उपभोक्ता की समस्याओं का वर्णन कीजिए -Describe consumer problems

Post Date : 30 September 2022

उपभोक्ता का अर्थ- अर्थशास्त्री मेयर्स के शब्दों में उपभोग मानव आवश्यकताओं की पूर्ति में लाई गई वस्तुओं अथवा सेवाओं का प्रत्यक्ष तथा अंतिम प्रयोग है, जो यह कार्य करता है वह उपभोक्ता है। बाजार की दृष्टि से उपभोक्ता होने के लिए क्रय शक्ति का होना तथा वस्तुओं की प्राप्ति में उसका उपयोग करने से है।

उपभोक्ता सार्वभौम है। उत्पादन की मात्रा एवं गुणवत्ता वही निश्चित करता है, यदि आप अपनी उत्पादन प्रणाली में सफल होना चाहते हैं तो उपभोक्ता को सम्मान दीजिए एवं उसकी आज्ञा का पालन कीजिए। उपभोक्ता के संबंध में कही गई यह उक्ति आज के समय में अपना महत्व खो रही है। वर्तमान में उपभोक्ता स्वयं असहाय व परावलंबी अनुभव करने लगा है।

उसे सरलता से प्रचार माध्यमों द्वारा दूरदर्शन एवं रेडियो के आकर्षक विज्ञापनों द्वारा दिग्भ्रमित किया जा सकता है। उपभोक्ता की बढ़ती हुई आवश्यकता और कम होती हुई आय उसकी स्थिति को चिन्तनीय बना रही है। उपभोक्ता को अपनी सीमित आय से अधिकतम संतुष्टि प्राप्त करना होता है।

अतः उपरोक्त उद्देश्य की प्राप्ति के लिए उपभोक्ता को संरक्षण देना आवश्यक लगने लगा है, जिससे वह उत्पादकों के प्रचार माध्यमों के मायाजाल में न फँसे तथा अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकें।

वर्तमान में भारत जैसे प्रजातांत्रिक मिश्रित अर्थव्यवस्था वाले राष्ट्र में निजी क्षेत्र एवं सहकारी उद्यम दोनों के प्रचार माध्यम से उपभोक्ता असहाय अनुभव करता है।

साथ ही उपभोक्ता को अपने अधिकारों के प्रति सचेत करना आवश्यक है लगने लगा है, उपभोक्ता की सुविधा के लिए अनेक कानूनी प्रावधान है, परंतु उपभोक्ता को उसकी जानकारी नहीं होती है। 

उपभोक्ता को शोषण से बचाने के लिए 1986 में उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम की स्थापना की गई जिसके अंतर्गत उपभोक्ता की शिकायतें सुनने एवं उनके कष्ट दूर करने के लिए तीन स्तरीय व्यवस्था की गई है।

राष्ट्रीय स्तर पर राज्य एवं जिला स्तर बने हुए फोरम में शिकायत करने की विधि सरल होती है, जिसके अंतर्गत उपभोक्ता को संरक्षण देकर उसे हुई हानि का मुआवजा दिलाने में फोरम सहायक होती है।

उपभोक्ता का कार्य क्षेत्र 

एक पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में उपभोक्ता सभी प्रकार की आर्थिक क्रियाओं का केन्द्र बिन्दु होता है, उत्पादक वर्ग उन वस्तुओं का उत्पादन करता है, जिन्हें उपभोक्ता चाहता है। यदि उत्पादक वर्ग ऐसा नहीं करता तो उसके द्वारा निर्मित माल की बिक्री नहीं होगी और परिणाम स्वरूप उसे हानि होगी।

इसके विपरीत एक समाजवादी अर्थव्यवस्था में उपभोक्ता के हितों का पूर्ण ध्यान सरकार द्वारा रखा जाता है, इस पद्धति में सरकार उन्हीं वस्तुओं का उत्पादन करती है, जो समाज के हित में हो।

एक मिश्रित अर्थव्यवस्था में पूँजीवाद एवं समाजवाद दोनों ही विशेषताएँ पाई जाती हैं, एक ओर जहाँ उत्पादक वर्ग उपभोक्ताओं की इच्छा के अनुसार उत्पादन करता है। वहीं सरकार उपभोक्ता के हितों की रक्षा करने के लिए अनेक प्रकार के कानून बनाती है, चूंकि भारत एक मिश्रित अर्थव्यवस्था वाला देश है। 

इसलिए यहाँ उत्पादन एवं उपभोक्ता स्वतंत्र है एक बड़ी सीमा तक बाजार की दशाएँ शोषण पूर्ण बनी रहती है इसलिए उपभोक्ता के हितों की रक्षा के लिए अनेक नियंत्रण भी सरकार द्वारा चलाए गए हैं, किन्तु एक मिश्रित अर्थव्यवस्था में उपभोक्ताओं के हितों की पूर्ण रक्षा नहीं होती। 

विज्ञापन एवं प्रचार के द्वारा उत्पादक वर्ग हल्की वस्तुओं को भी श्रेष्ठ वस्तुओं के रुप में प्रस्तुत करने में सफल हो जाते हैं। इसके साथ ही उनका अनेक प्रकार से शोषण भी होता है भारतीय अर्थव्यवस्था के संदर्भ में उपभोक्ताओं की समस्याएँ और उनका शोषण निम्न प्रकार होता है -

उपभोक्ता की समस्याएँ

1. मिलावट की समस्या - आज के युग में प्रमुख समस्या मिलावट की बन चुकी है। अनेक खाद्य पदार्थों बुरादा में मिलावट करके उपभोक्ताओं का शोषण किया जाता है। जैसे दूध में पानी, चावल में कंकड़ एवं मिर्च में मिलाना एक सामान्य बात हो गई है। मिलावट का असर हमारे स्वास्थ्य पर पड़ता है, तथा इसके प्रयोग से अनेक प्रकार की बीमारियाँ होती है।

2. मूल्य वृद्धि की समस्या - मूल्य वृद्धि की समस्या जटिल रुप धारण कर लिया है संसार के सभी देश में वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि हो रही है दैनिक एवं जीवन उपयोगी वस्तुओं की कीमतों में भारी वृद्धि हुई है। 

जिससे सामान्य लोगों को गंभीर संकट का सामना करना पड़ रहा है संग्रह की प्रवृत्ति से व्यापारीगण वस्तुओं का अभाव बता कर मनमानी कीमत वसूलतें हैं, इससे उपभोक्ताओं का शोषण होता है।

3. कम नाप तौल की समस्या - सामान्य उपभोक्ताओं को नाप तौल का ज्ञान नहीं होता है, या वे इस ओर विशेष ध्यान नहीं देते। अधिकांश व्यापारी वस्तुओं के नापतौल में गड़बड़ी करते हैं। छोटे व्यापारियों के पास तो सही ढंग से तराजू एवं बाँट तक नहीं पाए जाते फलतः उपभोक्ताओं को सही-सही नापतौल की वस्तुएँ प्राप्त नहीं हो पाती इस प्रकार ये उपभोक्ताओं का शोषण होता है। 

4 घटिया माल की समस्या - कुछ व्यापारी असली माल बताकर नकली व घटिया माल बेचते हैं, जैसे घटिया किस्म की सीमेंट, नकली दवाईयाँ तथा बिजली के नकली कलपुर्जे, यह प्रवृत्ति बढ़ रही है। 

इससे उपभोक्ताओं को कभी-कभी अपनी जान तक गंवानी पड़ती है। विज्ञापन के द्वारा नकली माल को भी असली बना दिया जाता है यह एक जटिल समस्या है, जिससे सभी क्षेत्रों में उपभोक्ताओं का शोषण होता है।

5. झूठे एवं भ्रम पैदा करने वाले विज्ञापन- विज्ञापनों के माध्यम से कई वस्तुओं की गुणवत्ता को बढ़ा-चढ़ाकर बताया जाता है। विज्ञापनों के मायाजाल में पड़कर उपभोक्ता ऐसी अनेक वस्तुओं को खरीद लेते हैं, जो नकली तथा हानिकारक होती है । इस प्रवृत्ति से उपभोक्ताओं का बहुत अधिक शोषण होता है।

6. बिक्री के बाद की देख-रेख - प्रायः उत्पादक एवं दुकानदार वस्तुओं की बिक्री के समय उपभोक्ता के बिक्री के बाद सेवाओं का वचन देता है। इसके साथ ही अधिक उत्पादन के साथ एक वर्ष या दो वर्ष अथवा उससे भी अधिक की गारंटी दी जाती है। 

किन्तु यह देखा जाता है कि अनेक उत्पादक एवं विक्रेता न तो बिक्री के बाद की सेवा प्रदान करते हैं और न ही गारंटी के अनुसार खराब उत्पादनों को वापिस लेते हैं। इससे सीधे-सीधे उपभोक्ताओं को बहुत हानि उठानी पड़ती है। 

7. जमा खोरी एवं कालाबाजारी- प्रायः देखा जाता है, कि उत्पादक एवं बड़े व्यापारी जीवन के लिए आवश्यक वस्तुओं की जमा खोरी कर लेते हैं, इससे इन वस्तुओं का बाजार में मूल्य बढ़ने लगता है। उपभोक्ताओं को विवश होकर ऊँचे मूल्य पर इन वस्तुओं को खरीदना पड़ता है। 

यदि सरकार इन वस्तुओं के मूल्य नियंत्रित करती है तो ये वस्तुएँ काला बाजार में बिकने लगती है, इससे उपभोक्ता का शोषण होता है, और उन्हें अपनी जरूरी आवश्यकताओं के लिए भी ऊँचे मूल्य पर वस्तुएँ खरीदने के लिए विवश होना पड़ता है।

8. उपभोक्ताओं की कम मोलभाव शक्ति- सामान्यतः उपभोक्ता गरीब एवं असंगठित होता है, फलतः बाजार में उसकी मोल भाव करने की शक्ति बहुत कम होती है, परिणामस्वरुप उत्पादक एवं दुकानदार उपभोक्ताओं से ऊँचे मूल्य वसूल करके घटिया और मिलावट माल देने में सफल हो जाते हैं। इस प्रकार उसका शोषण होता है।

उपभोक्ता के अधिकार 

भारत जैसे प्रजातांत्रिक एवं कल्याणकारी राज्य में प्रत्येक उपभोक्ता को यह अधिकार है, कि उचित मूल्य पर अपने जीवन यापन के लिए शुद्ध एवं अच्छी वस्तुएँ प्राप्त करें किन्तु अज्ञानता एवं असंगठित होने के कारण सामान्य उपभोक्ताओं को अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है, और उनका कई प्रकार से शोषण होता है आदिवासियों एवं ग्रामीण क्षेत्रों में यह प्रवृत्ति अधिक पाई जाती हैं। 

वास्तविकता यह है कि एक सामान्य उपभोक्ता को अपने अधिकारों का ज्ञान नहीं होता है, यदि किसी को ज्ञान होता भी है तो वह या तो झगड़े में पड़ने के स्थान पर शोषण को सह लेता है, या दुकानदार से समझौता कर लेता है। 

भारत में ऐसे कानून हैं जो उपभोक्ता को शोषण के विरूद्ध संरक्षण एवं न्याय प्रदान करते हैं इस संदर्भ में सन् 1986 का उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम विशेष महत्वपूर्ण है।

इसके साथ ही एकाधिकार प्रतिबंध अधिनियम, नापतौल अधिनियम, मिलावट विरोधी अधिनियम का भी विशेष महत्व है।

सामान्यतः यह देखा गया है, कि साधारण उपभोक्ता को इन कानूनी प्रावधानों का ज्ञान ही नहीं होता इसके साथ ही असंगठित होने के कारण एक अकेले उपभोक्ता की बात पर न तो उत्पादक और न ही दुकानदार ध्यान देता है। 

फलतः उपभोक्ताओं को शोषण से बचाने एवं उन्हें अपने अधिकारों के प्रति सचेत करने के लिए यह आवश्यक है, कि उनमें चेतना जागृत की जावे तथा उन्हें उपभोक्ता शिक्षा दी जावें। 

इन संदर्भ में सन् 1986 के उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम की जानकारी विशेष उपयोगी है यह अधिनियम सभी वस्तुओं एवं सेवाओं पर लागू होता है, चाहे उनका उत्पादन या बिक्री सार्वजनिक क्षेत्र द्वारा हो या निजी अथवा सहकारी क्षेत्र में इस अधिनियम में उपभोक्ताओं के लिए निम्नलिखित अधिकारों के संरक्षण का प्रावधान है -

1. ऐसे वस्तुओं की बिक्री रोकी जावें जिनमें उपभोक्ता के जीवन या संपत्ति की हानि होती है। 

2. व्यापार की वस्तु की मात्रा, गुण स्तर एवं मूल्य संबंधित धोखाधड़ी से संबंधित सुरक्षा, प्रतिस्पर्धात्मक मूल्य पर उपलब्ध विभिन्न वस्तुओं के बारे में जानने का अधिकार। 

3. उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा के लिए विभिन्न स्तरों पर संगठन बनाने और उन्हें सुदृढ़ करने का अधिकार। 

4. धोखा देने वाली व्यापारिक क्रियाओं से उपभोक्ता को होने वाली हानि का मुआवजा प्राप्त करने का अधिकार। 

5. उपभोक्ता शिक्षा का अधिकार। 

इस अधिनियम के अंतर्गत उपभोक्ताओं की शिकायतें सुनने व उनके कष्ट को दूर करने के लिए तीन स्तरीय न्याय व्यवस्था की गई है। सर्वोच्च स्तर पर राष्ट्रीय कमीशन है तदुपरान्त राज्य स्तरीय कमीशन की स्थापना की गई है, अंत में जिला स्तरीय संगठन है, जिसे जिला फोरम कहा जाता है। 

राष्ट्रीय कमीशन की स्थापना केन्द्र सरकार के द्वारा की जाती है राज्य कमीशन एवं जिला फोरम की स्थापना राज्य शासन केन्द्र से अनुमति लेकर करती है इन सभी संस्थाओं में शिकायत करने की विधि सरल होती है, इसमें कोई शुल्क नहीं लगता। उपभोक्ता को केवल लिखित में इन संस्थाओं को शिकायत देनी पड़ती है।

उपभोक्ताओं के हितों के साथ संरक्षण एवं उन्हें हुई हानि का मुआवजा दिलाने में संस्थाओं ने महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

किंतु यह देखा गया है, कि यदि उपभोक्ताओं में चेतना है, तो वे शोषण में अपनी रक्षा कर सकते हैं, जबकि उन्हें एक ओर इनका ज्ञान हो और दूसरी ओर यह आवश्यक है कि उपभोक्ता शिक्षा को जन-जन तक पहुँचाया जावें उपभोक्ताओं को उचित मूल्य पर अच्छी वस्तुएँ उपलब्ध कराने के उद्देश्य से सरकार ने अनेक कदम उठाए हैं।

उदाहरणार्थ- सहकारी उपभोक्ता समितियों का गठन, सुपर बाजार आवश्यक वस्तुओं का मूल्य नियंत्रण, उचित मूल्य की दुकानों की स्थापना, राज्य द्वारा अनाज, तेल, शक्कर, मिट्टी का तेल्ब आदि की पूर्ति । इन उपायों से जहाँ उपभोक्ताओं को उचित मूल्य पर वस्तुएँ प्राप्त होती हैं वहीं मिलावट एवं कम नापतौल से भी मुक्ति मिल जाती है।

उपभोक्ता शिक्षा

उपभोक्ता शिक्षा का आशय- उपभोक्ता को वस्तुओं, बाजारों, उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, अपने अधिकारों व उपभोक्ता आंदोलन की जानकारी प्राप्त करने अपनी शक्ति एवं चेतना के विकास करने से है। 

जिसमें वह बाजार के व्याप्त बुराइयों व विक्रेताओं के कुचक्र से अपने को बचा सकें संक्षेप में उपभोक्ताओं को उनके अधिकारों व कर्त्तव्यों की जानकारी देना ही उपभोक्ता शिक्षा है, अर्थशास्त्र के ज्ञान का सार एवं आधार है। 

ऐसी शिक्षा या ज्ञान जो उपभोक्ताओं को अधिकतम संतुष्टि प्रदान करने में सहायक हो उसे उपभोक्ता शिक्षा कहा जाएगा।

उपभोक्ता शिक्षा की आवश्यकता - उपभोक्ताओं को बाजार में उपलब्ध वस्तुओं के गुणों का ज्ञान, मोलभाव शक्ति, आय के अनुसार उपभोक्ता वस्तुओं का चयन, हानिकारक वस्तुएँ जैसे सिगरेट, शराब आदि के बारे में चेतावनी, उपभोक्ताओं का विभिन्न स्तरों पर संगठन आदि को सम्मिलित किया जाता है। 

इसके साथ ही वस्तुओं की खरीदी में हुई धोखाधड़ी या बेईमानी तथा उपयोग से हुई हानि का मुआवजा प्राप्त करने की कानूनी विधि का ज्ञान भी आवश्यक है।

उपभोक्ता शिक्षा की आवश्यकता एवं उद्देश्य को निम्न प्रकार से स्पष्ट कर सकते हैं। 

1. उत्पादों की जानकारी - उपभोक्ता शिक्षा की प्रथम आवश्यकता है, वस्तुओं के संबंध में जानकारी प्राप्त करना । उपभोक्ता जिन उत्पादों को क्रय करने जा रहा है, उस वस्तु के किस्म एवं कीमत के संबंध में उसे जानकारी होनी चाहिए। 

वस्तुओं के संबंध में अनभिज्ञ होना उसके शोषण का एक प्रमुख कारण है, वस्तुओं की जानकारी के संबंध में यह कहा जाता है - "क्रेता सावधान रहे।

2. अधिनियमों की जानकारी - उपभोक्ता को शोषण से बचाने के लिए अनेक अधिनियम है। नियमों की अनभिज्ञता के कारण अपने संरक्षण के लिए वह नियमों की सहायता नहीं ले पाता है। 

अतः उपभोक्ता शिक्षा का यह मुख्य उद्देश्य है, कि वह उपभोक्ताओं को विभिन्न अधिनियमों की जानकारी प्रदान करें और इस प्रकार उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करें।

3. उपभोक्ताओं की सुरक्षा - उपभोक्ताओं को अवांछित वस्तु के विक्रय से सुरक्षा एवं मिलावट एवं कम मापतौल से वस्तु प्राप्त करने से मुक्ति, उपभोक्ता शिक्षा का उद्देश्य है, उपभोक्ता शिक्षा से उपभोक्ताओं को इतना समर्थ बना देना कि उसे छला न जा सके तथा उस पर कपट व्यवहार का प्रभाव ने पड़े।

4. उपभोक्ता आंदोलन की सफलता - आधुनिक युग संगठन का युग है सफलता की प्रथम शर्त संगठन है अतः उपभोक्ता स्वयं को संगठित करके अपने ऊपर होने वाले शोषण से बच सकते हैं। उपभोक्ता आंदोलन की सफलता के लिए उपभोक्ता शिक्षा आवश्यक है। उपभोक्ता शिक्षा उपभोक्ता आंदोलन का अस्त्र कहलाता है।

5. देश की आर्थिक समृद्धि - आर्थिक परिदृश्य की स्वच्छता आर्थिक विकास के लिए आवश्यक है। वस्तुओं की अशुद्धता एवं मानक स्तर से न्यूनता विदेशी व्यापार में बाधक है।

आज किसी भी देश की आर्थिक संपन्नता उसके निर्यात पर आधारित है। उपभोक्ता की शिक्षा का इस पर अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ेगा, अतः उपभोक्ता की शिक्षा पर विशेष बल दिया जावे।

इस प्रकार स्पष्ट है, कि उपभोक्ता ज्ञान का समुचित विस्तार हो जावे तो उनका शोषण स्वतः समाप्त हो जावेगा। यह चेतना है, जिसके द्वारा उपभोक्ता संगठित होकर अपने हितों की रक्षा करने में सफल हो सकते हैं। भारत जैसे कल्याणकारी राज्य में उपभोक्ताओं की शिक्षा आवश्यक है।

इसके महत्व को निम्न प्रकार से स्पष्ट किया जा सकता है

1. भारत एक गरीब लोगों का देश है। यहाँ की लगभग एक तिहाई जनसंख्या गरीबी की रेखा के नीचे अपना जीवन यापन कर रही है, उपभोक्ता शिक्षा से यह वर्ग अपनी सीमित आय से अधिकतम संतुष्टि प्राप्त करने में सफल हो यह आवश्यक है।

2. विज्ञापन एवं प्रचार-प्रसार के कारण उत्कृष्ठ वस्तुओं को चयन करना कठिन हो गया। यदि उपभोक्ता को कहीं धोखा होता है तो वह अपने ज्ञान से मुआवजा प्राप्त कर सकता है। 

3. इससे उपभोक्ताओं का संगठन बनेगा जिससे उनकी मोलभाव करने की शक्ति में वृद्धि होगी।

4. उपभोक्ता शिक्षा से ही वस्तुओं को खरीदने का ज्ञान प्राप्त होता है। 

5. हानिकारक वस्तुओं का उपयोग कम होगा, जिससे सामाजिक कल्याण में वृद्धि होगी। 

6. उपभोक्ताओं में राष्ट्रीय भावना का विकास होगा, जिससे सरकार को मूल्य नियंत्रित रखने कालाबाजारी एवं मिलावट आदि रोकने में मदद मिलेगी।

7. इससे उपभोक्ताओं के ज्ञान में वृद्धि होगी और वे बचत के महत्व को समझेंगे फलतः उनका जीवन स्तर ऊँचा होगा।

8. उपभोक्ताओं को शोषण से सुरक्षा प्रदान करने के लिए।

9. इसका अंतिम तथा सबसे महत्वपूर्ण पहलू उपभोक्ताओं को अधिकतम संतुष्टि प्रदान करना है। वह सही वस्तुओं को क्रय, आय के उचित उपयोग, अपव्यय को रोककर एवं वस्तुओं को उचित समय पर क्रय करके प्राप्त करेगा। 

इस प्रकार उचित रुप से दी गई उपभोक्ता शिक्षा से उपभोक्ताओं के बीच अपनी राय का सही रुप में उपयोग करने की भावना जागृत होती है और बचत करने में सफल होकर वे अपने जीवन को आर्थिक रुप में सुखमय बना सकेंगे।