भारत में डचों का आगमन - Arrival of Dutch in India

डच भारत में आने वाले द्वितीय यूरोपीय थे। ये डच हॉलैण्डवासी थे। समुद्र के किनारे होने के कारण समुद्री यात्रा में इनकी विशेष रुचि थी। 1602 ई. में भारत में डचों के द्वारा डच ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना की गई। इन्हें भारत में व्यापार के साथ युद्ध समझौता तथा क्षेत्र विस्तार की अनुमति भी दी गई थी।

किन्तु डचों ने कभी भी एकाधिकार की बात पर ध्यान नहीं दिया। यह इन्डोनेशिया के कारण सुमात्रा द्वीपों पर अधिकार कर मसाले के व्यापार पर अधिकार करना चाहते थे।

डचों ने भारत के व्यापार पर पुर्तगालियों का अधिकार खत्म किया किन्तु इन क्षेत्रों में अंग्रेजों की भी नजरें थी। सन् 1623 ई. में डचों ने अंग्रेजों को पराजित किया । आगरा, सूरत, पटना, चिनसुरा मछलीपट्नम कोचीन, भड़ौंच (भरुच) आदि को अपना व्यापारिक केन्द्र बना लिया। 

डचों ने 1652 ई. में कोलंबों एवं 1658 ई. में श्रीलंका पर अपना अधिकार कर लिया। इन्होंने जावा तथा श्रीलंका में व्यापार पर विशेष ध्यान दिया और अंग्रेजों को भारत में स्थापित होने का अवसर प्रदान किया।

डचों का पतन - डच कंपनी राष्ट्रीय कंपनी थी। उनमें नेतृत्व कुशलता का अभाव था तथा इनके व्यापारिक साधन भी पर्याप्त नहीं थे। इनकी आंतरिक स्थिति भी खराब थी। फ्राँस के साथ लंबे युद्ध ने भी हॉलैण्ड की स्थिति खराब कर दी थी, इसी समय भारत में अँग्रेज ने अपने पैर दृढ़ता से जमा लिए थे। जिसका प्रभाव डचों पर भी पड़ा और भारत में इनकी सत्ता तथा व्यापार समाप्त हो गए।

अँग्रजों का आगमन- इंग्लैंड में सामुद्रिक शक्ति के उत्कर्ष ने इन्हें पूर्वी राष्ट्रों के साथ व्यापार करने के लिए प्रोत्साहित किया परिणामस्वरुप 31 दिसम्बर, 1600 ई. को रानी एलिजाबेथ ने ईस्ट इंडिया कंपनी को पूर्वी देशों के साथ व्यापार के लिए चार्टर पत्र दिया।

सर्वप्रथम 1609 ई. में कंपनी ने भारत में अपना व्यापारिक केन्द्र स्थापित किया। कंपनी का एक प्रतिनिधि कैप्टन हॅकिन्स ने मुगल सम्राट जहाँगीर के दरबार में उपस्थित होकर सम्राट से सूरत में व्यापारिक कंपनी स्थापित करने की आज्ञा माँगी। 

प्रारंभ में आज्ञा देने के पश्चात् जहाँगीर पुर्तगालियों की शत्रुता के भय एवं सूरत के व्यापारियों के अनुरोध पर आज्ञा देने से इंकार कर दिया। अंत में हॉकिन्स आज्ञा प्राप्त कर सूरत में व्यापार करने में सफल रहा। सन् 1615 ई. में सर टॉमस रो ने मुगल दरबार से साम्राज्य के सभी भागों में व्यापार करने की आज्ञा प्राप्त कर ली। 

इसके पश्चात् भारत में अंग्रेजों तथा डचों के मध्य संघर्ष आरंभ हुआ। जो कि 1667 ई. में एक संधि के साथ समाप्त हुआ। जिसके तहत अंग्रेजों ने इंडोनेशिया पर अधिकार के दावे को छोड़ दिया एवं डचों ने अँग्रेज बस्तियों से दूर रहने का वचन दिया।

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