इस्पात उद्योग क्या है - steel industry

 इस्पात उद्योग क्या है

लोहा व इस्पात उद्योग आधारभूत उद्योगों में से एक महत्वपूर्ण उद्योग है। अतः इसे आर्थिक संरचना की रीढ़ मानते हैं। किसी भी देश के विकास के लिए लोहा व इस्पात उद्योग का तेजी से विकास करना अत्यन्त आवश्यक होता है। क्योंकि इसी पर कृषि, उद्योग, परिवहन, रक्षा एवं दैनिक उपभोग की सैकड़ों वस्तुओं का निर्माण निर्भर करता है। 

लोहा व इस्पात उद्योग के सम्बंध में स्वर्गीय पं. जे. एल. नेहरू ने कहा था कि “लोहा एवं इस्पात उद्योग आधुनिक सभ्यता का आधार है। इसी प्रकार कार्याइल के अनुसार “वे देश जो लौह पर नियंत्रण प्राप्त कर लेते हैं। शीघ्र ही सोने पर नियंत्रण प्राप्त करते हैं। नि:संदेह, वर्तमान युग में लोहे का महत्व सोने से बढ़कर ही है।

भारत में लोहा-इस्पात बनाने का कार्य बहुत प्राचीनकाल से किया जाता रहा है। दिल्ली में कुतुबमीनार के पास स्थापित अशोक लाट इस बात का जीता-जागता प्रमाण है, जिसकी स्थापना ईसा से पूर्व प्रथम शताब्दी में की गयी थी। विश्व के विशेषज्ञ इस बात पर आश्चर्य व्यक्त करते हैं कि इतने समय पूर्व इतनी उच्चकोटि का इस्पात किस प्रकार भारतवासियों द्वारा तैयार किया गया होगा। 

कोणार्क के सूर्य मंदिर तथा पुरी के ज्ञान मंदिर में जो लोहे की छड़ें आज से 800 वर्ष पूर्व लगायी गयी थीं। वे सभी भारतीय इस्पात उद्योग के प्राचीन गौरव को साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत करती हैं। 

लोहा-इस्पात उद्योग का विकास एवं वर्तमान स्थिति - भारत में आधुनिक तरीकों से लोहा व इस्पात के निर्माण का सफल प्रयास सन् 1870 में किया गया। जबकि बंगाल आयरन वर्क्स कम्पनी की स्थापना की गयी, लेकिन इस उद्योग का वास्तविक रूप में शुभारंभ सन् 1907 में हुआ था। जबकि बिहार में जमशेदपुर नामक स्थान पर 'टाटा आयरन एण्ड स्टील कम्पनी' की स्थापना की गयी। 

इस उद्योग की प्रगति में यह एक महत्वपूर्ण घटना थी। इसके पश्चात् सन् 1919 में बर्नपुर में इंडियन आयरन एण्ड स्टील कम्पनी की स्थापना की गयी। लोहा-इस्पात उद्योग की सार्वजनिक क्षेत्र में पहली इकाई सन् 1923 में भद्रावती स्थान पर विश्वेश्वरैरया आयरन एण्ड स्टील वर्क्स लिमिटेड स्थापित की गयी।

देश में वर्तमान में 07 एकीकृत इस्पात कारखाने हैं। जिनमें से 06 ( भिलाई, राऊरकेला, दुर्गापुर, बोकारो, इण्डियन आयरन एण्ड स्टील कम्पनी तथा विशाखापट्टनम) सार्वजनिक क्षेत्र में और 01 (टाटा एण्ड स्टील कंपनी) निजी क्षेत्र में हैं। प्रारंभ में प्रबंध के लिए भिलाई, दुर्गापुर, राऊरकेला कारखानों के लिए एक कम्पनी हिन्दुस्तान स्टील लिमिटेड, तथा बोकारो कारखाने के लिए, “बोकारो स्टील लिमिटेड, थी। 

लेकिन 1973 में सरकार ने 'स्टील अथॉरिटी ऑफ इण्डिया लिमिटेड' (SAIL) की स्थापना की तथा सार्वजनिक क्षेत्र के प्रथम पाँच एकीकृत इस्पात कारखानों का प्रबंध इसे सौंप दिया। इस पुनर्गठन के फलस्वरूप HSL तथा BSL का अस्तित्व समाप्त हो गया। सन् 1982 में 'राष्ट्रीय इस्पात निगम लिमिटेड’ की स्थापना की गयी, जिसे विशाखापट्नम में एकीकृत इस्पात कारखाने का निर्माण कार्य सौंपा गया। अनेक कारखानों की स्थापना तथा उत्पादन क्षमता में वृद्धि के परिणामस्वरूप लोहा-इस्पात उद्योग का उत्पादन बहुत बढ़ गया।

वृहत् इस्पात कारखानों के अतिरिक्त देश में लघु इस्पात कारखानों में भी इस्पात का उत्पादन होता है । सन् 1991 की औद्योगिक नीति के अनुसार लोहा व इस्पात को सार्वजनिक क्षेत्र के लिए सुरक्षित उद्योगों से हटा दिया गया है। 2004-05 में तैयार इस्पात का उपभोग 334 लाख टन था। तैयार इस्पात का 2004-05 में 44 लाख टन का निर्यात किया गया।

लोहा-इस्पात उद्योग का महत्व

आधुनिक अर्थव्यवस्था में लोहा एवं इस्पात को सोने से भी ज्यादा महत्व दिया जाता है, क्योंकि यह देश के आधारभूत उद्योगों में प्रथम स्थान रखता है। लोहा-इस्पात उद्योग का महत्व निम्नांकित है- 

1. आधारभूत उद्योग - देश की सुदृढ़ अर्थव्यवस्था के लिए औद्योगिक विकास अनिवार्य है और औद्योगिक विकास के लिए लोहा व इस्पात उद्योग आधारभूत आवश्यकताएँ पूरी करते हैं।

2. औद्योगिक विकास - लघु वृहत् सभी प्रकार के उद्योगों में विभिन्न प्रकार के उपकरणों की आवश्यकता होती है। ये उपकरण लोहा व इस्पात उद्योग द्वारा ही निर्मित किए जाते हैं।

3. रोजगार में वृद्धि - लोहा - इस्पात उद्योग में देश की लगभग एक करोड़ जनसंख्या कार्यरत हैं। इससे रोजगार में वृद्धि होती है।

4. कृषि के आधुनिकीकरण में सहायक - भारतीय कृषि के आधुनिकीकरण के लिए ट्रेक्टर, थ्रेसर पम्प, नलकूप जैसे कई साधनों की पूर्ति लोहा एवं इस्पात उद्योग पर ही निर्भर है।

5. विदेशी मुद्रा की प्राप्ति - भारत लोहा व इस्पात उद्योग के अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार द्वारा करोड़ों रुपये की विदेशी मुद्रा अर्जित करता है।

6. राष्ट्रीय सुरक्षा में महत्व - लोहा - इस्पात द्वारा विभिन्न प्रकार के अस्त्र, -शस्त्र, बन्दूकें, तोप, टैंक, जहाज, मिसाइलें आदि बनाये जाते हैं। देश के आंतरिक एवं बाहरी सुरक्षा के लिए ये सब आवश्यक भी होते हैं, अतः राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से लोहा-इस्पात उद्योग का महत्वपूर्ण स्थान है।

7. संचार साधनों का विकास - देश में संचार साधन के रूप में दूरभाष सेवाओं की उपयोगिता बढ़ती जा रही है इन साधनों के विकास हेतु लोहा- इस्पात अनिवार्य रूप से उपयोगी है।

8. भवन निर्माण - व्यक्ति की एक महत्वपूर्ण आवश्यकता है मकान लोहा व इस्पात उद्योग मकानों के निर्माण के लिए इस्पात तैयार करता है, जो कि विविध रूपों में उपयोग किया जाता है।

भिलाई में लौह-इस्पात कारखाने की स्थापना के कारण

भिलाई में लौह-इस्पात संयंत्र की स्थापना में निम्नांकित कारकों का योगदान रहा है -

1. कच्चे माल की सुविधा - भिलाई कच्चे लोहे के क्षेत्र के निकट है । दल्लीराजहरा की कच्चे लोहे की खानें जो वहाँ से 40 कि.मी. दूर हैं, से शुद्ध खनिज लोहा प्राप्त होता है।

2. कोयले की सुविधा - शक्ति के साधन के रूप में भिलाई इस्पात संयंत्र को बिहार की कारमाली, झरिया तथा छत्तीसगढ़ की कोयला खदानों से कोयला प्राप्त होता है।

3. जल आपूर्ति - भिलाई इस्पात संयंत्र को जल आपूर्ति तान्दुला नहर के जरिए, गंगरेल बाँध से होता है, जो इस स्थान से नजदीक है।

4. रेलमार्ग की सुविधा - भिलाई इस्पात संयंत्र को मुम्बई-हावड़ा रेल मार्ग की सुविधा प्राप्त है। इसके अतिरिक्त से सड़क मार्ग राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 6 से जुड़ा होता है। जिससे उद्योग का उत्पादन देश के आंतरिक भागों में गा पहुँचाया जा सकता है।

5. अन्य खनिज की प्राप्ति - भिलाई इस्पात संयंत्र को मैंगनीज नागपुर और बालाघाट से चूने का पत्थर नंदिनी की खानों से और डोलोमाइट रायपुर और बिलासपुर के खानों से प्राप्त होता है। ये सब खानें भिलाई के निकट हैं। 

6. विदेशी तकनीक - भिलाई इस्पात संयंत्र के स्थानीयकरण में सोवियत संघ (पूर्व में) की तकनीकी एवं वित्तीय सहायता का महत्वपूर्ण योगदान है।

लोहा व इस्पात उद्योग की समस्याएँ

लोहा व इस्पात उद्योग की प्रमुख समस्याएँ निम्नांकित हैं -

1. उत्तम किस्म के कोयले का अभाव - लोहा गलाने के लिए बड़ी मात्रा में उत्तम किस्म के धातु शोधक को कोयले की आवश्यकता होती है, जिसका अपने देश में अभाव है, अतः इस्पात के कारखानों में पूर्ण क्षमता का उपयोग नहीं हो पाता।

2. प्रशिक्षित कर्मचारियों एवं तकनीकी विशेषज्ञों का अभाव - लोहा-इस्पात उद्योग में कार्यरत श्रमिकों में तकनीकी विशेषता एवं प्रशिक्षित कर्मचारियों का अभाव है। इसीलिए उच्च वेतनमान पर विदेशी विशेषज्ञों को नियुक्त करना पड़ता है।

3. पूँजी का अभाव - लोहा - इस्पात उद्योग के लिए एक विशाल पूँजी की आवश्यकता होती है। पूँजी की कमी के कारण उद्योग के विस्तार व सुधार में कठिनाइयाँ आती हैं तथा उद्योग का आधुनिकीकरण नहीं किया जा सकता है।

4. करों का भार - लोहा- इस्पात उद्योग में निर्मित पक्के माल पर करों का अधिक भार है। कर-भार के कारण तैयार लोहा- इस्पात बहुत महँगा हो जाता है।

5. आधुनिक मशीनों का अभाव - लोहा - इस्पात उद्योग में आधुनिक ढंग की मशीनों एवं उपकरणों का अभाव है। 

6. श्रम समस्याएँ - अन्य उद्योगों की भाँति श्रम समस्याओं से लोहा-इस्पात उद्योग भी अछूता नहीं रहा है। समयसमय पर वेतन वृद्धि की माँग, हड़ताल आदि उद्योग के उत्पादन को प्रभावित करती हैं।

7. परिवहन के साधनों का पर्याप्त न होना - भारत में कच्चा माल कारखानों तक ले जाने के लिए तथा निर्मित लोहा-इस्पात को ढोने के लिए तीव्रगामी परिवहन के साधन पर्याप्त मात्रा में नहीं हैं। 

8. उत्पादन क्षमता का अपूर्ण उपयोग - लोहा-इस्पात उद्योग की उत्पादन क्षमता का उपयोग नहीं हो पा रहा है, जो भी उत्पादन हो रहा है, वह क्षमता से कम है, अतः आयात पर निर्भर रहना पड़ता है।

लोहा-इस्पात उद्योग की समस्याओं के समाधान हेतु सुझाव

भारत में लोहा-इस्पात उद्योग की समस्याओं के समाधान हेतु निम्नांकित सुझाव दिये जा सकते हैं -

1. उत्तम किस्म के कोयले का प्रबंध - भारत में अच्छी किस्म के कोयले के उत्पादन तथा कोयला धोने के कारखानों की स्थापना पर बल दिया जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त वैकल्पिक रीतियों के प्रयोग के माध्यम से इस समस्या से छुटकारा पाने के प्रयास भी किये जाने चाहिए। 

2. परिवहन की सुविधाएँ - परिवहन की समस्या का समाधान करने के लिए सरकार द्वारा लोहा-इस्पात उद्योग के क्षेत्र में परिवहन की सस्ती एवं तीव्र सेवाएँ पर्याप्त मात्रा के उपलब्ध करवायी जानी चाहिए।

3. नवीन तकनीक का उपयोग - लोहा-इस्पात उद्योग में लागत को घटाने, उत्पादकता तथा लाभदायकता को बढ़ाने के लिए नवीन तकनीक का प्रयोग किया जाना आवश्यक है, अतः इस दिशा में आवश्यक कदम उठाये जाने चाहिए।

4. प्रशिक्षण सुविधाओं का विस्तार - लोहा- इस्पात उद्योग में विशेषज्ञों एवं तकनीकी कर्मचारियों के अभाव को दूर करने के लिए देश में इंजीनियरों, तकनीकी विशेषज्ञों एवं कर्मचारियों को आवश्यक प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। 

5. पूँजी की व्यवस्था - लोहा - इस्पात उद्योग में विशाल पूँजी की आवश्यकता होती है, अत: कारखानों की स्थापना, विकास एवं विस्तार के लिए विशिष्ट वित्तीय संस्थाओं से दीर्घकालीन ऋण कम ब्याज दर पर एवं विश्व बैंक से बड़ी मात्रा में ऋण लेकर पूँजी की पर्याप्त व्यवस्था करनी चाहिए।

6. करों में छूट - लोह-इस्पात उद्योग में उत्पादन को प्रोत्साहन देने के लिए सरकार को उदार नीति अपनानी चाहिए और करों में छूट प्रदान करना चाहिए।

7. श्रम समस्याओं का समाधान - श्रम समस्याओं को कम करने के आवश्यक प्रयास किये जाने चाहिए। इस संदर्भ में विभिन्न सयंत्रों के माध्यम से न्यूनतम एवं अधिकतम मजदूरी का निर्धारण करने के साथ-साथ कार्य की दशाएँ भी निर्धारित की जानी चाहिए।

8. पूर्ण क्षमता का उपयोग - सरकार को लोहा-इस्पात उद्योग में कार्यरत इकाइयों को अपनी पूर्ण क्षमता का प्रयोग करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए तथा इसके लिए आवश्यक कदम उठाने चाहिए। 

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