वैदिक सभ्यता क्या है - Vedic Civilization

 वैदिक सभ्यता क्या है

प्राचीन भारतीय सभ्यता का प्रारंभ वैदिक काल से माना जाता है। इस सभ्यता के निर्माता आर्य थे आज तक यह निश्चित नहीं हो पाया है कि आर्य कौन थे ? कहाँ से आए थे ? अथवा भारत ही उनका मूल निवास स्थान था ? लगभग 2000 ई.पू. में भारत आर्य सभ्यता का विकास हुआ। उनके मुख्य व्यवसाय पशुपालन और कृषि थे। उन्हें नगर संस्कृति का अनुभव नहीं था। 

वे प्रकृति की शक्तियों वर्षा एवं विद्युत के देवता इन्द्र, वायु के देवता मरुत और सूर्य की पूजा करते थे। इनका विश्वास था कि ये देवता समय पर वर्षा करते हैं। उनकी फसलों को पकाते हैं और शत्रुओं को पराजित करने में उनकी सहायता करते हैं। इन देवताओं की प्रशंसा में लिखे हुए सूक्तों का संग्रह ऋग्वेद में है। ऋग्वेद के सूक्तों की रचना सिंधु नदी के तट पर हुई। 

पंजाब से वे पूर्व की ओर बढ़े और गंगा की घाटी में फैल गए। फिर वे दक्षिण ओर विध्याचल तक पहुँच गए। इसके बाद वे भारत के अन्य भागों में फैले। उन्होंने यहाँ अनार्यों से वैवाहिक संबंध स्थापित किए इस प्रकार जिस भारतीय संस्कृति का विकास हुआ उसमें आर्य व अनार्य संस्कृति का समन्वय हुआ।

वैदिक सभ्यता क्या है - Vedic Civilization

आर्य प्रारंभ में छोटे-छोटे जनपदों में बटे हुए थे जो आपस में लड़ते रहते थे कालांतर में छोटे-छोटे से राज्य स्थापित हो पाए। इनमें कुछ में राजा और कुछ में अभिजात्य वर्ग के व्यक्ति शासन चलाते थे। छठवीं सदी ई.पू. में ये राज्य बड़े राज्यों में परिणित हो गए। इनमें कुछ राज्य और कुछ गणराज्य थे। ये सोलह राज्य महाजन पद कहलाते थे। 

इस समय मगध ( दक्षिण बिहार) का प्रदेश महत्वपूर्ण हो गया। कुछ दिनों पश्चात् मगध इतना शक्तिशाली हो गया कि उसने साम्राज्य का रूप धारण कर लिया इसी समय ईरानियों ने भारत पर आक्रमण पर कुछ स्थानों पर साम्राज्य स्थापित कर लिया। फलस्वरूप इन दोनों देशों में घनिष्ठ राजनैतिक व सांस्कृतिक संबंध स्थापित हो गए।

साम्राज्यों की स्थिति - मगध के राजा बिम्बिसार और अजातशत्रु ने अपनी शक्ति बढाने के लिए अन्य राज्यों से संघर्ष किया चौथी सदी ई.पू. में नंदवंश ने मगध में राज किया। उनकी राजधानी पाटली पुत्र थी जिसे आजकल पटना कहते हैं। चौथी सदी ई.पू. अंतिम चरण में नंदवंश के राजाओं ने मगध पर शासन किया उस समय एक तो सिंकदर के आक्रमण के कारण छोटे राज्यों की शक्ति कम हो गई थी दूसरी ईरानी साम्राज्य का पतन हो गया था। 

चन्द्रगुप्त मौर्य ने इस अव्यवस्थित परिस्थिति का लाभ उठाया और अपने मंत्री कौटिल्य की सहायता से भारत में पहले बड़े साम्राज्य की स्थापना की। चन्द्रगुप्त मौर्य तथा अशोक के शासनकाल में सुदुर दक्षिणी भाग के सिवाय लगभग सम्पूर्ण भारत मौर्य साम्राज्य के अंतर्गत आ गया।

सिंकदर के उत्तराधिकारी सैल्युकस की पराजय के पश्चात् एरिया आरकोशिया और परोपिन श्दय के प्रदेश मौर्य साम्राज्य के अंग बन गए। मौर्य साम्राज्य का अधिकतम विस्तार मानचित्र में दिखाया गया है। मौर्य काल (322 से 184 ई.पू.) में भारतीय जनता के सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक जीवन में अनेक महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए बौद्ध धर्म जिसका उदय पहले ही हो गया था इस काल में सर्वत्र फैला यही इस काल की सबसे महत्वपूर्ण घटना था। 

अशोक के राज्यकाल के पश्चात् साम्राज्य का पतन होने लगा इस समय बहुत छोटे-छोटे राज्य स्थापित हो गए और विदेशियों के आक्रमण हुए। विदेशियों में सबसे पहले यूनानियों के आक्रमण हुए जो वैक्टिया के शासक थे। 

यूनानियों ने पंजाब और सिंधु के कुछ भागों पर अपना अधिकार कर लिया। यूनानी संपर्क का भारतीय संस्कृति पर स्थाई प्रभाव पड़ा। कला में गंधार शैली का विकास उसी संपर्क का परिणाम था इस युग का सबसे महान यूनानी राजा मिनैन्डर (मिलिन्द) था उसने दूसरी सदी ई.पू. में राज किया वह बौद्ध धर्म का अनुयायी हो गया था। प्रसिद्ध बौद्धग्रंथ मिलिन्दपन्हो (मिलिन्द के प्रश्न ) में उसके प्रश्नों और एक बौद्ध दार्शनिक द्वारा दिए गए उत्तरों का वर्णन मिलता है। 

यूनानियों के आक्रमण के बाद शकों के आक्रमण हुए जिन्होंने बैक्ट्रिया के यूनानी राज्य को समाप्त कर पश्चिमी भारत में मालवा तक अधिकार लिया। उनका एक राजा रुद्रदामन था जिसने सौराष्ट्र में सिंचाई के लिए महत्वपूर्ण व्यवस्था की। दूसरे आक्रमणकारियों की भांति शकों ने भी यहाँ की संस्कृति को अपना लिया। 

मध्य एशिया के आने वाले आक्रमणकारियों में कुषाण भी थे जो ईसा की पहली सदी में आए थे। कुषाण राजाओं में सबसे महान कनिष्क था। कुछ इतिहासकारों का मत हे कि 78 ई.पू. उसी समय शक संवत् का प्रारंभ हुआ। कनिष्क ने भारत के मध्य एशिया तक फैले हुए अपने विस्तृत साम्राज्य में पुरुषपुर (पेशावर) को राजधानी बनाकर लगभग 40 वर्ष तक राज्य किया। 

कनिष्क के साम्राज्य के परिणाम स्वरूप ईरान, यूनान और रोम की संस्कृतियों के कुछ तत्व भारतीय संस्कृति के अंग बन गए। इसके कारण भारत और अन्य देशों के साथ होने वाले व्यापार को भी प्रोत्साहन मिला। कनिष्क ने बौद्धधर्म की महायान शाखा के प्रसार में योगदान दिया। जिससे बौद्ध धर्म का मध्य एशिया में प्रचार हुआ और वहाँ से यह चीन, कोरिया और जापान तक पहुँचा। तीसरी सदी में कुषाण साम्राज्य का पतन हो गया।

ई.पू. तीसरी शताब्दी के दौरान दक्षिण भारत में तीन राज्य थे। पाण्ड्य अपनी राजधानी मदुरा से भारत के सुदूर दक्षिण और दक्षिण–पूर्व भागों में शासन करते थे। चोल कारोमंडल तट पर शासन करते थे। वर्तमान केरल के अधिकांश भाग में चेरों का शासन था दक्कन और मध्यभारत में मौर्यों के बाद सबसे महत्वपूर्ण शासन सातवाहनों का था। 

गौतमीपुत्र शातकर्णी के राज्यकाल (106 ई. से 130 ई.) में सातवाहन काल की सांस्कृतिक परम्पराएँ राष्ट्रकूटों, चालुक्यों और पल्लवों के राज्यकाल में चलती रही। पल्लव राज्य की स्थापना तीसरी सदी ई. में हुई उसकी राजधानी काँची थी। इसी काल में उड़ीसा (कलिंग) में खारवेल नाम का शक्तिशाली राजा हुआ। इन राज्यों में भारत की सांस्कृतिक एकता का विकास हुआ। 

इस समय काँची सांस्कृतिक शिक्षा तथा बौद्ध और जैन धर्मों का मुख्य केन्द्र था। अजंता और एलोरा के गुफा मंदिरों और चित्रों का बनाना भी सातवाहन काल मे प्रारंभ हुआ। इन राज्यों ने रोम के साम्राज्य, दक्षिण पूर्व एशिया, पश्चिमी एशिया और चीन के साथ व्यापारिक संबंधों का भी विकास किया। इस काल में विदेशी व्यापार का भारतीयों के आर्थिक जीवन पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा। 

चेन्नई के निकट अरिकमेडू व्यापार का मुख्य केन्द्र था वहीं जो उत्खनन हुए हैं उनसे प्राचीन काल में भारत और रोम के व्यापारिक संबंधों पर पर्याप्त प्रकाश पड़ा है। दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के साथ व्यापार व्यापार के परिणामस्वरूप वहाँ अनेक भारतीय बस्तियाँ भी बनी जिन्होंने उन देशों के राजनीतिक और सांस्कृतिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की।

जब दक्षिण भारत में यह विकास हो रहा था उस समय उत्तर भारत में भी महत्वपूर्ण परिवर्तन हो रहे थे 1 चौथी शताब्दी के प्रारंभ में चन्द्रगुप्त प्रथम ने मगध में गुप्त साम्राज्य की स्थापना की। उसके पुत्र समुद्रगुप्त ने समस्त भारत पर आक्रमण किया और अपना प्रभुत्व स्थापित करने के लिए अश्वमेघ यज्ञ किया। उसके उत्तराधिकारी चन्द्रगुप्त द्वितीय ने और विजय प्राप्त की। 

स्कंदगुप्त के राज्य के पश्चात् गुप्त साम्राज्य का पतन होने लगा। यद्यपि गुप्त साम्राज्य इतना विस्तृत न था जितना की मौर्य साम्राज्य तथापि गुप्तकाल में प्राचीन भारतीय संस्कृति अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँच गई थी गुप्त साम्राज्य के पतन के प्रमुख कारण पाँचवी शताब्दी में हूणों के आक्रमण थे छठी शताब्दी के आते-आते यह राज्य समाप्त हो चुका था।

गुप्त साम्राज्य के पतन के पश्चात् भारत फिर छोटे-छोटे राज्यों में बँट गया। जो सर्वशक्तिशाली बनने के लिए आपस में लड़ते थे। दिल्ली के निकट थानेश्वर के राजा हर्ष ने उत्तर भारत के बड़े भाग पर अधिकार करके इसे संगठित कर लिया किन्तु वह दक्षिण के चालुक्य राजाओं को परास्त न कर सका हर्ष की मृत्यु के पश्चात् उत्तर भारत में अनेक छोटे-छोटे राजपूत राज्य स्थापित हो गए। 

यद्यपि गुप्त राजाओं के बाद अनेक छोटे-छोटे निर्बल राज्य स्थापित हुए तथापि इस काल में भी सांस्कृतिक उन्नती होती रही। प्राचीन भारत में प्रशासन - वैदिक काल में अधिकतर राज्यों में राजतंत्र प्रणाली थी किन्तु राजा निरंकुश शासक नहीं होता था, क्योंकि राज्य का स्वरूप अब भी जनतांत्रिक था।

जब राज्य बड़े हो गए तो राजा की शक्ति भी बढ़ गई किन्तु वह निरंकुश नहीं हुआ राजा धर्म का सेवक समझा जाता था धर्म का अभिप्राय उन सभी नियमों से था जिनका मूल स्रोत ईश्वरीय समझा जाता था ओर जो रीति रिवाजों और परम्पराओं पर आधारित होते थे। जब साम्राज्य की स्थापना हुई भारत की राजनीतिक व्यवस्था में कई महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए गणराज्यों में पहले अधिक अभिजात वर्ग के व्यक्ति शासन चलाते थे।

ये गणराज्य साम्राज्यों के युग में नष्ट हो गए, राजा की शक्ति और विशेषाधिकार में वृद्धि हो गई, वह शासन का सर्वोच्च अधिकारी था और समस्त शासन पद्धति का स्वयं संचालन करता था राज्य के उच्च पदाधिकारियों की नियुक्ति भी वह स्वयं करता था। 

राजा के अधिकारों पर अब किसी प्रकार का अंकुश न रहा । इसी काल में संसार के विजेता अर्थात चक्रवर्ती राजा का आदर्श भी विकसित हुआ परंतु इस आदर्श में विश्वविजय की भावना ही निहित न थी बल्कि इसका अर्थ यह भी था चक्रवर्ती राजा धर्म के अनुसार राज्य का शासन चलाए।

मौर्यकाल में लगभग समस्त भारत का शासन एक राजा चलाता था। प्रांतों में जो राज्यपाल शासन चलाते थे भी साधारणतः राजकुमार होते थे। राज्यपाल की सहायता के लिए उनके अधिकारियों का अधिक्रम था। राज्य का उद्देश्य साम्राज्य की रक्षा के लिए सुव्यवस्थित शासन चलाना ही न था अपितु समाज कल्याण के कार्य करना भी था। चाणक्य के अर्थशास्त्र में राजा का जो आदर्श स्वरूप बताया गया है उसके अनुसार प्रजा के सुख में राजा का सुख और प्रजा के कल्याण में उसका कल्याण निहित है।

कुषाणों का राज्य विस्तृत था। उन्होंने ऐसी शासन व्यवस्था विकसित की जिसमें प्रांतों की प्रायः स्वायत्त ईकाईयाँ थी वे प्रांत मिलकर एक संघीय राज्य बनाते थे जिसमें केन्द्र की शक्ति बहुत कम हो गई । कुषाण राजा अपने को ‘राजाधिराज' कहते थे। सातवाहन राज्य में मौर्यो की "केन्द्र प्रधान" शासन पद्धति चलती रही क्योंकि उनके प्रदेश पहले मौर्य साम्राज्य के अंग रह चुके थे। गुप्त शासन पद्धति "प्रांतों के माध्यम से” पूर्णतया सुव्यवस्थित थी। 

राजवंशों में बार-बार परिवर्तनों से ऊपरी प्रशासनिक व्यवस्था प्रभावित हुई परंतु गाँव का प्रशासन ज्यों का त्यों बना रहा ग्राम स्वायत ईकाई के रूप में विकसित हुए गाँव के मुखिया और बड़े-बूढ़ों को गाँव में शांति और व्यवस्था बनाए रखने के लिए पूर्ण अधिकार मिले थे। वे लोक कल्याण के कार्य करते स्थानीय झगड़े निपटाते और राज्य के करों को इकट्ठा करते थे।

सामाजिक और आर्थिक स्थिति - आर्यो का मुख्य व्यवसाय पशु पालन था। पशु ही उनके मुख्य धन थे। मनुष्यों का मूल्य भी पशुओं में आंका जाता था किन्तु धीरे-धीरे कृषि का महत्वपूर्ण व्यवसाय हो गया। वस्तुतः ज्यों-ज्यों वे गंगा की घाटी में फैले त्यों-त्यों उस क्षेत्र में कृषि का विस्तार हुआ विस्तृत जंगलों को काटकर साफ किया गया। लोहे के उपयोग ने भूमि को खेती योग्य बना दिया।

कृषि के साथ-साथ अन्य व्यवसायों का भी विकास हुआ गाँव के जमीन और अर्थतंत्र में बढ़ई का कार्य विशेष महत्व था, इसलिए बढ़ई का बड़ा आदर किया जाता था। ताँबे, काँसे और लोहे काम करने वाले का भी महत्व था। कुम्हार, चमड़ा रंगने वाले, जुलाहे आदि अन्य बहुत से कारीगर भी गाँव में थे। जब इन व्यवसायों का विकास हुआ तो कुछ व्यक्ति इन कामों में दूसरों की अपेक्षा अधिक कुशल हो गए और उनकी बनाई गई वस्तुओं की माँग गाँव से बाहर भी होने लगी इस प्रकार व्यापार का प्रारंभ हुआ।

600 ई.पू. के लगभग व्यापार और उद्योग के केन्द्र के पास अनेक नगर स्थापित हुए। इनमें से कुछ राजगृह चंपा, काशी, कौशांबी, तक्षशीला, भूगकच्छ और वैशाली थे। ईरानी, यूनानी और अन्य विदेशियों के आक्रमणों के फलस्वरूप पश्चिमी देशों और मध्य एशिया के साथ भारत के व्यापार में वृद्धि हुई। 

भारतीयों ने जब दक्षिण पूर्व के देशों में उपनिवेश बनाए तो उन देशों के साथ भी व्यापार को प्रोत्साहन मिला जैसे ब्रह्मदेश या बर्मा के साथ सूती कपड़ा, हाथी दांत और लोहे का काम जैसे अनेक उद्योगों का विकास हुआ जो कारीगर किसी विशेष प्रकार की वस्तुएँ बनाते थे उन्होंने अपनी श्रेणियाँ बना ली थी । ये श्रेणियाँ की कालांतर में उपजातियाँ बन गई। बाद में दक्षिण भारत के राज्यों और रोम साम्राज्य के बीच व्यापारिक संबंधों का विकास हुआ।

गुप्त साम्राज्य के पतन और पश्चिमी रोम साम्राज्य के छिन्न-भिन्न होने के पश्चात् रोम के साथ व्यापार कम हो गया किन्तु दक्षिण पूर्व एशिया के देशों और अफ्रीकी के पूर्वी तट से व्यापार में वृद्धि हो गई। इसी काल में इस भावना का उदय हुआ, कि समुद्र द्वारा विदेश यात्रा से मनुष्य अपवित्र हो जाता है और जो अपनी जातिय पवित्रता बचाये रखना चाहते हैं उन्हें ऐसी यात्रा नहीं करनी चाहिए इस भावना के कारण व्यापार की कुछ न कुछ हानि अवश्य हुई होगी। 

प्राचीन काल से अब तक भारतीय सामाजिक व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता मानी जाती रही है कि प्रारंभ में आर्यों ने अपना विभाजन क्षत्रिय (योद्धा), ब्राम्हण (पुरोहित ) और वैश्य ( कृषक) वर्णों मे कर लिया। भारत के अनार्य निवासियों को आर्य लोग दास कहते थे, इन दासों की गणना शूद्र वर्ण में की गई बाद में इनकी संतानों एवं आर्य तथा दासों के विवाहों से उत्पन्न संतानों को भी शूद्र वर्ण में रखा गया।

आरंभ में ब्राम्हणों और क्षत्रियों का समाज में समान स्तर था। बाद में जैसे-जैसे कर्मकांड का महत्व बढ़ा, कर्मकांड करने वाले ब्राम्हणों का भी समाज में स्तर ऊँचा हो गया वैश्यों में से बहुत से खेती करना छोड़ जमींदार और व्यापारी हो गए बाद में कृषि कार्य अधिकतर शूद्रों के द्वारा किया जाने लगा। वैदिक साहित्य के अनुसार भी ब्राम्हण की उत्पत्ति सृष्टा (ब्रम्हा) के सिर से, क्षत्रिय की उसकी भुजाओं से, वैश्य की उसकी जंघाओं शूद्र की उत्पत्ति उसकी पैरों से हुई। 

आरंभ में यह विभाजन कर्म के आधार पर था। पर धीरे-धीरे यह व्यवस्था जन्म पर आधारित होती चली गई। बाद में लिखे गए गृह्य सूत्रों ने जाति प्रथा को पहले से भी कड़ा बना दिया। धर्मशास्त्रों ने इस कठोरता और विषमता की प्रक्रिया को और भी आगे बढ़ाया। विभिन्न जातियों के लिए अलग-अलग नियम बनाए गए। अपराधी को जाति के अनुसार एक ही अपराध के लिए कम या अधिक दंड दिया जाता था। 

धर्मशास्त्रों ने जाति प्रथा को पूर्ण रूप से आध्यात्मिक पवित्रता का अंग मान लिया । शूद्रों के साथ व्यवहार करने के संबंध में बहुत कठोर नियम बनाए गए। किन्तु कुछ बातों में बहुत कट्टरता नही आई थी। उच्च वर्ग का पुरूष निम्न वर्ण की स्त्री से विवाह कर सकता था किन्तु कुछ समय बाद यह प्रथा भी लुप्त हो गई। 

जाति से बहिष्कृत व्यक्तियों का एक अलग वर्ण बन गया चीनी यात्री फाह्यान गुप्तकाल में भारत आया था उसने इसके विषय में लिखा है "चार जातियों वाली इस व्यवस्था में भी प्रत्येक जाति में अनेक उपजातियाँ थी। उपजातियाँ व्यवसायों पर आधारित थी और पीढ़ी दर पीढ़ी चलती थी । हिन्दु समाज में इन उपजातियों का महत्व बाद में बहुत बढ़ गया क्योंकि इन्हीं के द्वारा व्यवसाय और विवाह संबंधी नियम निर्धारित किए जाते थे।

जैन और बौद्ध धर्म के उदय और आक्रमणकारी विदेशियों के भारत में बस जाने के कारण जाति प्रथा के नियमों में कुछ ढील आ गई किन्तु दसवीं शताब्दी में तुर्की के आक्रमण के समय जाति प्रथा के नियम कठोरता से लागू किए जाने लगे। जो आधुनिक काल में शिथिल होना प्रारंभ हुए। 

प्राचीनकाल मे भारतीय परिवार पितृ सत्तात्मक सिद्धांत पर आधारित थे। सबसे बड़ी उम्र वाला पुरुष ही परिवार का मुखिया होता था। पुत्र-पुत्रवधु और उनके बालक अपने माता-पिता के साथ रहते थे। साधारणतया लोग एक ही विवाह करते थे वैसे बहुविवाह की अनुमति थी। 

राजा तथा धनी व्यक्ति कई पत्नियाँ रखते थे कुछ एक ऐसे उदाहरण भी हैं जिनमें एक स्त्री के कई पति होते थे। दक्षिण भारत में कुछ समाज मातृ सत्तात्मक थे। प्रत्येक व्यक्ति का जीवन आश्रम् व्यवस्था पर आधारित था। जीवन को चार आश्रमों में बाँटा गया था।

1. ब्रह्माचर्य - वह काल जब विद्यार्थी धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन करता था।

2. गृहस्थ - वह काल जब व्यक्ति विवाहित जीवन बिताता था।

3. वानप्रस्थ - जब व्यक्ति त्याग का जीवन बिताता और गृहस्थी बंधनों से मुक्त होने का प्रयत्न करता था। 

4. सन्यास - जब मनुष्य अपने परिवार और समाज को छोड़कर तपस्वी के रूप में पूर्ण आत्मसंयम का जीवन बिताता था। यह आश्रम व्यवस्था निम्न वर्ग पर लागू नहीं की जाती थी, क्योंकि उन्हें धार्मिक ग्रंथ पढ़ने का अधिकार नहीं था। अन्य सबके लिए यह जीवन का नियम था।

स्त्रियाँ पैतृक संपत्ति की स्वामिनी नहीं हो सकती थी। वैसे वे बहुत बातों में पूर्ण स्वतंत्र थी। विधवा को पुर्नविवाह करने का अधिकार था। साधारणतया वह देवर के साथ विवाह कर सकती थी। कुछ बातों में स्त्रियों का स्तर बाद में शूद्रों के समान हो गया। परिवार में पुत्रियों की अपेक्षा पुत्रों का अधिक मान होने लगा।

धर्म और दर्शन - प्राचीनकाल में अनेक भारतीय धर्मों और दर्शन प्रणालियाँ का विकास हुआ। हड़प्पा संस्कृति के धार्मिक विश्वासों, आर्यों तथा आर्येत्तर लोगों के धार्मिक विश्वासों का समन्वय होने पर विविध प्रकार के धार्मिक विश्वासों तथा प्रथाओं का विकास हुआ जो सब मिलकर हिन्दू धर्म का अंग माने जाते हैं। आर्यो के धार्मिक विश्वासों और प्रथाओं का वर्णन वेदों में है। 

प्रकृति के विभिन्न रूपों को देवता मानकर पूजा जाता था किन्तु कोई मंदिर नहीं थे। देवताओं को प्रसन्न करने के लिए आर्य यज्ञ करते थे। यज्ञ के दौरान लिए जाने वाले कर्मकांड की जटिल प्रणाली का विकास हुआ। इस काल में दर्शन की विभिन्न शाखाओं का भी उद्भव हुआ। इनमें से वेदांत, मीमांसा, सांख्य, योग, न्याय और वैशेषिक नामक कालक्रम से भारतीय दर्शन की छः शाखाएँ बन गई। 

वेदांत दर्शन उपनिषदों पर आधारित था। उसने एक लंबे समय तक भारतीय चिंतन को बहुत प्रभावित किया। उसने अनेक सूक्ष्म विचारों का विवेचन किया। जो विश्व के स्वरूप आत्मा के अस्तित्व और विश्व और आत्मा के संबंधों के बारे में थे भारतीय दर्शन की कुछ शाखाएँ अनीश्वरवादी थी।

महाराजा अग्रसेन की विचारधारा- महाभारत काल में महाराजा अग्रसेन ने समाज को बहुत अधिक प्रभावित किया। महाभारत युद्ध के पश्चात् जब सम्पूर्ण भारत राजनैतिक और सामाजिक दृष्टि से अस्त-व्यस्त था। ऐसी परिस्थिति में महाराजा अग्रसेन ने अपनी दूर दृष्टि, दृढ़ता और मानवीय सहृदयता के द्वारा राजनैतिक और सामाजिक सुव्यवस्था निर्मित करने का सफल प्रयास किया।

महाराजा अग्रसेन ने हरियाणा राज्य में अग्रोहा (आज का अबोहर) गणराज्य की स्थापना की। इनके शासनकाल के बारे में ऐतिहासिक साक्ष्य तो मिलते नहीं लेकिन जनश्रुतियाँ, किंवदितयाँ तथा पुरातात्विक अवशेषों के आधार पर पूर्व उत्तरी भारत के राजस्थान राज्य का प्रताप नगर गणराज्य के राजा धनपाल की छठवीं पीढ़ी में राजा वल्लभसेन के घर इनका जन्म हुआ था। 

इसी खुशी में राजा वल्लभ सेन ने यमुना नदी किनारे अग्रपुर नामक नए नगर की स्थापना की, जो आज आगरा के नाम से प्रसिद्ध है। महाराजा अग्रसेन की माता विदर्भ की राजकुमारी थी। जिनका नाम भागवती देवी था। महाराजा अग्रसेन के माता-पिता भगवान आशुतोष (शिव) के परम भक्त थे। इनके पिता राजा वल्लभसेन अत्यन्त धार्मिक, प्रजावत्सल, वीर, साहसी तथा पराक्रमी थे, परन्तु उनकी कोई भी संतान नहीं होने का उनको दुख था। 

भगवान आशुतोष की भक्ति साधना के परिणाम स्वरूप उन्हें आश्विन शुक्ल प्रतिपदा को अभिजित नक्षत्र के शुभ योग में पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई जिन्हें बाद में महाराजा अग्रसेन के नाम से जाना जाता है।

महाराजा अग्रसेन का शासन काल द्वापर युग का अंत और कलयुग का प्रारंभ माना जाता है। अल्पवय में बालक अग्रसेन को उज्जयनी के प्रसिद्ध ऋषि तांड्य के आश्रम में विद्याध्ययन के लिए भेजा दिया गया। 14 वर्ष की आयु में शिक्षा दीक्षा ग्रहण कर उज्जयनी लौटे। किशोर अग्रसेन की विनम्रता, शालीनता, सदाचार, उदारता, निडरता, साहसीवृत्ति और अस्त्र-शस्त्र में निपुणता ने माता-पिता और परिवार में एवं नागरिकों के हृदय में अपना स्थान बना लिया। महाराज वल्लभ सेन अपने पुत्र अग्रसेन को शासन के सभी अंगों, गतिविधियों तथा कार्यप्रणाली में पारंगत कर देना चाहते थे।

अग्रसेन अपने पिता वल्लभ सेन के साथ महाभारत युद्ध में युधिष्ठिर के पक्ष में सम्मिलित हुए थे । अग्रसेन अभिमन्यु के हम उम्र थे। इस युद्ध में उन्हें अर्जुन से वीरता, भीम से साहस, युधिष्ठिर से धर्मपरायणता, अभिमन्यु से उत्साह और श्रीकृष्ण से कौशल, दूरदृष्टि जटिल समस्याओं के समाधान करने की कला ग्रहण की । इस युद्ध में महाराज वल्लभ सेन वीरगति को प्राप्त हुए। ऐसी स्थिति में पितृत्व कुन्दसेन ने प्रताप नगर पर अपना कब्जा कर लिया। 

अग्रसेन ने अपने अनुज शूरसेन और माता भगवती के साथ महर्षि गर्ग के आश्रम में शरण ली। महर्षि गग्र के सहयोग से अग्रसेन ने नए राज्य की स्थापना की जिसकी राजधानी आग्रोहा को बनाया गया।

महाराजा अग्रसेन गणतंत्रीय राज्य प्रणाली के जनक, सहकारिता व समाजवाद कि सिद्धांतों के प्रणेता थे। उस समय वंशानुगत शासन चलता था। महाराज अग्रसेन ने अपने राज्य में 18 गणराज्य बनाए। महाराज अग्रसेन एक योग्य शासक ही नहीं कुशल समाज संगठक भी थे। 

मनुष्य मात्र की समानता में उनका विश्वास था वे मानते थे कि सभी मनुष्य समान है और सबको समान अवसर मिलने चाहिए। आग्रोह राज्य में सभी जाति एवं धर्मों के लगभग एक लाख परिवार रहते थे। सभी को अपना-अपना धर्म पालन करने एवं उनकी उपासना की पूर्ण स्वतंत्रता थी। उनके राज्य में न बेकारी थी, न ही बेरोजगारी थी, न कोई गरीब, न कोई दुखी। 

समाजवाद के सिद्धांत पर आधारित उन्होंने एक परिपाटी बनाई थी कि जो भी नया परिवार अग्रोहा राज्य में आकर बसता था उसे प्रत्येक परिवार एक रुपया और एक ईंट देता था। इस प्रकार मकान निर्माण के लिए ईंट एवं व्यापार के लिए धन सहज की मिल जाता था। इससे आगन्तुक की आर्थिक स्थिति राज्य में पहले से रहने वाले समान बन जाती थी। 

पारस्परिक सहयोग की इस परिपाटी से राज्य में एक आदर्श पद्धति का जन्म हुआ और समाजवाद की प्रारंभिक नींव रखी गई। अग्रोहा में जल सुविधा के लिए तालाब खुदवाया गया, किन्तु जल रिसाव के कारण खाली हो जाता था। महाराजा अग्रसेन ने प्रभूत मात्रा में ताँबा क्रय कर उसकी परत सम्पूर्ण सरोवर में बिछवाई। इस प्रकार जल संकट का स्थायी समाधान निकाला गया।

महाराजा अग्रसेन अकारण हिंसा के विरोधी थे अतः उन्होंने पशुवध से सर्वथा इन्कार कर दिया। अग्रसेन ने स्पष्ट कह दिया पशुबलि हिंसा है, त्याज्य कर्म है। उनका स्पष्ट मत था कि यज्ञादि सारे आयोजन प्राणी मात्र के कल्याण के लिए है और हम कर्मकाण्ड को निमित्त बनाकर हिंसा करेंगे तो शेष समाज उसी को आदर्श मानकर अतिहिंसक बन जाएगा। 

अंत में बिना पशुबलि के पूर्णहुति दी गयी। दूसरी ओर आत्मरक्षा या राष्ट्ररक्षा के लिए शस्त्र उठाना अग्रसेन ने स्वीकार किया तथा सभी के लिए सैन्य शिक्षण, शस्त्र शित्रण अनिवार्य किया। महाराजा अग्रसेन ने अपने शासनकाल में सामाजिक समानता, आर्थिक समानता, शांति, सद्भाव को महत्व दिया। वे अग्रवाल जाति के प्रवर्तक थे लेकिन उन्होंने जाति और धर्म से परे होकर एक जनकल्याणकारी शासन व्यवस्था कायम की। 

इस तरह वे जनहित और बंधुत्व की प्रेरणा के अग्रणी स्रोत है। अपने 18 पुत्रों के साथ सुख पूर्वक शासन करते हुए अपने ज्येष्ठ पुत्र विभू का राज्याभिषेक करके तीर्थ यात्रा पर चले गए और अपने जीवन के अंतिम 10 वर्ष तीर्थ स्थानों पर बिताए।

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