वितरण के रिकार्डो सिद्धांत - vitran ka siddhant

Post Date : 03 August 2022

वितरण के रिकार्डो सिद्धांत 

वितरण के सिद्धान्त के रूप में मुख्यतया तीन सिद्धान्त प्रतिपादित किये गये हैं -

  1. वितरण का प्रतिष्ठित सिद्धान्त, 
  2. वितरण का सीमान्त उत्पादकता का सिद्धान्त, 
  3. वितरण का आधुनिक सिद्धान्त या माँग एवं पूर्ति का सिद्धान्त।

1. वितरण का प्रतिष्ठित सिद्धान्त 

वितरण का प्रतिष्ठित सिद्धान्त, प्रतिष्ठित अर्थशास्त्रियों द्वारा प्रतिपादित किया गया था। इनमें एडम स्मिथ और रिकार्डो के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इन अर्थशास्त्रियों ने वितरण का कोई सामान्य सिद्धान्त नहीं दिया, बल्कि लगान, मजदूरी तथा ब्याज के निर्धारण के लिए अलग-अलग सिद्धान्त प्रतिपादित किये। 

इस सिद्धान्त के अनुसार, राष्ट्रीय आय में से सर्वप्रथम भूमि के लगान का भुगतान किया जाता है। इसके पश्चात् श्रमिकों को मजदूरी का भुगतान किया जाता है और अन्त में जो बचा रहता है। वह साहसी को ब्याज या लाभ के रूप में प्राप्त होता है।

रिकार्डो के अनुसार, लगान एक आधिक्य है जो केवल श्रेष्ठ भूमि को ही प्राप्त होता है। उनके अनुसार, सीमांत भूमि को कोई लगान प्राप्त नहीं हो पाता। इस सिद्धान्त के अनुसार, मजदूरी का भुगतान मजदूरी कोष में से किया जाता है।

यह भुगतान इस आधार पर किया जाता है कि श्रमिक न्यूनतम जीवन स्तर पर अपना निर्वाह कर सके। लगान एवं मजदूरी देने के बाद राष्ट्रीय आय में से जो शेष बचता है वह साहसी को ब्याज एवं लाभ के रूप में दिया जाता है। 

प्रतिष्ठित सिद्धान्त की आलोचनाएँ

प्रतिष्ठित सिद्धान्त की अनेक आधारों पर आलोचना की गयी, जिनमें से प्रमुख निम्न हैं - 

  • यह सिद्धान्त साधन की कीमत निर्धारण का एक सामान्य सिद्धान्त न होकर उनके निर्धारण हेतु अलग-अलग सिद्धान्त देता है।
  • इस सिद्धान्त पूँजीपति तथा साहसी को एक ही साधन स्वीकार किया गया है, जो गलत है। ये दोनों अलगअलग साधन हैं तथा इनका अपना अलग अलग कार्य क्षेत्र है। 
  • यह सिद्धान्त इस मान्यता पर आधारित है कि उत्पादन की सभी क्रियाओं पर उत्पत्ति ह्रास नियम लागू होता है, परन्तु व्यावहारिक दृष्टि से यह मान्यता उचित नहीं है । तकनीकी विकास की अवस्था में उत्पत्ति वृद्धि नियम लागू होने लगता है । 
  • यह सिद्धान्त वितरण के कार्यात्मक सिद्धान्त की अवहेलना करता है। 
  • यह सिद्धान्त राष्ट्रीय आय के वितरण का सही क्रम प्रस्तुत नहीं करता। 

उपर्युक्त दोषों के कारण ही वितरण के इस सिद्धान्त को आधुनिक अर्थशास्त्रियों द्वारा त्याग दिया गया है।

2. वितरण का सीमांत उत्पादकता का सिद्धान्त 

राष्ट्रीय आय के वितरण के सिद्धान्तों में सीमान्त उत्पादकता सिद्धान्त का अपना एक विशिष्ट स्थान है। इस सिद्धान्त का सर्वप्रथम प्रतिपादन सन् 1894 में विक्सटीड, वालरस, जे. बी. क्लार्क आदि अर्थशास्त्रियों ने किया था। 

लेकिन इस सिद्धान्त को आधुनिक रूप में विकसित करने का श्रेय प्रो. मार्शल, श्रीमती जॉन राबिन्सन तथा प्रो. हिक्स को जाता है। इस सिद्धान्त को वितरण का सामान्य सिद्धान्त भी कहा जाता है, क्योंकि इसकी सहायता से उत्पादन के सभी साधनों का पुरस्कार निर्धारित किया जाता है। 

सीमान्त उत्पादकता का अर्थ - सीमान्त उत्पादकता से आशय, उत्पत्ति के अन्य समस्त साधनों को यथास्थिर करके किसी एक साधन की मात्रा में वृद्धि करने से कुल उपज में वृद्धि होता है। 

अर्थात् सीमांत उत्पादकता का सिद्धान्त, साधन की कीमत का निर्धारण उनकी उत्पादकता के आधार पर करता है जो साधन की सीमांत उत्पादकता के द्वारा तय की जाती है। 

प्रो. सैम्युल्सन के अनुसार - किसी उत्पादक साधन की सीमांत उत्पादकता उस साधन की एक अतिरिक्त इकाई द्वारा उत्पादित की गयी अतिरिक्त मात्रा होती है, जबकि अन्य साधन स्थिर रहते हैं। 

प्रो. हैन्सन के शब्दों में - किसी साधन की सीमांत उत्पत्ति साहसी की कुल आय में वह वृद्धि है, जो उस साधन की एक अतिरिक्त इकाई को कार्य में लगाने से प्राप्त होती है। 

सिद्धान्त की व्याख्या - यह सर्वविदित है कि राष्ट्रीय आय में हिस्सा पाने वाले साधनों का पारिश्रमिक उनकी सीमान्त उत्पादकता के बराबर निर्धारित होता है, किन्तु प्रश्न यह उपस्थित होता है कि साधन की कीमत, साधन की उत्पादकता पर क्यों निर्भर करती है ? यह सर्वविदित तथ्य है कि वस्तु तथा साधन की माँग में बहुत अधिक अन्तर है। 

वस्तु की माँग प्रत्यक्ष रूप से उसकी उपयोगिता के कारण की जाती है, जबकि साधन की माँग 'व्युत्पन्न माँग' होती है, अर्थात् प्रत्येक साधन की माँग इस बात पर निर्भर करती है कि उस साधन की उत्पादकता कितनी है? 

इसीलिए यह कहा जाता है कि जिस साधन की उत्पादकता जितनी अधिक होगी, उसकी माँग भी उतनी ही अधिक होगी। यही कारण है कि साधन की कीमत का निर्धारण साधन की सीमांत उत्पादकता से तय होता है। 

अब इस संबंध में दूसरा प्रश्न उठता है कि किसी साधन की कीमत का निर्धारण उस साधन की सीमांत उत्पादकता से क्यों ? औसत उत्पादकता से क्यों नहीं तय होता? 

इसका मुख्य कारण यह है कि जिस प्रकार कोई भी फर्म अपने लाभ को अधिकतम करने के लिए सीमांत आगम एवं सीमांत लागत को बराबर करती है, ठीक उसी तरह एक फर्म अपने लाभ को अधिकतम करने के लिए साधन की सीमांत उत्पादकता तथा साधन की सीमांत लागत को बराबर करना चाहती है। 

एक फर्म तब तक साधन की मात्रा को बढ़ाती है, जब तक कि उसके लिए साधन की सीमांत उत्पादकता उसकी सीमांत साधन लागत के बराबर नहीं हो जाती है । इस बिन्दु के पश्चात् साधन की मात्रा में और अधिक वृद्धि नहीं की जायेगी। 

सिद्धान्त की मान्यताएँ - वितरण का सीमांत उत्पादकता सिद्धान्त निम्नलिखित मान्यताओं पर आधारित है 

  • उत्पादन में प्रयुक्त साधन की सभी इकाइयाँ समान रहती हैं।
  • प्रत्येक साधन का एक-दूसरे से प्रतिस्थापन किया जा सकता है।
  • उत्पत्ति के साधनों का इच्छानुसार विभाजन किया जा सकता है।
  • उत्पत्ति के साधन व्यवसायों में पूर्ण गतिशील होते हैं।
  • यह सिद्धान्त उत्पत्ति ह्रास नियम की मान्यता पर आधारित है।
  • यह सिद्धान्त पूर्ण रोजगार व पूर्ण प्रतिस्पर्द्धा की मान्यता पर आधारित है।
  • यह सिद्धान्त केवल दीर्घकाल में ही लागू होता है।
  • प्रत्येक फर्म एवं उत्पादक का उद्देश्य अधिकतम लाभ कमाना होता है। 

सीमांत उत्पादकता की माप - उत्पत्ति के अन्य साधनों को स्थिर रखकर परिवर्तनशील साधन की एक अतिरिक्त इकाई के प्रयोग से कुल उत्पादन में जो वृद्धि होती है, उसे साधन की सीमांत उत्पादकता कहा जाता है। सीमांत उत्पादकता को तीन तरह से मापा जा सकता है।

1. सीमांत भौतिक उत्पादकता - जब किसी साधन की सीमांत उत्पादकता को उसके द्वारा उत्पादित वस्तु की भौतिक मात्रा के रूप में व्यक्त किया जाता है तो उनको सीमांत भौतिक उत्पादकता कहते हैं। इस प्रकार, किसी साधन की एक अतिरिक्त इकाई का प्रयोग करने पर वस्तु के कुल भौतिक उत्पादन में जो वृद्धि होती है, उसे उस साधन की सीमांत भौतिक उत्पादकता कहते हैं।

2. सीमांत कीमत (मूल्य ) उत्पादकता - सीमांत भौतिक उत्पादकता को बाजार में बेचने से जो राशि प्राप्त होती है, उसे सीमांत कीमत उत्पादकता कहा जाता है।

3. सीमांत आगम उत्पादकता - जब किसी साधन की सीमांत उत्पादकता को उस साधन द्वारा उत्पादित वस्तु या सेवा के विक्रय से प्राप्त होने वाले आगम के रूप में व्यक्त किया जाता है तो उसे उस साधन की सीमांत आगम उत्पादकता कहा जाता है। 

इस प्रकार साधन विशेष की अतिरिक्त इकाई का प्रयोग करने पर वस्तु या सेवा के विक्रय से प्राप्त होने वाले कुल आगम में जो वृद्धि होती है, उसी को सीमांत आगम उत्पादकता कहते हैं।

सीमांत उत्पादकता सिद्धान्त की आलोचनाएँ - 

वितरण के सीमांत उत्पादकता सिद्धान्त की प्रमुख आलोचनाएँ निम्नलिखित हैं -

1. साधन की सीमांत उत्पादकता ज्ञात करना कठिन है - यह सिद्धान्त यह मानकर चलता है कि उत्पत्ति के साधनों में से किसी एक साधन की सीमांत उत्पादकता को मापा जा सकता है जबकि सीमांत उत्पादकता मापना संभव नहीं है। इसका कारण यह है कि किसी भी वस्तु या सेवा का उत्पादन उत्पत्ति के साधनों का सामूहिक परिणाम होता है, अतः इनमें से किसी एक साधन की सीमांत उत्पादकता की माप कर पाना सम्भव नहीं है। 

2. उत्पत्ति के साधनों की विभाज्यता की मान्यता अवास्तविक है - यह सिद्धान्त इस मान्यता पर आधारित है कि उत्पत्ति के साधन पूर्णरूप से विभाज्य होते हैं और इनकी मात्रा में आवश्यकतानुसार परिवर्तन किया जा सकता है, जबकि यह मान्यता सही नहीं है। उत्पत्ति के कुछ साधन ऐसे होते हैं जिनको एक निश्चित मात्रा में ही प्रयोग किया जा सकता है।

3. उत्पत्ति के साधनों की एकरूपता की मान्यता अवास्तविक है - यह सिद्धान्त यह मानकर चलता है कि उत्पत्ति के सभी साधन एकरूप होते हैं, जबकि यह मान्यता सही नहीं है । साधनों की इकाइयों में भिन्नता अवश्य होती है। जैसे – भूमि समान उपजाऊ नहीं होती तथा सभी श्रमिकों की कार्यकुशलता समान नहीं हो सकती।

4. पूर्ण प्रतियोगिता की मान्यता अवास्तविक है - यह सिद्धान्त इस मान्यता पर आधारित है कि उत्पत्ति के साधनों के बाजार में तथा उत्पादित वस्तु के पूर्ण प्रतियोगिता पायी जाती है। जबकि यह मान्यता भी अवास्तविक है। इन बाजारों में अपूर्ण प्रतियोगिता पायी जाती है, पूर्ण प्रतियोगिता नहीं। 

5. पूर्ण रोजगार की मान्यता अवास्तविक है - यह सिद्धान्त इस मान्यता पर आधारित है कि अर्थव्यवस्था सभी साधनों का पूर्ण उपयोग कर रही है तथा पूर्ण रोजगार की स्थिति प्राप्त की जा चुकी है, परन्तु यह मान्यता भी वास्तविक नहीं है। आर्थिक जगत में पूर्ण रोजगार की स्थिति सामान्य स्थिति नहीं है।

6. उत्पत्ति के साधनों की पूर्ण गतिशीलता की मान्यता अवास्तविक है - यह सिद्धान्त इस मान्यता पर आधारित है कि उत्पत्ति के सभी साधन पूर्णरूप से गतिशील होते हैं, परन्तु व्यावहारिक जीवन में अनुभव यह बताता है कि यह सत्य नहीं है। उत्पत्ति के साधनों की गतिशीलता में विभिन्न प्रकार की बाधाएँ होती हैं।

7. यह सिद्धान्त केवल माँग की विवेचना करता है - यह सिद्धान्त उत्पत्ति के साधनों के माँग- पक्ष की ही विवेचना करता है। इस सिद्धान्त के द्वारा यह स्पष्ट नहीं किया जाता है कि वास्तव में उत्पत्ति के साधनों का मूल्य किस प्रकार निर्धारित होता है। यह सिद्धान्त उत्पत्ति के साधन की पूर्ति पर कोई ध्यान नहीं देता।

8. असमान वितरण - यह सिद्धान्त आय के असमान वितरण को बढ़ावा देता है, क्योंकि पूँजी की सीमांत उत्पादकता, श्रम की तुलना में अधिक होती है, अतः पूँजीपति को श्रमिक की तुलना में अधिक पुरस्कार प्राप्त होता है। इस प्रकार, पूँजीपति और अधिक पूँजीपति तथा श्रमिक और अधिक गरीब होते जाते हैं।

3.  वितरण का आधुनिक सिद्धांत 

वितरण के प्रतिष्ठित सिद्धांत तथा सीमांत उत्पादकता सिद्धांत के दोषों के निवारण हेतु आधुनिक अर्थशास्त्रियों ने ‘माँग व पूर्ति के सिद्धांत का प्रतिपादन किया। वितरण का माँग व पूर्ति सिद्धांत (आधुनिक सिद्धांत) व्यावहारिक एवं सैद्धांतिक दोनों ही दृष्टिकोणों से श्रेष्ठ है तथा उपर्युक्त दोनों सिद्धांतों की अपेक्षा अधिक तर्कयुक्त भी है। क्योंकि यह उत्पादन के प्रत्येक साधन के मूल्य अथवा पारिश्रमिक को निर्धारित करने में सामान्य रूप से ही लागू होता है।

माँग एवं पूर्ति के सिद्धांत से आशय - आधुनिक अर्थशास्त्रियों का विचार है कि जिस प्रकार वस्तु का मूल्य उसकी माँग एवं पूर्ति द्वारा निर्धारित होता है, उसी प्रकार वितरण के आधुनिक सिद्धांत के अनुसार, उत्पत्ति के पाँचों साधनों भूमि, श्रम, पूँजी, प्रबंध एवं साहस का पारिश्रमिक उनकी माँग एवं पूर्ति द्वारा निर्धारित किया जाता है।

प्रो. सैम्युलसन के अनुसार - अर्थव्यवस्था के लिए साधनों के पुरस्कार निर्धारण का एकमात्र संतोषजनक सिद्धांत सामान्य संतुलन’ का है। जिसमें माँग एवं पूर्ति की समकालीन परस्पर क्रिया प्रत्येक आर्थिक मात्रा के लिए पूर्ण एवं अपूर्ण प्रतियोगिता में होती है।

मान्यताएँ वितरण के माँग व पूर्ति सिद्धांत की प्रमुख मान्यताएँ निम्नांकित हैं -

  • उत्पत्ति के साधन की प्रत्येक इकाई समरूप होती है। 
  • उत्पत्ति के प्रत्येक साधन एक-दूसरे के पूर्ण प्रतिस्थापन होते हैं। 
  • उत्पादन, उत्पत्ति ह्रास नियम के अन्तर्गत होता है। 
  • अर्थव्यवस्था में पूर्ण रोजगार की दशा पाई जाती है। 
  • साधनों में पूर्ण विभाजनीयता होती है।
  •  साधन की सीमांत उत्पादकता को मापा जा सकता है। 
  • साधन की अवसर लागत दी हुई होती है।

1. साधनों की माँग 

उत्पत्ति के किसी साधन की माँग उसकी सीमांत उत्पादकता पर निर्भर करती है। एक फर्म किसी साधन विशेष की इकाई को उस सीमा तक प्रयोग में लायेगी, जब तक कि 'साधन की सीमांत उत्पादकता का मूल्य साधन की सीमांत लागत के बराबर न हो जाय। 

यदि साधन की सीमांत उत्पादकता का मूल्य साधन की सीमांत लागत से अधिक है तो फर्म के लिए उस साधन की अधिक इकाइयों का प्रयोग करना लाभदायक होगा, अतः जब तक साधन की सीमांत उत्पादकता साधन की सीमांत लागत के बराबर नहीं हो जाती, तब तक फर्म उस साधन की इकाइयों का प्रयोग करती जायेगी। 

कोई भी फर्म किसी साधन को उसकी सीमांत उत्पादकता से अधिक मूल्य नहीं देगी। इस प्रकार, साधन की सीमांत उत्पादकता, उसकी कीमत की अधिकतम सीमा का निर्धारण करती है।

किसी साधन की माँग पर निम्नलिखित बातें प्रभाव डालती हैं-

  • जैसा कि मालूम है कि साधन की माँग उसके द्वारा उत्पादित वस्तु की माँग पर निर्भर करती है अर्थात् साधन की माँग व्युत्पन्न माँग होती है। अतः जब बाजार में साधन द्वारा उत्पादित वस्तु की माँग बढ़ती है तो फर्मों द्वारा भी साधन की अधिक माँग की जाती है।
  • अन्य साधनों की कीमत भी साधन विशेष की माँग को प्रभावित करती है। जैसे मजदूरी में अत्यधिक वृद्धि हो जाने पर मशीनों की माँग बढ़ेगी। इसके विपरीत मजदूरी की दरें कम होने पर मशीनों की माँग घटेगी।
  • साधन की सीमांत उत्पादकता में वृद्धि होने पर उसकी कीमत तथा माँग दोनों में ही वृद्धि हो जायेगी।

2. साधनों की पूर्ति

उत्पत्ति के किसी साधन की पूर्ति उसकी अवसर लागत पर निर्भर करती है। अवसर लागत मुद्रा की वह मात्रा है जो किसी साधन को दूसरे सर्वश्रेष्ठ वैकल्पिक प्रयोग में प्राप्त हो सकती है। एक साधन को वर्तमान व्यवसाय में कम से कम इतनी आय अवश्य प्राप्त होनी चाहिए, जितनी कि उसे किसी दूसरे सर्वश्रेष्ठ व्यवसाय में प्राप्त हो सकती है।  

अन्यथा वह साधन वर्तमान व्यवसाय को छोड़कर दूसरे व्यवसाय में कार्य करने चला जायेगा, अतः वर्तमान प्रयोग में एक साधन की लागत अथवा पूर्ति कीमत उस साधन की अवसर लागत पर निर्भर करती है, जिसके नीचे उस साधन की कीमत नहीं गिर सकती है।

उत्पत्ति के साधन की पूर्ति को अनेक बातें प्रभावित करती हैं, जिनमें से मुख्य हैं साधन का पारिश्रमिक, साधन की गतिशीलता, साधन को एक स्थान से दूसरे स्थान पर लाने-ले जाने की लागत, साधन की शिक्षा तथा प्रशिक्षण पर किया गया व्यय, इत्यादि।

3. साधन का मूल्य निर्धारण  

साधन का मूल्य उस बिन्दु पर निर्धारित होता है। जहाँ पर उस साधन की माँग व पूर्ति बराबर होती है। इसे उस साधन का 'संतुलन - मूल्य' कहा जाता है। जैसा कि स्पष्ट किया जा चुका है, साधन की माँग उत्पादकों द्वारा की जाती है तथा इसकी पूर्ति इसके स्वामियों द्वारा की जाती है। 

साधन का अधिकतम मूल्य जो उत्पादक देने को तैयार होंगे, उसकी सीमांत उत्पादकता के बराबर होता है और उसका न्यूनतम मूल्य जिस पर उसके स्वामी उसकी पूर्ति करने को तैयार होंगे, उसकी अवसर लागत के बराबर होता है। साधन का मूल्य भी अधिकतम एवं न्यूनतम इन दोनों सीमाओं के बीच किसी बिन्दु पर निर्धारित होगा।