भारत और अमेरिका के संबंध कैसे हैं - India and America relations

शीत युद्ध की समाप्ति के कारण भारत और अमेरिका के मध्य एक अनोखे युग का प्रारंभ हुआ है दोनों ही लोकतांत्रिक देश है। भारत तटस्थ राष्ट्र है। स्वतंत्रता के प्रथम दशक में अमेरिका और भारत के मध्य कटुता, तनाव, अलगाव, अविश्वास अब मैत्री भाव में परिवर्तित हो रहे हैं। 

यह उम्मीद जागी है कि अन्तर्राष्ट्रीय संबंध में भारत और अमेरिका का प्रगतिशील संबंध बनाएँगे। विश्वव्यापी चुनौतियों में भारत और अमेरिका का नजरिया एक-सा है।

भारत और अमेरिका के संबंध कैसे हैं

अमेरिका के साथ भारत के संबंध बहुध्रुवीय व्यवस्था में महत्वपूर्ण प्रयास है। हाल के वर्षों में भारत अमरीकी के संबंध भारी परिवर्तन हुआ है। शीत युद्ध की समाप्ति और कई भौगोलिक राजनीतिक दृष्टिकोण में साम्यता के कारण हमारे लिए एक दूसरे के निकट आना संभव हो सका। 

मार्च 2000 में राष्ट्रपति क्लिंटन ने इस बात पर सहमति जताई थी कि नई शताब्दी में भारत और अमेरिका शांति में सहभागी बनेंगे और क्षेत्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करने की सांझा जिम्मेदारी संभालेंगे।

1 नवम्बर, 2001 में भारत और अमेरिका ने अपने द्विपक्षीय संबंध को बेहतर बनाने का वचन दिया । भारत एवं अमेरिका इस बात पर सहमत हुए थे कि सहभागिता में दोनों देश लोकतंत्रों में समस्त भावी राजनीतिक परिवर्तनों के अनुरूप ढालने की सहज शक्ति प्राप्त करेंगे। 

भारत में इस संबंध को मजबूत करने की हमारी सरकार की प्रतिबद्धता को सभी राजनीतिक दलों का समर्थन प्राप्त है वस्तुतः लोक अक्सर कहते हैं कि प्रगति धीमी है वे तुरंत नाटकीय परिणाम और मीडिया के अनुरुप मैत्री के प्रतीक चाहते हैं। 

संसद में विपक्ष के चार दशक रहने के दौरान भारतीयों से एक सबक सीखा है और वह यह है कि जब तक शंका और मतभेद के घने बादल छट नहीं जाते हैं दोनों देश को इस दिशा मे प्रयास करते रहना होगा और अपरे दृष्टिकोण को तात्कालिक हितों से कहीं अधिक व्यापक बनाना होगा। भारत तथा अमेरिका के मध्य मतभेद के प्रमुख मुद्दे निम्नलिखित हैं-

उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् भारत और अमेरिका दोनों ही उपनिवेशवाद एवं साम्राज्यवाद का घोर विरोध करते थे। साम्राज्यवादी देशों के साथ जुड़े होने के कारण अमेरिकी नेताओं ने उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद की निंदा और विरोध न करके प्रायः मौन धारण कर लिया। 

भारत तथा अमेरिका के मध्य मतभेद के प्रमुख मुद्दे

 1. उपनिवेशवाद एवं साम्राज्यवाद, 2. चीन की साम्यवादी क्रांति और भारत द्वारा मान्यता, 3 हिन्द चीन की समस्या, 4. कश्मीर का प्रश्न, 5 सैनिक संगठन, 6. अमेरिका द्वारा पाकिस्तान का समर्थन एवं सैनिक सहायता।

सन् 1949 में साम्यवादी चीन का प्रादुर्भाव हो गया तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने दिसम्बर सन् 1949 को मान्यता प्रदान कर दी। भारत का यह कार्य अमेरिका को पसंद नहीं आया। हिन्द चीन समस्या से भी दोनों देशों के बीच कटुता उत्पन्न हुई क्योंकि अमेरिका ने उन्हें सैनिक सहायता दी। कश्मीर समस्या के संबंध में भी अमेरिका सदैव पाकिस्तान के पक्ष में था।

अमेरिका अन्तर्राष्ट्रीय संधियों और सैनिक संगठन को अनिवार्य मानता है जबकि भारत इसका विरोधी है रुस की तरफ भारत का झुकाव खालिस्तान आंदोलन को अमेरिका का समर्थन, चीन की संयुक्त राष्ट्रसंघ की सदस्यता का प्रश्न, पाकिस्तान की एक्वास विमान, रॉकेट प्रौद्योगिकी, परमाणु परीक्षण की स्वीकृति, भारत के प्रक्षेपास्त्र कार्यक्रम को रोकने के लिए अमेरिका का दबाव, अनेक ऐसे प्रश्न है। 

जो भारत और अमेरिका के मैत्रीपूर्ण संबंधों के लिए बाधक रहे हैं। वर्तमान में भारत अमेरिका का वार्ता का दायरा और इसकी बारंबारता काफी बढ़ी है।

अब इसमें अन्तर्राष्ट्रीय और क्षेत्रीय मामलों को सात दीर्घकालीन और लघुकालीन मुद्दे भी शामिल हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि वार्ता की परिस्थितियाँ भी बदली है।

भारत एवं अमेरिका एक दूसरे से आत्मविश्वासपूर्वक मिलकर बात करते हैं सम्मान व समानता पर आधारित वार्ता खासकर इसलिए सफल है कि भारत अमेरिका ने यह मान लिया है कि उनके हितों में कोई बुनियादी विरोध नहीं है वे सहमति के मुद्दों पर मिलजुलकर कार्य करते हैं और संबंधों को अप्रभावित रखकर मतभेदों पर भी खुलकर चर्चा करते हैं इससे भारत और अमेरिका की मैत्री परिपक्व हुई है।

पहली बार भारत ने महत्वपूर्ण रक्षा सहयोग किया। आतंकवाद राष्ट्र अपराध तथा साइबर अपराध भारत और अमेरिका के लिए चिंता के विषय हैं। भारत और अमेरिका ने इन क्षेत्रों में भी करार किए हैं। भारत और अमेरिका चिकित्सा, प्रदूषण रहित ऊर्जा, उन्नत सामाग्रियों सहित विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी जैसे अग्रणी क्षेत्रों में संयुक्त अन्वेषण कर रहे हैं।

नागरिक अंतरिक्ष अनुप्रयोग तथा नागरिक नाभिकीय सुरक्षा संबंधी समझौते की दिशा में भी वे दोनों कार्यरत हैं। सूचना प्राद्योगिकी एवं ज्ञान आधारित नई आर्थिकी के कारण भारत और अमेरिका द्विपक्षीय संबंध प्रगाढ़ हो रहे हैं। भावी प्रौद्योगिकी के विकास के दोनों देशों की सहभागिता नई ऊँचाईयों पर है।

दोनों देशों के सम्पर्क केवल सरकार या सरकारी स्तरों पर व्यापक नहीं है। शैक्षिक संस्थानों वैज्ञानिकों प्रयोगशालाओं, कार्यालयों और घरों तथा यहाँ तक कि साइबर अंतरिक्ष में भी भारतीय और अमेरिकी अपने हितों के अनुरूप नई पहचान कायम करने की दिशा में अग्रसर है।

अपनी प्रतिभा, कठिन परिश्रम उद्यम के बलबूते भारतीय एवं अमेरिकी देश के सबसे अमीर अल्पसंख्यक के रूप में उभरे हैं। खासकर सूचना प्रौद्योगिकी वित्तीय सेवाओं, प्रबंधन और औषधि के क्षेत्र में उनकी उपलब्धियों ने अमेरिकी प्रगति में योगदान दिया है।भारतीय अर्थव्यवस्था दस वर्ष में प्रगति के पथ पर है।

क्रय शक्ति के पथ की दृष्टि से हमारी अर्थव्यवस्था विश्व की चौथी और सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है भारत का विदेशी मुद्रा का भंडार लगातार बढ़ रहा है। तेजी से बढ़ते हुए आर्थिक विकास में दोनों एक दूसरे के नजदीक आए. इसका दोनों देशों के साझा भविष्य पर दूरगामी प्रभाव पड़ेगा।

आतंकवाद के मामले में अमेरिका भारत के दुख दर्द को समझने लगा है। आतंकवाद के विरूद्ध शुरु हुआ अन्तर्राष्ट्रीय युद्ध खत्म होने में अभी काफी वक्त लगेगा। दीर्घकालीन कार्यनीति में दोनों देश आगे बढ़ेंगे। दोनों लोकतात्रिक देश सामंजस्य से कार्य करें। किसी एक देश पर आये खतरे को हर किसी का खतरा माना जाए। दूसरा आतंकवाद के खात्मे के लिए सभी देशों में उच्चस्तरीय मानदंडों पर खरे उतरने की लगातार अपेक्षा की जाए।

तीसरे संकल्प, विस्तार और प्रयोजन में स्पष्टता होना चाहिए जिसमें नितिगत आतंकवाद पर भ्रामक स्थिति पैदा न हो। चौथा यह है कि आतंकवाद के खिलाफ जंग जीतने के लिए हमें विचारों पर दोनों देशों की दीर्घकालीन एवं बुद्धिमता और सहभागिता आवश्यक है इससे राजनीतिक आर्थिक परिवर्तन की गति बढ़ेगी। परिपक्व भारत अमरीकी संबंध में विश्व व्यवस्था पर जबर्दस्त असर डालेगा।

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