राज्य के नीति निर्देशक तत्व क्या है - what are the directive principles of state policy

भारतीय संविधान में राज्य के नीति निर्देशक तत्वों का समावेश आयरलैंड के संविधान में से किया गया है। ये तत्व शासन के मूलभूत तत्व है। कानून निर्माण में इन तत्वों का प्रयोग करना या इन्हें ध्यान में रखना राज्य के लिए आवश्यक है। 

राज्य के नीति निर्देशक तत्व क्या है

संविधान के भाग 8 अनुच्छेद 36 से 51 तक इनका उल्लेख किया गया है ये तत्व उन आदर्शों की व्याख्या करते हैं। जिनके द्वारा भारत में सामाजिक, आर्थिक लक्ष्य की प्राप्ति कर सच्चे लोकतंत्र की स्थापना की जा सके।

परिभाषा - एम. पायली के अनुसार- "सामूहिक रूप से राज्य के नीति निर्देशक तत्व भारत का शिलान्यास करते हैं ये भारतीय जनता के आदर्शों व आकांक्षाओं का वह भाग है जिन्हें सीमित अवधि में राज्य प्राप्त करने का भरसक प्रयास करेंगे।

तत्वों का स्वरूप- ये तत्व आर्थिक व व्यवहारिक लोकतंत्र की स्थापना में सहायक है। ये नैतिकता के सूत्र है यद्यपि उनक पीछे कोई कानूनी शक्ति नहीं है अर्थात् राज्य इनके पालन के लिए बाध्य नहीं है न ही न्यायालय इनकी रक्षा करता है फिर भी कोई राज्य इनकी अवहेलना नहीं कर सकता क्योंकि इनका पालन राज्य का नैतिक कर्त्तव्य है। 

यदि कोई सरकार इनके अनुसार कार्य नहीं करती है तो जनता अगले चुनाव में उसे नहीं चुनेगी। वास्तव में ये तत्व नागरिकों को यह बताते हैं कि सरकार को कौन-कौन से काम करने चाहिए।

जनता के हाथ में सरकार के मूल्यांकन की कसौटी है। संविधान द्वारा इन तत्वों का समावेश इसलिए किया गया है कि इन तत्वों के माध्यम से भारत में लोक कल्याणकारी राज्य की स्थापना हो सके । प्रत्येक व्यक्ति को समानता, न्याय व स्वतंत्रता की प्राप्ति हो सके। इसके अतिरिक्त राष्ट्रीय जीवन के मूल्य आदर्शों की स्थापना में सहयोग किया जा सके।

डॉ. बी.आर. अम्बेडकर के अनुसार नीति निर्देशक तत्वों की स्थापना का मूल उद्देश्य आर्थिक लोकतंत्र की स्थापना है ये स्थायी व कठोर नहीं अपितु भारतीय मानस के परिवर्तित विचारों को स्थापित कर राज्य के विकास में पूर्ण योगदान देते हैं। इनका मुख्य उद्देश्य सामाजिक, आर्थिक व राजनैतिक विकास के द्वारा लोक कल्याणकारी राज्य की नींव मजबूत करना है।

प्रकार या वर्गीकरण

भारतीय संविधान में निम्न नीति निर्देशक तत्वों को सम्मिलित किया गया है

1. आर्थिक तत्व, 2. प्रशासनिक व न्याय संबंधी तत्व, 3. सामाजिक व शैक्षिक तत्व, 4. अंतर्राष्ट्रीय शांति व सुरक्षा संबंधी तत्व, 5 अन्य तत्व।

1. आर्थिक तत्व- संविधान के अनुच्छेद 39 में इनका उल्लेख है जो कि निम्नानुसार है :

1. भौतिक साधनों के स्वामित्व पर ऐसा नियंत्रण हो कि उनका सार्वजनिक हित में उपयोग हो उत्पादन के साधनों को केन्द्रीयकरण न हो।

2. सभी नागरिकों को समान कार्य के लिए समान वेतन दिया जावे तथा जीविका उपार्जन के साधन उपलब्ध हो औद्योगिक संस्थानों में श्रमिकों की भागीदारी हो।

3. श्रमिकों, स्त्री – पुरुष, बालकों को उनकी आयु व शक्ति के अनुसार कार्य दिया जाय । शैशव व किशोरावस्था शोषण से मुक्त हो, स्त्रियों को प्रसूति अवकाश दिया जाए। 

4. आर्थिक रुप से कमजोर व पिछड़े वर्ग की निःशुल्क कानूनी सहायता की जाए। बेकारी, वृद्धावस्था, विकलांगता में असमर्थ नागरिकों को राज्य की ओर से सहायता दी जावे।

5. कृषि व कुटीर उद्योग को प्रोत्साहन दिया जाए। पशुवध बंद हो, पशुपालन में नस्ल सुधार हो। 

2. प्रशासनिक व न्याय संबंधी तत्व- शासन सत्ता का लोकतांत्रिक तरीके से विकेन्द्रीकरण हो अर्थात् पंचायती राज्य की स्थापना की जाए। स्थानीय स्वशासन की स्थापना हो। न्यायपालिका स्वतंत्र हो।

समस्त नागरिकों के लिए समान आचार संहिता राज्य बनाए। लोक सेवाओं में कार्यपालिका व न्यायपालिका का हस्तक्षेप न हो।

3. सामाजिक व शैक्षिक तत्व - सामाजिक विकास का शैक्षिक विकास के लिए निम्न तत्वों का समावेश किया गया है

1. राज्य के 14 वर्ष के सभी बालक बालिकाओं के लिए निःशुल्क व अनिवार्य प्राथमिक व माध्यमिक शिक्षा की व्यवस्था करें।

2. अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजातियों की सभी प्रकार के शोषण से रक्षा हो।

3. राज्य के नागरिकों का जीवन स्तर सुधारने एवं स्वास्थ्य रक्षा के लिए हानिकारक तत्वों के सेवन पर प्रतिबंध लगाए।

4. अंतर्राष्ट्रीय शांति व सुरक्षा संबंधी तत्व- संविधान के अनुच्छेद 51 के अनुसार

1. राज्य अंतर्राष्ट्रीय शांति व सुरक्षा को प्रोत्साहन देगा।

2. राष्ट्रों के मध्य मित्रता पूर्ण संबंधों की स्थापना करेगा।

3. अंतर्राष्ट्रीय विवादों को मध्यस्थता से शांतिपूर्ण तरीकों से निपटाया जाएगा।

4. राज्य अंतर्राष्ट्रीय संधि व समझौता का सम्मान करेगा।

5. अन्य तत्व - 1. अनुच्छेद 49 के अनुसार संसद द्वारा घोषित राष्ट्रीय स्मारक स्थान व वस्तु का क्रय-विक्रय नहीं किया जावेगा

1. उन्हें बचाना संवारना राज्य का कर्त्तव्य है।

2. संविधान के 42वें संशोधन के अनुसार पर्यावरण व वन्यजीवों की सुरक्षा व संवर्धन राज्य का कर्त्तव्य है। नीति निर्देशक तत्वों का मूल्यांकन- इनके उचित मूल्यांकन के लिए इनकी अच्छाइयों व कमियों को समझना आवश्यक है। 

महत्व व उपयोगिता (पक्ष में तर्क ) 

1. ये तत्व लोक कल्याणकारी राज्य की स्थापना में सहायक है।

2. ये तत्व आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक, स्वतंत्रता व समानता स्थापित करते हैं एवं लोकतंत्र के आधार है।

3. इन तत्वों के पीछे जनमत की शक्ति है अर्थात् कोई राज्य इनका पालन न करें तो जनता उन्हें चुनाव द्वारा हटा सकती है।

4. ये तत्व नैतिक सांस्कृतिक मूल्य की स्थापना करते हैं ये तत्व राम राज्य की कल्पना को साकार रुप देते है।

5. ये तत्व कार्यपालिका, व्यवस्थापिका व न्यायपालिका के मार्गदर्शक हैं।

आलोचना (विपक्ष) - राजनीतिज्ञ व बुद्धिजीवी इन तत्वों की इस आधार पर आलोचना करते हैं कि ये तत्व व्यवहारिक नहीं है क्योंकि इनके पीछे कानूनी शक्ति नहीं है ये तत्व अस्पष्ट है तथा भारतीय लोकतंत्र के अनुरूप नहीं है विकास - पथ को दायरे में बाँधना उचित नहीं है।

यद्यपि इनमें कुछ कमियाँ है फिर भी एम.सी. छागला का कहना है कि- "इन तत्वों का प्रयोग करके भारत को स्वर्ग बनाया जा सकता है। ये समानता स्वतंत्रता के पूरक है तथा संवैधानिक उपचारों में मरहम का कार्य करते हैं।

संविधान में संशोधन की प्रक्रिया

भारतीय संविधान में संशोधन की प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 368 में निम्न प्रकार है-

संसद के विशिष्ट बहुमत के द्वारा संशोधन में आवश्यकताओं और परिस्थितियों के अनुसार संशोधन करने के लिए विधेयक संसद के किसी भी सदन में (राज्यसभा, लोकसभा) रखा जा सकता है। 

जब विधेयक दोनों सदनों में कुल सदस्यों के बहुमत से और उपस्थित मत देने वाले सदस्यों के 2/3 बहुमत से पारित हो जाते हैं तो राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद संशोधन विधेयक पारित माना जाता है।

संसद के विशिष्ट बहुमत तथा राज्य की विधान सभाओं की स्वीकृति में संशोधन - संविधान में कुछ अनुच्छेद है जिन पर संसद के दोनों सदनों का विशिष्ट बहुमत और आधे राज्यों की विधान सभाओं की स्वीकृति आवश्यक होती है ये विषय है राष्ट्रपति का चुनाव, कार्यपालिका की शक्तियाँ, केन्द्रशासित व राज्यों के उच्च न्यायालय केन्द्र व राज्यों के मध्य विधायी संबंध व प्रतिनिधियों की संख्या का निर्धारण आदि।

संविधान संशोधन को राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद संशोधित माना जाता है।

भारतीय संविधान का निर्माण - संविधान सभा का गठन, संविधान सभा की बैठक का प्रस्ताव, प्रारूप समिति का निर्माण, संविधान का प्रारूप।

भारतीय संविधान की प्रस्तावना - "हम भारत के लोग भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न लोकतांत्रिक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समानता प्राप्त कराने के लिए तथा उसमें व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता सुनिश्चित करने वाली बन्धुता बढ़ाने के लिए दृढ़ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवम्बर, 1949 ई. (मिती मार्गशीर्ष शुक्ल सप्तमी सम्वत् दो हजार छः विक्रम) को एतद द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियम और आत्मार्पित करते हैं।

संविधान सभा - संविधान सभा का गठन कैबिनेट मिशन योजना के अन्तर्गत 1946 में किया गया इसको भारत के लिए संविधान बनाने का कार्य सौंपा गय। 

संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेन्द्र प्रसाद बनाए गए। संविधान सभा ने दो वर्ष 11 महीने, 18 दिन में संविधान बनाकर तैयार किया गया 26 जनवरी, 1950 को भारत का संविधान लागू किया गया।

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