कर कितने प्रकार के होते हैं - types of taxes

Post Date : 05 August 2022

 कर कितने प्रकार के होते हैं

वर्तमान में विश्व के लगभग सभी देशों में बहुकर प्रणाली प्रचलित है। करों के स्वभाव, उद्देश्य, कार्य अथवा भुगतान विधि के आधार पर विभिन्न अर्थशास्त्रियों ने करों का वर्गीकरण अलग-अलग ढंग से किया है। सामान्यत: करों का वर्गीकरण निम्न श्रेणियों के अंतर्गत किया जाता है -

  1. प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कर,
  2. आनुपातिक, प्रगतिशील, प्रतिगामी तथा अधोगामी कर,
  3. विशिष्ट एवं मूल्यानुसार कर,
  4. एकल कर एवं बहुकर प्रणाली।

1. प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कर

सामान्यतया, प्रत्यक्ष कर वे कर होते हैं जिनका भुगतान एक ही बार में कर दिया जाता है तथा वे ही व्यक्ति उनका भुगतान करते हैं जिन पर वह लगाया जाता है अर्थात् उनके भार को दूसरों पर टाला नहीं जा सकता। दूसरे शब्दों में, जब किसी कर का आघात एवं कर का भार अंतिम रूप से किसी एक ही व्यक्ति पर पड़ता है तो उसे प्रत्यक्ष कर कहा जाता है। ऐसे कर के भार को दूसरे व्यक्तियों पर टाला नहीं जा सकता । प्रत्यक्ष कर की प्रमुख परिभाषाएँ निम्न हैं-

डॉ. डाल्टन के अनुसार - प्रत्यक्ष कर वह कर है। जिसका भुगतान वास्तव में उसी व्यक्ति के द्वारा किया जाता है जिस पर यह कानूनी तौर से लगाया जाता है। 

प्रो. जे. एस. मिल के शब्दों में - प्रत्यक्ष कर वह कर है। जो उसी व्यक्ति से माँगा जाता है जिससे उसे भुगतान करने की आशा की जाती है। 

आर्मिटेज स्मिथ के अनुसार - प्रत्यक्ष कर से तात्पर्य यह है कि यह कर हस्तांतरित एवं विवर्तित नहीं किया जा सकता, वरन् उसी व्यक्ति पर लगाया जाता है। जिससे भार सहन करने की आशा की जाती है। आय कर प्रत्यक्ष कर का श्रेष्ठ उदाहरण है। 

फिण्डले शिराज के अनुसार - प्रत्यक्ष कर वे हैं। जो शीघ्र ही व्यक्तियों की आय एवं सम्पत्ति पर लगाये जाते हैं। और जिनका भुगतान सरकार को प्रत्यक्ष रूप में किया जाता है। इस प्रकार आय एवं सम्पत्ति कर, मृत्यु कर, पोल कर आदि प्रत्यक्ष कर के उदाहरण हैं। 

प्रत्यक्ष कर गुण - प्रत्यक्ष कर में निम्न गुण होते हैं -

1. समानता एवं न्यायोचित - प्रत्यक्ष कर, करदान क्षमता के सिद्धान्त पर आधारित होते हैं और इनमें अलग-अलग लोगों एवं संस्थाओं पर करों के भार का वितरण न्यायपूर्ण तरीके से किया जाता है। अर्थात् जो अधिक कमाता है। वह अधिक कर देता है और जो कम कमाता है वह कम कर देता है। इसीलिए इसमें समानता होती है।

 2. निश्चितता - प्रत्यक्ष कर में निश्चितता का गुण होता है। क्योंकि करदाता को इस बात की निश्चितता रहती है कि उसे कर के रूप में कितनी राशि चुकानी है। राज्य को भी निश्चितता रहती है कि प्रत्यक्ष कर से उसे कितनी आय प्राप्त होगी, ताकि उसके अनुसार व्यय का समायोजन किया जा सके।

3. उत्पादकता - प्रत्यक्ष कर में उत्पादकता का गुण पाया जाता है क्योंकि जैसे-जैसे सम्पत्ति बढ़ती जाती है, वैसे-वैसे कर से होने वाली आय भी बढ़ती जाती है। 

4. मितव्ययिता - प्रत्यक्ष कर को संग्रह करने में मितव्ययता रहती है। इन करों का संग्रह, व्यय की अपेक्षा करों से प्राप्त होने वाली आय अधिक होती है। इसीलिए इन करों में न्यायशीलता, निश्चितता, मितव्ययिता, उत्पादकता एवं प्रगतिशीलता के गुण पाये जाते हैं। जिससे नागरिकता जाग्रत होती है।

5. लोचकता - प्रत्यक्ष कर में लोचकता का भी गुण पाया जाता है। इनकी दर संकटकाल में बढ़ायी जा सकती है, और सामान्य स्थिति में करों को नीचा किया जा सकता है। साथ ही अधिक छूटें देकर आवश्यकतानुसार सरकार आय कम कर सकती है।

6. नागरिक चैतन्यता - प्रत्यक्ष कर नागरिकों में जागरुकता की भावना पैदा करते हैं। करदाता जानता है कि वह सरकार को कर दे रहा है, उसकी अभिरुचि इस बात में रहती है कि सरकार इस आय को किस प्रकार व्यय कर रही है। इस प्रकार व्यक्ति नागरिक के रूप में अपने कर्तव्य और अधिकारों के प्रति सजग रहता है। 

प्रत्यक्ष कर के दोष - प्रत्यक्ष कर के प्रमुख दोष निम्नलिखित हैं -

1. असुविधाजनक - प्रत्यक्ष कर का प्रथम दोष यह है कि ये असुविधाजनक होते हैं। क्योंकि करदाताओं को अपनी आय का सरकारी नियमों के अनुसार लम्बा-चौड़ा हिसाब रखना पड़ता है। जरा-सी गलती होने पर करदाताओं को भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। इसके साथ ही करदाताओं को एक ही बार में भारी मात्रा में कर का भुगतान करना पड़ता है जिससे उन्हें बड़ा मानसिक कष्ट होता है।

2. कर अपवंचन - प्रत्यक्ष करों का सबसे बड़ा दोष यह है कि इनमें करों के अपवंचन अथवा चोरी की अधिक गुंजाइश रहती है। प्राय: लोग झूठा हिसाब प्रस्तुत कर या तो अपने आपको इन करों से पूर्णरूप से बचा लेते हैं अथवा करों की चोरी कर लेते हैं अर्थात् कम मात्रा में करों का भुगतान करते हैं।

3. करों की मनमानी दर - सरकार द्वारा प्रत्यक्ष करों की जो दर निर्धारित की जाती है। उनके पीछे कोई वैज्ञानिक आधार नहीं होता। एक निश्चित मात्रा में सम्पत्ति और निश्चित आय के नीचे सब व्यक्तियों को कर से छूट दे दी जाती है तथा यह सीमा भी प्रत्येक वार्षिक बजट में परिवर्तित कर दी जाती है। इसके पीछे कोई ठोस आधार नहीं होता।

4. सीमित क्षेत्र - प्रत्यक्ष कर चूँकि सम्पत्ति और आय पर लगाए जाते हैं। इसलिए इनका क्षेत्र सीमित हो जाता है तथा निर्धन और कम आय वाला वर्ग इनकी पहुँच के बाहर होता है।

5. बचत एवं विनियोग पर प्रतिकूल प्रभाव - यदि प्रत्यक्ष करों की दर बहुत ऊँची होती है तो इसका बचत एवं विनियोग पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। प्रायः पत्यक्ष करों का भार उसी वर्ग पर पड़ता है जो बचत और विनियोग कर सकते हैं। भारत में प्रत्यक्ष करों की दर काफी ऊँची रही है।

6. अलोकप्रिय - प्रत्यक्ष कर लोकप्रिय नहीं होते हैं। क्योंकि इन करों का भुगतान होने के कारण करदाता इनको ठीक नहीं समझते हैं।

7. संकटकाल में सहायक नहीं - प्रत्यक्ष कर संकटकाल में सहायक नहीं होते हैं। जब सरकार को अधिक आय प्राप्त करने की इच्छा होती है तब उस समय इन करों से अधिक सहायता नहीं मिलती है, क्योंकि जनता सरकार का विरोध करने लगती है और इस प्रकार सरकार को जनता का सहयोग प्राप्त नहीं होता है।

अप्रत्यक्ष कर

सामान्यतया, अप्रत्यक्ष कर वे कर हैं जिनका भुगतान दूसरे व्यक्तियों पर टाला जा सकता है। अर्थात् अप्रत्यक्ष कर का कराघात किसी एक व्यक्ति पर पड़ता है जो कर के मौद्रिक भार को अन्य व्यक्तियों के कन्धे पर टाल देता है। वस्तुओं एवं सेवाओं पर लगाये गये कर अप्रत्यक्ष कर होते हैं। जैसे- विक्रय कर, आयात एवं निर्यात कर इत्यादि। इन करों को करदाता वस्तुओं एवं सेवाओं के मूल्यों में वृद्धि करके इनके भार को उपभोक्ताओं पर डाल देता है। इस प्रकार, यही प्रत्यक्ष कर एवं अप्रत्यक्ष कर में महत्वपूर्ण अन्तर है।

अप्रत्यक्ष कर की परिभाषा 

डॉ. डाल्टन के अनुसार - अप्रत्यक्ष कर एक व्यक्ति पर लगाया जाता है तथा पूर्णतया अथवा अंशदाता अन्य एक व्यक्ति द्वारा भुगतान किया जाता है। जो कि अनुबंधित एवं सौदा करने की शर्तों के परिणामस्वरूप ऐसा होता है। 

प्रो. जे. एस. मिल के शब्दों में - अप्रत्यक्ष कर वह कर है जो व्यक्ति से इस आशा के साथ माँगा जाता है कि वह दूसरों पर बोझ डालकर अपनी क्षतिपूर्ति कर लेगा।

आर्मिटेज स्मिथ के शब्दों में - अप्रत्यक्ष कर वस्तुओं एवं सेवाओं पर ऐसे कर होते हैं जिन्हें अन्य व्यक्तियों पर वितरित किया जा सकता है।

निष्कर्ष रूप में यह कहा जा सकता है कि जिस कर का कराघात एवं करापात अलग-अलग लोगों पर पड़ता है तो वह कर अप्रत्यक्ष या परोक्ष कर कहलाता है।

अप्रत्यक्ष कर के गुण - अप्रत्यक्ष कर के प्रमुख गुण निम्नलिखित है -

1. सुविधाजनक - अप्रत्यक्ष कर सुविधाजनक होते हैं, क्योंकि वे ऐसे समय लगाये जाते हैं जबकि व्यक्ति वस्तु को क्रय करता है अथवा सेवा का उपभोग करता है। इससे करदाता कर के भार को महसूस नहीं करता। इसके साथ ही इन करों का भुगतान छोटी-छोटी किस्तों में तथा समयान्तरों पर करना पड़ता है।

2. करवंचन कठिन - अप्रत्यक्ष कर का एक गुण यह है कि इस प्रकार के कर की चोरी करना सरल नहीं होता है, क्योंकि ये कर वस्तुओं एवं सेवाओं के मूल्यों में सम्मिलित रहते हैं, फलतः जब कोई व्यक्ति वस्तु या सेवा क्रय करता है तो उसे ये कर 1 आवश्यक रूप से देने पड़ते हैं।

3. लोचदार - ये कर लोचदार होते हैं। इन करों की दरों में थोड़ी सी वृद्धि करने से ही करों से प्राप्त राशि की मात्रा अधिक बढ़ जाती है। इसी प्रकार दर कम करके इस आय को घटाया जा सकता है।

4. न्यायपूर्ण - अप्रत्यक्ष कर का एक गुण यह है कि ये न्यायपूर्ण होते हैं, क्योंकि इन करों को वस्तुओं और सेवाओं पर लगाया जाता है जिनको सभी लोगों द्वारा अपनी-अपनी क्षमताओं के अनुसार क्रय किया जाता है और कर का भुगतान करते हैं। इस प्रकार कर आनुपातिक होते हैं।

5. विस्तृत आधार - अप्रत्यक्ष कर से देश की कर प्रणाली के आधार को विस्तृत किया जा सकता है तथा कर प्रणाली को भी सरलतापूर्वक बढ़ाया जा सकता है।

6. हानिकारक वस्तुओं पर रोक - अप्रत्यक्ष कर का एक गुण यह है कि इनके द्वारा हानिकारक वस्तुओं, जैसेशराब, अफीम आदि पर ऊँची दर से कर लगाकर उनके उपभोग को रोका जा सकता है। ये कर समाज को सेवाएँ भी प्रदान करते हैं तथा सरकार को भी आय प्रदान करते हैं। 

7. मितव्ययी - अप्रत्यक्ष कर मितव्ययी होते हैं, क्योंकि इनको जमा करने तथा संग्रह करने में अत्यधिक खर्च नहीं करना पड़ता है। 

8. लोकप्रिय - अप्रत्यक्ष कर लोकप्रिय भी होते हैं। क्योंकि इन करों को देने में करदाता को कोई विशेष कष्ट नहीं होता है। इनके भुगतान में भी कोई विशेष कठिनाई नहीं होती है। 

अप्रत्यक्ष कर के दोष - अप्रत्यक्ष कर के प्रमुख दोष निम्नलिखित हैं -

1. कर की चोरी - अप्रत्यक्ष कर का दोष यह है कि इन करों की चोरी की संभावना अधिक रहती है। चोरबाजारी तथा नकली खाते बनाकर इन करों की चोरी की संभावना अधिक रहती है। फलतः समाज में भ्रष्टाचार तथा बेईमानी को बढ़ावा मिलता है और अधिकारी वर्ग भी अपना नैतिक उत्थान नहीं कर पाते।

2. असमानता - अप्रत्यक्ष कर बिना किसी प्रकार का भेद किये, यहाँ तक कि लोगों की कर चुकाने की योग्यता को ध्यान में रखे बिना ही सभी लोगों पर लगाये जाते हैं। अत: यह अन्यायपूर्ण एवं असमानतापूर्ण माने जाते हैं।

3. न्यायोचित नहीं - अप्रत्यक्ष कर प्रायः वस्तुओं एवं सेवाओं पर लगाये जाते हैं। अतः इनका भार गरीबों पर अधिक पड़ता है, जो न्यायसंगत नहीं है।

4. अत्यधिक अनिश्चित - अप्रत्यक्ष कर का एक दोष यह है कि ये कर अत्यधिक अनिश्चित होते हैं। इन करों से प्राप्त होने वाली आय अनिश्चित होती है और उसका ठीकठीक अनुमान लगाना भी कठिन होता है।

5. बेलोचदार - अप्रत्यक्ष कर में लोचकता का अभाव रहता है, क्योंकि ऐसी वस्तुओं की माँग बेलोचदार होती है। विलासिता की वस्तुओं पर इन करों को लगाने से उनके मूल्य बढ़कर माँग गिर जाती है, जिससे सरकार को भी पर्याप्त आय प्राप्त नहीं होती है जिससे इन करों में लोच का अभाव पाया जाता है।

6. प्रतिगामी - अप्रत्यक्ष कर प्रतिगामी भी होते हैं, क्योंकि इनका अत्यधिक भार गरीबों पर  पड़ता है।

7. मध्यस्थ - अप्रत्यक्ष कर में सरकार तथा अंतिम उपभोक्ता के मध्य अनेक मध्यस्थ कार्य करते हैं, जो कि मूल्य बढ़ाने में सहायक होते हैं।

8. नागरिक चेतना की कमी - अप्रत्यक्ष कर का एक दोष यह है कि इनमें नागरिक चेतना की कमी होती है, क्योंकि ये कर, मूल्यों में दिये जाते हैं जिससे वस्तु खरीदने वाले व्यक्ति को महसूस नहीं हो पाता और उसमें नागरिक चेतना जाग्रत नहीं हो पाती।

9. अमितव्ययी - अप्रत्यक्ष करों को वसूल करने में भी भारी खर्च करना पड़ता है। इससे ये अमितव्ययी होते हैं।

प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष करों में संबंध

प्राचीन समय से यह विवाद चला आ रहा है कि प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष करों में कौन-सा कर श्रेष्ठ है। अधिकांश अर्थशास्त्रियों ने अप्रत्यक्ष कर की तुलना में प्रत्यक्ष कर को श्रेष्ठ माना है। क्योंकि अप्रत्यक्ष करों का भार गरीब वर्ग द्वारा उठाया जाता है। जबकि प्रत्यक्ष करों का भार अमीर वर्ग द्वारा। जैसा कि डॉल्टन ने कहा है कि इन विचार के पक्ष में कोई सैद्धान्तिक आधार नहीं, केवल कुछ व्यावहारिक आधार है।

वस्तुतः किसी भी देश की कर प्रणाली के अन्तर्गत प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष दोनों ही प्रकार के करों के बीच उचित संतुलन होना चाहिए। दोनों ही कर एक-दूसरे के दोषों को दूर करते हैं। अर्थात् दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं।

ग्रेट स्काट मैन के शब्दों में मैं प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष करों के बारे में इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं सोच सकता कि मैं उनको दो आकर्षक बहनों के समान मान लूँ, जो लंदन के सुन्दर संसार में आयी हैं। दोनों ही बड़ी भाग्यशाली हैं। दोनों के माता-पिता एक हैं। मेरा विश्वास है कि दोनों के माता-पिता आवश्यकता और आविष्कार हैं। इन दोनों में अन्तर केवल इतना हो सकता है जितना कि दो बहनों में होता है।

प्रत्यक्ष कर, अप्रत्यक्ष करों के पूरक होते हैं, क्योंकि- 

  • अप्रत्यक्ष कर लोगों के उपभोग पर लगाये जाते हैं। और आय की उस मात्रा पर भी कर वसूल करते हैं जो प्रत्यक्ष करों से बच जाती है। 
  • वे किसी व्यक्ति की समयानुसार परिवर्तनशील आय को भी ध्यान में रख सकते हैं। क्योंकि आय में परिवर्तन हो जाता है। वस्तुतः अप्रत्यक्ष कर आय में परिवर्तनों को अपने क्षेत्र में लाकर उन पर भी कर ले लेते हैं। 

इसी प्रकार अप्रत्यक्ष कर, प्रत्यक्ष करों के पूरक होते हैं, क्योंकि- 

  • अप्रत्यक्ष कर ऐसी वस्तुओं पर नहीं लगाये जा सकते, जिनका उपभोग स्वयं उत्पादकों द्वारा किया जाता है। 
  • अप्रत्यक्ष कर सभी प्रकार की वस्तुओं एवं सेवाओं पर नहीं लगाये जाते हैं एवं 
  • अप्रत्यक्ष करों में भी कर की चोरी हो सकती है। इन कारणों से दोनों कर एक साथ लगाये जाते हैं।

2. आनुपातिक, प्रगतिशील, प्रतिगामी एवं अधोगामी कर 

आनुपातिक कर 

आनुपातिक कर प्रणाली से सभी व्यक्तियों से एक निश्चित दर के अनुसार कर वसूल किए जाते हैं, अर्थात् निर्धन लोगों के लिए कर की जो दर रहती है। वही दर धनी वर्ग के व्यक्तियों के लिए रहती है । जैसे, यदि एक व्यक्ति की आय दो हजार रु. है तथा दूसरे व्यक्ति की पाँच हजार रुपये है और कर प्रणाली की आनुपातिक दर 10 प्रतिशत है तो पहले व्यक्ति को दो सौ रुपये और दूसरे व्यक्ति को पाँच सौ रुपये का भुगतान करना पड़ेगा।

डॉ. डाल्टन के अनुसार - आनुपातिक करारोपण के अंतर्गत सभी करदाता अपनी आय का समान अनुपात करों के रूप में भुगतान करते हैं। 

फिलिप ई. टेलर के शब्दों में - आनुपातिक कर की दरों की तालिका वह होती है जिसमें कर के आधार में परिवर्तन होने पर भी कर की दर समान रहती है। 

आनुपातिक कर के गुण - आनुपातिक कर के प्रमुख गुण निम्नलिखित हैं -

1. सरलता - आनुपातिक कर प्रणाली का सबसे बड़ा गुण यह है कि यह बहुत ही सरल होती है अर्थात् आनुपातिक कर सरलता के सिद्धान्त को पूरा करते हैं।

2. धन के वितरण को पूर्ववत् रखता है - आनुपातिक कर प्रणाली का दूसरा प्रमुख गुण यह है कि यह समाज में धन के वितरण को पूर्ववत् ही रखता है।

3. कर की अनुचित वृद्धि पर रोक - आनुपातिक कर प्रणाली में सरकार मनमाने ढंग से कर नहीं लगाती है। 

आनुपातिक कर के दोष - आनुपातिक कर के प्रमुख दोष निम्नलिखित हैं -

1. न्यायशीलता का अभाव - आनुपातिक कर प्रणाली न्यायपूर्ण नहीं है। यदि हम उपयोगिता ह्रास नियम को मुद्रा पर लागू करें, तो स्पष्ट हो जाता है कि अधिक आय वाले व्यक्ति को मुद्रा की अतिरिक्त इकाई से, निर्धन की अपेक्षा, कम संतुष्टि प्राप्त होती है। इस प्रकार, आनुपातिक करों से करों के भार का वितरण असमान रूप से होता है। 

2. लोच का अभाव - आनुपातिक करों में लोच का अभाव है। यदि सरकार को अधिक आय की आवश्यकता होती है और पहले ही करों की दर अधिक है तो विशेष रूप से निर्धन व्यक्तियों से अधिक कर नहीं लिये जा सकते, क्योंकि ऐसी स्थिति में करों की दर बढ़ाना संभव नहीं होता ।

3. मितव्ययिता का अभाव - आनुपातिक कर प्रणाली अमितव्ययी होती है, क्योंकि इसमें प्रत्येक व्यक्ति से कर वसूल करना पड़ता है, अर्थात् अधिक आय वालों के साथ कम आय वालों से भी कर वसूल करना पड़ता है। इसलिए, इससे आय की रकम कम होती है तथा खर्च अधिक पड़ता है।

इस प्रकार, यदि आनुपातिक कर प्रणाली को अपनाया जाता है, तो इससे करों के भार का वितरण अन्यायपूर्ण होगा, सरकार को पर्याप्त आय प्राप्त नहीं होगी तथा करों के ढाँचे में लोच का अभाव होगा। 

 प्रगतिशील अथवा आरोही कर 

प्रगतिशील कर प्रणाली, ऐसी प्रणाली है जिसमें आय की वृद्धि के साथ ही कर की दर में भी वृद्धि होती जाती है अर्थात् इस प्रकार के कर के अंतर्गत कम आय वाले व्यक्तियों को कम दर से कर देना पड़ता है तथा अधिक आय वाले व्यक्तियों को अधिक दर से कर देना पड़ता है। जैसे- भार में आय-कर ढाँचा प्रगतिशील कर प्रणाली के अनुरूप है। 

डॉ. डाल्टन के अनुसार - प्रगतिशील कर में करदाता की आय जितनी अधिक होती है। उतने ही अधिक अनुपात में वह कर का भुगतान करता है।

प्रो. टेलर के शब्दों में - प्रगतिशील कर की दरों की तालिका वह है, जिसमें कर के आधार में वृद्धि के साथ-साथ कर की दर भी बढ़ती जाती है।

प्रगतिशील कर के गुण - प्रगतिशील कर के प्रमुख गुण निम्नलिखित हैं -

1. न्यायपूर्ण - प्रगतिशील कर प्रणाली न्यायपूर्ण है, क्योंकि इसमें ऊँची आय वालों से ऊँची दर के आधार पर कर लिया जाता है। जो उपयोगिता ह्रास नियम के अनुरूप है। इस प्रकार यह प्रणाली कर देने की योग्यता के अनुरूप है। 

2. कुल त्याग न्यूनतम सिद्धान्त के अनुरूप - प्रगतिशील कर प्रणाली में, निर्धन व्यक्तियों की तुलना में धनी व्यक्तियों को कम त्याग करना पड़ता है जो कि उपयोगिता ह्रास नियम से स्पष्ट हो गया है। यदि धनी व्यक्तियों पर ऊँची दर से कर लगाए जाते हैं और निर्धन व्यक्तियों को या तो करों से मुक्त कर दिया जाता है अथवा बहुत नीची दरों पर कर लगाये जाते हैं तो पूरे समुदाय पर करों का भार न्यूनतम होगा। 

3. वितरण में समानता - प्रगतिशील कर से धन के वितरण में अधिक समानता लायी जा सकती है। इन करों से धनी व्यक्तियों की क्रयशक्ति को कम किया जा सकता है और इस आय को सार्वजनिक व्यय के माध्यम से निर्धन व्यक्तियों पर व्यय करके वितरण में समानता लायी जा सकती है। इस प्रकार समाज की कुल संतुष्टि को अधिकतम किया जा सकता है।

4. सरकार की आय में वृद्धि संभव - प्रगतिशील कर के माध्यम से अमीर व्यक्तियों पर ऊँची दर से कर लगाकर सरकार अपनी आय में वृद्धि कर सकती है।

5. लोचपूर्ण - प्रगतिशील कर से एक लाभ यह है कि सरकार अपनी आय को आवश्यकता पड़ने पर बढ़ा सकती है। प्रगतिशील कर में धनी व्यक्तियों पर कर की दर बढ़ाकर आय में वृद्धि की जा सकती है। 

6. मितव्ययिता - प्रगतिशील कर मितव्ययी भी होते हैं, क्योंकि इन्हें एकत्रित करने की लागत अधिक नहीं होती। इस प्रकार करों के संग्रह पर कम व्यय करके सरकार प्रगतिशील करों के माध्यम से अधिक राजस्व प्राप्त कर सकती है। 

प्रगतिशील कर के दोष - प्रगतिशील कर के प्रमुख दोष निम्नलिखित हैं-

1. उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव - यदि प्रगतिशील कर की दर बहुत ऊँची रहती है तो बचत, विनियोग और उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

2. कर का आधार गलत - कुछ विद्वानों के अनुसार प्रगतिशील कर का आधार गलत है, क्योंकि यह इस मान्यता पर आधारित है कि तुलनात्मक रूप से एक निर्धन व्यक्ति की तुलना में एक धनी व्यक्ति की मुद्रा की सीमांत उपयोगिता कम होती है।

3. प्रगतिशील कर प्रणाली अन्त में स्वयं समाप्त हो जाती है - प्रगतिशील करों से एकाधिकार और धन के केन्द्रीकरण पर रोक लगती है तथा लोगों की सम्पत्ति समान होने की प्रवृत्ति होती है। यदि यह स्थिति निरन्तर चलती रहे, तो करों में प्रगतिशीलता का आधार ही समाप्त हो जाएगा।

4. कर की मनमानी दर - यह आलोचना भी की जाती है कि विभिन्न प्रकार की आयों पर लगाने के लिए कर की जो दर निर्धारित की जाती है, वह प्रायः मनमाने ढंग से निश्चित की जाती है, जो किसी-न-किसी रूप से अन्यायपूर्ण होती है। 

5. बचत व परिश्रम हतोत्साहित - प्रगतिशील कर का एक दोष यह है कि यह कर बचत करने वालों एवं परिश्रम करने वालों को सजा देती है तथा फिजूलखर्ची करने वालों और आलसियों को प्रश्रय देती है।

निष्कर्ष रूप में यह कहा जा सकता है कि आजकल प्रगतिशील कर प्रणाली को उसके गुणों के कारण बहुत से देशों द्वारा अपनाया जा रहा है । यद्यपि इसमें कुछ दोष हैं, जिन्हें प्रशासनिक कुशलता द्वारा दूर किया जा सकता है। 

प्रतिगामी अथवा अवरोही कर प्रणाली 

प्रतिगामी कर, प्रगतिशील कर के ठीक विपरीत होता है। जब अधिक आय वाले पर कर की दर कम और कम आय वाले पर कर की दर अधिक होती है, तो इस कर को प्रतिगामी कर कहते हैं। इस प्रकार की कर प्रणाली में व्यक्ति की आय जैसे-जैसे बढ़ती है, कर की दर वैसे-वैसे घटती जाती है। भारत में नमक पर ऐसा ही कर था। कर का भार धनी व्यक्तियों की तुलना में निर्धन व्यक्तियों पर अधिक पड़ता है। 

डॉ. डाल्टन के शब्दों में प्रतिगामी करारोपण में करदाता की आय जितनी अधिक होती है, कर का दिया जाने वाला अनुपात उतना ही कम होता है।

प्रतिगामी कर के दोष - प्रतिगामी कर प्रणाली के प्रमुख दोष निम्नलिखित हैं -

1. यह प्रणाली बेलोचदार एवं अनुत्पादक है। क्योंकि सरकार को इससे कोई उल्लेखनीय आय प्राप्त नहीं होती। 
2. गरीबों पर कर भार का डालना न्याय संगत नहीं है।
3. प्रतिगामी कर न तो मितव्ययी होते हैं और न समानता के आधार पर इन्हें उचित कहा जा सकता है। 

अधोगामी कर 

ऐसे कर जिनमें किसी एक सीमा तक आय में वृद्धि के साथ ही साथ कर की दर बहुत मंद गति से बढ़ती है और एक निश्चित सीमा के बाद कर की दर आनुपातिक हो जाती है, अधोगामी कर कहलाते हैं। चूँकि यह कर एक सीमा तक मंद गति से प्रगतिशील तत्पश्चात् आनुपातिक होता है, इसलिए कर का भार निर्धनों पर धनी वर्गों की तुलना में अधिक होता है, जो कि न्याय संगत नहीं है ।

3. मूल्यानुसार एवं मात्रानुसार कर

जब किसी वस्तु पर उसके वजन के अनुसार या जिसकी इकाई या आकार के अनुसार कर लगाया जाता है, तब उसे मात्रानुसार कर या विशिष्ट कर कहते हैं। जैसे- किसी वस्तु के भार पर 50 रुपये प्रति मीट्रिक टन के हिसाब से कर लगाया जाये, तो इसे विशिष्ट कर एवं आकारानुसार कर भी कहते हैं। 

मात्रानुसार कर के गुण - मात्रानुसार कर के प्रमुख गुण अग्रलिखित होते हैं- 

1. इन करों को एकत्रित करना सुविधाजनक होता है। 

2. इन करों का अपवंचन भी सरलता से नहीं किया जा सकता, क्योंकि वस्तुओं की संख्या अथवा भार की जाँच की जा सकती है।

मात्रानुसार कर के दोष - मात्रानुसार कर का सबसे बड़ा दोष यह है कि ये न्यायपूर्ण नहीं होते, क्योंकि इनका भार निर्धन वर्ग पर अधिक पड़ता है। निर्धन वर्ग धनी व्यक्तियों की तुलना में ऐसी वस्तुओं का उपभोग करते हैं जिनका भार अधिक होता है।

मूल्यानुसार कर

जब किसी वस्तु पर उसके मूल्य के अनुसार कर लिया जाता है, तब उसे मूल्यानुसार कर कहते हैं। जैसे- किसी वस्तु के मूल्य पर 10 प्रतिशत की दर से कर लगाया जाये, तो यह मूल्यानुसार कर होगा। विक्रय कर प्रायः इसी पद्धति से लगाया जाता है। इसे यथामूल्य कर भी कहा जाता है।

मूल्यानुसार कर के गुण - मूल्यानुसार कर, मात्रानुसार कर की तुलना में पूर्ण होते हैं, क्योंकि इनको प्रगतिशील दरों से वसूल किया जा सकता है। प्राय: धनी लोग अधिक मूल्यवान वस्तुओं का प्रयोग करते हैं और यदि ऐसी वस्तुओं पर कर की दर ऊँची रखी जाये, तो इन करो को प्रगतिशील बनाया जा सकता है।

मूल्यानुसार कर के दोष - मूल्यानुसार कर के प्रमुख दोष निम्नलिखित हैं

1. मूल्यानुसार कर एकत्रित करने की दृष्टि से असुविधाजनक होते हैं, मूल्य का सही-सही पता लगाना पड़ता है। 

2. मूल्यानुसार करो' का अपवंचन किया जा सकता है, क्योंकि करदाता झूठे बिल बनाकर करों से बचने का प्रयास करते हैं।

उपर्युक्त दोनों कर एक-दूसरे के प्रतिगामी न होकर पूरक हैं। जिन वस्तुओं की गणना करना कठिन होता है, उन पर मूल्यानुसार कर लगाया जाता है तथा जिन वस्तुओं का भार ज्ञात किया जा सकता है अथवा गणना की जा सकती है, उन पर मात्रानुसार कर लगाया जाता है।

 4. एकल कर एवं बहुकर प्रणाली।

एक कर प्रणाली के अन्तर्गत राज्य द्वारा केवल एक कर लगाया जाता है या तो कृषि उत्पादन पर हो सकता है, आय पर हो सकता है अथवा किसी वस्तु पर हो सकता है।

प्रकृतिवादी अर्थशास्त्रियों का विचार था कि केवल कृषि उत्पादन पर कर लगाया जाये, क्योंकि केवल कृषि ही उत्पादक व्यवसाय है। प्रकृतिवादी मानते थे कि कृषि के अतिरिक्त अन्य सब व्यवसाय अनुत्पादक होते हैं, क्योंकि शुद्ध उत्पादन केवल कृषि में ही प्राप्त होता है।

दोष - यदि केवल भूमि पर कर लगाया जाता है। तो इसके प्रमुख दो दोष दिखाई देते हैं -

  1. यदि केवल कृषि पर कर लगाया जाता है। तो इससे सरकार को पर्याप्त आय प्राप्त नहीं होती। 
  2. कृषि पर लगाए जाने वाले कर का भार केवल कृषकों पर पड़ता है, जबकि पूँजीपति इन करों से बच जाते हैं। अतः यह कहना गलत है कि कर को विवर्तनीय किया जा सकता है।

केवल आय पर कर - समाजवादी विचारकों ने एक कर के रूप में केवल आय पर कर लगाने का समर्थन किया है। उनका तर्क है कि करों का भुगतान आय में ही किया जाता है, अतः एक ही कर लगाना पर्याप्त है तथा इसे प्रगतिशील बनाकर कर देने की योग्यता के अनुरूप बनाया जा सकता है।

दोष - केवल आय पर कर लगाने के निम्नलिखित दोष हो सकते हैं। 

  1. केवल आय पर कर लगाने से पर्याप्त आय प्राप्त नहीं हो सकती, 
  2. आय के अलावा अन्य स्रोतों से प्राप्त सम्पत्ति पर कर नहीं लगाया जा सकेगा, 
  3. इस कर की बड़ी मात्रा में चोरी की जाएगी, 
  4. निर्धन वर्ग की आय पर भी कर लगेगा तथा उसे आय का हिसाब-किताब रखने में असुविधा होगी, 
  5. सभी व्यक्तियों से आयकर वसूल करने का खर्च काफी होगा।

उपर्युक्त दोषों के कारण सभी देशों ने बहुकर प्रणाली को अपनाया है। 

बहुकर प्रणाली  

इसे अनेक कर प्रणाली भी कहते हैं। जैसा कि शब्द से ही स्पष्ट है कि इसके अन्तर्गत विभिन्न प्रकार के कर लगाकर सरकार आवश्यक धन एकत्रित कर सकती है। आर्थर यंग के शब्दों में यदि मैं करारोपण की श्रेष्ठ रीति की परिभाषा करूँ तो वह ऐसी होनी चाहिए जिसमें किसी विशेष बिन्दु पर बहुत अधिक कर भार न होकर अनन्त बिन्दु पर थोड़ा-थोड़ा भार हो।

आजकल प्रायः सब देशों में बहुकर प्रणाली ही लोकप्रिय है। इन करों में प्रगतिशील कर का गुण लाकर इन्हें न्यायपूर्ण भी बनाया जा सकता है। आजकल सरकारें आयकर, विक्रय कर, सम्पत्ति कर, उपहार कर, मृत्यु कर, उत्पादन कर, आयात कर आदि अनेक कर को अपना रही हैं।

गुण - बहुकर प्रणाली के निम्नलिखित गुण हैं -

  1. इन करों से सरकार को आवश्यकतानुसार पर्याप्त आय हो सकती है।
  2. करों को प्रगतिशील बनाकर न्यायपूर्ण बनाया जा सकता है।
  3. अनेक करों के माध्यम से राज्य के प्रायः सब वर्गों से सहयोग लिया जा सकता है।
  4. उचित उपाय अपनाकर करवंचन को रोका जा सकता है।

उपर्युक्त गुणों के कारण बहुकर प्रणाली का महत्व बढ़ता जा रहा है।