शक्ति की विशेषताएं बताइए - shakti ki visheshta

Post Date : 27 September 2022

शक्ति से आशय व्यक्तियों को या व्यवहार को नियन्त्रित करने, विनियमित करने या निर्देशित करने की क्षमता से है। शक्ति आदेश देने की क्षमता है। इस प्रकार शक्ति उस क्षमता को कहते हैं जिसमें बल प्रयोग करने की योग्यता होती है।

शक्ति की विशेषताएं बताइए

प्रत्येक व्यक्ति में अपनी आकांक्षाओं को पूरा करने की प्रबल इच्छा होती है। इन आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए स्वतन्त्रता की आवश्यकता होती है और शक्ति उस स्थिति को कहते हैं जिसके द्वारा आकांक्षाओं की पूर्ति सम्भव होती है। शक्ति की निम्नलिखित विशेषताएँ होती हैं।

  1. शक्ति की अवधारणा सम्बन्धात्मक है 
  2. शक्ति परिस्थितियों पर निर्भर होती है
  3. शक्ति के पीछे अनुशक्तियाँ विद्यमान होती हैं
  4. शक्ति के लक्ष्य भी समान नहीं होते हैं
  5. यह सैनिक शक्ति से भिन्न है 
  6. वास्तविक शक्तिधारकों को पहचानना कठिन होता है

1. शक्ति की अवधारणा सम्बन्धात्मक है - शक्ति की अवधारणा सम्बन्धात्मक है। इसका आशय यह है कि शक्ति उन दो पक्षों के सम्बन्धों को प्रकट करती है जिनमें से एक के पास शक्ति होती है और दूसरा वह जिस पर शक्ति का प्रयोग किया जाता है। 

शक्ति को धारण करने वाले पक्ष की स्थिति को अनुभव करने के लिए यह आवश्यक है कि जिन पर शक्ति का प्रयोग किया जाये, वे धारक की शक्ति से परिचित हों। इस प्रकार शक्ति की अवधारणा में एक पक्ष शक्ति रखने वाला होता है तथा अन्य पक्ष वे होते हैं जो उस शक्ति से प्रभावित होते हैं। 

2. शक्ति परिस्थितियों पर निर्भर होती है - शक्ति परिस्थितियों पर निर्भर करती है। परिस्थितियों के बदलने पर शक्ति का अनुभव कम या अधिक हो सकता है। लोकतान्त्रिक व अधिनायकवादी परिस्थितियों की समीक्षा से इसे भली प्रकार समझा जा सकता है।

शक्ति निश्चित पदो व भूमिकाओं में भी निहित होती है। इतना ही नहीं, एक ही पद पर दो भिन्न-भिन्न प्रतिभा वाले व्यक्तियों के पदासीन होने पर वास्तविक शक्ति का प्रभाव अलग होता है। भारत के किन्हीं दो प्रधानमंत्री की तुलना से यह स्पष्ट हो सकता है।

3. शक्ति के पीछे अनुशक्तियाँ विद्यमान होती हैं - शक्ति की अवधारणा अनुशक्तियों के अभाव में अकल्पनीय है। शक्ति के पीछे अन्तिम अनुशक्तियों का स्वरूप दमनात्मक व उत्पीड़क होता है वास्तविक अनुशक्तियाँ हैं, प्रभाव, प्रोत्साहन व बल आदि। दमनात्मक अनुशक्ति का प्रयोग अन्तिम शक्ति के रूप में ही होता है।

महमूद गजनबी व मुहम्मद गौरी ऐसे ही व्यक्ति थे जिन्होंने दमन व उत्पीड़न को ही अपनी शक्ति का आधार बनाया था। लोकतन्त्र में शक्ति के धारकों को जनसेवक समझा जाता है अतः यहाँ शक्ति का आधार बल या दमन न होकर प्रभाव तथा प्रोत्साहन होता है।

4. शक्ति के लक्ष्य भी समान नहीं होते - शक्ति आदर्श व उसके लक्ष्य सदैव बदलते रहते हैं। प्राचीन यूनानी दार्शनिकों की दृष्टि में शक्ति का लक्ष्य सामूहिक हित था, जबकि यथार्थवादी दार्शनिकों की दृष्टि में शक्ति का लक्ष्य सदैव व्यक्तिगत हित या स्वहित रहा है। वर्तमान में भी कल्याणकारी राज्यों का आदर्श जनहित ही माना जाता है यद्यपि शक्ति-धारक अनेक बार स्व-हित की पूर्ति करते हुए दिखाई देते हैं। 

5. यह सैनिक शक्ति से भिन्न है - जब हम सैनिक शक्ति की बात करते हैं तो हम हिंसा पर आधारित उस शक्ति की कल्पना करते हैं जो वास्तविक बल प्रयोग से सम्बन्धित है किन्तु शक्ति से आशय वास्तविक बल प्रयोग से न होकर बल प्रयोग करने की क्षमता से है। 

अतः सैनिक शक्ति राजनीतिक शक्ति की अवधारणा से भिन्न होती है। राजनीतिक शक्ति मुख्यत: मनोवैज्ञानिक है। इसकी यह मान्यता है कि कुछ व्यक्ति अन्यों की क्रियाओं व उनके मस्तिष्कों को नियंत्रित करते हैं अतः उन्हें वास्तविक बल प्रयोग की आवश्यकता नहीं पड़ती।

6. वास्तविक शक्तिधारकों को पहचानना कठिन होता है - प्रत्येक समाज में ऐसे व्यक्ति होते हैं जो वास्तविक शक्ति रखते हैं और नीति निर्धारण आदि में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है किन्तु वे पर्दे के पीछे छिपे हुए होते हैं और उनको पहचानना कठिन होता है।

चुनावों में राजनीतिक दलों को चन्दा देकर व अनेक प्रत्याशियों को विभिन्न प्रकार की सहायता देकर पूँजीपति विधायिकाओं में अपना प्रभाव स्थापित कर लेते हैं और बाद में पर्दे के पीछे बैटे सरकारी नीतियों के निर्धारण को प्रभावित करते हैं। 

समाज के अत्यधिक शक्तिशाली लोग वे हो सकते हैं जो पर्दे के पीछे रहते हैं या जो वातावरण को तथा समय-समय पर उठने वाले प्रश्नों को नियन्त्रित करते हैं, वे नहीं जो प्रत्यक्ष प्रश्नों को सुलझाने में भाग लेते हैं। 

शक्ति के रूप

शक्ति के विभिन्न पक्षों का अध्ययन करने के पश्चात् समाज में विद्यमान इसके विभिन्न रूपों को समझना भी आवश्यक है। सामान्यतः शक्ति तीन रूपों में प्रकट होती है। ये रूप हैं- आर्थिक, राजनीतिक तथा वैचारिक। नीचे इन्हीं तीनों रूपों का वर्णन किया गया है -

1. आर्थिक शक्ति - आधुनिक युग में आर्थिक शक्ति तथा राजनीतिक शक्ति को पूर्णतः पृथक् नहीं किया जा सकता। एक ओर पूँजीवादी देश हैं जहाँ पूँजीवादी वर्ग अपने हितों की पूर्ति के लिए राजनीतिक शक्ति पर परोक्ष रूप से प्रभाव डालता है और इस प्रकार इन देशों में नीति निर्धारण व पदों के वितरण पर आर्थिक शक्ति का प्रभाव स्थापित रहता है। 

दूसरी ओर साम्यवादी देशों में राजनीतिक व आर्थिक दोनों प्रकार की शक्तियों का कुछ हाथों में केन्द्रीकरण हो जाता है। जो लोग राजनीतिक निर्णय लेने की शक्ति रखते हैं, उन्हीं के हाथों में सम्पूर्ण आर्थिक शक्ति भी निहित होती है। 

अनुभव ने यह सिद्ध कर दिया है कि सामान्यतः सभी साम्यवादी देशों में तानाशाही शासन स्थापित है और उन देशों में जहाँ थोड़े-से पूँजीपतियों को देश की सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था पर अधिकार स्थापित करने का अवसर मिल जाता है। 

वहाँ वे न केवल राजनीतिक शक्ति पर भी अपना परोक्ष रूप में प्रभाव स्थापित कर लेते हैं बल्कि अपने हित साधन करने के लिए राजनीतिक शक्ति का निरंकुश रूप में प्रयोग भी करते हैं। इस प्रकार यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि किसी समाज में जितना अधिक राजनीतिक व आर्थिक शक्ति का केन्द्रीकरण होता जायेगा, वहाँ उतना ही अधिक निरंकुश व तानाशाही शासन स्थापित होता जायेगा।

आर्थिक शक्ति के प्रभाव को एक अन्य प्रकार से भी स्पष्ट किया जा सकता है। जिन देशों में उत्पादन के साधन कुछ थोड़े-से लोगों के हाथों में केन्द्रित होते हैं और अधिकांश जनता गरीब व दरिद्र होती है, वहाँ सामान्यत: निरंकुश शासन की स्थापना की अधिक सम्भावना होती है। 

इसका कारण यह है कि ऐसे देश की सरकार यदि गरीबों की सहायता करना चाहेगी और उनके जीवन स्तर को ऊँचा उठाना चाहेगी तो उसे पूँजीपतियों के विरुद्ध कठोर कदम उठाने पड़ेंगे और उनकी सम्पत्ति को छीनकर गरीबों में वितरित करना होगा।

2. राजनीतिक शक्ति - राजनीतिक शक्ति से आशय उस शक्ति से है जिसके द्वारा शासकीय निर्णय लिये जाते हैं; उन्हें लागू किया जाता है और इन निर्णयों का उल्लंघन करने वालों को दण्ड दिये जाने की व्यवस्था की जाती है। 

इन कार्यों के लिए राजनीतिक शक्ति नागरिकों को प्रभावित करती है और उन्हें राजनीतिक शक्ति के निर्णयों के अनुसार व्यवहार करने का अभ्यस्त बनाती है। यद्यपि उपर्युक्त कार्य समाज में विद्यमान विभिन्न समुदायों द्वारा सम्पन्न होते रहते हैं किन्तु राज्य इन समुदायों में सर्वाधिक सुसंगठित होने के कारण अपने निर्णयों को अधिक प्रभावपूर्ण ढंग से लागू करवा सकता है। 

क्योंकि उसके पास अपनी आज्ञाओं को मनवाने की शक्ति भी होती है, यद्यपि इन निर्णयों को राजनीतिक दुल व दबाव समूह आदि संगठन भी प्रभावित करते हैं। राज्य का स्वरूप अनेक प्रकार का हो सकता है। 

जैसे - नेपाल के समान वंशानुगत राजतन्त्र जहाँ राजा वंशानुगत राज्य करता है, भारत जैसे देश के समान लोकतन्त्र जहाँ जनता अपने शासकों को पाँच वर्ष के लिए चुनती है, रूस जैसे देश के समान साम्यवादी शासन जहाँ साम्यवादी दल का अधिनायकवाद स्थापित है तथा पाकिस्तान जैसे देशों में जहाँ सैनिक शासन की स्थापना सामान्य बात है आदि। 

राज्य के विभिन्न स्वरूपों के होते हुए भी जहाँ तक राजनीतिक शक्ति के उपयोग करने का प्रश्न है, सभी शासनों में कुछ विशिष्ट वर्ग के लोग ही शक्ति का प्रयोग करते हैं, इनमें प्रशासनिक अधिकारी, कानून-निर्माता, पुलिस, सेना, न्यायालय, राजनीतिज्ञ, राजनीतिक दल व दबाव समूह आदि सम्मिलित होते हैं।

3. वैचारिक शक्ति - वैचारिक शक्ति से आशय उस शक्ति से है जिसके माध्यम से शासक जनता को अपने पक्ष का बनाकर उस पर अपने शासन को स्थायी बनाने का प्रयास करता है। यह मान्यता प्रत्येक युग में रही है कि हिंसा व बल प्रयोग के माध्यम से जनता पर स्थायी शासन स्थापित नहीं किया जा सकता है। 

अतः प्रत्येक युग में शासकों ने अपनी-अपनी परिस्थितियों के अनुसार जनता के विचारों को इस प्रकार बदलने का प्रयास किया है कि उनके शासन को वैचारिक समर्थन प्राप्त हो सके। इतिहास इस बात का साक्षी है कि जिन शासकों ने हिंसा व बल प्रयोग के माध्यम से शासन करने का प्रयास किया है, उनको जन-समर्थन प्राप्त नहीं हुआ है और वे स्थायी नहीं रहे हैं। 

इस प्रकार वैचारिक शक्ति का राजनीति में महत्वपूर्ण स्थान है। यह सत्य है कि इस वैचारिक युग में विचारों की शक्ति ने और अधिक महत्व प्राप्त कर लिया है।

शक्ति की पृष्ठभूमि

वैचारिक शक्ति का इतिहास भी उतना ही पुराना है जितनी पुरानी व्यक्ति की शासन करने की अभिलाषा है। विभिन्न कालों में शासकों की सत्ता को वैधानिक आधार प्रदान करने के लिए तथा जनता में शासकों के प्रति निष्ठा का भाव जाग्रत करने के लिए आवश्यकतानुसार विभिन्न सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया गया है। 

प्राचीन काल में राजा को ईश्वर के प्रतिनिधि के रूप में प्रस्तुत किया जाता था अर्थात् ईश्वर ने राजा को पृथ्वी पर शासन करने के लिए अपने प्रतिनिधि के रूप में भेजा है और सभी लोगों को उसकी आज्ञाओं का पालन करना चाहिए। जो व्यक्ति राजा की आज्ञा का उल्लंघन करेगा, वह ईश्वर के आदेश का उल्लंघन करेगा। 

शताब्दियों तक संसार के सभी भागों में राजाओं ने इसी दैवी सिद्धान्त के सहारे शासन किया है। इस विचार ने जनता में राजा के विरोध की भावना को समाप्त कर दिया है। 

सत्रहवीं शताब्दी में जब बौद्धिक क्रान्ति हुई और व्यक्ति तर्क पर आधारित ज्ञान को स्वीकार करने लगा तो दैवी सिद्धान्त में आस्था समाप्त होती चली गयी। यह विचार प्रतिपादित हुआ कि राज्य ईश्वरकृत नहीं है बल्कि व्यक्ति ने अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए बनाया है। 

इसी समय सामाजिक समझौते का सिद्धान्त तथा सामान्य इच्छा का सिद्धान्त सामने आया। अठारहवीं शताब्दी में राज्य को एक उपयोगी संस्था माना जाने लगा और उन्नीसवीं शताब्दी में लोकतन्त्रीय विचारों का प्रतिपादन हुआ। शासक व शासित का भेद समाप्त हो गया।

शक्ति सिद्धांत की आलोचना

राजनीति को शक्ति के सन्दर्भ में अध्ययन करने के दृष्टिकोण का विस्तार से अध्ययन करने से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि राजनीति के अध्ययन का यह एक महत्वपूर्ण पक्ष है किन्तु इसकी अनेक आधारों पर आलोचना की जाती है। कुछ प्रमुख आधार निम्नांकित हैं।

1. शक्ति साध्य नहीं - अनेक विचारकों ने राजनीति को शक्ति के अध्ययन तक सीमित करने के प्रयास का कड़ा विरोध किया है क्योंकि इससे शक्ति प्राप्त करना साध्य बन जाता है, जबकि यह साधन मात्र है। साध्य के रूप में शक्ति पाश्विक बन जाती है और वह व्यक्तिगत हितों की पूर्ति तक सीमित हो जाती है, जबकि राजनीति का आदर्श जनहित है, समाज में विद्यमान संघर्षों को सुलझाती है और सामाजिक प्रक्रिया के रूप में सम्पूर्ण समाज के हितों से सम्बन्धित है। 

राजनीति कल्याणकारी व्यवहार से सम्बन्धित है अतः इसे केवल शक्ति प्राप्त करने के संघर्ष के रूप में नहीं देखा जा सकता। लास्की ने ठीक ही कहा है कि "मनुष्यों को शक्ति केवल शक्ति के लिए नहीं बल्कि सम्पूर्ण जनता की सम्पन्नता के लिए दी जाती है। 

वास्तव में शक्ति को जन भावना के नियन्त्रण में रहना चाहिए। जन भावना से परे स्वार्थ पर आधारित शक्ति विध्वंसक होती है। मैकाइवर का कथन है कि राज्य का प्रमाण यह है कि उसके पास बल प्रयोग की शक्ति होती है, वह राज्य का निष्कर्ष या निचोड़ नहीं है।

2. राजनीति मूल्यात्मक - शक्ति स्वयं में एक तथ्य है। उसे अच्छाई या बुराई के रूप में नहीं समझा जा सकता, यह मूल्य विहीन अवधारणा है। इसका उपयोग अच्छाई व बुराई दोनों रूपों में किया जा सकता है। यदि राजनीति को हम शक्ति के अध्ययन तक सीमित कर दें तो राजनीति का अध्ययन भी मूल्य-विहीन बन जायेगा। इस प्रकार राजनीति के अध्ययन से शुभ व श्रेष्ठ की प्राप्ति नहीं हो सकेगी।

यदि हम उन दार्शनिकों के विचारों का अध्ययन करें जिन्होंने अपने दर्शन का केन्द्र बिन्दु शक्ति को बनाया है तो पता चलेगा कि उनके द्वारा शासक को बल प्रयोग की अनियन्त्रित व अमर्यादित शक्ति प्रदान की गयी है। मैकियावेली व हॉब्स के विचार इस तथ्य की पुष्टि करते हैं। 

वास्तविकता यह है कि राजनीति का मूल्यविहीन शक्तिवादी दृष्टिकोण राजनीतिक सिद्धान्तों (Political Principles) के पतन की ओर संकेत करता है क्योंकि यदि राजनीति को सत्ता के संघर्ष तक सीमित कर दिया गया तो स्वाभाविक रूप से आदर्शो व सिद्धान्तों का पतन अवश्यम्भावी है।

3. शक्ति का सम्बन्ध - शक्ति समर्थकों का दृष्टिकोण है कि वास्तविक शक्ति का उपभोग सम्पत्ति के मालिक नहीं करते बल्कि प्रबन्धकों के विभिन्न विशिष्ट वर्गों द्वारा होता है जो प्रबन्धक कहलाते हैं। शक्ति समर्थकों के उपर्युक्त दृष्टिकोण की साम्यवादियों द्वारा आलोचना की जाती है। 

उनका विचार है कि प्रत्येक युग में राजनीतिक शक्ति के स्वामी वही होते हैं जिनके पास आर्थिक शक्ति होती है और आर्थिक शक्ति उनके पास होती है जिनके पास उत्पादन के साधन होते हैं। इस प्रकार साम्यवादी विचारधारा के मतानुसार पूँजीपति व्यवस्था में आर्थिक, राजनीतिक व वैचारिक सभी प्रकार की शक्ति का केन्द्रीकरण पूँजीपति वर्ग के हितों की पूर्ति के लिए किया जाता है। 

जहाँ तक प्रबन्धक विशिष्ट वर्गों का प्रश्न है, उनका उद्देश्य प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में पूँजीपतियों के हितों का संरक्षण करना होता है। उनके द्वारा जनहित के कार्यों की पूर्ति करना सम्भव नहीं है। शक्ति-समर्थकों द्वारा प्रबन्धकवाद की धारणा का विकास पूँजीपतियों के हितों का परोक्ष रूप से समर्थन व विकास करना है।