने से भारतीय मूर्ति कला का बहुत विकास हुआ। गुप्तकाल तक वैदिक काल की तुलना में धार्मिक संस्थानों और आचरणों में काफी परिवर्तन हो चुका था। ब्राह्मण धर्म के अत्यन्त महत्वपूर्ण पहलू थे देवत्रयी या त्रिमूर्ति इस देवत्रयी में ब्रम्हा (संसार का सृष्टा), विष्णु (रक्षक) और शिव (संहारकर्ता) थे। 

धर्म अब वैष्णव, शैव और शाक्त तीन संप्रदायों में बँट गया। कृष्ण पूजा विकसित होने लगी। कृष्ण का विष्णु के साथ तादातम्य स्थापित हो गया। कुछ क्षेत्रों में लोग मातृदेवी के भी उपासक बने रहे। मातृदेवी की पूजा हड़प्पा काल में आरंभ हुई। बाद में इस देवी की पूजा शक्ति के कल्याणकारी रूप में उमा, भवानी, अन्नपूर्णा आदि तथा पापनाशिनी रूप में काली, कराली, चामुंडा, चंडी आदि के नाम से होने लगी।

ब्राम्हण धर्म उच्चतम सार्वभौम आत्मा (ईश्वर या परब्रम्हा) के अस्तित्व की बात बतलाता है, परन्तु वह प्रत्येक उपासक को वह जिस रूप में चाहे, ईश्वर की पूजा करने की छूट देता है। इस प्रकार ब्राम्हण धर्म एक देववादी धर्म है।

ब्राह्मण धर्म के अनुसार मानव जीवन के तीन मुख्य लक्ष्य है पहला लक्ष्य धर्म है धर्म से अभिप्राय गुण से है, जो अच्छे कर्मों का स्रोत है। दूसरा लक्ष्य- अर्थ है। अर्थ से अभिप्राय उन सभी नैतिक व जीवनोपयोगी वस्तुओं का संग्रह से है जो धार्मिक गर्म का अनुसरण करके प्राप्त की गई हो। तीसरा लक्ष्य काम है काम का अर्थ इन्द्रिय सुख के उपयोग से है। किन्तु यह उपयोग पाशविक सुख से भिन्न अर्थात् शिष्ट तथा सुसंस्कृत मन के अनुरूप होना चाहिए। 

इन तीनों लक्ष्यों के सही अनुसरण से मोक्ष की प्राप्ति होती है। ब्राम्हण धर्म की एक अन्य विशेषता वर्णाश्रम धर्म है। इसके अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को वर्ण विधान का पालन करना चाहिए और विभिन्न आश्रमों के लिए निर्दिष्ट कर्तव्यों का पालन करना चाहिए। चार वर्ण और चार आश्रम क्रमशः समाज के सैद्धांतिक विभाजन और जीवन की आदर्श व्यवस्था रूप में माने गए है।

ब्राम्हण धर्म कभी एकरूप, स्थिर और अपरिवर्तनशील नहीं रहा है। वह अपने को बदली हुई परिस्थितियों और जीवन दशाओं के अनुरूप ढालने में समर्थ हुआ है।

अपने विविध सिद्धांतों और कर्मकांडों के कारण ब्राम्हण धर्म के अंदर अनेक संप्रदायों को जन्म दिया। कालक्रम में इन संप्रदायों ने पूजा की अपनी विधि विकसित की। परन्तु प्रत्येक सम्प्रदाय के सदस्य अपनी व्यवस्था का अनुसरण करते हुए भी दूसरों के विचारों के प्रति सम्मानपूर्ण दृष्टिकोण रखते थे। बौद्ध धर्म की तरह ही वैदिक धर्म की भी कुछ शाखाओं का प्रसार भारत से बाहर विशेषकर दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों में हुआ है।

धर्म ग्रंथों की संख्या बड़ी है इसमें सबसे महत्वपूर्ण है चार वेद- ऋग्वेद, सामवेद, अथर्ववेद एवं यजुर्वेद। वेदांग, ब्राम्हण तथा उपनिषद् भी इसी श्रेणी के ग्रंथ है।  

भगवतगीता भी एक महत्वपूर्ण धर्म ग्रंथ है। हिन्दुओं के जीवन शैली पर महाकाव्यों- महाभारत और रामायण-धर्मशास्त्रों और पुराणों का भी महत्वपूर्ण प्रभाव है। अपने सभी संप्रदायों सहित ब्राम्हण धर्म भारत का सबसे लोकप्रिय धर्म बना रहा।

प्राचीन भारतीयों की सांस्कृतिक उपलब्धियाँ

भाषा और साहित्य - भारत में आजकल बोली जाने वाली भाषाओं में से अधिकतर अपने मूल रूप में प्राचीन काल में विद्यमान थी उन्हें दो भागों में बाँटा जाता है।

भारतीय आर्य भाषा तथा द्रविड भाषाएँ - प्राचीन आर्यो की भाषा संस्कृत थी । कालांतर में ऋग्वेद की संस्कृत में कुछ परिवर्तन हुए। संस्कृत साहित्य की भाषा वैदिक संस्कृत से भिन्न है संस्कृत के साथ-साथ अनेक भाषाओं का विकास हुआ जिन्हें प्राकृत कहते हैं। संस्कृत की अपेक्षा इनकी व्याकरण और ध्वनि अधिक सरल थी पाली, मागधी, शौरसेनी प्राकृत के विभिन्न रूप है जो विभिन्न क्षेत्रों में बोली जाती थी। 

प्राचीन संस्कृत साहित्य, वेद, उपनिषद और ब्राम्हण ग्रंथों के रूप में मिलता है। इनको मौखिक रूप से ही याद किया जाता था। जैन और बौद्ध धर्म के प्रादुर्भाव के पश्चात् प्राकृत भाषाओं की स्थिति में परिवर्तन हुआ। इन धर्मों की मौखिक शिक्षाएँ प्राकृत थी। मौर्य काल में शासन के कार्यों के लिए प्राकृत भाषा का ही प्रयोग किया जाता था। 

अशोक के अभिलेख में भी प्राकृत भाषा का ही प्रयोग किया जाता था। अशोक के अभिलेख ब्राम्ही और खरोष्ठी लिपियों में है। भारत के लिए ब्राम्ही लिपि अधिक महत्वपूर्ण है, क्योकि सभी भारतीय लिपियाँ ब्राम्ही लिपि से निकली है। चौथी सदी ईसवी पूर्व से ईसा की चौथी सदी ई. के बीच भारत के दोनों महाकाव्य रामायण और महाभारत प्राचीन गाथाओं के आधार पर रचे जा चुके थे। वर्तमान रूप में आने से पहले इन महाकाव्यों में अनेक परिवर्तन हुए।

जब प्रसिद्ध व्याकरण शास्त्री पाणिनी ने अपनी व्याकरण की पुस्तक लिखी, संस्कृत साहित्य का पूर्ण विकास हुआ। इसका रुप परिष्कृत हुआ और यह विद्वानों की भाषा बन गई। शिक्षित ब्राम्हण और क्षत्रिय संस्कृत ही बोलते थे। साधारण मनुष्य और स्त्रियॉ शूर सेनी और अन्य प्राकृत बोलियाँ बोलते थे। अधिकाश बौद्ध ग्रंथ भी संस्कृत में लिखे गए। 

ब्राह्मी लिपि में अनेक प्रादेशिक परिवर्तन हुए और इस प्रकार प्रादेशिक लिपियों का मूल रुप बना। शिला खण्डों के अतिरिक्त ताम्रपत्रों पर भी अभिलेख लिखे गए । लिखने के लिए तालपत्र (ताड़ का पत्ता) और भोजपत्र भी काम में लाए जाते थे। जब अरब और तुर्क भारत में आए तब से लिखने के लिए कागज का भी प्रयोग होने लगा।

चौथी सदी ईसवी में ही अनेक महत्वपूर्ण नाटक भारतवर्ष में रचे गए सबसे प्रसिद्ध नाटककार अश्वघोष, भास और कालिदास थे। कालिदास सबसे महान भारतीय कवि भी थे। गद्य साहित्य में विष्णुशर्मा का पंचतंत्र विशेष कृति थी। जिसका बाद में अनेक विदेशी भाषाओं में अनुवाद किया गया। दक्षिण भारत में ईस्वी सन के प्रारंभ में लगभग तमिल भाषा में संगम साहित्य की रचना हुई। इसमें अनेक कविताएँ तथा महाकाव्य लिखे गए।

वास्तुकला एवं अन्य कलाएँ - हड़प्पा संस्कृति के विनाश के पश्चात् लगभग एक हजार वर्ष तक भारतीय वास्तुकला तथा अन्य कलाओं में भी कोई प्रगति नहीं हुई । वस्तुतः हड़प्पा के लोगों की उपलब्धियों को बिल्कुल भुला दिया गया। 

इस काल का न कोई सुव्यवस्थित मकान, न नगर, न ही मूर्ति मिली है। वैदिक काल के मृदभंडों में भी कुछ कलात्मक विशेषताएँ नहीं मिलती। चौथी सदी ई.पू. के अंतिम चरण में मौर्यकाल में कला के क्षेत्र में कुछ प्रगति हुई। अशोक के समय बौद्ध वास्तुकला का विकास भी हुआ। 

बौद्ध वास्तुकला के सुंदर उदाहरण चैत्य और विहार है। चैत्यों में पूजा के लिए बौद्ध उपासक इकट्ठे होते थे और विहारों में भिक्षु निवास करते थे। अशोक स्तम्भ के सुंदर शीर्ष इस काल की मूर्तिकला के उत्तम उदाहरण है। मौर्यकाल के पश्चात् बुद्ध या उनके शिष्यों के अवशेषों पर स्तूपों का निर्माण हुआ। ये स्तूप सुंदर कला कृतियाँ है। 

तोरणद्वारों पर सुंदर मूर्तियाँ उत्कीर्ण करके उन्हें सजाया गया है। इनमें बुद्ध की जीवन गाथा और बौद्ध साहित्य के अनेक दृश्य दिखाए गए हैं। अनेक चट्टानों को काटकर गुफाओं में भी चैत्य बनाए गए। इसी  काल के अंत में अजंता की गुफाओं के प्रारंभिक भित्तिचित्रों का निर्माण हुआ। 

मौर्यकाल के बाद मूर्तिकला की गंधार और मथुरा शैलियों का विकास हुआ। गंधार शैली में यूनानी और रोमन मूर्तिकला का प्रभाव बिल्कुल स्पष्ट है। मथुरा शैली ने एक देशी रूप विकसित किया। गंधार और मथुरा दोनों कला शैलियों में बुद्ध की मूर्तियाँ बनाई गई और विषयों का निरुपण किया गया। 

सातवाहन राजाओं ने भी चैत्यों और विहारों के निर्माण प्रोत्साहन दिया। सबसे अधिक भव्य चैत्य में उसी काल के है । अमरावती में एक भव्य स्तूप बनाया गया यद्यपि यह स्तूप नष्ट हो गया किन्तु अमरावती की मूर्तिकला के अधिकतर उदाहरण अभी विद्यमान है।

भारतीय कला के इतिहास में गुप्तकाल के सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। इस काल में चित्रकला का बहुत विकास हुआ। अजंता एलोरा के अधिकतर भित्ति चित्रों का निर्माण इसी काल में हुआ। गुप्तकाल में ही ब्राम्हण मंदिरों वास्तुकला प्रतिस्थापित की जाती थी। 

अधिकतर मंदिर पत्थर से बनाए जाते थे। उनमें एक ही गर्भगृह होता था जिसमें देवी की मूर्ति स्थापित की जाती थी। बाद में उत्तर और दक्षिण भारत में बहुत से मंदिर बनाए गए थे जो गुप्तकालीन मंदिरों के ही अनुरुप थे मंदिरों को भूमि का अनुदान भी मिला और देश के आर्थिक जीवन में उनका महत्वपूर्ण स्थान हो गया। चिकित्सा शास्त्र, ज्योतिष, गणित आदि विषयों पर अनेक शास्त्र लिखे गए इन्हीं के कारण विज्ञान के विषयों की नींव पड़ी।

विज्ञान का विकास  - प्राचीन भारत की विभिन्न चितन धाराओं में ब्रह्माण्ड को चार या पाँच तत्वों पृथ्वी, वायु, अग्नि, जल और आकाश में बाँटा गया है। इन चिंतन धाराओं ने यह प्रतिपादित किया कि तत्व अणु से बने है और तत्व में अणुओं के सयोजन का तरीका अंक स्वरूप का निर्धारण करता है। मगर ये सिद्धांत प्रयोग पर नहीं बल्कि सहज बुद्धि और तर्क पर आधारित थे।

यज्ञ के लिए शुभ दिन और समय ज्ञात करने की आवश्यकता ने भारतीयों को ज्योतिष के सिद्धांत जानने की प्रेरणा दी। अनेक महत्वपूर्ण ग्रंथ लिखे गए इन ग्रंथों में दिन का ठीक-ठीक मान निकालने और ग्रहण का हिसाब लगाने की ठीक विधियाँ बतलाई गई। 

प्राचीन भारत के दो महान ज्योतिष शास्त्री थे आर्यभट्ट और वराहमिहिर। राशि चक्र संबंधी विज्ञान का भी विकास किया गया । और त्रिकोणमिति का उपयोग ज्योतिष के अध्ययन में किया गया।

गणित का प्रारंभिक उल्लेख हमें वैदिक साहित्य में मिलता है। वैदिक काल में यज्ञ के लिए वेदियाँ बनाने की आवश्यकता हुई जिस कारण रेखा गणित की नींव पड़ी। धीरे-धीरे गणित का विकास हुआ। भारतीयों ने ज्ञान के इस क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण योग दिया है जैसे अंको की दशमलव प्रणाली उनका स्थानीय मान और शून्य का ज्ञान।

वैदिक यज्ञों के लिए वेदी निर्माण के नियम जिन ग्रंथों में दिए गए है उन्हें शूल्व सूत्र कहते हैं। इनमें ऐसा वर्णन मिलता है कि इनके लेखक पाइथोगोरस के प्रमेय और वर्गों के दुगुना करने सिद्धांत से भली-भाँति परिचित थे। 

भारत के गणितज्ञ वर्गमूल का मूल्य ठीक-ठीक निकाल सकते थे। गुप्त काल से शताब्दियों पूर्व भारतीय गणित की दो शाखाएँ पाटी या पट्टी गणित ( अंकगणित) और बीज गणित प्रचलित थी। दशमलव प्रणाली और अंकों के स्थानीय मान का प्रयोग किया जाता था। शून्य के अंक का भी प्रयोग किया जाने लगा और इसे बिन्दु कहा जाता था।

चारों वेदों में एक अथर्ववेद में पर्याप्त रूप से रोगों के लक्षण और रोगों का वर्णन मिलता है किन्तु उसमें उनका संबंध नहीं बतलाया गया है। रोगों की औषधियो, जल और जादू के मंत्रों से रोगों की चिकित्सा का वर्णन भी अथर्ववेद में मिलता है। यूनानी साहित्य में भारतीय चिकित्सा और औषधियों के नुस्खों का वर्णन मिलता है। ऐसा प्रतीत होता है भारतीय विकित्सा का यूनानी चिकित्सा पर पर्याप्त प्रभाव पडा।

प्राचीन काल में भारतीय आयुर्वेद की पर्याप्त उन्नति हो चुकी थी। आयुर्वेद के क्षेत्र में सबसे प्रसिद्ध नाम सुश्रुत और चरक का आयुर्वेद के सिद्धांत, जिसका भारत में आजतक प्रयोग किया जाता है वह इस काल में पूर्ण रुप से विकसित होते जा रहे थे। इसलिए स्वास्थ्य रक्षा के नियमों और शुद्ध भोजन पर बल दिय जाता था। शल्य चिकित्सा के क्षेत्र में पर्याप्त प्रगति हो गई थी। इस काल में अनेक रोगों में कठिन शल्यक्रिया की जाती थी। 

मेहरोली स्थित लौह स्तम्भ और देश के बाहर भारतीय तलवारों के महत्व के विषय में किए गए उल्लेखों से स्पष्ट है कि प्राचीन भारत में धातु विज्ञान के निपुणता प्रदान कर ली गई थी। शासन व्यवस्था, अर्थशास्त्र, साहित्य कला और विज्ञान सभी क्षेत्रों में प्राचीन भारत की संस्कृति का विकास हुआ। 

भारत की विभिन्न जातियों ने एक दूसरे से और आक्रमणकारियों से भी बहुत कुछ सीखा। इसी प्रकार पूर्व और पश्चिम देशों के निवासियों ने भारतीय ज्ञान को प्राप्त करके अपने ज्ञान व संस्कृति का विकास किया।

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