भारत में अंग्रेजी सत्ता की स्थापना - Establishment of British power in India

भारत में अँग्रेजों की सत्ता स्थापना तथा फ्राँसीसियों को पराजित करने के कई कारण थे। जिनमें प्रमुख है- 

1. शक्तिशाली नौसेना - अँग्रेजों की नौसना फ्राँसीसियों की तुलना में अत्यधिक शक्तिशाली थी, अतः इनका मुकाबला करना कठिन था। 

2. स्वरूप – ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी व्यापारिक कंपनी थी जिस पर ब्रिटिश सरकार को कोई हस्तक्षेप नहीं था।

3. समृद्ध प्रदेश - अंग्रेजों के पास अत्यंत समृद्ध प्रदेश थे, जिनसे उनसे लाभ प्राप्त होता था। 

4. विलियम पिट की नीति- विलियम पिट इंग्लैण्ड का युद्ध मंत्री था। इसने अपने विवेक से फ्राँस को यूरोप में युद्धों में उलझाए रखा जिससे उसका ध्यान भारत को नहीं जा सका। 

5. श्रेष्ठ सैनिकशक्ति- अँग्रेज सैनिक अनुशासनबद्ध, प्रशिक्षित एवं हथियारों से सुसज्जित थे जबकि फ्रांसीसियों के पास इनका अभाव था।

भारत में अंग्रेजी सत्ता की स्थापना

भारत में ब्रिटिश शासन की स्थापना सर्वप्रथम बंगाल में हुई। भारत की राजनीतिक स्थिति का लाभ उठाकर अँग्रेजों ने भारत अपना अधिकार जमा लिया।

बंगाल पर आधिपत्य - बंगाल के सूबेदार स्वतंत्र नवाब के रूप में शासन कर रहे थे। 1717 में सम्राट फर्रूखशियर ने मुर्शिद कुली खाँ को बंगाल का सूबेदार बनाया। इसने 1719 ई. में उड़ीसा को भी अपने अधि कार में कर लिया। मुर्शिद कुली खाँ के बाद शुजाउद्दीन बंगाल का नवाब बना। इसने 1733 में बिहार पर भी अधिपत्य स्थापित कर लिया। 

शुजाउद्दीन की मृत्यु के पश्चात् सरफराज नवाब बना। वह अयोग्य था। 1740 ई. में बिहार के सूबेदार अलीवर्दी खाँ ने सरफराज खाँ को पराजित कर नवाबी प्राप्त कर ली । यह योग्य प्रशासक था। बंगाल की समृद्धि मराठों तथा अँग्रेजों के आकर्षण का केन्द्र थी। 

10 अप्रैल, 1756 में अलीवर्दी खाँ के मृत्यु के बाद उसका पौत्र मिर्जा मुहम्मद सिराजुद्दौला नवाब बना। इस समय सिराजुद्दौला की आयु 24 वर्ष थी। नवाब ने सर्व प्रथम अँग्रेजों को शर्तों के अनुरूप व्यापार का आदेश दिया और अपने प्रशासन को व्यवस्थित किया। अपनी प्रारंभिक सफलताओं के बाद सिराजुद्दौला निष्क्रियता व प्रमोद में फँस गया जिसका लाभ अँग्रेजों ने उठाया।

प्लासी का युद्ध (1757 ई.) सिराजुद्दौला एक योग्य प्रशासक था, किन्तु अँग्रेजों के साथ उसकी क्षमा नीति घातक सिद्ध हुई जो आगे चलकर इसके पतन का कारण बनी। 11 जुलाई को नवाब कलकत्ता से आया तभी कुछ दिनों बाद शैकतजंग ने बगावत कर दी। 16 अक्टूबर, 1756 ई. में शौकत जंग व सिराजुद्दौला के मध्य रंगमहल नामक स्थान पर युद्ध हुआ जिसमें नवाब को विजय प्राप्त हुई।

कलकत्ता पर अँग्रेजों का अधिकार - कलकत्ते के भाग पर अँग्रेज फुल्टन द्वीप में शरण लिए हुए थे। दिसंबर 1756 ई. में क्लाइव स्थल सेना लेकर तथा वाटसन जलसेना लेकर पहुँचा। क्लाइव ने नवाब को अँग्रेजों की पूर्वस्थिति स्वीकार करने को कहा, परिस्थितिवश नवाब ने 9 फरवरी 1757 ई. को अलीनगर की संधि कर ली जिसके तहत अँग्रेजों को कर मुक्त व्यापार का अधिकार प्राप्त हो गया।

चन्द्रनगर का अधिकार - क्लाइव ने 23 मार्च, 1757 ई. को चन्द्रनगर पर आक्रमण कर इस पर अधिकार कर लिया। नवाब के खिलाफ षड़यंत्र - अँग्रेजों ने विश्वास घात करते हुए नवाब के खिलाफ षड़यंत्र कर नवाब के सेनापति मीर जाफर, खादिम खाँ, जगत सेठ और अमीरचंद को लालच देकर अपनी तरफ मिला लिया। मीर जाफर को नवाब, जगत सेठ व अमीरचंद को राजकोष का अंश प्रदान करने का वचन दिया।

युद्ध की घटना- क्लाइव ने नवाब पर अली नगर की संधि तोड़ने का अरोप लगाया । 22 जून, 1757 ई. को मुर्शिदाबाद से 20 मील दूर पलाश के वृक्ष से आच्छादित पलासी मैदान पर नवाब व अँग्रेजों की सेना आमने-सामने हो गई। नवाब की सेना में 57,000 सैनिक थे। इसमें 45,000 सैनिक मीर जाफर के और 12,000 मीर मदन के अधीन थे। 

23 जूप, 1757 ई. को युद्ध शुरू हो गया, युद्ध आरंभ होते ही जाफर के 45,000 सैनिक अँग्रेजों से मिल गए। मीर मदन के नेतृत्व वाले थोड़े से सैनिक बहादुर से लड़ते रहे। विषम स्थिति को देख नवाब युद्ध स्थल से भागने लगा। लेकिन मीर जाफर के पुत्र मीरन ने उसे पकड़कर उसकी हत्या कर दी और युद्ध लड़े ही अँग्रेज विजयी हो गए।

युद्ध के परिणाम- इस युद्ध से अंग्रेजों को बंगाल प्रात में मुक्त व्यापार का अधिकार प्राप्त हो गया। कंपनी को कलकत्ता में टकसाल खोलने की अनुमति मिल गई। कर मुक्त व्यापार अधिकार मिलते ही अंग्रेजों का शोषण आरंभ हो गया। 

इस युद्ध ने भारतीयों को उत्साहहीन कर दिया। जिससे भारत विजय अँग्रेजों के लिए आसान हो गई। प्लासी के युद्ध ने अंग्रेजों के लिए भारत की विजय का द्वार खोल दिया। फ्राँसीसियों को पराजित करनेके लिए पर्याप्त धन बंगाल से प्राप्त होने लगा फलस्वरुप फ्राँसीसियों का भी भारत में पतन हो गया।

प्लासी का युद्ध इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि इसने बक्सर युद्ध की आधारशिला रखी थी। प्लासी के युद्ध के पश्चात् मीर जाफर बंगाल का नवाब बना, जो कमजोर व अयोग्य था। किंतु षड़यंत्र कर अँग्रेजों ने उसे भी गद्दी से हटाकर मीर जाफर के दामाद मीर कासिम को नवाब बनाया। 

मीर कासिम एक योग्य व कुशल शासक था। उसने अपनी प्रशासनिक शक्तियों को बढ़ाने का प्रयास किया फलतः अँग्रेजों ने पुनः मीर कासिम को हटा कर मीर जाफर को नवाब बना दिया। मीर कासिम ने अवध के नवाब शुजाउद्दौला व मुगल सम्राट शाह आलम से सहयोग लेकर बक्सर में अंग्रेजों को ललकारा।

बक्सर का युद्ध (22 अक्टूबर, 1764 ई.) मीर कासिम ने अवध के नवाब व मुगल सम्राट के साथ संयुक्त सेना तैयार कर अँग्रेजों के खिलाफ बक्सर के मैदान में अंग्रेजों को ललकारा। चार माह तक युद्ध चला, सेना ने वीरतापूर्वक सामना किया किंतु पराजित हुए। शाह आलम आलम अंग्रेजों से संबंध बनाने में व्यस्त रहा। 

अवध का नवाब शरणार्थी बन गया तथा मीर कासिम युद्ध स्थल से भाग गया। 12 वर्ष पश्चात् उसकी भी मृत्यु हो गई।

इलाहाबाद की संधि - अगस्त, 1765 ई. को क्लाइव ने अवध के नवाब तथा मुगल सम्राट के साथ संधि की । इसे इलाहाबाद की संधि कहते हैं, इसकी शर्तें थी

1. शुजाउद्दौला से कड़ा तथा इलाहाबाद के दो प्रांत ले लिए गए।

2. शुजाउद्दौला को अवध का प्रदेश सौंप दिया गया।

3. अँग्रेजों ने अवध के नवाब को सैनिक सहायता देना स्वीकार किया किंतु सेना का पूरा व्यय नवाब को वहन करना था।

4. कंपनी को अवध में कर मुक्त व्यापार का अधिकार मिल गया।

5. अवध के नवाब ने युद्ध की क्षतिपूर्ति हेतु कंपनी को 50 लाख रूपये देना स्वीकार किया।

6. कड़ा तथा इलाहाबाद के जिले मुगल सम्राट को दे दिए गए।

7. मुगल सम्राट शाह आलम को 26 लाख रूपये वार्षिक पेंशन निश्चित किया गया। 

8. मुगल सम्राट ने बंगाल - बिहार और उड़ीसा की दीवानी अँग्रेजों को प्रदान कर दी।

बक्सर की विजय से अंग्रेजों की महत्वकांक्षाएँ इतनी बढ़ गई कि वे दिल्ली पर भी अधिकार करने का स्वप्न देखने लगे। इलाहाबाद की संधि से बंगाल, बिहार और उड़ीसा का दीवानी अधिकार कंपनी को प्राप्त हो गया, जिससे लगान वसूल करना तथा तत्सम्बन्धी न्याय कार्य कंपनी के हाथ में आ गया। अब कंपनी को वैधता की मुहल लग गई और वह अपहरणकर्ता के रूप में नहीं वरन विधिक रूप से मुगल सम्राट की प्रजा बन गई।

बंगाल में द्वैध शासन- 1765 ई. में क्लाइव पुनः बंगाल का गवर्नर बनकर आया। बंगाल पर कंपनी का सीधा अधिकार अव्यवहारिक था, अतः क्लाइव ने बंगाल में आर्थिक अधिकार कंपनी के पास रखे तथा व्यवस्थ की जिम्मेदारी नवाब को दे दी। इस व्यवस्था को ही द्वैध शासन कहते हैं।

द्वैध शासन के कारण- यदि कंपनी शासन पर पूर्ण नियंत्रण कर लेती तो उसकी आमदनी कम हो जाती और उत्तरदायित्व बढ़ जाता। साथ ही कंपनी के पास योग्य कर्मचारियों का भी अभाव था। कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स भी पूर्ण अधिकार के पक्ष में नहीं था। इन सभी समस्याओं का हल यही था कि बंगाल में दोहरा शासन लागू किया जाए।

द्वैध शासन के प्रभाव - द्वैध शासन प्रणाली का बंगाल का विशेष प्रभाव पड़ा, भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था का पूर्णतः पतन हो गया । 1770 ई. में भयानक अकाल पड़ा। जो परिणामों के लिहाज से मानव इतिहास में ज्ञात सबसे भयंकर अकालों में से एक था। 

इसमें लाखों लोग (बंगाल की लगभग एक तिहाई जनता) मारे गए। नवाब के अधिकारियों एवं कर्मचारियों में निष्क्रियता आ गई। कंपनी में भ्रष्टाचार व लूटपाट की स्थिति बढ़ती जा रही थी।

द्वैध शासन की समाप्ति - द्वैध शासन में निहित दोषों के कारण 1772 ई. में वारेन हेस्टिंग्ज ने इसे समाप्त कर दिया।

वारेन हेस्टिंग्ज (1772 - 1784) के कुशल नेतृत्व में कम्पनी ने अपने सबसे कठिन समय में कई सफलताएँ प्राप्त की। सारे मराठा सरदार, दक्षिण भारतीय शक्तियाँ, हैदरअली और निजाम अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई की घोषणा कर चुके थे। 

अँग्रेज भारत के बाहर अमेरिका में भी उपनिवेशों की लड़ाई हार रहे थे। फ्राँसीसी उनके संकटकाल को देख पुनः सक्रिय हो रहे थे लेकिन वारेन हेस्टिंग्स ने बड़ी बुद्धिमत्ता, दृढ़ता और कर्मठता से स्थितियों को बदल दिया। 

वारेन हेस्टिंग्ज के शासन काल में प्रथम अँग्रेज-मराठा युद्ध हुआ। जिससे नागपुर राज्य अँग्रेजों के खेमें में आ गया । इस युद्ध ने पेशवा, होल्कर तथा भोंसले पर अधिकार कर लिया। उसने अपनी दूरदर्शिता से इंग्लैण्ड के भारतीय साम्राज्य को अनुशासित और संगठित करने की तरफ ध्यान दिया।

कार्नवालिस (1786-1793) के शासन काल तक अंग्रेजों के मराठों के साथ शांति संबंध थे। (यद्यपि वे अपनी शक्ति को निरंतर बढ़ाते रहे) तृतीय आंग्ल मैसूर युद्ध में दक्षिण भारत में टीपू की प्रमुखता खत्म हो चुकी थी। हैदराबाद का निजाम उनकी कूटनीति से ब्रिटिश विरोधी गठजोड़ से अलग हो चुका था।

वैलेजली का शासन काल (1798-1805) में भारत में ब्रिटिश शासन का बड़े पैमाने पर विस्तार हुआ । वैलेजली ने तीन तरीकों का सहारा लिया -1. सहायक संधियाँ, 2. पूरी लड़ाई, 3. अधीनस्थ शासकों के भू-भागों को हथियाना। 

1. सहायक संधि की व्यवस्था के अंतर्गत संधि करने वाले भारतीय शासकों को अपने राज्य में स्थायी तौर पर ब्रिटिश फौज रखने और उसके रख-रखाव का पूरा खर्च वहन करने को मजबूर किया जाता था।

2. अपने दरबार में ब्रिटिश रेजीडेंट रखना पड़ता था। उसकी (कम्पनी की) स्वीकृति के बिना वह किसी भी यूरोपवासी को अपनी सेवा में नहीं रख सकता था।

3. किसी अन्य भारतीय शासक से बातचीत न करे। बदले में अँग्रेजों ने उसकी रक्षा करने और उसके आंतरिक मामलों में दखल न देने का वचन दिया। मगर ऐसा किया नहीं।

इस प्रकार सहायक संधि करके वस्तुतः भारतीय राज्यों ने अपनी स्वतंत्रता को अंग्रेजों के पास गिरवी रख दिया और अपने सभी महत्वपूर्ण अधिकार खो दिए।

वैलेजली ने पहली सहायक संधि हैदराबाद के निजाम के साथ 1798 में की। 1801 में अवध का नवाब सहायक संधि करने पर मजबूर हुआ।

टीपू सुल्तान ने सहायक संधि करने से इंकार कर दिया और 4 मई, 1799 को चौथे आंग्ल मैसूर युद्ध में अँग्रेजों से बहादुरी के साथ युद्ध करते हुए वीरगति को प्राप्त हुआ। उसकी मृत्यु के बाद वैलेजली ने मैसूर, कर्नाटक, तंजौर और सूरत के साथ और भी कड़ी शर्तों के साथ संधि की।

25 अक्टूबर, 1802 को होल्कर ने जब पेशवा और सिंधिया की संयुक्त सेनाओं को हरा दिया तब कायर पेशवा बाजीराव द्वितीय भागकर अंग्रेजों के पास पहुँचा और उसने 1802 में बेसीन में सहायक संधि पर दस्तखत कर दिए। 

सितम्बर और नवंबर 1803 में वैलेजली ने सिंधिया और भोंसल की सेनाओं को भी परास्त कर दिया और उन्हें भी कम्पनी के साथ सहायक संधि स्वीकार करनी पड़ी। वेलेजली होल्कर को पूरी तरह परास्त नहीं कर पाया। 1806 में उसे इंग्लैण्ड वापस बुला लिया गया। जिसे इंग्लैण्ड में माक्विस ऑफ हेस्टिंग्स भी कहते हैं । गवर्नर जनरल हेस्टिंग्स 1813 से 1828 तक भारत में रहा।

प्रशासनिक संगठन (1757- 1857 ई.)- भारत में ब्रिटिश शासन व्यवस्था तीन आधारों पर स्थापित थी- 1. नागरिक सेवा, 2. सेना, 3. पुलिस। अँग्रेज विदेशी थे और कभी भी भारतीयों का स्नेह तथा समर्थन प्राप्त नहीं कर पाए। क्योंकि उन्होंने अपना नियंत्रण बनाए रखने के लिए आतंक व शक्ति का सहारा लेकर शासन किया। समय-समय पर कम्पनी ने अपने अधिनियम भी पारित किए।

1. रेग्युलेटिंग एक्ट (1773 ई.)- इसे ब्रिटिश संसद में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की व्यवस्था पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए पारित किया गया था ।

2. पिट्स इंडिया एक्ट (1784 ई.)- इंग्लैण्ड के प्रधानमंत्री विलियम पिट ने 1773 ई. के एक्ट में निहित दोषों को दूर करने के लिए पिट्स इंडिया एक्ट पारित किया।

3. 1813 ई. का चार्टर एक्ट - महारानी विक्टोरिया के द्वारा निर्धारित प्रपत्रों के अधीन ही ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना की गई थी। कंपनी के अधिकारों व स्थिति को स्पष्ट करने के लिए जो कानून बनाए जाते थे, उन्हें चार्टर एक्ट कहा जाता था।

4. 1833 ई. का चार्टर एक्ट- इस एक्ट के तहत चीन से होने वाले व्यापार तथा चाय के उत्पादन से कंपनी का एकाधिकार समाप्त कर दिया गया। दास प्रथा अवैध घोषित कर दी गई। बंगाल के गवर्नर को सम्पूर्ण भारत का गवर्नर जनरल बना दिया गया। अंग्रेजों को बिना किसी अनुमति के भारत में कहीं भी बसने का अधिकार दे दिया गया।

5. 1853 ई. का चार्टर एक्ट- इस एक्ट के तहत कंपनी को सम्राट की ओर से तब तक शासन करने का अधिकार दिया गया जब तक ब्रिटिश संसद उसे इस अधिकार से वंचित नहीं करेगा। इस एक्ट ने कंपनी पर ब्रिटिश सरकार का नियंत्रण बढ़ा दिया, गवर्नर जनरल की कौसिल का विस्तार किया गया और उसे विधानसभा का नाम दिया गया। इस एक्ट के द्वारा पहली बार भारत में संसदीय शासन की नींव रखी गई।

ब्रिटिश शक्ति का सुदृढ़ीकरण- मराठों के पतन (1818 ई.) के पश्चात्  शक्ति का आधिपत्य पंजाब और सिन्ध प्रांत को छोड़कर संपूर्ण भारत पर अधिकार स्थापित हो गया था। सिन्ध विजय - 11 मार्च, 1839 ई. को अँग्रेजों ने सिन्ध में अमीरों को सहायक संधि के लिए विवश कर दिया, फलस्वरूप अगस्त 1846 में सिन्ध भी अंग्रेजों के अधीन आ गया। 

चार्ल्स नैपीयर ने लिखा था- "हमें सिन्ध् ा छीनने का कोई अधिकार नहीं है, फिर भी हम ऐसा करेंगे। यह एक अति लाभकारी उपयोगी और शैतानीपूर्ण मानवता का कार्य होगा।"

पंजाब विजय- पंजाब में राजा रणजीत सिंह का सुदृढ़ शासन था, रणजीत सिंह की मृत्यु के पश्चात् मार्च, 1849 ई. को लाहौर की संधि के द्वारा पंजाब पर भी अंग्रेजी शासन स्थापित हो गया । के

डलहौजी की हड़पनीति- लार्ड डलहौजी 1848 ई. में भारत का गवर्नर जनरल बनकर आया। लार्ड डलहौजी का शासनकाल (1848-1856 ई.) क्रूरता व दमन का काल था। डलहौजी ने विलय नीति का सहारा लेकर भारत के स्वतंत्र देशी राज्यों पर ब्रिटिश आधिपत्य स्थापित कर लिया।

विलय नीति- लार्ड डलहौजी ने देशी राज्यों को हडपने के लिए विलय नीति का सहारा लिया।  इस नीति के तहत देशी राज्यों को निस्संतान शासन की मृत्यु के पश्चात् उनके राज्य पर ब्रिटिश आधिपत्य का अधिकार मिल गया। 

अँग्रेजों ने कई राज्यों पर कुशासन का आरोप लगाकर अधिकार कर लिया। हड़पनीति के तहत सतारा (1848 ई.) झाँसी, (1853 ई.) नागपुर, (1873 ई.) सम्भलपुर व जैतपुर, (1849 ई.) सतारा, बघात एवं अवध पर ब्रिटिश आधिपत्य स्थापित हो गया। 

इस प्रकार लाई डलहौजी ने भारत में साम्राज्यवाद का ऐसा नग्न प्रदर्शन किया, जिससे सैकड़ों वर्षों सुप्त भारतीय राष्ट्रवादी विचारधारा से ओत-प्रोत हो गए।

डलहौजी के सुधार कार्य 

डलहौजी ने भारतीय प्रशासन में कई सुधार कार्य भी किए। जिनमें प्रमुख हैं-

1. बंगाल में गवर्नर जनरल के अधीन लेफ्टिनेंट गवर्नर की नियुक्ति की गई।

2. प्रत्येक प्रांत में एक-एक मुख्य आयुक्त नियुक्त किए।

भारत में डाक, तार, परिवहन, संचार माध्यमों में कई महत्वपूर्ण सुधार किए। 1845 ई. में शिक्षा आयोग का गठन किया एवं शिक्षा में सुधार कार्य भी किए।

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