भारत में ब्रिटिश सत्ता की स्थापना - Establishment of British power in India

भारत में गुगल शासक बाबर के द्वारा जिस विशाल मुगल साम्राज्य की स्थापना की गई थी, वह 18वीं सदी में पतन के गर्त में डूब गया। औरंगजेब के पश्चात् दिल्ली पर बैठने वाले सभी मुगल शासक विपत्तियों में घिरे रहे और मुगल साम्राज्य जर्जर हो गया था।

मुगल साम्राज्य के इस मलबे पर कई स्वतंत्र और अर्ध स्वतंत्र शक्तियाँ उठ खड़ी हुई। दक्षिण में निजाम-उल-मुल्क, बंगाल में अलीवर्दी खाँ एवं अधम में सहादत खाँ ने स्वतंत्र राज्यों की स्थापना कर ली एवं रोहेलखण्ड में रुहेला अफगानों ने अपनी स्वतंत्रता सत्ता स्थापित कर ली तो सिक्खों ने पंजाब में और ब्रिटिश मराठों ने महाराष्ट्र में अपनी शक्ति बढ़ा ली। 

इसी मध्य कई विदेशी शक्तियाँ भारत में व्यापार करने आई और धीरे-धीरे उन्होंने भारतीय राजनीति में हस्तक्षेप प्रारंभ कर दिया। इन स्वतंत्र शक्तियों ने नाममात्र के लिए मुगल साम्राज्य की सत्ता स्वीकारी और उनके प्रतिनिधि के रूप में स्वीकृति प्राप्त कर अपने पद को वैधता प्रदान का प्रयास किया।

इन राज्यों में शासकों ने कानून और शांति व्यवस्था स्थापित कर व्यावहारिक, आर्थिक तथा प्रशासनिक ढाँचा तैयार किया। राजनैतिक अधिकारों को विकेन्द्रीकरण हुआ। जिससे सरदारों, जागीरदारों एवं जमींदारों को राजनैतिक तथा आर्थिक शक्ति प्राप्त हुई। इन राज्यों में धर्म-निरपेक्ष राजनीति थी। 

शासकों ने सार्वजनिक स्थानों, सेना एवं नागरिक सेवा में धार्मिक भेदभाव का ध्यान नहीं रखते हुए, योग्यता के आंधार पर नियुक्ति की किन्तु इन्होंने आर्थिक विकास पर ध्यान नहीं दिया, जिससे धीरे-धीरे राज्यों का अर्थ व्यवस्था खराब होने लगी। 

शासकों ने आन्तरिक तथा विदेशी व्यापार को प्रोत्साहन दिया परन्तु आधारभूत औद्योगिक तथा व्यापारिक ढाँचे को आध पुनिक बनाने के लिए कोई प्रयत्न नहीं किया, फलस्वरूप विदेशी शक्तियों को बढ़ते हुए प्रभाव को रोकने में यह राज्य असमर्थ रहे। अंततः भारत में ब्रिटिश शासन स्थापित हो गया।

18वीं शताब्दी के स्वतंत्र भारतीय राज्य

हैदराबाद- हैदराबाद में स्वतंत्र सत्ता की स्थापना 1724 ई. में निजाम-उल-मुल्क आसफ जहाँ ने की। इसने स्वतंत्र शासक के रूप में शासन किया, कई लड़ाईयाँ लड़ी, सुलह एवं संधियाँ की, हिन्दुओं को उच्च पदों पर नियुक्त किया। इसके राज्य की वार्षिक आय लगभग 18 करोड़ प्रतिवर्ष थी। 

1784 में निजाम-उल-मुल्क की मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र नासिर जंग निजाम बना। निजाम बनने के लिए वंश में अन्य दावेदार भी थे इनके मध्य संघर्ष के कारण यूरोपीय शक्तियों ने हैदराबाद के राजनीति में हस्तक्षेप किया परिणामस्वरुप 1798 में निजाम ने अँग्रजों की अधीनता स्वीकार कर ली। 

कर्नाटक- कर्नाटक का नवाब शआदतउल्ला खाँ हैदराबाद के राजा के अधीन था। किन्तु बाद में इसने भी स्वतंत्र सत्ता स्थापित कर ली। कर्नाटक में भी उत्तराधिकार के आपसी पारिवारिक संघर्ष में अंग्रेजों व फ्राँसीसियों ने दखल दिया और अंत में नवाब ने अंग्रेजों की अधीनता स्वीकार कर ली।

बंगाल- बंगाल में मुगल सत्ता की कमजोरी का लाभ उठाकर मुर्शिद कुली खाँ ने स्वतंत्र सत्ता स्थापित कर ली थी। मुर्शिद कुली खाँ एक योग्य शासक सिद्ध हुआ। इसके शासनकाल में बंगाल, बिहार, उड़ीसा में अभूतपूर्व प्रगति हुई। जून 1727 ई. में इसकी मृत्यु हो गई।

मुर्शिद कुली खाँ के पश्चात् इसका दामाद शुजाउद्दीन मुहम्मद खाँ वहाँ का शासक बना। 1739 में इसकी मृत्यु के पश्चात् शुजाउद्दीन का पुत्र सरफराज खाँ गद्दी पर बैठा। इसके शासन में बंगाल में अराजकता फैल गई। 

10 अप्रैल, 1740 ई. में इसे मारकर अलीवर्दी खाँ बंगाल, बिहार और उड़ीसा का शासक बन गया। उसने पुनः बंगाल में शांति और सुव्यवस्था कायम की। अलीवर्दी खाँ के पश्चात् इसका पौत्र सिराजुद्दौला बंगाल का शासक बना। वह प्लासी युद्ध एवं बक्सर की युद्ध में अंग्रेजों से पराजित हुआ और उसने उनकी अधीनता स्वीकार कर ली।

अवध- अवध में शआदत खाँ ने स्वतंत्र सत्ता स्थापित की थी। इसकी मृत्यु के पश्चात् सफदरजंग अवध का नवाब बना। अक्टूबर, 1754 ई. में शुजाउद्दौला नवाब बना। यह उत्तर भारत का सर्वाधिक लोकप्रिय नवाब था। 

1765 ई. में बक्सर के युद्ध में अंग्रेजों से पराजित होने के पश्चात् शुजाउद्दौला ने इलाहाबाद और कड़ाप्रांत अँग्रेजों को दे दिया था। 1856 में लार्ड डलहौजी ने अवध के अंतिम नवाब वाजिद अली शाह पर कुशासन का आरोप लगाकर अवध पर अधिकार जमा लिया।

मैसूर- मैसूर में 1761 ई. में हैदर अली नामक सेना नायक ने सत्ता स्थापित की । हैदर अली एवं इसका पुत्र टीपु सुल्तान जीवन पर्यन्त अंग्रेजों से युद्धरत रहे। अंततः मैसूर भी अंग्रेजों के अधिपत्य में आ गया।

इन राज्यों के अतिरिक्त दिल्ली के आसपास कई स्वतंत्र राज्य स्थापित हुए थे। इनसे राजपूत राज्य, जाट राज्य, सिक्ख राज्य प्रमुख थे। यह सभी स्वतंत्र देशी राज्य सदैव आपसी संघर्ष करते रहते थे। जिससे भारत की राजनैतिक, आर्थिक एवं सामाजिक स्थिति अत्यंत खराब हो गई थी। इस कमजोर राजनीतिक स्थिति का लाभ उठाकर विदेशी शक्तियों ने अपने पैर जमाने शुरु कर दिए।

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