राजनीतिक सिद्धांत का महत्व क्या है - importance of political theory

Post Date : 27 September 2022

राजनीतिक सिद्धान्त एक राजनीतिक चेतना है। सामाजिक विज्ञान का उद्देश्य मानवीय जीवन की व्याख्या करना है। मानवीय जीवन के विभिन्न आयामों की व्याख्या करने वाले सामाजिक विज्ञानों में महत्वपूर्ण नाम राजनीति विज्ञान का है। जिसे प्राचीन यूनानी विचारक व राजनीति विज्ञान के जनक अरस्तू ने सर्वोच्च विज्ञान कहा है।

सामाजिक विज्ञान में राजनीति सिद्धान्त सर्वाधिक महत्वपूर्ण विषय है, जिसका सम्बन्ध मानवीय चेतना से है। मानव में जैसे-जैसे चेतना की वृद्धि होती गई, ठीक उसी तरह सिद्धान्तों के प्रतिपादन भी जारी रहा हैं।

राजनीतिक सिद्धान्त का अर्थ

कार्ल पॉपर के अनुशार सिद्धान्त एक प्रकार का जाल है, जिसमें संसार को समझा जा सकता है। ये एक ऐसी मानसिक स्थिति है जो एक वस्तु के अस्तित्व और उसके कारणों को सामने रखती है। विभिन्न विद्वानों ने राजनीतिक सिद्धान्त को अलग-अलग ढंग से परिभाषित किया है। 

डेविड हैंल्ड के अनुसार - राजनीतिक सिद्धान्त राजनीतिक जीवन से सम्बन्धित धारणाओं और सामान्य नियमों का वह समूह हैं, जिसमें सरकार, राज्य और समाज की प्रकृति, उद्देश्य तथा प्रमुख विशेषताएँ एवं व्यक्ति की राजनीतिक क्षमताओं के बारे में विचार, परिकल्पनाएँ और वर्णन शामिल होते हैं।

जार्ज कैटलीन के अनुसार - राजनीतिक सिद्धान्त राजनीति विज्ञान और राजनैतिक दर्शन दोनों का मिश्रण है, जहाँ विज्ञान सम्पूर्ण सामाजिक जीवन के नियन्त्रण के विभिन्न स्वरूपों की प्रक्रिया की ओर ध्यान आकर्षित करता है।

इस प्रकार इन विभिन्न परिभाषाओं के आधार पर यह स्पष्ट होता है कि राजनीतिक चिन्तन में केवल आदर्श की व्याख्या की जाती है, जबकि राजनीतिक सिद्धान्त में व्यक्ति, समाज व राज्य की विस्तृत व्याख्या की जाती है।

राजनीतिक सिद्धांत का महत्व क्या है

मानवीय जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति तथा लक्ष्य की प्राप्ति से राजनीतिक सिद्धान्त का वास्ता है। मानव की खुशहाली के लिए ही विभिन्न विचारधाराओं का प्रतिपादन किया जाता रहा है। कल अगर उपयोगितावाद, उदारबाद और मार्क्सवाद जैसी विचारधाराओं का आगमन हुआ तो आने वाले दिनों में कुछ नयी विचारधाराएं कुछ नये मूल्यों को लेकर स्थापित होने के लिए प्रयासरत हैं। 

हालांकि इनका सम्बन्ध मुख्यतः दो ही विचारधाराओं उदारवाद या मार्क्सवाद से हो सकता है। जहाँ तक राजनीतिक सिद्धान्त की उपयोगिता और महत्व की बात है, तो निम्नलिखित रूप में इन्हें रखा जा सकता है। 

1. समस्याओं के समाधान में सहायक - राजनीतिक सिद्धान्त की उपयोगिता राजनीतिक समस्याओं के समाधान से जुड़ी हुई है। एक राजनीतिक चिन्तक परिस्थितियों का गहन अध्ययन करता है और उस परीक्षण के आधार पर अपने कुछ समाधान प्रस्तुत करता है, जिनसे मानव जीवन यानि सम्पूर्ण व्यवस्था को लाभ मिलता है। स्पष्ट है कि समस्याओं के समाधान के दृष्टिकोण से राजनीतिक सिद्धान्त की महना है।

2. आन्दोलन में महत्वपूर्ण कारक - राजनीतिक आन्दोलनों के पीछे सदैव एक विचारधारा का हाथ रहा है। अब तक जितने भी राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय आन्दोलन हुए तथा समाज में क्रांतियाँ लाई गईं, उन सबके पीछे राजनीतिक सिद्धान्त की भूमिका ही महत्वपूर्ण रही है।  

राजनीति विज्ञान के क्षेत्र में देखें तो उदारवादी एवं मार्क्सवादी राजनीतिक सिद्धान्त की जबर्दस्त भूमिका रही है। अनुभववादी राजनीतिक सिद्धान्त के द्वारा राजनीति विज्ञान में व्यवहारवादी क्रान्ति लाई गई, तो समकालीन राजनीतिक सिद्धान्त द्वारा व्यवहारवादी कट्टरता के विरोध में उत्तर व्यवहारवादी को लाया गया। 

स्पष्टतः राजनीतिक सिद्धान्त को जीवन व विज्ञान के क्षेत्रों में परिवर्तन के एक महत्वपूर्ण कारक के रूप में स्वीकार किया जा सकता है।

3. भविष्य की योजना  – राजनीतिक सिद्धान्त का उद्देश्य केवल वर्तमान परिस्थितियों की समालोचना करना ही नहीं, बल्कि भविष्य के लिए योजना निर्धारित करना भी है, ताकि एक बेहतर भविष्य का निर्माण किया जा सके।

उदाहरणार्थ प्लेटो के द्वारा अपनी प्रथम व महत्वपूर्ण आदर्शवादी रचना 'The Republic में न्याय, शिक्षा और साम्यवादी सिद्धान्तों के साथ-साथ अनेक सिद्धान्तों का प्रतिपादन आदर्श राज्य की परिकल्पना हेतु किया गया है। इसी प्रकार सकारात्मक उदारवादी चिन्तकों के द्वारा न्यायपूर्ण समाज के लिए लोक कल्याणकारी राज्य की स्थापना में विभिन्न सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया जाता रहा है। 

4. नवीन धारणाओं का विकास – प्रत्येक परिस्थितियाँ होती हैं और प्रत्येक राजनीतिक विचारक अपने युग की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए में अलग-अलग युग नई-नई अवधारणाएँ प्रस्तुत करता है। 

मध्यकालीन युग के पश्चात् बौद्धिक जागरण, धार्मिक सुधार आन्दोलन व औद्योगिक क्रान्ति ने उदारवाद को सामने लाया और व्यक्तिगत स्वतन्त्रता की अवधारणा का जन्म हुआ, उसी प्रकार परम्परागत उदारवादी सिद्धान्त के विरोध में समाजवादी और मार्क्सवादी सिद्धान्त का उदय और आर्थिक समानता की अवधारणा का विकास हुआ। 

सार रूप में, यह कहा जा सकता है कि बदलती परिस्थितियों में राजनीतिक सिद्धान्त नवीन मानवीय मूल्यों की स्थापना में सहायक साबित होते रहे हैं।

5. राजनीतिक व्यवस्था का औचित्य प्रमाणित करना - राजतन्त्र, कुलीनतन्त्र, लोकतन्त्र, तानाशाही जैसी – विभिन्न प्रकार की व्यवस्थाएं होती हैं, जिनका खास सिद्धान्त एवं उद्देश्य होता है। इन सिद्धान्तों के द्वारा हर युग की राजनीतिक व्यवस्था के औचित्य को प्रमाणित करने का प्रयास किया जाता है। 

उदाहरणार्थ, मुसोलनी और हिटलर के द्वारा फासीवाद व नाजीवाद के औचित्य को प्रमाणित करने का प्रयास किया गया। है कि तमाम विचारधाराएं किसी न किसी सिद्धान्त पर आधारित होकर राजनीतिक व्यवस्था के औचित्य को प्रमाणित करना चाहती हैं। 

दूसरे शब्दों में, राजनीतिक सिद्धान्त का महत्व राजनीतिक व्यवस्था के औचित्य को प्रमाणित करने के कारण कुछ ज्यादा ही महत्वपूर्ण हो जाता है।

6. ज्ञान और चेतना की अभिवृद्धि - राजनीतिक सिद्धान्त के द्वारा समस्याओं का समाधान भविष्य की योजना की सफलता, नवीन धारणाओं का विकास और राजनीतिक प्रणालियों के औचित्य प्रमाणित तो होता ही है, साथ ही साथ इससे ज्ञान तथा चेतना में भी अभिवृद्धि होती है। 

वास्तव में, ज्ञान और चेतना की अभिवृद्धि से ही मानवीय जीवन में प्रकाश आता है तथा आदर्श समाज और आदर्श राज्य का निर्माण होता है। प्लेटो ने ठीक ही कहा है कि "ज्ञान ही सद्गुण है और सद्गुण ही ताकत है। 

स्पष्ट है कि राजनीतिक सिद्धान्त के माध्यम से जिस ज्ञान और चेतना की अभिवृद्धि होती है, उनसे परिवार, समुदाय, राज्य के साथ-साथ सम्पूर्ण अन्तर्राष्ट्रीय समाज को सौहार्दपूर्ण व खुशहाल बनाया जा सकता है। यहाँ स्पष्ट हो रहा है कि राजनीतिक सिद्धान्त से सम्पूर्ण विश्व को बेहतर मुकाम की ओर जाया जा सकता है।

7. घटनाओं और मानवीय मूल्यों में सन्तुलन - राजनीतिक चिन्तकों के द्वारा राजनीतिक घटनाओं का विश्लेषण करके, उनका समाधान प्रस्तुत किया जाता है तथा घटनाओं और मानवीय मूल्यों में सन्तुलन स्थापित करने का प्रयास किया जाता है। 

घटनाओं और मानवीय मूल्यों के बीच सन्तुलन स्थापित करने के लिए ही राजनीतिक सिद्धान्तों को अपने स्वरूप में परिवर्तन लाना पड़ता है।

राजनीतिक सिद्धान्त की उपयोगिता, उद्देश्य एवं महत्व के विवेचन से स्पष्ट है कि यह मानवीय जीवन की आधारशिला है, मानवीय जीवन को गति देता है तथा एक खुशहाल व शांतिपूर्ण विश्व निर्माण में सहायक भी हो सकता है।

हर युग में राजनीतिक विचारकों ने मानवीय गतिविधियों एवं आवश्यकताओं के प्रति एक दृष्टिकोण रखा हैं। मानव जीवन के राजनीतिक पक्ष से सम्बन्धित विचारको के दृष्टिकोण को ही राजनीतिक सिद्धान्त का नाम दिया जाता है।

सामान्यतः राजनीति विज्ञान के कुछ विद्यार्थियों द्वारा राजनीतिक चिन्तन, राजनीतिक विचारधारा, राजनीतिक सिद्धान्त, राजनीतिक विश्लेषण और राजनीतिक विज्ञान को पर्यायवाची समझने की भूल की जाती है। 

जबकि ये सभी पर्यायवाची नहीं है। निश्चित रूप से इनके बीच समानताएँ है, परन्तु बहुत हद तक असमानताएँ भी है। ऐसी स्थिति में सभी को एक नहीं माना जा सकता है।

राजनीतिक चिन्तन और राजनीतिक सिद्धान्त में कुछ समानताएँ है, जैसे दोनों में राज्य को केन्द्रीय विषय बनाया गया है, दोनों में विचारकों के दृष्टिकोण की प्रधानता है, लेकिन फिर भी इन्हें एक नहीं माना जाना चाहिए। 

राज्य की उत्पत्ति, विकास, प्रकृति या स्वरूप और उपलब्धि से सम्बन्धित रोचक, आदर्शात्मक, ऐतिहासिक, तार्किक, काल्पनिक, मूल्य सापेक्ष, व्यक्तिपरक वर्णन या विवेचन को राजनीतिक चिन्तन कहा जाता है।

जबकि राजनीतिक सिद्धान्त राज्य के दार्शनिक या चिन्तन के पक्ष के अतिरिक्त राज्य के व्यावहारिक क्रियाकलाप और राज्य मानव सम्बन्ध को भी अध्ययन का विषय बनाता है। दूसरे शब्दों में, राजनीतिक सिद्धान्त में प्राचीन राज्य के स्वरूप व कार्य से लेकर वर्तमान राज्य के स्वरूप व कार्य तक का अध्ययन किया जाता है। 

अर्थात् राजनीतिक सिद्धान्त का दायरा व्यापक है, जबकि राजनीतिक चिन्तन का दायरा राजनीतिक सिद्धान्त की तुलना में कम है, क्योंकि यह तो राज्य के परम्परागत स्वरूप के वर्णन तक ही सीमित है। राजनीतिक चिन्तन का दायरा उस समय राजनीतिक सिद्धान्त से बहुत व्यापक हो जाता है, जब इसका सम्बन्ध अध्यात्म और दर्शन जैसे आदर्शवादी मूल्यों से हो जाता है। 

जब राजनीतिक चिन्तन में आदर्शवादी मूल्यों का समावेश होता है, तो उस समय उसका दायरा भले ही व्यापक हो जाता है, लेकिन उसके स्वरूप में अस्पष्टता व अव्यवस्था दिखाई देने लगती है। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि राजनीतिक चिन्तन में आदर्शवादी मूल्यों के इसी समावेश के कारण इसे राजनीतिक दर्शन (Political Philosophy ) भी कहा जाता है। 

राजनीतिक सिद्धान्त में आध्यात्मिक व दार्शनिक मूल्यों का समावेश नहीं होता है, इसलिए इसके स्वरूप में अस्पष्टता दृष्टिगोचर होने का सवाल ही नहीं उठता। राजनीतिक सिद्धान्त में तो राज्य के विविध पक्षों का व्यवस्थित अध्ययन किया जाता है।

राजनीतिक विचारधारा और राजनीतिक सिद्धान्त को भी एक नहीं माना जा सकता है, भले ही दोनों में समानताएँ हैं। राजनीतिक विचारधारा को एक मनोवैज्ञानिक अवधारणा के रूप में परिभाषित करते हुए यह का जा सकता है कि यह व्यक्ति, राज्य, समाज या अन्य विषयों के प्रति एक खास दृष्टिकोण है। 

विचारधारा के आधार पर लोगों का व्यक्ति, राज्य, धर्म, नैतिकता के प्रति खास दृष्टिकोण रहता है। कोई किसी खास विचारधारा से प्रेम और किसी खास विचारधारा से घृणा करता है। दूसरे शब्दों में, विचारधारा विचारों के ऐसे समुच्चय को कहा जाता है, जिन्हें लागू करने के लिए लोग न केवल संघर्ष करते हैं, बल्कि वे अपनी जान तक देने के लिए तैयार रहते हैं। 

यही कारण है कि विचारधारा को 'राजनीतिक धर्म' भी कहा जाता है। राजनीतिक विज्ञान में दो विचारधाराएँ ही प्रमुख हैं- मार्क्सवाद और उदारवाद मार्क्सवाद दबे कुचले, गरीव, वेबस, ईमानदार, नैतिक, सामाजिक, मानवीय और मेहनतकश लोगों की विचारधारा हैं। 

जिसके प्रति इनका खास लगाव होता है और ये मार्क्सवादी मूल्य (वैज्ञानिक एवं विकासोन्मुखी पद्धति) के लिए कुछ भी कर सकते हैं। उदारवाद भी एक गतिशील, अवसरवादी, बुर्जुआ व्यवस्था के समर्थक, आर्थिक स्वतन्त्रता के नाम पर मनमानी कमाई कर अथाह सम्पत्ति संग्रह करने वाली विचारधारा है, जिसे सामाजिकता, नैतिकता-अनैतिकता, न्याय, समानता से कुछ लेना देना नहीं है। 

जहाँ तक राजनीतिक सिद्धान्त का विचारधारा से अन्तर का प्रश्न है तो राजनीतिक सिद्धान्त में वैसे ही राजनीतिक विचारधारा का स्थान है, जो महत्वपूर्ण हो तथा राजनीतिक व्यवस्था के सम्बन्ध में सही व्यवहार रखता हो। 

राजनीतिक सिद्धान्त और राजनीतिक विश्लेषण को भी एक नहीं माना जा सकता है। ऐसे दोनों के बोच कुछ मूलभूत विषय समान होते हैं। दोनों का इस प्रश्न से सम्बन्ध होता है कि राजनीतिक व्यवस्था में सत्ता और प्रभाव की क्या भूमिका है ? 

राजनीतिक व्यवस्था में कौन से लक्षण समान होते हैं और वे एक-दूसरे से किस प्रकार भिन्न होते हैं ? विभिन्न राजनीतिक प्रणालियों में कौन सी परिस्थितियाँ स्थिरता, परिवर्तन या क्रान्ति को प्रेरित करती हैं ? लोग राजनीति में किस प्रकार का व्यवहार करते हैं ? कौन-सी राजनीतिक प्रणाली सर्वोत्तम है ? इत्यादि। 

परन्तु इसके बाद भी राजनीतिक सिद्धान्त और राजनीतिक विश्लेषण में भेद है। राजनीतिक सिद्धान्त के वैज्ञानिक अपना विचार प्रस्तुत करने से पहले गहन अध्ययन करता है, जबकि राजनीतिक विश्लेषण में एक विश्लेषणकर्ता वस्तुओं का उस प्रकार वर्णन कर देता है, जिस प्रकार उसे नजर आता है। 

दूसरे शब्दो में, राजनीतिक सिद्धान्तों के प्रतिपादक अपने अन्त:करण और अपनी कल्पना शक्ति का उपयोग करता है विश्लेषणकर्ता एक यान्त्रिक की तरह कार्य करता है। इस सम्बन्ध में एक नवीन उदाहरण पेश किया जा सकता है कि समसामयिक अमरीकी राजनीतिक विश्लेषणकर्ताओं द्वारा लिखी गई अधिकांश पुस्तकों में राजनीतिक सिद्धान्त की गहनता की कमी है। 

प्रायः ऐसा देखने को मिलता है कि राजनीतिक सिद्धान्त में मानकात्मक दृष्टिकोण का कोई खास महत्व नहीं होता है, लेकिन राजनीतिक विश्लेषण में वस्तुओं के व्यावहारिक अन्वेषण एवं मानकात्मक दृष्टिकोण का पूर्ण प्रयोग हुआ रहता है। 

यहाँ यह उल्लेखनीय है कि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद की अवधि में राजनीतिक विश्लेषण की होड़ ने उस मानकात्मक परम्परा को नजरअन्दाज करना शुरू कर दिया, जिसे गलती से राजनीतिक सिद्धान्त का पतन मान लिया गया। अन्त में, राजनीतिक सिद्धान्त का सम्बन्ध राज्य से सम्बद्ध विवेचन है। 

जिसमें बहुत पहले से लेकर आज तक का विवेचन समाहित है, जबकि राजनीतिक विश्लेषण का अस्तित्व नवीन है जो राजनीतिक सिद्धान्तों का विश्लेषण तो करता ही है, साथ ही साथ राज्य व्यक्ति के बीच चलने वाली अन्तःक्रियाओं का भी गहनतापूर्ण विश्लेषण या विवेचन करता है।

राजनीतिक सिद्धान्त और राजनीतिक विज्ञान को अलग-अलग तो नहीं, परन्तु पूर्णत: एक भी नहीं माना जा सकता है। राजनीतिक विज्ञान एक सामाजिक विज्ञान है, जिसमें राज्य की उत्पत्ति, प्रकृति या स्वरूप, कार्य आदि के वर्णन से सम्बन्धित सिद्धान्त और विश्लेषण के अलावा मानवीय अन्तः क्रियाओं का भी अध्ययन किया जाता है। 

अर्थात् इसमें राजनीति को एक मानवीय क्रिया मानते हुए अध्ययन किया जाता है। राजनीतिक सिद्धान्त एक अर्थ में राजनीति विज्ञान के अन्तर्गत आ जाता है जब वह राज्य के संरचना एवं कार्य के विवेचन से सम्बन्धित होता है, परन्तु राजनीतिक सिद्धान्त का दायरा राजनीति विज्ञान से उस समय व्यापक होता है जब वह अपने शुरूआती काल में लौकिक के साथ-साथ पारलौकिक विषयों के विवेचन से जुड़ जाता है। 

स्पष्ट है कि राजनीतिक सिद्धान्त, राजनीतिक दर्शन, राजनीतिक विश्लेषण, राजनीतिक विचारधारा राजनीति विज्ञान में समानताएँ तो हैं, परन्तु कुछ मौलिक अन्तर भी है, जिसके कारण पर्यायवाची नही माना जा सकता है।

राजनीतिक सिद्धान्त की अवधारणा का विकास

राजनीतिक सिद्धान्त विकास का प्रतिफल है। जिस गति से मानव में राजनीतिक चेतना का विकास होता गया, उसी गति से राजनीतिक सिद्धान्त की प्रकृति या स्वरूप एवं उद्देश्यों में भी परिवर्तन होता गया। अध्ययन की सुविधा के लिए राजनीतिक सिद्धान्तों के बदलते स्वरूप के सम्बन्ध में दो दृष्टिकोण रखे जा सकते --परम्परागत दृष्टिकोण तथा आधुनिक दृष्टिकोण। 

परम्परागत दृष्टिकोण मानवीय मूल्यों की व्याख्या दार्शनिक आधार पर करता है। इसके विश्लेषण का आधार सम्पूर्ण राजनीतिक व्यवस्था और मानवीय जीवन के तमाम पक्ष निहित हैं। 

उदाहरण के तौर पर, राजनीतिक दर्शन के जनक के रूप में मान्य प्राचीन यूनानी विचारक प्लेटो ने अपनी सर्वाधिक महत्वपूर्ण रचना Republic' में मानवीय जीवन के तमाम पहलुओं की विस्तृत व्याख्या की है चाहे वह कला और साहित्य हो या शिक्षा और स्वास्थ्य। 

यूनानी विचारक अरस्तू के द्वारा तुलनात्मक पद्धति पर विशेष बल दिया गया। उदाहरण के लिए, अरस्तू ने राज्यों के वर्गीकरण के सिद्धान्त में तुलनात्मक पद्धति का प्रयोग किया है। परम्परागत दृष्टिकोण द्वारा नैतिकता पर ज्यादा जोर दिया जाता रहा है। 

यूनानी विचारधारा से लेकर मध्यकालीन युग तक राज्य को एक नैतिक व दैविक संस्था बताते हुए इसके दार्शनिक स्वरूप का ही वर्णन किया जाता रहा है। प्लेटो के द्वारा राज्य के दार्शनिक पक्ष का वर्णन किया गया है। 

प्लेटो कहता है कि आदर्श राज्य को कैसा होना चाहिए ? राज्य को क्या करना चाहिए? इत्यादि । वह इस बात पर ध्यान नहीं देता कि राज्य कया कर रहा है और ऐसा क्यों कर रहा है ? इस प्रकार परम्परागत दृष्टिकोण आदर्शवादी अधिक है, इसीलिए परम्परागत राजनीतिक सिद्धान्त का स्वरूप भी आदर्शवादी है।

परम्परागत दृष्टिकोण के प्रतिक्रियास्वरूप आधुनिक राजनीतिक वैज्ञानिकों ने व्यवहारवाद पर ज्यादा जोर दिया है। यह स्पष्ट है कि परम्परागत सिद्धान्त के द्वारा राज्य के औपचारिक एवं संस्थागत पहलू पर ज्यादा बल दिया जाता रहा है। 

लेकिन आधुनिक वैज्ञानिकों या आधुनिक दृष्टिकोण ने अनुभववाद, व्यवहारवाद एवं अनौपचारिक तत्वों पर विशेष बल दिया है तथा राजनीति के अध्ययन में वैज्ञानिक पद्धति पर बल देते हुए उसे अधिक व्यावहारिक बनाने का प्रयास किया है। 

राबर्ट डॉल, मेरियम, लासवेल, डेविड ईस्टन आदि ने परम्परावादी विचारधारा का खण्डन किया और राजनीति को वास्तविक तथ्य आधारित अध्ययन पर ज्यादा जोर दिया। इसके द्वारा उद्देश्य विवरण और आदर्शवाद के स्थान पर प्रक्रिया अवलोकन और वैज्ञानिकता पर पर्यावरण विशेष बल दिया जाता है। राजनीति अध्ययन में सामाजिक, आर्थिक, नैतिक, मनोवैज्ञानिक तथ्यों, आदि के अध्ययन पर विशेष बल दिया गया है।

राजनीतिक इस प्रकार स्पष्ट है कि परम्परागत विचारकों के विपरीत आधुनिक विचारकों के मतानुसार, सिद्धान्त का महत्वपूर्ण उद्देश्य अनुभववादी विश्लेषण के आधार पर समस्याओं को समझना है। कब, क्यो और कैसे आदि सवालों का बदलती परिस्थिति के आधार पर अध्ययन करना है।

राजनीतिक सिद्धान्त की प्रकृति 

राजनीतिक सिद्धान्त की प्रकृति में परिवर्तनशीलता देखी जाती रही है। इसके परिवर्तन की दर में उस वक्त से और ज्यादा वृद्धि देखी जा रही है, जब से राज्य का स्वरूप लोककल्याणकारी हुआ है। 

जैसे-जैसे लोककल्याणकारी राज्य के कार्यों में वृद्धि होती गई हैं, वैसे-वैसे राजनीतिक सिद्धान्त की प्रकृति एवं क्षेत्र में भी बदलाव आया है। राजनीति विज्ञान का केन्द्रीय विषय-वस्तु ‘राज्य' की बदलती हुई अवधारणा के साथ-साथ राजनीतिक चिन्तकों के अध्ययन पद्धति में भी बदलाव आया है।

राजनीतिक सिद्धान्त की प्रकृति में परिवर्तनशीलता के कारण ही इसे परम्परागत राजनीतिक सिद्धान्त और आधुनिक राजनीतिक सिद्धान्त में विभाजित किया गया है।

परम्परागत राजनीति सिद्धान्त की प्रकृति

परम्परागत राजनीतिक सिद्धान्त में दार्शनिक पहलू पर ज्यादा जोर देखने को मिलता है और आधुनिक वैज्ञानिक पद्धतियों को नजरअन्दाज किया गया है। इसके अन्तर्गत परिवर्तन के लिए उत्तरदायी तत्वों पर कोई खास ध्यान नहीं दिया गया है। 

परम्परागत राजनीतिक सिद्धान्त की प्रकृति औपचारिक व संस्थागत अध्ययन से जुड़ी हुई है, क्योंकि परम्परागत विचारकों के द्वारा संस्थागत पहलुओं पर ज्यादा बल दिया गया है। राजनीतिक संस्थाओं की उत्पत्ति, स्वरूप, प्रकृति, कार्य क्षेत्र उनके विषय-वस्तु रहे है। 

राज्य और सरकार ही उनके अध्ययन एवं विवेचन के विषय रहे हैं। उदाहरण के तौर पर कहा जा सकता है कि प्लेटो ने अपनी रचना 'Republic' में आदर्श राज्य को अपने सिद्धान्त का विषय बनाया है और उसके शिष्य अरस्तू ने अपनी रचना 'Polities' में 'नगर-राज्यों' की ही व्याख्या की है। 

बाद के परम्परागत राजनीतिक सिद्धान्त के समर्थक विद्वानो यथा डायसी, लास्की, आग व जिंक के द्वारा भी संस्थाओं के औपचारिक एवं कानूनी स्वरूप पर बल दिया गया है। स्पष्टत: परम्परागत दृष्टिकोण के समर्थकों ने राजनीतिक सिद्धान्त को केवल संस्थाओं के अध्ययन तक ही सीमित रखा है।

परम्परागत राजनीतिक सिद्धान्त की प्रकृति वर्णनात्मक पद्धति पर आधारित है। परम्परागत दृष्टिकोण के समर्थकों के द्वारा विश्लेषणात्मक पद्धति को नजरअन्दाज किया गया है। 

परम्परागत राजनीतिक सिद्धान्त के अन्तर्गत आदर्शात्मक पद्धति को अपनाया गया है तथा इसमें धर्म, दर्शन, नैतिकता का विशेष प्रभाव देखने को मिलता है। परम्परागत सिद्धान्तों में मुख्य आदर्शों को पहले से स्वीकार कर लिया जाता है और उसी के आधार पर राजनीतिक संस्थाओं को कसौटी पर रखा जाता है। 

इन पूर्ण निर्धारित मान्यताओं के आधार पर ही परम्परागत दृष्टिकोण रखने वाले राजनीतिक वैज्ञानिकों ने व्यवस्थाओं को उत्तम या निम्नतम करार दिया है। अन्त में, परम्परागत राजनीतिक सिद्धान्त मुख्यतः मूल्यों एवं लक्ष्यों से जुड़ा हुआ है। 

इसके विषयों के अन्तर्गत राज्य व सरकार की उत्पत्ति, विकास, संगठन, प्रकार, राजनीतिक दल, राजनीतिक विचारधाराएं, प्रमुख सरकारों और संविधानों का तुलनात्मक अध्ययन, अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध राष्ट्रीय प्रशासन आदि हैं।

आधुनिक राजनीतिक सिद्धान्त की प्रकृति

परम्परागत राजनीतिक सिद्धान्त की प्रकृति मसलन, औपचारिक, संस्थागत, वर्णनात्मक, आदर्शात्मक, तार्किक, कानूनी दृष्टिकोण के प्रतिक्रियास्वरूप आधुनिक राजनीतिक सिद्धान्त का उदय हुआ, इसमें आधुनिक विचारकों के द्वारा नवीन पद्धतियों के माध्यम से राजनीति के अध्ययन पर बल दिया जाता है और यह नवीन पद्धतियाँ वैज्ञानिक पद्धति होती हैं। 

परम्परागत राजनीतिक सिद्धान्त के औपचारिक संस्थाओं के विवेचन के स्थान पर अनौपचारिक तत्वों पर बल आधुनिक राजनीतिक सिद्धान्त का रहता है। इसमें संस्थाओं के संरचनात्मक अध्ययन के स्थान पर क्रियात्मक या कार्यात्मक अध्ययन पर बल दिया जाता है। 

आधुनिक राजनीतिक सिद्धान्त में नवीन दृष्टिकोण से विभिन्न अवधारणाओं का विकास हुआ, जिनमें हैरोल्ड लॉसवेल तथा चार्ल्स मैरियम की शक्ति उपागम, पैरोटा, मोस्का और मिचेल्स का विशिष्ट वर्गीय सिद्धान्त, डेविड ईस्टन का व्यवस्था विश्लेषण उपागम, संरचनात्मक कार्यात्मक उपागम आदि प्रमुख हैं। आधुनिक राजनीतिक सिद्धान्त में विश्लेषण की महत्ता है तथा आनुभाविक पद्धतियों पर विशेष बल दिया गया है।

आनुभाविकता व वस्तुनिष्ठता तो आधुनिक राजनीतिक सिद्धान्त की मुख्य विशेषता है ही; इसमें नैतिकता पर भी अधिक बल नहीं दिया गया है। इसमें मूल्यविहीन विश्लेषण की पद्धति को अपनाया जाता है। इसके विचारक मूल्यों और आदर्शों को पूर्णतः अस्वीकार करते हैं।

परम्परागत राजनीतिक सिद्धान्त की प्रकृति और आधुनिक राजनीतिक सिद्धान्त की प्रकृति में काफी अन्तर देखने को मिलता है। दोनों में से किसी एक की प्रकृति व अध्ययन पद्धति को उचित नहीं माना जा सकता है। 

परम्परागत राजनीतिक सिद्धान्त के द्वारा कानून, नैतिक एवं मूल्य प्रधान पद्धति पर ज्यादा जोर और वैज्ञानिक पद्धतियों को अमहत्वहीन मानना उचित नहीं है। साथ ही साथ आधुनिक राजनीतिक सिद्धान्त में जिस तरह प्राकृतिक विज्ञान वाली वैज्ञानिकता पर जोर दिया गया है वह भी पूर्णतः उचित नहीं है। 

राजनीति में नैतिकता और वैज्ञानिकता दोनों ही आवश्यक हैं; मूल्य व तथ्य दोनों ही आवश्यक हैं। अतः राजनीति के बेहतर अध्ययन के लिए हमें परम्परागत तथा आधुनिक सिद्धान्तों की विशेषताओं को आधार बनाकर एक समन्वित दृष्टिकोण अपनाना होगा।

राजनीतिक सिद्धान्त की मुख्य अवधारणाएँ

राजनीतिक सिद्धान्त की मौलिक धारणा में परिवर्तन लाने वाली मुख्य अवधारणाएँ निम्नलिखित है। 

1. शास्त्रीय राजनीतिक सिद्धान्त 

शास्त्रीय राजनीतिक सिद्धान्त का प्रतिपादन प्राचीन यूनानी विचारक प्लेटो, अरस्तू तथा रोमन दार्शनिकों के द्वारा किया गया। इस विचारधारा के मार्फत इन विद्वानों का उद्देश्य सार्वजनिक विषयों का व्यवस्थित अध्ययन करना था। 

इन विद्वानों के द्वारा राजनीतिक सिद्धान्तों का दार्शनिक आधार पर प्रतिपादन किया गया तथा राज्य को भी नैतिक व दैविक संस्था के रूप में प्रतिपादित किया गया। शास्त्रीय राजनीतिक सिद्धान्त के समर्थकों ने व्यक्ति के सम्पूर्ण विकास के लिए भी शास्त्रीय अवधारणा को सही बताया। इनके द्वारा राज्य और व्यक्ति के बीच साम्यता दिखाकर सामूहिक हित में व्यक्तिगत हित को जोड़ने का प्रयास किया गया। 

आदर्शवादी विचारकों हीगेल, टी.एच. ग्रीन, बोसाके, काण्ट आदि पर इस विचारधारा का प्रभाव पड़ा है, क्योंकि उन्होंने भी राज्य के आदर्शवादी स्वरूप की व्याख्या की है।

2. उदारवादी राजनीतिक सिद्धान्त 

16वीं शताब्दी में चर्चशाही, सामंतवाद व निरंकुशतावादी के खिलाफ उदारवाद का आगमन एक क्रान्तिकारी विचारधारा के रूप में हुआ। उदारवादी राजनीतिक विचारकों के द्वारा धर्म के नाम पर हो रहे अत्याचार का जबर्दस्त विरोध कर व्यक्ति को स्वयं की मर्जी से जीने की वकालत की गई। 

जान लाक, एडम स्मिथ, हर्बर्ट स्पेन्सर, हॉब्स, रूसो आदि ने राज्य को मानव द्वारा निर्मित संस्था मानते हुए सीमित राज्य का समर्थन किया। यह उदारवाद का रूप हमेशा बरकरार नहीं रहा, बल्कि उसमें बदलाव आता गया। इसीलिए तो उदारवाद को दो भागों में विभक्त किया जाता है। 

परम्परागत उदारवाद और आधुनिक उदारवाद। परम्परागत उदारवाद के द्वारा राज्य के सम्बन्ध में जो धारणा है उसे परम्परागत उदारवादी राजनीतिक सिद्धान्त कहा जाता है। 

स्पष्ट है कि परम्परागत राजनीतिक सिद्धान्त व्यक्ति के लिए धर्म को आंतरिक एवं निजी मामला मानता है यानि व्यक्तिगत स्वतन्त्रता की बात करता है, सीमित राज्य के अस्तित्व को स्वीकार व समर्थन करता है तथा सामाजिक प्रतिमान में एकता का समर्थन करता है। 

बाद में चलकर उदारवाद एक क्रान्तिकारी विचारधारा नहीं रहता; बल्कि वर्ग-विशेष की विचारधारा यानि समाज के मुठ्ठी भर अमीर लोगों की विचारधारा के रूप में स्थापित होता है, निजी सम्पत्ति का जबर्दस्त समर्थन करता है, इसके कारण मानवीय जीवन में असमानता का आगमन शुरू हो जाता है। 

उदारवाद अब पूँजीवाद का पर्यायवाची बन जाता है। इस पूँजीवादी व्यवस्था के खिलाफ वैज्ञानिक मार्क्सवादी क्रान्ति की शुरूआत होती है, जिसके द्वारा मानवीय जीवन में समानता लाने के लिए तलवार उठाई जाने लगती है। इसका रिणाम उदारवाद पर पड़ता है और उदारवाद का रूप बदल जाता है जिसे समसामयिक उदारवाद (नवीनतम रूप में आधुनिक उदारवाद) कहा जाता है। 

समसामयिक उदारवाद के द्वारा लोक कल्याणकारी राज्य का समर्थन किय जाता है, निजी सम्पत्ति पर अंकुश के लिए पूँजीपतियों पर कर लगाने की बात की जाती है। ये सभ सिद्धान्त समसामयिक उदारवाद या आधुनिक उदारवादी सिद्धान्त हैं। 

आधुनिक उदारवादी सिद्धान्त के समर्थक में लास्की मैकाइवर, बार्कर जैसे-विचारकों का नाम लिया जा सकता है, जो परम्परागत उदारवाद औ समाजवाद के बीच का रास्ता अपनाते हैं।

3. मार्क्सवादी राजनीतिक सिद्धान्त 

कार्ल मार्क्स को वैज्ञानिक समाजवाद का जन्मदाता माना जाता है, जिसने सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन की गूढ़ बातो को द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद और ऐतिहासिक भौतिकवाद के सध्यम से समझाया। मार्क्स ने परिवर्तन के तीन चरण, वाद प्रतिवाद और संवाद बनायें, जहाँ पदार्थ के कारण संघर्ष और परिवर्तन होता है। 

इतिहास के विभाजन के पीछे उत्पादन प्रणाली महत्वपूर्ण भूमिका की और मार्क्स ने इशारा किया है। मार्क्स के द्वारा इतिहास का वर्गीकरण किया गया है। (1) आदिम युग (2) दास युग, (3) सामंतवादी युग, (4) पूँजीवादी युग, (5) समाजवादी युग (6) साम्यवादी युग यह आदर्शवादी एवं मार्क्सवादी कल्पना है।

मार्क्स के अनुसार युग परिवर्तन उत्पादन प्रणाली के कारण हुआ और इतिहास परिवर्तन के प्रत्येक चरण यानि हर युग की अपनी विशेषता है। आदिम साम्यवादी युग में समाज सुराहाल था, क्योंकि व्यक्ति-व्यक्ति के बीच जाति, वर्ग, साम्प्रदाय को कायम करने वाली प्राइवेट प्रॉपर्टी की दीवार न थी। 

दास युग में दास और मालिक दो वर्गों का निर्माण हो गया, दोनों की आर्थिक सामाजिक स्थिति भिन्न थी। सामनवादी युग, जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है— सामंती व्यवस्था पर आधारित थी, जहाँ जमीन का मालिक बगैर मेहनत किये लाग हासिल करता था। 

मेहनत करने वालों को न तो वाजिब हक ही मिलता था और न इज्जत, सम्मान ही। सामंतयुग के बाद प्राइवेट पूँजी का अपार संग्रह हो गया, सम्पूर्ण समाज में निजी सम्पति ने अपना घिनोना रूप दिखाना शुरू कर दिया, पैसा ही सब कुछ हो गया। पैसे से गरीबों की बहू-बेटियों की इज्जन नीलाम की जाने लगी, पैसे के लिए लोग कुकर्म करने को तैयार हो गये। 

चांदी के चंद सिड़कों पर ईमानदारी कुर्बान होने लगी। इस पूँजीवादी अराजकता के खिलाफ मार्क्सवादी आन्दोलन का आगमन हुआ और समाजवादी युग की शुरूआत हुई। समाजवादी युग, पूँजीवादी और साम्यवादी युग की विशेषताओं को लेकर चलना शुरू किया, जिसका लक्ष्य साम्यवाद को प्राप्त करना रहा। साम्यवादी युग को गाधर्म के लक्ष्य या कल्पना के रूप में देखा जा सकता है। 

मार्क्स कहता है कि एक न एक दिन वार का ना होगा, जहाँ आदिम साम्यवादी व्यवस्था वाली खुशियाँ स्थापित होगी। साम्यवादी युग में व्यक्ति-व्यक्ति के बीच जाति, वर्ग, सम्प्रदाय, प्राइवेट प्रोपर्टी की दीवार न होकर प्रेम और अपनापन होगा। इस प्रकार इतिहास की भौतिकवादी व्याख्या करके सामाजिक, मानवीयता व नैतिकता के महान समर्थक मार्स ने सिद्धान्त में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

4. अनुभववादी राजनीतिक सिद्धान्त 

20वी शताब्दी में राजनीतिक सिद्धान्त के क्षेत्र में एक क्रान्तिकारी परिवर्तन हुआ! The Process of Gorernment के लेखक आर्थर बंटले तथा Human nature in Politics' के लेखक हम वालास आदि ने राजनैतिक सिद्धान्त के व्यावहारिक पक्ष पर जोर दिया। इनके द्वारा इस बात पर भी जोर दिया गया कि राजनीति का अध्ययन तथ्यपूर्ण होना चाहिए।

ग्राहम बालास और ऑर्थर बंटले के इस प्रयास में 'New Aspect of Polines के लेखक माग का विशेष योगदान रहा तथा जार्ज कैटलिन ने अन्तर्विषयक उपागम (Interdiciplinary approach) पर जोर देकर मेरियम की बात को और आगे बढ़ाया। 

इन सबके परिणामस्वरूप द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात एक नवीन राजनीतिक विचारधारा का विकास शिकांगो विश्वविद्यालय, अमरीका में हुआ। लामवेल, आमंड व पॉशिल्स, डेविड ईस्टन आदि ने जोरदार रूप में व्यावहारिक राजनीति के अध्ययन पर बल दिया। 

इन लोगों ने न केवल औपचारिक राजनीति, बल्कि राजनीति के अनौपचारिक पहलू को भी महत्वपूर्ण मानते हुए 'राजनीतिक व्यवस्था' को समझने का प्रयास किया, संरचना के साथ-साथ कार्य पर भी इनका काफी ध्यान रहा। 

तभी तो आमंड व पॉवेल ने संरचनात्मक कार्यात्मक उपागम का प्रतिपादन किया। इनके द्वारा मूल्यवहीन राजनीति की बात की जाती रही। स्पष्ट है कि ग्राहम वालास, बन्टले, मेरियम, आमंड, पावेल, शिल्स आदि के विचारों के समुच्चय को ही अनुभववादी-राजनीतिक सिद्धान्त का नाम दिया जाता है। 

इस सिद्धान्त की आलोचना मूल्यविहीनता, अतिकार्यात्मकता, अनौपचारिकता जैसे पहलू को लेकर की जाती रही है और उसका परिणाम भी निकला कि राजनीतिक सिद्धान्त के विकास में नैतिक मूल्यों को महत्व देने की बात की जाने लगी।

5. समकालीन राजनीतिक सिद्धान्त 

व्यवहारवाद के प्रतिक्रिया स्वरूप नवीन विचारधारा का विकास हुआ। 1970 के बाद यूरोपीय तथा अमरीकी राजनीतिक चिन्तकों ने परम्परागत नैतिक मूल्यों तथा ऐतिहासिक सन्दर्भों पर जोर दिया। 

थॉमस कून के द्वारा विज्ञान के सम्पूर्ण प्रतिमान या मॉडल को चुनौती दी गई तथा समकालीन चिन्तकों ने भी अनुभववादी दृष्टिकोण की आलोचना की। 

इन्होंने व्यवहारवादियों द्वारा नजरअंदाज की गई ऐतिहासिक पद्धति को ज्यादा महत्व दिया, फिर नये ढंग से समकालीन चिन्तकों ने न्याय, स्वतन्त्रता, लोककल्याणकारी धारणाओं के परीक्षण, पुनर्विचार एवं प्रयोग पर बल दिया। 

डेविल हैल्ड ने तो राजनीतिक पहलू को दार्शनिक पहलू से जोड़ने की बात तक कह डाली। स्पष्ट है कि समकालीन राजनीतिक सिद्धान्त व्यवहारवादी कट्टरता और अनुभववादी राजनीतिक सिद्धान्त के विरोध में आये एक नवीन सिद्धान्त का नाम है।

राजनीतिक सिद्धान्त का पतन और उत्थान

राजनीतिक सिद्धान्त की प्रकृति और महत्व की चर्चा के दौरान राजनीति विज्ञान के अन्तर्गत राजनीतिक सिद्धान्त के पतन और उत्थान को लेकर उभरे विवाद पर संक्षिप्त चर्चा आवश्यक है। अगर हम राजनीतिक सिद्धान्त के महत्व एवं उपयोगिता को ध्यान में रखते हुए विचार करें तो इसकी पतन की बात सही नहीं लगती। 

दूसरी ओर यदि बदलती परिस्थिति एवं बदलते मूल्य के सन्दर्भ में देखें तो राजनीतिक सिद्धान्त के उत्थान सम्बन्धी बात को स्वीकारने में कठिनाई होती है। आज जब इतिहास की अंत की बात की जा रही है, बेहिचक उत्तर आधुनिकतावादी मूल्यों को स्वीकार किया जा रहा है, तो क्या ऐसी परिस्थिति में राजनीतिक सिद्धान्त के उत्थान की बात करना सही है ? 

निष्कर्ष तक पहुँचने के लिए राजनीतिक सिद्धान्त के पतन और उत्थान के पहलुओं को अलग-अलग अध्ययन करना होगा।

राजनीतिक सिद्धान्त का पतन

राजनीतिक विज्ञान के समकालीन विद्वानों के बीच राजनीतिक सिद्धान्त की स्थिति के सम्बन्ध में एक रोचक विवाद चल रहा है। विवाद यह है कि राजनीतिक सिद्धान्त का पतन हो रहा है या नहीं। 

1951 ई. के ‘Journal of Politics' के एक अंक में ईस्टन ने अपने लेख 'The Decline of Modern Political Theory' तथा 1953 ई. में 'Political Science Quaterly' के एक अंक में कब्बन ने अपने लेख 'The Decline of Political Theory' में जो विचार दिए, उसी से इस विवाद का आरम्भ हुआ। 

आगे चलकर कई अन्य विद्वानों ने भी राजनीतिक सिद्धान्त के पतन की बात का समर्थन किया। यह बात उल्लेखनीय है ये विद्वान राजनीतिक चिन्तन की परम्परा में ह्रास को ही राजनीतिक सिद्धान्त के ह्रास की संज्ञा देते हैं।

जो विद्वान राजनीतिक सिद्धान्त के पतन की बात करते हैं उनका मानना है कि मार्क्स तथा जे. एस. मिल के बाद अब तक कोई महत्वपूर्ण राजनीतिक दार्शनिक नहीं हुआ है। राजनीतिक विचारों का प्रतिपादन प्राय: सामाजिक उथल-पुथल तथा परिवर्तन के काल में होता रहा है। 

परन्तु 20वीं सदी के मध्य सामाजिक संघर्ष तथा महत्वपूर्ण सांस्कृतिक परिवर्तनों के बावजूद पूरे विश्व में कहीं भी राजनीतिक चिन्तन विकसित नहीं हो सका। वास्तव में ईस्टन तथा कब्बन जैसे विद्वानों का ऐसा मत है कि आधुनिक विश्व में मौजूद परिस्थितियाँ राजनीतिक चिन्तन की परम्परा के मार्ग अवरुद्ध करती हैं। 

कब्बन शक्तिवादी राजनीति को राजनीतिक सिद्धान्तों के पतन का कारण मानता है। जब राजनीतिक शक्ति संघर्ष में बदल जाती है, तब सिद्धान्तों का पतन हो जाता है; जैसे—रोमन साम्राज्य के दिनों में हुआ था।

ईस्टन, कब्बन, लॉसवेल तथा अन्य विद्वान इस बात पर एकमत नहीं है कि राजनीतिक सिद्धान्त के ह्रास के लिए कौन-कौनसी परिस्थितियाँ जिम्मेदार हैं: फिर भी, सामान्यतः ऐसी कुछ परिस्थितियों के सम्बन्ध में सहमति दिखाई देती हैं। राजनीतिक सिद्धान्त में ज्यादा स्थिरता या ह्रास के लिए इतिहासवाद उत्तरदायी है। 

डनिंग, सेवाइन, मैकमिलन तथा लिंडसे जैसे विद्वानों ने ऐतिहासिक दृष्टिकोण अपनाते हुए केवल उन तथ्यों को समझने का प्रयास किया है, जिन्होंने अतीत में मूल्यों या सिद्धान्तों के प्रतिपादन का मार्ग प्रशस्त किया है।

राजनीतिक सिद्धान्त के ह्रास में मूल्यों के प्रति आपेक्षवादी दृष्टिकोण, जिसे ईस्टन ने नैतिक आक्षेपवाद का नाम दिया है, का भी हाथ है। पश्चिमी देशों द्वारा स्वीकृत राजनीतिक मूल्यों को राजनीतिक शास्त्र के विद्वानों ने सर्वव्यापी एवं शाश्वत रूप से स्वीकृत विचार मान लिया है।

हद से ज्यादा तथ्यों पर बल देने, विज्ञानवाद एवं आनुभाविक उपागम के विकास ने भी राजनीतिक सिद्धान्त को प्रतिकूल रूप से प्रभावित किया। तथ्यों पर हद से ज्यादा बल देने के चलते राजनीतिशास्त्र में प्रत्यक्षवाद की प्रवृत्ति बढ़ी, उसके चलते राजनीतिशास्त्र के विद्वानों में वैसे नैतिक उद्देश्यों का विलोप हो गया है जो उन्हें विचारों के प्रतिपादन के लिए प्रेरित करते। 

राजनीतिक सिद्धान्त के ह्रास के सम्बन्ध में विद्वानों द्वारा जो विचार दिए गए हैं, उनमें कई असंगतियाँ पाई जाती हैं और स्वयं उनके बीच इस मत पर भ्रम पाया जाता है कि राजनीतिक सिद्धान्त क्या है ? इसके अतिरिक्त समकालीन राजनीति विज्ञान में प्रत्यक्षवाद की प्रवृत्ति के विरोध में भी काफी सशक्त तर्क लियो स्ट्रास जैसे विद्वानों द्वारा प्रस्तुत किए गए हैं। 

वे राजनीतिक सिद्धान्त के ह्रास की बात स्वीकार नहीं करते और वे मानते हैं कि शास्त्रीय राजनीतिक चिन्तन की उपादेयता एव सार्थकता आज भी बनी हुई है। राजनीतिक दर्शन एवं राजनीतिक सिद्धान्त के बीच पृथक्करण हुआ है और दोनों के बीच सीमा रेखा को पुनः खींचा जा रहा है, परन्तु दोनों के बीच के सीमा निर्धारण तथा पृथक्करण का अर्थ राजनीतिक सिद्धान्त का ह्रास नहीं है।

राजनीतिक सिद्धान्त का उत्थान

19वीं सदी के मध्य से और विशेष रूप से 20वीं सदी में राजनीति विज्ञान में प्रत्यक्षवाद के बढ़ते हुए प्रभाव तथा अपनी राजनीतिक विचारधारा के सम्बन्ध में पश्चिमी देशों में पाए जाने वाले सन्तोष की स्थिति के चलते ईस्टन, कब्बन तथा अन्य विद्वानों द्वारा राजनीतिक सिद्धान्त के ह्रास की बात उठायी गई। 

परन्तु कई विद्वानों ने राजनीतिक सिद्धान्त के ह्रास की बात को स्वीकार नहीं किया है और उनके अनुसार यह कहना उचित नहीं होगा कि राजनीतिक सिद्धान्त मृत हो गया है या ह्रास की अवस्था में है। राजनीतिक सिद्धान्त के ह्रास की बात करने वाले विद्वानों ने राजनीतिक सिद्धान्त एवं राजनीतिक दर्शन को एक मानने की भूल की है। 

ईशा, बर्लिन जैसे विद्वानों ने राजनीतिक सिद्धान्त के ह्रास की बात का जोरदार खण्डन किया है। समकालीन राजनीति विज्ञान में दार्शनिकों द्वारा राजनीतिक सिद्धान्तों के प्रतिपादन की परम्परा का ह्रास हुआ है। वह कार्य राजनीतिशास्त्रियों द्वारा किया जाता है; जिन्होंने अपने विषय क्षेत्र में पड़ने वाले विषयों की समझदारी के लिए परिष्कृत अध्ययन पद्धतियाँ विकसित कर ली हैं।

इसके अतिरिक्त परम्परागत अर्थ में भी राजनीतिक सिद्धान्त के ह्रास की बात कहना उचित नहीं है।

प्रत्यक्षवादी अध्ययन प्रणाली का विरोध करते हुए परम्परागत राजनीतिक चिन्तन की धारा का जोरदार समर्थन किया है। ई. बर्लिन तथा लियो स्ट्रास दोनों विद्वानों ने प्लेटो तथा अरस्तू जैसे चिन्तकों द्वारा उचित राजनीतिक व्यवस्था के सम्बन्ध में प्रतिपादित विचारों की महत्ता को स्वीकार करते हुए उन्हें मानवीय समाज की वर्तमान परिस्थितियों पर लागू करने के पक्षधर रहे हैं। 

लियो स्ट्रास प्रत्यक्षवादी आन्दोलन का एक अन्य महत्वपूर्ण विरोधी है। उसने यह विचार दिया है कि परम्परागत राजनीतिक सिद्धान्त के पुनरोत्थान की प्रक्रिया चल रही है और इस धारा को रोका नहीं जा सकता। दर्शन में अभिरुचि मे कमी आई है। 

वर्तमान समय में राजनीतिक सिद्धान्त का राजनीतिक दर्शन से सम्बन्ध विच्छेद हो रहा है राजनीति एवं दर्शन के बीच की सीमा रेखा फिर से खींची जा रही है। दर्शन में अभिरुचि की कमी तथा दर्शन के बीच सीमा के पुनः निर्धारण का अर्थ राजनीतिक सिद्धान्त में ह्रास नहीं है।