छत्तीसगढ़ की भौगोलिक विशेषताएं - Geographical Features of Chhattisgarh

छत्तीसगढ़ राज्य के प्रायद्वीपीय प्रठार के उत्तर-पूर्व भाग में स्थित है, यह 17°46 उत्तरी अक्षांश से 24°5' डिग्री उत्तरी आक्षांश तक तथा 80°15' पूर्वी देशांतर से 84°24' पूर्वी देशांतर में स्थित है, इसकी लंबाई पूर्व से पश्चिम की ओर 700 किमी. तक और चौड़ाई उत्तर से दक्षिण की ओर 435 किमी. तक है।

छत्तीसगढ़ की भौगोलिक विशेषताएं

छत्तीसगढ़ राज्य के उत्तर में उत्तर प्रदेश एवं झारखंड, पूर्व में उड़ीसा, दक्षिण में आन्ध्रप्रदेश, पश्चिम में मध्यप्रदेश एवं महाराष्ट्र राज्य स्थित है। यहाँ की जलवायु मुख्यत: उष्णार्द्र तथा अधोआर्द्र प्रकार की है। जो उष्ण कटिबंधीय मानसूनी जलवायु है।

छत्तीसगढ़ राज्य का कुल क्षेत्रफल 1,35,191 वर्ग कि.मी. है जो पूरे देश का 4.1 प्रतिशत है। इसकी राजधानी रायपुर है। आज का छत्तीसगढ़ अतीतकाल में कोशल, दक्षिण कोशल महाकौशल, महाकांतार दंडकारण्य आदि नामों से जाना जाता था। 

चीनी यात्री ह्वेनसांग ने अपने भारत भ्रमण वृतांत में छत्तीसगढ़ को कोसल ही लिखा है, इसका छत्तीसगढ़ नाम सुनते ही यह सोचा जाता है कि इस अंचल में छत्तीसगढ़ या किले रहे होंगे। छत्तीसगढ़ का शाब्दिक अर्थ छत्तीस गढ़ों या किलों से है। 

कलचुरी या हैहयवंशी रतनपुर और रायपुर शाखाओं के अधीन 36 किले थे जिनमें से 18 गढ़ शिवनाथ नदी के उत्तर अर्थात् रतनपुर में तथा 18 गढ़ दक्षिण में रायपुर राज्य में आते थे। छत्तीसगढ़ शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग 1487 में खैरागढ़ के दरबारी कवि दलराम राव ने अपनी रचना में किया। 

छत्तीसगढ़ राज्य ने अपनी स्वतंत्र पहचान के लिए लंबी लड़ाई लड़ी थी और अंततः जनता, विभिन्न संस्थाओं, समितियों तथा प्रमुख शिक्षाविदों, साहित्यकारों, नेताओं, छात्र-छात्राओं के सहयोग तथा संघर्ष के परिणाम स्वरूप 1 नवंबर, 2000 से छत्तीसगढ़ राज्य अपने अस्तित्व में आ गया ।

छत्तीसगढ़ के भौतिक विभाग

छत्तीसगढ़ राज्य भारत के प्रायद्वीपीय पठार के उत्तर पूर्व भाग में विस्तृत है इसके अंतर्गत छत्तीसगढ़ मैदान एवं दण्डकारण्य पठार के भौतिक भाग सम्मिलित है। भौतिक विभिन्नता के आधार पर यहाँ मैदानी, पठारी, पहाड़ी और पाट प्रदेश स्पष्टतः दृष्टिगोचर होते हैं, इसे निम्नांकित चार भौतिक विभागों में विभक्त किया जा सकता है- 1. पहाड़ी प्रदेश, 2. पठारी प्रदेश, 3 पाट प्रदेश, 4. मैदानी प्रदेश ।

1. पहाड़ी प्रदेश - छत्तीसगढ़ राज्य चारों तरफ से वनाच्छादित पहाड़ियों से घिरा हुआ है। इसकी सामान्य ऊँचाई 1,000 से 3,000 मीटर तक है, इसकी भूगर्भिक सरचना की विभिन्नता तथा नदियों के अपरदन के फलस्वरूप उच्च भूमि कई श्रेणियों और पहाड़ियों में विभक्त है, इसे निम्नलिखित चार भागों में विभाजित किया जा सकता है -

  • मैकाल श्रेणी - यह बिलासपुर तथा राजनांदगाँव जिले की सीमा में दक्षिण-पूर्व एवं उत्तर-पूर्व दिशा में फैला हुआ है, इसकी ऊँचाई समुद्रतल से 450 से 1000 मीटर के बीच है। इसमें कई ऊँची-ऊँची घाटियाँ है। जिनमें चिल्फी घाट तथा बृजपाती घाट प्रमुख है। यह घाटियाँ प्राकृतिक वनस्पति के आवरण से ढकी हुई है। पहाड़ की ऊँचाईयों में अलग-अलग प्रकार के चट्टानों के कारण भिन्नता है।
  • छुरी उदयपुर की पहाड़ियाँ- छुरी की पहाड़ियाँ बिलासपुर जिले के मध्य में स्थित है, जिसकी ऊँचाई 600 से 1000 मीटर तक है। उदयपुर की पहाड़ियाँ छुरी की पहाड़ियों के पूर्व में स्थित है, इन पहाड़ियों का उत्तरी भाग मैनपाट है जो एक दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र है जो वनों से ढका हुआ है, मांडनदी यहाँ 400 मीटर गहरी ढाल वाली घाटी का निर्माण करती है।
  • चांगभखार - देवगढ़ पहाड़ियाँ- ये पहाड़ियाँ उत्तरी भाग में बैकुंठपुर, उत्तरी सूरजपुर, प्रतापपुर, उत्तरी अम्बिकापुर, पश्चिमी कुसमी तथा दक्षिणी रामानुजगंज में फैली है। समुद्र तट से इसकी ऊँचाई 600 से 1,000 मीटर है। सबसे ऊँची चोटी देवगढ़ 11,027 मीटर ऊँची है।
  • अबूझमाड़ की पहाड़ियाँ- ये पहाड़ियाँ बस्तर जिले की नारायणपुर की पश्चिमी सीमा से दंतेवाड़ा जिले के बीजापुर तहसील के उत्तरी भाग तक फैली हुई है। नारायणपुर से दक्षिण की ओर पहाड़ी की लंबाई 100 किमी. तथा चौडाई 0.8 किमी है।

2. पठारी प्रदेश - छत्तीसगढ़ राज्य के पठारी प्रदेश निम्नांकित है

  • पैण्ड्रा - लोरमी पठार - यह पठार छत्तीसगढ़ के मुंगेली जिले और लोरमी तहसील की उत्तर–पश्चिम सीमा पर दीवार के रूप में फैला है, इसका कुछ भाग पेंड्रा, कटघोरा, महासमुंद और पंडरियों में भी फैला है, इसकी ऊँचाई समुद्रतल से 700 से 900 मीटर के मध्य है।
  • धमतरी - महासमुंद उच्च भूमि - यह क्षेत्र महासमुंद, धमतरी, कुरूद, राजिम, गरियाबंद, सरायपाली एवं देवगढ़ में फैला हुआ है, समुद्रतल से इसकी ऊँचाई 400 से 900 मीटर है।
  • बस्तर का पठार- इसे दण्डकारण्य का पठार भी कहा जाता है, इसका विस्तार बस्तर और रायपुर के दक्षिणी भाग तक है, जिसमें चारामा, कांकेर, केसकाल, कोंडागाँव, जगदलपुर, दंतेवाडा, अंतागढ़, बीजापुर आते हैं। इसकी औसत ऊँचाई 600 मीटर है। यह पठार घने वनों से आच्छादित है।
  • दुर्ग उच्च भूमि - यह भूमि पश्चिम की ओर रायपुर उच्च भूमि के समानान्तर फैली है, इसकी सबसे महत्वपूर्ण धरातलीय स्वरूप दल्ली राजहरा की पहाड़ियाँ है जो लौह अयस्क का विख्यात क्षेत्र है, दुर्ग जिले में दक्षिणी भाग में इसकी ऊँचाई 700 मीटर है।

3. पाट प्रदेश- यह भी पठारी क्षेत्र ही है किन्तु इनका धरातल सीढ़ीनुमा होता है। पाट पुरानी समप्राय भूमि का क्षेत्र है जिनका उत्थान हो जाने से वे ऊँचे हो गए हैं

  • मैनपाट - मैनपाट सरगुजा जिले के दक्षिण-पूर्व में है । यह 29 किमी. लंबा और 12 किमी. चौड़ा है जो रायगढ़ की सीमा बनाता है। समुद्र जल से इसकी ऊँचाई 1,015 मीटर है, यहाँ पर बॉक्साइट का खनन होता है जिसे कोरबा के एल्युमिनियम के कारखानों में भेजा जाता है।
  • जारंगपाट - यह सरगुजा जिले के सीतापुर एवं लुंड्रा तक फैला हुआ है। इसकी समुद्र तल से ऊँचाई 1,114 मीटर है।
  • जशपुर पाट- यह छत्तीसगढ़ का सबसे बड़ा पाट है जो जशपुर जिले के जशपुर तहसील में विस्तृत है। यह मैनी नदी का संपूर्ण उत्तरी क्षेत्र है तथा 4,300 वर्ग किमी. क्षेत्र में फैला हुआ है। यह पाट महानदी के मैदान से ऊपर उठकर छोटा नागपुर के पठार में विलीन हो जाता है। इसका धरातल सीढ़ीनुमा है इस पाट का ढालू क्षेत्र वनाच्छादित है और समतल भाग में कृषि क्षेत्र है।
  • सामरी पाट - यह बलरामपुर जिले की सामरी - कुसमी तहसील के उत्तर-1 -पूर्व में फैला हुआ है। समुद्र तल से ऊँचाई 700 से 1,200 मीटर तक है, इसका पूर्वी भाग अधिक ऊँचा है जिसे जमीर पाट कहते हैं। 

4. मैदानी प्रदेश - वह भाग जो समुद्र तल से 300 मीटर से कम ऊँचा होता है, उसे मैदानी प्रदेश कहते हैं। इसमें उच्चावच बहुत कम होता है और धरातल समतल होता है।

छत्तीसगढ़ का मैदान

छत्तीसगढ़ के महानदी बेसिन को छत्तीसगढ़ का मैदान कहा जाता । यह मैदान 31,600 वर्ग किमी में फैला है। यह समुद्र तल से महानदी के निकास पर 229 मीटर से लेकर उच्च भूमि की सीमा पर लगभग 330 मीटर है। 

मैदानी धरातल पर जलोढ़ मिट्टी का आवरण है जिसे चारों दिशाओं में प्रवाहित होने वाली महानदी, शिवनाथ, हसदो और उनकी सहायक नदियाँ ने काट दिया है।

(1) दुर्ग-रायपुर मैदान - यह छत्तीसगढ़ मैदान का दक्षिणी भाग है जो कि शिवनाथ और महानदी के अपवाह में शामिल है, इसके मैदान में दुर्ग, भिलाई, रायपुर आदि प्रमुख औद्योगिक व व्यापारिक नगर स्थित है। इसे तीन भाग में विभक्त किया गया है

1. ट्राँस महानदी मैदान- इसका विस्तार महानदी की पश्चिम दिशा में है जिसके अंतर्गत राजिम, रायपुर व धमतरी के भाग आते हैं।

2. महानदी - शिवनाथ दोआब - यह रायपुर - दुर्ग के मैदान का दक्षिण-मध्यवर्ती भाग है, इसके बीच में खारून नदी बहती है, इसकी ऊँचाई 100 से 300 मीटर के मध्य है।

3. ट्राँस शिवनाथ मैदान - यह एक समरूप मेदान है जिसकी ऊँचाई औसतन 300 मीटर है। इसका विस्तार शिवनाथ नदी के पश्चिम में पूर्वी राजनांदगाँव तथा पश्चिम दुर्ग जिले के 4.459 वर्ग किमी. क्षेत्र में फैला हुआ है।

(2) बिलासपुर - रायगढ़ मैदान - छत्तीसगढ़ मैदान का उत्तरी भाग बिलासपुर-रायगढ़ मैदान कहलाता है, यह मैदान 11.118 वर्ग किमी. में फैला हुआ है, इसका उत्तरी भाग उच्च भूमि से घिरा हुआ विच्छेदित है। इसकी औसत ऊँचाई 280 मीटर है। इसे निम्नांकित उपभागों में विभक्त किया गया है

1. हसदो-मांड का मैदान - यह छत्तीसगढ़ मैदान का पूर्वी भाग है जो लीलागर नदी के पूर्वी भाग में रायगढ़ जिले के केलो नदी तक फैला हुआ है। इसकी उत्तरी सीमा पर चैंवर दाल की पहाड़ियाँ है जो हड़प्पा काल की क्वार्टजाईट चट्टानों से बनी है। यह हसदो तथा मांड नदियों द्वारा अप्रवाहित क्षेत्र है, इस मैदान का ढाल उत्तर से दक्षिण होते हुए पूर्व की ओर है।

2. बिलासपुर का मैदान - यह मनियारी, अरपा तथा लीलागर नदियों के जलोढ़ से आच्छादित है तथा छत्तीसगढ़ मैदान के उत्तरी भाग में स्थित है, इसकी औसत ऊँचाई औसतन 250 मीटर से कम है, इस मैदान का मध्य भाग अरपा तथा उसकी सहायक नदियाँ जो पेंड्रा पठार से निकलती है, के अपवाह क्षेत्र में है।

3. रायगढ़ का मैदान - यह छुरी एवं उदयपुर पहाड़ियों के बीच स्थित एवं संक्रमणीय श्रृंखला के समान है, यह धनुष के आकार का बेसिन है जो 100.20 वर्ग किमी. में फैला हुआ है, इसकी ढाल मंद है 

4. बस्तर का मैदान - यह छत्तीसगढ़ राज्य के दक्षिणी सीमांत क्षेत्र में है यह गोदावरी तथा उसकी सहायक सबरी नदी का मैदान है। यह प्रदेश की दक्षिणी सीमा के उत्तर की ओर दक्षिणी पठार तथा उत्तर- र-पूर्वी तक विस्तृत है, कोटा एवं बीजापुर तक इसका विस्तार है, इसकी ऊँचाई 150 से 300 मीटर के मध्य है तथा चौड़ाई लगभग 25 किमी. है।

5. कोटारी का बेसिन - इसका विस्तार दक्षिणी-पश्चिमी सीमांत क्षेत्र में है, भानुप्रतापपुर, पंखाजुर व दक्षिणी मोहला तक यह विस्तृत है। इसकी समुद्र तल से ऊँचाई औसतन 300 से 450 मीटर है।

6. सारंगढ़ का मैदान - यह पूर्वी सीमांत क्षेत्र है जो कि सारंगढ़ तहसील में आता है, समुद्र तल से इसकी ऊँचाई औसतन 300 से 400 मीटर है। महानदी के दक्षिणी भाग पर स्थित यह मैदान एक लंबी किन्तु निचली पहाड़ी श्रेणी से दो भागों में विभक्त हो गया है। भूमि का ढाल उत्तर से दक्षिण की ओर है। 

पश्चिम भाग को सारंगढ़ का मैदान तथा पूर्वी भाग को सरिया मैदान कहते हैं। सारंगढ़ मैदान की मुख्य नदी लातनाला है और सरिया की किंकारी नाला । यह कृषि प्रधान क्षेत्र है।

7. कोरबा का बेसिन - यह छत्तीसगढ़ प्रदेश के उत्तर-पश्चिम कोरबा तक विस्तृत है। यह बेसिन 200 वर्ग किमी. में फैला है इसकी ऊँचाई 300 मीटर है।

8. हसदो - रामपुरा का बेसिन - यह प्रदेश के उत्तर में स्थित है, इसके तहत उत्तरी कटघोरा, पूर्वी पेंड्रा तथा दक्षिणी मनेन्द्रगढ़ शामिल समुद्रतल से इसकी ऊँचाई 300 से 450 मीटर है। यह हसदो बेसिन का एक खुला निचला क्षेत्र है ।

9. सरगुजा का बेसिन - छत्तीसगढ़ प्रदेश के उत्तर मध्य क्षेत्र में यह विस्तृत है जिसमें दक्षिणी प्रतापपुर, दक्षिणी सूरजपुर, अंबिकापुर तथा पश्चिमी सीतापुर आते हैं। इसकी समुद्र तल से ऊँचाई 400 से 650 मीटर है।

10. रिहन्द का बेसिन- यह प्रदेश के उत्तरी सीमांत भाग में वाड्रफनगर में विस्तृत है। इसकी ऊँचाई औसतन 300 से 450 मीटर तक है।

11. कन्हार का बेसिन - यह प्रदेश के उत्तर-पूर्वी सीमांत भाग में फैला हुआ है। इसके अंतर्गत वाड्रफ नगर तथा उत्तरी रामानुजगंज- पाली तहसीलें इसके अंतर्गत आती है।

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