भारत में 1857 की क्रांति की शुरुआत कब हुई -When did the revolt of 1857 start in India

1856 ई. में लार्ड डलहौजी के बाद लार्ड केनिंग गवर्नर जनरल बनकर आया । केनिंग के शासनकाल की सर्वाधिक महत्वपूर्ण घटना 1857 ई. की क्रांति थी। भारतीयों ने कभी स्वेच्छा से ब्रिटिश साम्राज्य को स्वीकार नहीं किया था। 

भारत में 1857 की क्रांति की शुरुआत कब हुई

भारतीय नरेशो तथा सरदारों में अंग्रेज विरोधी भावना मौजूद थी। 1857 की क्रांति का प्रारंभ एक सिपाही विद्रोह के रूप में हुआ था तथापि यह बहुत व्यापक था। यह हमारे इतिहास में एक युगांतरकारी घटना थी। यह भारत का प्रथम अंग्रेजों के विरूद्ध विद्रोह था, इसका कारण निम्नलिखित है। 

1. राजनीतिक कारण

  • लार्ड डलहौजी की साम्राज्यवादी या विलय नीति- देशी राजा निःसंतान होते थे। डलहौजी ने अपना साम्राज्य का विस्तार करने के उद्देश्य से निःसंतान राजाओं द्वारा गोद लेने की प्रथा पर निषेध घोषित कर दिया और सतारा, नागपुर, झाँसी को अपने राज्य में मिला लिया।                        झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई को गोद का अधिकार न देकर तथा अवध के नवाब पर कुशासन का आरोप लगाकर अवध के राज्य को भी समाप्त कर दिया। देशी राजाओं में काफी असंतोष था । नाना साहब की पेंशन बंद रानी लक्ष्मी बाई करके डलहौजी ने उसे भी अंग्रेजों का शत्रु बना दिया था। तात्या टोपे, नाना साहब की सेनापति थे।
  • मुगल बादशाह का अपनमान- अंग्रेजों ने भारतीय सिक्के पर से मुगल बादशाह का नाम हटा दिया, पेंशन (नजराना) देना एवं सम्मान प्रदर्शित करना बंद कर दिया । अतः मुसलमानों एवं भारतीयों में असंतोष बढता गया।
  • देशी नरेशों में असंतोष- देशी नरेशों को उच्च पदों से वंचित कर दिया गया, देशी नरेशों में असंतोष की भावना उत्पन्न हो गई।
  • अँग्रेजों का कुशासन - ब्रिटिश शासन व्यवस्था जटिल थी। शासक भारतीयों की भाषा, राजनीति एवं कानून से अनभिज्ञ थे। ठीक-ठीक न्याय नहीं करते थे। 

2. आर्थिक कारण

अँग्रेजों के आगमन के पूर्व भारत आर्थिक दृष्टि से विश्व में सर्वाधिक समृद्ध देश समझा जाता था। अँग्रेजी सत्ता के प्रसार के फलस्वरूप यह विश्व के निर्धन देश बन गए। भारतीय व्यापार पर अँग्रेजों ने एकाधिपत्य स्थापित कर लिया, घरेलू उद्योग-धंधों को नष्ट कर डाला। आर्थिक स्थिति अत्यंत शोचनीय हो गई। देशी राज्यों को कंपनी राज्य में मिला लेने से बहुत से सैनिक बेकार हो गए।

3. सामाजिक कारण

  • अंग्रेजों द्वारा भारतीय सामाजिक जीवन में हस्तक्षेप -  कंपनी सरकार ने भारत में 100 वर्षों के शासनकाल में अनेक समाज सुधार के कार्य किए। बेटिंग ने सती प्रथा, बाल हत्या आदि को अवैध घोषित किया। डलहौजी ने विधवा विवाह को मान्यता दी । ये सभी सुधार भारतीयों हित में थे। भारतीय रूढ़िवादी होने के कारण डर गए कि अंग्रेज भारतीय सभ्यता नष्ट कर अंग्रेजी सभ्यता का प्रसार कर रहे हैं।
  • वैज्ञानिक अविष्कार- रेल, तार, डाक आदि व्यवस्था से लोग डर गए । इन अविष्कारों को सामाजिक हस्तक्षेप समझने लगे।
  • ईसाई धर्म का प्रचार- अंग्रेज भारतीय रीति-रिवाजों एवं सामाजिक नियमों की अवहेलना करते थे । भारतीयों को महसूस हुआ कि वे उन्हें ईसाई बनाना चाहते हैं।
  • अंग्रेजों का अहंकार - अंग्रेजों ने अहंकारवादी नीति अपनाई। अँग्रेज भारतीयों से घृणा करते थे, उनसे बेगार लेते थे। भारतीयों की रीति-रिवाजों से उन्हें नफरत थी।

4. धार्मिक कारण

  • धर्म की निंदा- ईसाई धर्म प्रचारक खुलेआम हिन्दू और मुसलमान दोनों धर्मों की निंदा करते थे। इससे दोनों धर्मों की भावनाओं को ठेस लगी।
  • शिक्षण संस्थाओं में ईसाई धर्म का प्रचार- शिक्षण संस्थाओं में ईसाई धर्म का प्रचार किया जाता था, ईसाई मिनशनरियों ने बहुत से स्कूल खोले।
  • ईसाई धर्म को स्वीकार करने वालों की सुविधा - जो ईसाई धर्म को स्वीकार कर लेते थे उनहें सरकारी नौकरी व अन्य सुविधाएँ सहज मिल जाती थी। 

5. सैनिक कारण

कंपनी में भारतीय सैनिकों की संख्या अधिक और अँग्रेज सैनिकों की संख्या कम थी। भारतीय सैनिकों को वेतन भत्ता कम मिलता था। सेना के उच्च पद पर अँग्रेज नियुक्त होते थे। अँग्रेज अफसर भारतीय सैनिकों के साथ अपमान जनक व्यवहार करते थे।

6. तात्कालिक कारण

अँग्रेजी सेना में शामिल रायफलों में कारतूस भरने के पहले दी गई कारतूस के खोखे को दाँतों से छीलना पड़ता था। सैनिकों में यह अफवाह फैल गई थी कारतूसों में गाय और सूअर की चर्बी का प्रयोग किया गया है। इससे हिन्दू और मुस्लिम दोनों सैनिकों की धर्मिक भावना को ठेस पहुँची। समस्त देश में विद्रोह की लहर प्रारंभ हो गई।

विद्रोह का आरंभ और अंत - 29 मार्च, 1857 को बैरकपुर छावनी में मंगल पाण्डेय नामक एक सैनिक ने चर्बी वाले कारतूस का प्रयोग करने से इंकार करते हुए विद्रोह किया और एक अंग्रेज सार्जेन्ट को मार डाला। उसे फाँसी की सजा दी गई। इसके बाद बैरकपुर छावनी के सैनिकों ने विद्रोह कर दिया। 

यह सूचना आग की चिनगारी की तरह सारे देश में फैल गई। शीघ्र की मेरठ, कानपुर, लखनऊ, झॉसी और बिहार आदि में भी सैनिकों ने विद्रोह कर दिया। रानी लक्ष्मीबाई, बाबू कुंवर सिंह आदि क्रांतिकारियों के नेता थे। पर ब्रिटिश सैनिकों ने बड़ी क्रूरतापूर्वक क्रांति को कुचल दिया।

विद्रोह के परिणाम

1. अँग्रेजी सेना का पुनर्गठन। 

2. कंपनी के शासन का अंत।

3. शासन की नीति में परिवर्तन।

4. देशी राज्यों में परिवर्तित नीति। 

5. हिन्दू-मुस्लिम वैमनस्य का जन्म।

6. भारतीयों के प्रति अंग्रेजों में भेदभाव और वैमनस्य में वृद्धि। 

7. उग्रवाद का उदय।

1. सेना का पुनर्गठन - अंग्रेजों ने अपनी सेनाओं में राजपूत, मुसलमान आदि भारतीय सैनिकों की संख्या घटा दी सिक्ख और गोरखा सैनिकों की संख्या बढ़ा दी गई।

2. कंपनी की शासन का अंत- महारानी विक्टोरिया ने कंपनी का शासन समाप्त कर भारत का शासन सीधे क्राउन के हाथों ले लिया। गवर्नर जनरल को वायसराय की उपाधि दी गई।

3. शासन की नीति में परिवर्तन- लार्ड केनिंग ने महारानी विक्टोरिया का घोषणा पत्र पढ़कर सुनायाजनता के कल्याण के लिए सार्वजनिक सुविधाएँ प्रदान की जाए साथ ही प्रजा के धार्मिक विचारों में हस्तक्षेप न करें

4. देशी राज्यों में परिवर्तित नीति- डलहौजी की हड़प नीति का परित्याग कर दिय गया। भारतीय राजाओं को दत्तक पुत्र लेने का अधिकार मिला।

5. हिन्दू मुस्लिम वैमनस्य का जन्म - 1857 के विद्रोह से हिन्दु-मुस्लिम में एकता की भावना जागृत हुई। जो ब्रिटिश साम्राज्य के लिए खतरनाक थी। अतः अँग्रेजों ने दोनों सम्प्रदायों के बीच मतभेद पैदा करने का प्रयास किया। 

6. उग्रवाद का उदय - भारतीय राजनीति में उग्रवाद का उदय हुआ। आगे चलकर उग्रवादी प्रारंभ हुआ।

विद्रोह की असफलता का कारण

1. योग्य नेता, एकता संगठन का अभाव।

2. विद्रोह के संचालन के लिए सुव्यवस्थित कार्यक्रम का अभव।

3. अपर्याप्त सैनिक साधन थे।

4. भारतीयों के पास संप्रेषण और विचारों के आदान-प्रदान के लिए सुव्यवस्थित कार्यक्रमों का अभाव था।

5. विद्रोह का समय उपयुक्त न था। 

6. देशी शासकों (नेपाल, हैदराबाद, कश्मीर, पटियाला) ने अँग्रेजों के प्रति राजभक्ति दिखाई। 

7. विद्रोह सिर्फ उत्तर भारत तक सीमित रहा।

8. बुद्धिजीवियों ने सहयोग नहीं दिया।

विद्रोह का स्वरूप - 1857 का विद्रोह भारतीय इतिहास की एक युगांतरकारी घटना थी। यह भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम था। सावरकर ने "भारतीय स्वतंत्रता का युद्ध" नामक पुस्तक में इसे भारतीय स्वतंत्रता का युद्ध बताया है। 

विद्रोह के समय भारत में सांप्रदायिकता की भावना समाप्त हो चुकी थी जो इसके राष्ट्रीय स्वरूप का द्योतक थी। अंग्रेजों के विरूद्ध भारतीयों के हृदय में असंतोष की भावना पनप रही थी। तभी कारतूसों की घटना ने विद्रोह का काम किया। 

इस प्रकार 1857 में हिन्दुओं और मुसलमानों ने मिलका अँग्रेजों से मोर्चा लिया। दिल्ली में मुगल सम्राट बहादुरशाह के नेतृत्व में क्रांति का संचालन स्वीकार कर लिया था। अवध के बेगम हजरत महल के नेतृत्व में विद्रोह ने राष्ट्रीय रूप ले लिया था। इसे भारतीय स्वतंत्रता का प्रथम चरण कहा जा सकता है।

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