चुनाव का महत्व - Importance of election

भारतीय संविधान में वयस्क मताधिकार के सिद्धांत को स्वीकार करते हुए संविधान निर्माताओं ने चुनाव से संबंधित सम्पूर्ण व्यवस्था को स्वतंत्र रखना ही उचित समझा। 

चुनाव किसे कहते हैं 

प्रजातंत्र में स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव का विशेष महत्व है। अगर निर्वाचन तंत्र दोषपूर्ण है तो प्रजातंत्र के उत्पत्ति का स्रोत विषमय हो जाएगा। अतः भारतीय संविधान में अनुच्छेद 234 से 329 तक एक पृथक अध्याय रखा गया है। 

अक्टूबर 1993 को केन्द्र सरकार की सिफारिश पर चुनाव आयोग को तीन सदस्यीय बना दिया गया है। चुनाव आयोग निम्न कार्य करेगा 

1. चुनाव क्षेत्र का परिसीमन या सीमांकन।

2. मतदाता सूची तैयार करना।

3. विभिन्न राजनीतिक दलों को मान्यता प्रदान करना तथा उनके लिए आचार संहिता बनाना।

4. राजनीतिक दलों को चुनाव चिन्ह प्रदान करना।

5. चुनाव से संबंधित समस्त व्यवस्था करना। जैसे मतदाता सूची बनाना, अधिसूचना जारी करवाना, चुनाव कार्यक्रम की घोषणा करवाना, चुनाव हेतु उम्मीदवारों का चयन, नामांकन पत्र, जमानत राशि, मतपत्रों की जाँच, मतगणना आदि कार्य करना।

भारत की चुनाव पद्धति की निम्न विशेषताएँ हैं

1. वयस्क मताधिकार।

2. आरक्षित पदों का निर्वाचन।

3. गुप्त मतदान।

4. साधारण पद्धति व अनुपातिक पद्धति से निर्वाचन।

चुनाव लोकतंत्र की आवश्यक प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया के माध्यम से जनता प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से शासन कार्य में हिस्सा लेती है।

भारत में वयस्क मताधिकार

अर्थ- भारतीय संविधान के अनुच्छेद 326 में लोकतंत्र स्थापना करने के लिए वयस्क मताधिकार की व्यवस्था की गई। इस अनुच्छेद में कहा गया है कि लोकसभा का चुनाव वयस्क मताधिकार के आधार पर होगा। 

अर्थात् वह व्यक्ति जो भारत का नागरिक है तथा अपराधी, पागल, भ्रष्टाचारी, अवैधानिक आचरण के कारण अयोग्य घोषित नहीं किया गया है तथा मतदाता सूची में जिसका अपना नाम हो, मतदान का अधिकारी होगा। अतः भारतीय संविधान में उक्त व्यवस्था के आधार पर मताधिकार प्राप्ति के लिए निर्धारित योग्यता निम्नानुसार है -

1. वह भारत का नागरिक हो।

2. 18 वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो।

3. गम्भीर अपराध के लिए न्यायालय द्वारा दंडित न किया गया हो।

4. पागल, दीवालिया, भ्रष्ट या अवैधानिक आचरण के रूप में मताधिकार से वंचित न किया गया हो। इस प्रकार जब राज्य के समस्त वयस्क नागरिकों को लिंग व अन्य किसी प्रकार के भेदभाव किए बिना मताधिकार देती है। 

यह वयस्क मताधिकार या सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार कहलाता है। वयस्क होने का अर्थएक निर्धारित आयु पूरी हो। जैसे भारत में 18 वर्ष आयु का व्यक्ति वयस्क माना जाता है।

सार्वभौम वयस्क मताधिकार के गुण

1. लोकतंत्र के सिद्धांतों के अनुकूल - वयस्क मताधिकार लोकतांत्रिक सिद्धांतों के अनुकूल है। प्रजातंत्र का मूल सिद्धांत राजनैतिक सामानता है। प्रजातंत्र में प्रत्येक वयस्क स्त्री, पुरूष को बिना किसी भेदभाव के मत देने का अधिकार है। 

2. क्रांति से सुरक्षा - मताधिकार के सार्वभौमिक न होने एकता में वृद्धि से जिन लोगों को इनसे वंचित रखा जाएगा। उनमें असंतोष फैलेगा मताधिकार के अभाव में उन्हें संवैधानिक तरीके से आचरण बदलने का अवसर नहीं मिलेगा। फलतः वे विद्रोही होंगे एवं क्रांति का मार्ग अपनाएँगे। क्रांति व हिंसा से बचाने वयस्क मताधिकार लोकतंत्र की सफलता के लिए आवश्यक अल्पसंख्यकों की रक्षा कारगर उपाय है।

3. राजनीतिक शिक्षा की प्राप्ति एवं राष्ट्रीय एकता में वृद्धि -  वयस्क मताधिकार राजनीतिक शिक्षा की प्राप्ति का महत्वपूर्ण साधन है। मताधिकार की प्राप्ति से मतदाताओं को राजनीतिक व सामाजिक कार्यों में रूचि बढ़ती है। उनमें राजनीतिक चेतना व उत्तरदायित्व की भावना का विकास होता है। फलतः राष्ट्रीय एकता में वृद्धि होती है।

4. लोकतंत्र की सफलता के लिए आवश्यक - वयस्क मताधिकार लोकतंत्र की सफलता का मुख्य आधार है।

5. अल्पसंख्यकों की रक्षा करना - वयस्क मताधिकार के अनुसार अल्पसंख्यकों का प्रतिनिधित्व होता है। उन्हें अलग से अधिकार देने की आवश्यकता नहीं होती। निर्वाचन विधियों द्वारा उनका मतदान किया जाता है।

वयस्क मताधिकार के दोष

वयस्क मताधिकार के दोष निम्नांकित तर्क दिए गए है-

1. योग्यता पहचान मे अक्षमता - सर हेनरीमेन का कथन है कि- "अधिकांश जनता अयोग्य होती है।" उन्हें प्रत्याशियों के गुण-अवगुण की जानकारी नहीं होती है, वे किसी को भी मतदान कर अपना कार्य समाप्त कर लेती है। योग्य प्रत्याशी चुने नहीं जाते है और प्रशासन कमजोर हाथों में चला जाता है। 

2. राजनीतिक सूझबूझ की कमी - वर्तमान में शासन की समस्याएँ काफी जटिल हो गई है। साधारण मतदाता उसे नहीं समझ सकता। एक निर्धन व्यक्ति के पास इतना समय नहीं होता है कि वह प्रशासन संबंधी बातों को समझे इसलिए वह अपने मत का सदुपयोग नहीं कर पाता।

3. मताधिकार शिक्षित लोगों को हो- मिल के अनुसार- "योग्य व्यक्तियों को ही मताधिकार देना चाहिए। अशिक्षित अंधविश्वासी लोग मताधिकार का सही उपयोग नहीं कर पाते।” 

4. प्रगतिशील विचारों का विरोध - अशिक्षित उम्मीदवार प्रायः रूढ़िवादी होते हैं तथा प्रगतिशील विचारों का विरोध करते हैं।

इस प्रकार हम देखते हैं कि राज्य की सुख-शांति व विकास वयस्क मताधिकार पर निर्भर है। किन्तु लोकतंत्र के लिए यह आवश्यक है। अतः लास्की ने लिखा है- "वयस्क मताधिकार का कोई विकल्प नहीं है। इसलिए प्रायः विश्व के सभी देशों ने इसे स्वीकार कर लिया।" इसी के द्वारा राजनीतिक जागरूकता लाई जा सकती है।

चुनाव के प्रकार 

चुनाव के तीन प्रकार होते हैं- 1. सामान्य व आम चुनाव 2. मध्यावधि चुनाव, 3. उपचुनाव। 

1. सामान्य व आम चुनाव - जब एक निश्चित अवधि के पश्चात् किसी देश के केन्द्रीय संसद मंडल या राज्य विधान मंडल के लिए चुनाव होते हैं तो उसे आम चुनाव कहा जाता है। लोकसभा और राज्यों की वि पानसभाओं के लिए प्रति वर्ष पाँच वर्ष पश्चात् आम चुनाव होते हैं।

2. मध्यावधि चुनाव - संवैधानिक संकट होने से स्थिति में जब लोक सभा या किसी राजय की विधानसभा पाँच वर्ष की अवधि के मध्य में ही भंग कर दी जाती है, तो उसके लिए जो चुनाव आयोजित होते हैं उन्हें मध्यावधि चुनाव कहते हैं। जैसे भारत में सन् 1971, 1977 एवं 1980 में लोकसभा मध्यावधि चुनाव सम्पन्न हुए हैं।

3. उपचुनाव- जब किसी विधान सभा सदस्य या लोकसभा के सदस्य का स्थान उसकी मृत्यु, पद त्याग या अन्य कारणों से रिक्त हो जाता है तो इस हेतु जो चुनाव आयोजित होता है उसे उपचुनाव कहते हैं।

जैसे विधायक श्री रविशंकर त्रिपाठी के निधन पर भटगाँव विधानसभा क्षेत्र का सन् 2010 में उपचुनाव हुआ था। इसी प्रकार छत्तीसगढ़ के कोटा में राजेन्द्र शुक्ला के निधन पर उपचुनाव सम्पन्न कराया गया था।

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