गरम दल के नेता कौन कौन थे - garam dal ke neta

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का गठन 1885 में हुआ था, 1907 में यह दो गुटों में विभाजित हो गया। तिलक के नेतृत्व में गरम दल और गोखले के नेतृत्व में नरम दल। ब्रिटिश शासन के प्रति उनके रवैये के कारण उन्हें ऐसा कहा जाता था।

गरम दल के नेता कौन कौन थे

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय और बिपिनचंद्र पाल के करण गरम दल को एक विजयी दल माना जाता है। कांग्रेस के दो गुटों के बीच मतभेदों ने इसे पंगु बना दिया और प्रथम विश्व युद्ध के अंत तक ऐसा ही रहा। नारम दल ने युद्ध में अंग्रेजों की मदद की, दूसरी ओर तिलक  के नेतृत्व में गरम दल ने 1917 में होम रूल लीग आंदोलन शुरू किया। 

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक

बाल गंगाधर तिलक लोकप्रिय व्यक्तित्व होने के साथ साथ राष्ट्रवादी, शिक्षक और स्वतंत्रता कार्यकर्ता थे। वह लाल बाल पाल की एक तिहाई थे। तिलक भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के पहले नेता थे। ब्रिटिश औपनिवेशिक अधिकारियों ने उन्हें भारतीय अशांति का जनक कहा था। उन्हें लोकमान्य की उपाधि से भी सम्मानित किया गया, जिसका अर्थ है लोगों द्वारा उनके नेता के रूप में स्वीकार किया गया। महात्मा गांधी ने उन्हें आधुनिक भारत का निर्माता कहा था।

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक उग्र राष्ट्रवाद के जनक थे। उनका जन्म महाराष्ट्र में हुआ था। वे संस्कृत, अंग्रेजी एवं मराठी भाषाओं के प्रकाड विद्वान, उच्च कोटि के पत्रकार तथा महान देशभक्त थे। उन्होंने केसरी और मराठा नामक दो समाचार पत्र प्रकाशित किए थे। 

वे 1890 में कॉंग्रेस में सम्मिलित हुए महाराष्ट्र के राष्ट्रीय आंदोलन को सुसंगठित करने की उन्होंने बड़ी चेष्टा की। उन्होंने वहाँ के नवयुवकों में आत्म विश्वास, आत्मबलिदान और आत्मनिर्भरता जागृत करने के उद्देश्य से लाठी क्लबों, अखाड़ों, तथा गौ वध विरोधी समितियों की स्थापना की। 

1893 में उन्होंने गणपति उत्सव को संगठित किया जिसका उद्देश्य राजनीतिक एवं धार्मिक दोनों था। इसके बाद राजनीतिक उद्देश्य से उन्होंने 1895 में शिवाजी उत्सव प्रारंभ किया जिसका उद्देश्य यह था कि लोग शिवाजी के आदर्शों पर चलकर भारत को अंग्रेजों के हाथ से छीन लें। 

1896 के अकाल और 1897 के प्लेग के दिनों में सच्ची भावना और देशभक्ति का प्रमाण दिया। 1905 में बंगभंग आंदोलन के समय उन्होंने उदार वादी लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक दल की नीति तथा सरकार की दमन नीति की कटु आलोचना की। उन्होंने भारतीयों का उत्साह बढ़ाया तथा उनमें आत्मसम्मान एवं आत्मविश्वास की भावना जागृत की। 

बंगभंग आंदोलन के बाद वे विपिन चंद्र पाल के साथ मिलकर उग्रवादी आंदोलन का संचालन करने लगे। उनका निश्चित मत था कि काँग्रेस की नरमी और राज भक्ति से स्वतंत्रता की प्राप्ति संभव नहीं है। उनका कहना था कि राजनीतिक अधिकार लेने के लिए लड़ना पड़ेगा।

उन्होंने ही सर्वप्रथम स्वराज्य का नारा लगाया और बताया था कि “राजनीतिक अधिकार लेने के लिए लड़ना पड़ेगा।" उन्होंने ही सर्वप्रथम स्वराज्य का नारा लगाया और बताया कि स्वराज्य मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर ही रहूँगा परंतु, तत्कालीन अधिकांश नेता उदारवादी थे। 

अतः दोनों में मतभेद हो गया। यह मतभेद 1907 के सूरत काँग्रेस के समय इतना तीव्र हो गया कि दोनों (गरम तथा नरम विचार वाले नेताओं) में फूट पड़ गई तब वे काँग्रेस से बाहर आ गए। बंगाल विभाजन के विरुद्ध आवाज उठाने के दंड में उन्हें निर्वासित कर मांडले (बर्मा) भेज दिया गया। 

मांडले जेल में उन्होंने 'गीता रहस्य' तथा 'दि आर्कटिक होम ऑफ दि वेदाज' की रचना की। 1915 में नरम विचार वाले नेताओं तथा गरम दलीय विचार वाले नेताओं में मेल होने पर वे पुनः काँग्रेस में सम्मिलित हो गए। 1920 में उनका देहांत हो गया।

लाला लाजपत राय

गरमदलीय विचारधारा में विश्वास रखने वाले लाला लाजपत राय दूसरे महान नेता थे। उनका जन्म 28 जनवरी 1865 को जगराव (जिला लुधियाना) में हुआ था। 

उन्होंने देश प्रेम से प्रेरित होकर एक सच्चे देशभक्त के रूप में न केवल राजनीतिक क्षेत्र बल्कि सामाजिक और शिक्षा के क्षेत्र में बड़ा काम किया। कुछ दिनों तक उन्होंने हिसार तथा लाहौर में भी वकालत की। डीएवी कॉलेज, लाहौर की स्थापना का श्रेय लाला लाजपत राय को ही जाता है।

लाला लाजपत राय वे 1880 में कॉंग्रेस के सदस्य बने और अंतिम समय तक बडी लगन से राजनीतिक क्षेत्र में काम करते रहे। साहस और वीरता के अद्वितीय गुण के आधार पर ही उन्हें “पंजाब केसरी शेर-ए-पंजाब" कहा जाता था। उन्होंने बाल गंगाधर तिलक एवं विपिनचंद्र पाल के साथ मिलकर कार्य किया। लाल-बाल पाल की त्रिमूर्ति इतिहास प्रसिद्ध है।

20 अक्टूबर 1928 को लाला लाजपत राय के नेतृत्व में साइमन कमीशन का विरोध प्रदर्शन किया। पुलिस के एक गोर अधिकार सैंडर्स ने उन पर बड़ी बेदर्दी से लाठी से प्रहार किए। जिसके कारण 17 नवंबर 1918 को उनका देहांत हो गया। 

विपिनचंद्र पाल

विपिनचंद्र पाल स्वदेशी आंदोलन के एक महान नेता थे। उनका जन्म 1858 में सिलहट - असम में हुआ था। 1887 में वे काँग्रेस में सम्मिलित हुए। वे भी तिलक, लाजपत राय और अरविंद घोष की तरह उग्र राष्ट्रवादी थे। 

1905 में स्वदेशी आंदोलन के समय उन्होंने न्यू इंडिया, वंदे मातरम इत्यादि पत्रिकाओं द्वारा स्वदेशी उद्योग और स्वदेशी शिक्षा की आवश्यकता पर बल दिया। अरविंद घोष पर चलाए जा रहे मुकदमें के दौरान उन्हें गवाही देने के लिए बुलाया गया पर उन्होंने इंकार कर दिया। 

फलतः उन पर अदालत की मानहानि का मुकदमा चलाया गया और उन्हें छह महीने के कारावास का दंड दिया गया। जेल से छूटने के बाद वे इंग्लैण्ड चले गए। वहाँ वे लगभग तीन वर्षों तक रहे। वहाँ से लौटने के बाद वे काँग्रेस से अलग हो गए, क्योंकि गाँधी जी के शांतिपूर्ण नीतियों में उनकी आस्था नहीं थी। 1932 में उनका देहांत हो गया। 

अरविंद घोष 

अरविंद घोष का जन्म 15 अगस्त, 1872 को बंगाल के एक संपन्न परिवार में हुआ था । वे क्रांतिकारी दल के एक प्रमुख नेता थे। उन्होंने भी बंगाल विभाजन का घोर विरोध किया था उनका भी यह विचार था कि भारत को विक्षावृत्ति से स्वतंत्रता नहीं मिलेगी इसके लिए संघर्ष अत्यावश्यक है। 

उन्होंने बंगाल में गुप्त क्रांतिकारी दल का संगठन किया । वे उसके प्रधान संचालक थे। इसी काम के लिए पूना में बैठे हुए लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक और कलकत्ता में बैठे हुए अरविंद दोनों में बड़ा गहरा संबंध था। 

उन्होंने न्यू इंडिया और वंदे मातरम नामक पत्रिकाओं का संपादन कर लोगों में राष्ट्रीयता की भावना का प्रचार किया। ब्रिटिश सरकार ने उनके विरूद्ध कई प्रकार के षडयंत्र किए।

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