कांग्रेस की स्थापना कब हुई थी - Establishment of Congress in hindi

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस बोलचाल की भाषा में कांग्रेस पार्टी कहा जाता हैं। यह एशिया और अफ्रीका में ब्रिटिश साम्राज्य में उभरने वाला पहला आधुनिक राष्ट्रवादी आंदोलन था। कांग्रेस ने भारत को यूनाइटेड किंगडम से आजादी दिलाई और ब्रिटिश साम्राज्य में अन्य उपनिवेशवाद विरोधी राष्ट्रवादी आंदोलनों को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित किया। अपने स्थायी इतिहास के कारण, कांग्रेस को अक्सर सबसे पुरानी पार्टी कहा जाता है।

कांग्रेस की स्थापना कब हुई थी

1857 की क्रांति के असफल होने के बावजूद भारतीयों में अंग्रेजी शासन के विरुद्ध असंतोष विद्यमान था। भारत में अंग्रेजी शिक्षा व पश्चिमी सभ्यता के संपर्क के फलस्वरूप एक मध्यमवर्गीय बुद्धिजीवी वर्ग का उदय हो रहा था। इस वर्ग के प्रतिनिधियों द्वारा दिसम्बर 1885 ई. में मुंबई में भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस की स्थापना की गई। 

प्रारंभ में काँग्रेस की नीति ब्रिटिश सरकार से सहयोग की रही। इसके नेता संवैधानिक तरीकों से भारतीयों को स्वशासन देने के पक्षधर थे तथापि इन नरम पंथियों का ब्रिटिश शासन पर कोई अधिक प्रभाव नहीं पड़ा। फलस्वरूप उग्र राष्ट्रवाद का विकास हुआ।

उन्नीसवीं सदी के अंत तक काँग्रेस पर उदारवादियों का ही प्रभाव रहा। उन्हीं के प्रयास से 1892 में भारत परिषद अधिनियम भी पारित हुआ था। धीरे-धीरे सरकार की नीति से उन्हें भी निराशा होने लगी थी। बीसवीं सदी के आरंभ होते ही भारतीय राष्ट्रीय जीवन में नई भावनाओं का उदय हुआ। काँग्रेस के युवग वर्ग के नेताओं की उदारवादियों की भिक्षाटन नीति में तनिक भी आस्था नहीं रही। 

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक, विपिनचंद्र पाल, अरविंद घोष, लाला लाजपत राय आदि इस नए वर्ग के प्रमुख नेता थे। ये सभी नरमदल के नेताओं को तिरस्कार की दृष्टि से देखते थे और उग्रवादी या उग्र राष्ट्रवादी कहलाए।

उग्रवादी आंदोलन के कारण भारत में उग्रवादी आंदोलन के निम्नलिखित प्रमुख कारण थे।

1. संवैधानिक आंदोलन की विफलता - नरमदल के नेताओं की असफलता के कारण युवकों का वैधानिक कार्यों पर जरा भी विश्वास नहीं रहा। उन्हें विश्वास हो गया कि हाथ-पैर जोड़ने से स्वतंत्रता कभी नहीं मिलेगी। 

इसके लिए शक्तिसंचय करना होगा तथा क्रांतिकारी उपायों का सहारा लेना पड़ेगा। इस संबंध में यह उल्लेखनीय है कि 1892 के अधिनियम द्वारा जो सुधार हुए थे वे पूर्णतः निराशाजनक थे। गैर-सरकारी सदस्यों का निर्वाचन जनता द्वारा प्रत्यक्ष रूप से नहीं होता था। फिर भी विधान परिषदों को कोई उल्लेखनीय अधिकार नहीं दिया गया था। अतः युवक वर्ग को यह विश्वास हो गया कि स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए उन्हें क्रांतिकारी रास्ता अख्तियार करना ही होगा।

2. प्राकृतिक प्रकोप- अकाल और प्लेग - 1897 में भारत में भयंकर अकाल पड़ा जिसमें लोखों व्यक्तियों की मृत्यु हो गई। अकालपीड़ितों की सहायता के लिए सरकार ने जो भी प्रयास किया वह अपर्याप्त एवं असंतोषजनक था। फलतः भारतीय जनता में बड़ा क्षोभ था। इसी समय पूना एवं बंबई में भयंकर प्लेग फैला जिससे जनमा में त्राहि-त्राहि मच गई। 

सरकार की ओर से प्लेग की रोकथाम एवं बीमारों की सहायता के लिए कुछ प्रयत्न किए गए। पर जिन फौजियों को इस कार्य के लिए भेजा गया वे ही लोगों पर अनाचार ढाने लगे। इससे जनता में बड़ी तीखी प्रतिक्रिया हुई।

3. आर्थिक असंतोष - उन्नीसवीं सदी के अंतिम चरण तथा बीसवीं सदी के प्रारंभ में चारों ओर आर्थिक असंतोष की लहर फैली हुई थी और भारतीय जनता सरकार की आर्थिक नीति से अत्यंत क्षूब्ध थी । भारतीय उद्योग धंधें नष्ट हो चुके थे।

बेकारी की संख्या बढ़ रही थी और जनता कर के बोझ से कराह रही थी। अकाल और महामारी के कारण जनता की तबाही और भी बढ़ती जा रही थी। इन बातों को क्रांति की ओर प्रेरित किया। उन्हें विश्वास हो गया कि भारत की गरीबी का मुख्य कारण विदेशी शासन है।

4. लार्ड कर्जन का शासन - लार्ड कर्जन ने अपने शासनकाल (1898 – 1905 ई.) में कुछ ऐसे अलोकप्रिय कदम उठाए जिससे ब्रिटिश सरकार के प्रति विरोध तेज हुआ और उग्रराष्ट्रवाद के विकास में मदद मिली। उसका कहना था कि वह काँग्रेस की कष्ट रहित मृत्यु में पूरा सहयोग देगा। उसका सबसे अलोकप्रिय कार्य बंगाल का विभाजन था। इसके फलस्वरूप एक उग्र आंदोलन आरंभ हो गया।

5. राष्ट्रीय घटनाओं का प्रभाव - तत्कालीन अंतर्राष्ट्रीय घटनाएँ भी भारत में उग्र राष्ट्रवादी आंदोलन सहायक सिद्ध हुई। 1896 में अबीसीनिया ने इटली को पराजित किया और 1905 में छोटे से जापान ने विशाल रूस को हराया। किसी यूरोपीय राष्ट्र पर किसी एशियाई राष्ट्र की यह पहली विजय थी। 

रूस की हार के बाद वहाँ चल रही क्रांति का उद्देश्य जार के निरंकुश शासन को समाप्त करना था पर उसे कुचल दिया गया। इस घटनाओं का भारतीय राष्ट्रवादियों पर भी प्रभाव पड़ा फलतः सारे देश में एक नई स्फूर्ति आई और समस्त देश ब्रिटिश आधिपत्य से मुक्त होने के लिए व्यग्र हो उठा।

इन सब कारणों से भारतीय राजनीति में उग्रवाद का जन्म हुआ और काँग्रेस पर उस उग्रवाद का प्रभाव अधिक पड़ा। काँग्रेस में एक नए दल का गठन हुआ, जो गरमदल कहलाया। इस दल की लोकप्रियता अधिक बढ़ी। गरमपंथियों का नेतृत्व बाल गंगाधर तिलक, विपिनचंद पाल तथा लाला लाजपत राय कर रहे थे जिन्हें 'लाल-बाल-पाल' कहा जाता है।

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