राष्ट्रीय आंदोलन में छत्तीसगढ़ का योगदान - Contribution of Chhattisgarh in National Movement

सोनखान के जमींदार वीर नारायण सिंह के नेतृत्व में 1857 की क्रांति में आरंभ हुई। 18 जनवरी, 1858 को हनुमान सिंह राजपूत ने सेना में विद्रोह कर अँग्रेज अधिकारी सिडवेल को मार डाला। 17 क्रांतिकारियों को 22 जनवरी, 1858 को रायपुर में फाँसी दी गई। हनुमान सिंह गिरफ्तार न हो सका। भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस की स्थापना सन् 1885 ई. में हुई थी। 

राष्ट्रीय आंदोलन में छत्तीसगढ़ का योगदान

काँग्रेस का प्रथम अधिवेशन 1891 ई. में नगापुर में हुआ। पढ़े-लिखे युव क तेजी से राष्ट्रीय आंदोलन में आने लगे तथा स्वदेशी प्रचार, खादी, विदेशी वस्तु का बहिष्कार आदि छत्तीसगढ़ में भी होने लगे । काँग्रेसी नेताओं का रायपुर आना-जाना प्रारंभ हो गया। 

शहीद वीरनारायण सिंह 1918 में ही होमरूल लीग का अधिवेशन हुआ और प्रांतीय काँग्रेस की राजनीतिक परिषद की बैठक भी रायपुर में होने के कारण अच्छा माहौल बन गया। राजनाँदगाँव में 37 दिनों तक मजदूर हड़ताल (बीएसपी मिल की) भारत में पहली बार हुई । जिसका नेतृत्व ठाकुर प्यारेलाल सिंह ने किया था।

1920 ई. में कंडेल ग्राम (जिला धमतरी) में किसानों ने नहर सत्याग्रह प्रारंभ किया और किसानों ने नहर जलकर पटाने से इंकार कर दिया। सरकार ने किसानों के पालतू मवेशी जब्त कर लिए। जब सरकार को यह पता चला कि पं. सुंदरलाल शर्मा ने गाँधी जी को सत्याग्रह के संचालन हेतु आमंत्रित किया है तो सरकार ने मवेशी किसानों को वापिस कर दिए तथा टैक्स भी वापिस ले लिया।

गाँधी जी का पर्दापण तथा प्रथम छत्तीसगढ़ आगमन - महात्मा गाँधी 20 दिसंबर 1920 को छत्तीसगढ़ आए थे, 21 दिसम्बर को धमतरी पहुँचकर कृषकों को बधाइयाँ दी। रायपुर लौटते हुए वे कुरूद में भी रूके। छत्तीसगढ़ की जनता ने गाँधी जी का अभूतपूर्व स्वागत किया। छत्तीसगढ़ से वे नागपुर गए वहाँ 26 दिसंबर को काँग्रेस का नियमित अधिवेशन हुआ।

गाँधी जी और असहयोग आंदोलन- गाँधी जी ने अधिवेशन में असहयोग आंदोलन के संबंध में अपने विचार रखे। छत्तीसगढ़ के पं. सुंदरलाल शर्मा, वामन राव लाखे, ठाकुर छेदी लाल, ई. राघवेन्द्र राव एवं रविशंकर शुक्ल प्रमुख थे। छत्तीसगढ़ के अनेक वकीलों ने वकालत, हजारो छात्रों ने सरकारी विद्यालयों का बहिष्कार कर दिया। 

शराब बंदी, खादी प्रचारक, स्वदेशी का उपयोग तथा विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया गया। जन सहयोग से रायपुर, धमतरी, बिलासपुर, दुर्ग, राजनांदगाँव में राष्ट्रीय विद्यालय और राष्ट्रीय पंचायत का गठन किया गया। साथ ही अँग्रेजी अदालतों का बहिष्कार और विदेशी वस्त्रों की होली जलाई गई।

जंगल सत्याग्रह- 1922 में सिहावा नगरी में आदिवासी जनता ने अंग्रेज वन अधिकारियों के विरूद्ध जंगल सत्याग्रह प्रारंभ किया। ये आदिवासी जनता से बेगारी कराते और मजदूरी कम देते थे। पं. सुंदरलाल शर्मा, नारायण मेघावले तथा छोटे लाल श्रीवास्तव ने भी आंदोलन में साथ दिया। अँग्रेजों ने उन्हें रास्ते में ही गिरफ्तार कर लिया।

सविनय अवज्ञा आंदोलन - जवाहर लाल नेहरू आने वाले थे, अँग्रेजों ने उन्हें रास्ते में ही गिरफ्तार कर लिया। रायपुर में नमक कानून तोड़ने में सेठ गोविंद दास, रविशंकर शुक्ल, द्वारकाप्रसाद मिश्र तथा महंत लक्ष्मी नारायण दास आदि ने सक्रिय योगदान दिया। सैकड़ों लोगों को जेल में बंद कर दिया गया।

गाँधी जी की दूसरी यात्रा - 1933 में गाँधी जी दुबारा छत्तीसगढ़ आए और 23 से 28 नवंबर तक रहे। पं. सुंदरलाल शर्मा द्वारा पहले से चलाए जा रहे हरिजन उद्धार आंदोलन की उन्होंने प्रशंसा की तथा शर्मा जी को अछूतोद्धार में अपना गुरू माना।

1942 का आंदोलन - 8 अगस्त, 1942 को गाँधी जी ने भारत छोड़ो आंदोलन का प्रस्ताव करते हुए करो या मरो का नारा दे दिया। फलस्वरूप 9 अगस्त को सुबह होने के पूर्व ही सभी बड़े नेता बंदी बना लिए गए। 

छत्तीसगढ़ में भी कोने-कोने में आंदोलन हुआ। हजारों लोग गिरफ्तार कर लिए गए। जेलें ठसाठस भर गई तो बेतों की सजा दी जाने लगी, लेकिन उत्साही छात्रों ने घुटने नहीं टेके। टेलीफोन तार की लाइनें काटना, डाकघर लूटना, थाने जलाना ये सब घटनाएँ बड़े पैमाने पर हुई। अंततः 15 अगस्त, 1947 को देश आजाद हो गया।

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