जैव विविधता का संरक्षण क्या है - what is biodiversity conservation

प्राकृतिक वनस्पति किसी भी क्षेत्र के धरातल का एक महत्वपूर्ण अंग है, जो वन, घास एवं झाड़ियों के रूप में पाए जाते हैं किन्तु इसमें वनों का विशेष महत्व है। आदिकाल से वनों का मानव के साथ घनिष्ठ संबंध रहा है। 

यह हमारी राष्ट्रीय संपदा है, वस्तुतः यह हमारे लिए प्रकृति का वरदान है। भारत में प्राचीन काल से ही वनों की संस्कृति रही है, पेड़ों को वन देवता के रूप में पूजा करने का विधान रहा है। 

पेड़ लगाना सदैव बड़ा धार्मिक कृत्य समझा गया है क्योंकि वनों से ही क्षेत्र का पारिस्थितिक संतुलन बना रहता है इसलिए प्राचीन समय में हमारे देश में वनों की प्रचुरता थी किन्तु सभ्यता के विकास के साथ मानव ने कृषि, परिवहन के साधनों, उद्योग धंधों एवं बस्तियों के लिए वनों का दोहन आरंभ कर वनों को नष्ट करना शुरू कर दिया है। 

वनों के विनाश के कारण 

वनों के विनाश के कई कारण हैं जिनमें से प्रमुख निम्नलिखित हैं

1. कृषि कार्य के लिए- देश में लगातार जनसंख्या में वृद्धि होती जा रही है जिससे कृषि उत्पादन में भी वृद्धि की जरूरत बढ़ती जा रही है अतः खाद्य की पूर्ति हेतु वनों की कटाई कर उसे कृषि योग्य भूमि में परिवर्तित किया जा रहा है।

2. रेल मार्ग बनाने के लिए - ब्रिटिशकाल में रेल मार्गों के निर्माण हेतु लकड़ी की स्लीपर बनाए जाते थे किन्तु अब रेलवे बोर्ड ने लकड़ी के स्थान पर कांक्रीट के स्लीपरों का प्रयोग करना शुरू कर दिया है जिससे वनों का विनाश कम हुआ है।

3. प्राकृतिक विनाश- वर्षा काल में अधिक बाढ़ होने से भूमि के कटाव के कारण वृक्षों का विनाश होता है। कई बार वृक्षों में कीड़े आदि लगने एवं दावाग्नि ( जंगल की आग ) फैलने के कारण भी वनों का विनाश होता है।

4. अनियंत्रित चराई व्यवस्था - वन प्रदेशों में ग्रामीणों द्वारा पशुओं की अनियंत्रित चराई के कारण भी वनों का विनाश होता है।

5. जलाऊ लकड़ी की प्राप्ति हेतु- जलाऊ लकड़ी की प्राप्ति हेतु भी वनों की कटाई करने के कारण वनों की संख्या की कमी आती जा रही है। इस प्रकार से वनों का निरंतर विनाश होता जा रहा है, जिसके अनेक दुष्प्रभाव होते हैं, जैसे वर्षा की कमी, शुष्क जलवायु पशुओं के लिए चारे की कमी, भूमि क्षरण की गति तेज हो जाती है। 

अतः वनों की कटाई रोकना, वृक्षारोपण करना वर्तमान मे हमारे लिए अत्यंत आवश्यक हो गया है क्योंकि वन हमारे जीवन के लिए अत्यन्त आवश्यक है उनसे हमें कई प्रकार के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष लाभ होते हैं, जो निम्नानुसार है

 वनों से होने वाले प्रत्यक्ष लाभ

1. वनों से प्राप्त उपज - वन से प्राप्त होने वाली प्रमुख उपज लकड़ी है, वनों से प्राप्त होने वाली आय का 75% भाग लकड़ियों से प्राप्त होता है- सागौन, चीड़, देवदार, शीशम, साल, पाइन आदि वृक्षों से उत्तम कठोर एवं टिकाऊ लकड़ी प्राप्त होती है। 

जिन्हें अनेक प्रकार के सुन्दर, कलात्मक और टिकाऊ फर्नीचर बनाया जाता है, चंदन के वृक्ष की लकड़ी से सुगंधित तेल निकाला जाता है एवं सुंदरी वृक्षों की लकड़ी से टिकाऊ और मजबूत नावें बनाई जाती है।

2. गौण उपज - वनों से हमें कई प्रकार के उपयोगी पदार्थ मिलते हैं, भारत में 75% लाख़ उत्पन्न किया जाता है, बबूल, चीड़, नीम, पीपल आदि वृक्षों से गोद प्राप्त होता है तथा खैर वृक्ष की लकड़ी को पानी में उबालकर और सुखाकर कत्था प्राप्त किया जाता है।

3. उत्तम चारागाह- वनों में उगी हुई हरी घास पशुओं के लिए उत्तम चारागाह है।

4. चमड़ा रंगने तथा पकाने के पदार्थ- सुंदरी, खैर, हरड़, बबूल, बहेड़ा आदि वृक्षों की छाले एवं । पत्तियाँ चमड़ा रंगने और साफ करने में सहायक होती है।

5. उद्योग धंधे- कई प्रकार के उद्योग धंधे भी वनों पर आधारित है, दियासलाई उद्योग, फर्नीचर उद्योग, जड़ी-बूटियाँ एवं सिनकोना आदि औषधि, रबर, रीठा, शहद आदि वनों पर आधारित उद्योग है, जिनसे लाखों लोगों को आजीविका प्राप्त होती है, इसके अलावा जंगली जानवरों से प्राप्त मांस, हड्डी और पंख आदि भी कई प्रकार के उपयोगी होते हैं।

6. पर्यटक स्थल - वनों की उपयोगिता के प्रति लोगों में जागरूकता उत्पन्न करने के लिए सरकार कई प्रकार के कार्य कर रही है, वनों को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जा रहा है जो न सिर्फ पर्यटकों को अपनी तरफ आकर्षित करते हैं वरन् राष्ट्रीय आय में भी वृद्धि करते हैं।

वनों से होने वाले अप्रत्यक्ष लाभ

1. वन जलवायु को प्रभावित करते हैं ये तापमान को नियंत्रित भी करते हैं।

2. मृदा अपरदन को रोकते हैं।

3. रेल लाइनों के किनारे वृक्षारोपण से धूल व ध्वनि प्रदूषण कम होता है।

4. वन मरूस्थल के प्रसार को रोकते हैं, वृक्षो से वायु की गति मंद हो जाती है, एवं तेज आँधियों से होने वाली हानि को कम करती है।

5. वन देश के प्राकृतिक सौंदर्य में भी वृद्धि करते हैं।

6. वनों में रेशम के कीड़े और मधुमक्खी पालने का काम सुविधापूर्वक किया जा सकता है। 

7. वन अनेक प्रकार के पशु पक्षियों के लिए शरण स्थली होते हैं, मानव इसका शिकार कर भोजन व अन्य सामग्री प्राप्त करते हैं ।

8. वनों से भूमि में जल का रिसाव अधिक होता है जिससे भूमिगत जल का भंडार बढ़ता है। 

9 वनों में कृषि की पूरक वस्तुएँ भी उपलब्ध होती है।

10. कालिस के अनुसार वृक्ष पर्वतों को थामे रहते हैं, तूफानी वर्षा को नियंत्रित करते हैं। नदियों को अनुशासित रखते हैं। जल प्रपातों को बनाए रखते हैं और पक्षियों का पोषण करते हैं।

इस तरह हम समझ सकते हैं कि वन हमारी राष्ट्रीय सम्पत्ति है, पारिस्थितिक संतुलन एवं प्राकृतिक परितंत्र को बनाए रखने के लिए जहाँ एक ओर वनों का संरक्षण आवश्यक है, वहीं वृक्षारोपण कर वनों के क्षेत्र में वृद्धि

करना भी आवश्यक है, वन राष्ट्र की अमूल्य निधि है, यह प्रकृति द्वारा प्रदत्त निःशुल्क उपहारों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण है, पं. जवाहरलाल नेहरू के अनुसार- उगता हुआ वृक्ष प्रगतिशील राष्ट्र का जीवंत प्रतिक है।

वन महोत्सव के जनक ऐ. एम. मुंशी के अनुसार- वृक्षों का अर्थ है जल, जल का अर्थ है रोटी और रोटी ही जीवन है।' अतः वनों का संरक्षण आज की परम आवश्यकता है।

वन संरक्षण- वन किसी भी देश के लिए उसके जीवन का आधार है यह एक आपूर्ति संसाधन है जो एक बार कट जाए या समाप्त हो जाए तो फिर उसे उगने में बहुत समय लगता है, पौधों का उगना तथा मिट्टी का बनना बहुत से तत्वों का लम्बे काल तक एक साथ अतः प्रक्रिया का अंतिम फल है।

अतः इन्हें बहुत ही बुद्धिमानी के साथ उपयोग किया जाना चाहिए । वर्तमान में हमारी सरकार ने भी इस ओर ध्यान दिया है तथा राष्ट्रीय वन नीति की भी घोषणा की है, जिसके तहत भूमि के 33% भाग पर वन होना अनिवार्य है। इस नीति के दो उद्देश्य हैं

1. वन संसाधनों का दीर्घकालीन विकास सुनिश्चित करना।

2. निकट भविष्य में निर्माण कार्य हेतु बढ़ती माँग की पूर्ति करना ।

सरकार ने 1998 में नवीन राष्ट्रीय वन नीति लागू की है जिसके उद्देश्य निम्नलिखित हैं

1. पर्यावरण स्थिरता एवं सुधार।

2. वन क्षेत्र के जीव-जन्तु एवं वनस्पति जैसे प्राकृतिक धरोहर की सुरक्षा।

3. मृदा संरक्षण।

4. बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति।

5. सामाजिक वानिकी एवं वृक्षारोपण कार्यक्रमों का विस्तार।

इस राष्ट्रीय वन नीति को क्रियाशील बनाने के लिए अगस्त 1999 में एक 20 वर्ष की दीर्घ अवधि वाली राष्ट्रीय वानिकी कार्य योजना लागू की गई है जिसका उद्देश्य वनों की कटाई को रोकना एवं देश के एक तिहाई भाग को वृक्षों और वनों से ढकना है। सरकार ने प्रति वर्ष जुलाई, अगस्त माह में वन महोत्सव मनाना आरंभ किया है, जिसके तहत देश के विभिन्न भागों में वृक्ष लगाए जाते हैं।

थार मरूस्थल के विस्तार को रोकने के लिए पाकिस्तान की सीमा के साथ वृक्ष लगाए गए हैं। एक सामाजिक कार्यक्रम सुंदरलाल बहुगुणा के द्वारा चिपको आंदोलन आरंभ किया गया है, जिसमें वृक्षों की कटाई पर प्रतिबंध लगाया गया। वन संरक्षण हेतु वर्तमान में निम्नलिखित उपाय किए गए हैं— 

1. शासन ने राष्ट्रीय उद्यान और अभ्यारणों की स्थापना कर वहाँ पूर्ण संरक्षण प्रदान किया है। 

2. वनों की अंधाधुंध कटाई पर प्रतिबंध लगाया है।

3. वनों के बाहर खाली पड़ी भूमि पर चारागाह विकास तथा ईंधन के लिए रोपण करना आवश्यक है। 

4. वन ग्रामों में खेती के उन्नत तरीकों को अपनाना, वन ग्राम एवं वनों के आस-पास के ग्रामों में खेती को उन्नत करके उसके लिए स्थानीय नदी, नालों से सिंचाई की व्यवस्था, चारागाह विकास करना आवश्यक है। 

5. वनों में सुरक्षा उपाय अपनाना आवयक ताकि आग लगने जैसी घटनाएँ कम हो सके। 

6. वनों को कीड़े-मकोड़ों एवं बीमारियों से बचाने के लिए रसायनों का उपयोग आवश्यक है।

7. आरा कारखानों में लकड़ी के दुरूपयोग पर प्रतिबंध लगाना।

8. वनों को सुरक्षित क्षेत्र घोषित किया जाए।

9. लकड़ी तथा इसके उत्पादों का अधिकतम उपयोग करना।

10. लकड़ी की प्रतिस्थानापन्न वस्तुओं की खोज कर लकड़ी पर मानव की निर्भरता को कम किया जाए। 

11. जनता में वनों के संरक्षण की प्रति जागरूकता पैदा करने के कार्यक्रम आयोजित किए जाए। 

12. खेतों में मेड़ तथा खाली भूमि पर सार्वजनिक जल स्रोतों पर ग्रामवासियों द्वारा वृक्षारोपण आदि वन संरक्षण में सहयोग प्रदान करते हैं।

13. उपयोगी एवं शीघ्र विकसित होने वाले वृक्षों का रोपण किया जाए।

14. वन ग्रामों में पशुओं की नस्ल सुधारने तथा पशु शिविरों के माध्यम से गोबर एकत्रित कर सार्वजनिक बायोगैस संयंत्र लगाकर ईंधन की पूर्ति करने एवं पेड़ों की पत्तियों और सूखी टहनियों को उन्नत चूल्हों में ईंधन के रूप में उपयोग लाना था ऊर्जा बचत के लिए अन्य सामान विशेषकर सूर्य ऊर्जा का उपयोग करना । 

15. नवीन वन संरक्षण नीति बनाई जाई और इसे तोड़ने वाले को कठोर दण्ड दिया जाए।

इस तरह हम कह सकते हैं कि वन का संरक्षण देश के विकास, आर्थिक प्रगति के लिए अत्यन्त आवश्यक है क्योंकि वन देश की समृद्धि का मूलाधार तो है ही पर्यावरण संतुलन स्थापित करने के लिए भी आवश्यक है।

वन्य जीव संरक्षण, वन्य जीव अभयारण्य योजना

किसी क्षेत्र के पौधे एवं जीव-जन्तु परस्पर इतने घुल-मिल जाते हैं तथा एक-दूसरे पर इतने आश्रित हो जाते हैं कि एक के बिना दूसरे के अस्तित्व की कल्पना तक नहीं की जा सकती है। जितनी विविधता हमारे देश की वनस्पति में है उतनी ही विविधता हमारे दश के जीव-जन्तुओं में भी है।

देश में जीव-जन्तुओं की लगभग 75,000 जातियाँ पाई जाती हैं, खारे और ताजे पानी की 2,500 जाति की मछलियाँ पाई जाती है, यहाँ पर लगभग 2,000 प्रकार के पक्षियों की भी जातियाँ हैं। इनके अतिरिक्त उभयचर, सरीसृप, स्तनपायी और छोटे कीट पाए जाते हैं, हमारे देश में मुख्यतः पाए जाने वाली जीव-जन्तु निम्नलिखित हैं

1. हाथी– यह स्तनपायी राजसी ठाट-बाट वाला पशु है यह विषुवतीय उष्ण-आर्द्र वनों का जीव है, हाथी हमारे देश में असम, केरल और कर्नाटक के जंगलों में पाए जाते हैं ।

2. सिंह - शिकारी पशुओं में भारतीय सिंह का विशेष स्थान है जो अफ्रीका और भारत में ही पाया जाता है, सिंह का प्राकृतिक आवास गुजरात में सौराष्ट्र के गिर वनों में है। इस तरह की जलवायु में सिंहों के संरक्षण और संवर्धन के लिए प्रयास किए जा रहे हैं। सिंह एक राजसी और शक्तिशाली पशु है।

3. ऊँट और जंगली गधे- ऊँट और जंगली गधे गर्म और शुष्क मरूस्थली स्थानों पर ही मिलते हैं, ऊँट थार मरूस्थल में सामान्य रूप से पाया जाता है।

4. शेर - शेर जंगली पशुओं में सबसे ज्यादा शक्तिशाली पशु है, प्रसिद्ध बंगाल टाइगर तथा प्राकृतिक निवास गंगा के डेल्टा में सुन्दरवन में पाए जाते हैं। टाइगर देश का राष्ट्रीय पशु है।

5. हिरण- हिरण भारतीय जीव जगत का सुंदर और कोमल पशु है, भारत में हिरण की अनेक प्रकार की जातियाँ है जिनमें चौसिंघा, काला हिरण, चिकारा, कश्मीरी बारह सिंघा, दलदली मृग, चित्तीदार मृग, कस्तूरी मृग और मूषक मृग उल्लेखनीय है।

6. तामचिता और हिमतेन्दुआ- यह हिमालय के ऊँचे क्षेत्रों में पाए जाते हैं, यह बिल्ली की जाति के जन्तु हैं। इनके अतिरिक्त हिमालय की श्रृंखलाओं में और कई आकर्षक जन्तु रहते हैं जिसमें जंगली और भी कई आकर्षक जन्तु रहते हैं जिनमें जंगली भेड़, पहाड़ी बकरियाँ, साकिन ( लंबे सींग वाली बकरी), टैपीर आदि हैं।

7. बंदर - भारत में बंदरों की अनेक जातियाँ पाई जाती है, लंगुर सामान्य रूप से पाया जाने वाला बंदर है, पूँछ वाला बंदर (मकाक) बड़ा विचित्र जीव है, इसके मुँह पर चारों ओर बाल उगे होते हैं जिससे चेहरे पर एक प्रभामंडल दिखाई देता है।

8. पक्षी - भारत में कई प्रकार के रंग-बिरंगे पक्षी मिलते हैं जिनमें मोर अत्यन्त आकर्षक पक्षी है, इसे देश का राष्ट्रीय पक्षी होने का गौरव प्राप्त है। हंस, बतख, मैना, टइपा, तोता, कबूतर, बगुले, धनेष (हाईबिल) शकर, खोटा आदि भारत के जंगलों और झीलों में रहने वाले पक्षी हैं।

वन्य जीवों की दशा में हास के कारण

1. लगातार वनों की कटाई- बढ़ती जनसंख्या के कारण वनों की अंधाधुंध कटाई से वन्य जीवों के लिए आवास की समस्या उत्पन्न हो गई।

2. इलाज की व्यवस्था - पशुओं के रहने की जगह गंदी होने पर कई प्रकार के रोग हो जाते हैं। और समय पर उनके समुचित इलाज की व्यवस्था नहीं हो पाती है।

3. पौष्टिक चारे का अभाव- शाकाहारी पशुओं के लिए पर्याप्त मात्रा में चारागाह उपलब्ध नहीं हो पाते हैं

4. भोजन चक्र में बाधा - भोजन चक्र में बाधा आने पर वन्य जीव आबादी की ओर भागने लगते हैं जिससे वन जीव व भोजन दोनों की ही हानि होती है।

वन्य जीवों का आर्थिक महत्व

पर्यावरण प्रदूषण पर रोक लगाने के लिए वन्यजीवों का संरक्षण अत्यंत आवश्यक है। क्योंकि इनके द्वारा पर्यावरण में बहुत से प्रदूषित पदार्थों को नष्ट कर दिया जाता है। वन्य जीवों के आर्थिक महत्व निम्नलिखित हैं

1. पशुओं तथा वन्य जीवों से प्राप्त मांस, हड्डी, खाल व परत से कई उपयोगी वस्तुओं का निर्माण होता है। 

2 वन्य जीव प्राकृतिक परितन्त्र में सन्तुलन स्थापित करते हैं तथा खाद्य श्रृंखला को नियमित और पूर्ण करते हैं। 

3. कई वन्य जीव अपघटक का कार्य करते हैं, मृत जीवों के शरीर को लोमड़ी गिद्ध द्वारा नष्ट कर पर्यावरण को दूषित होने से बचाया जाता है।

4. मधुमक्ख्यिों द्वारा प्राप्त शहद, रेशम कीट पालन आदि कई वन्य जीव आर्थिक महत्व के लिए पाले जाते हैं। 

5. परिवहन व्यवस्था में बैल, ऊँट, घोड़े का अत्यधिक महत्व है।

6. गाय, भैंस, बकरी आदि का दुग्ध उत्पादन में विशेष महत्व है।

वन्य जीव संरक्षण

 वन्य प्राणियों की संख्या लगातार कम होती जा रही है वनों की अंधाधुंध कटाई, पर्यावरण का प्रदूषण है जिनसे देश के कई विशिष्ट प्रकार जीवों की संख्या में लगातार कमी आ रही है। काला हिरण, सफेद शेर, सिंह आदि कई ऐसे पशु है जिनकी स्थिति समाप्तप्राय - सी होती जा रही है। अतः वन्य जीवों को संरक्षण प्रदान करने के लिए विशेष प्रयास किए जा रहे हैं। 

इस संबंध में नवीनतम स्थिति तथा प्रवृत्तियों की जानकारी के लिए पशु-पक्षियों की गणना की जाती है देश में बाघ परियोजना काफी सफल हुई है। वर्तमान में देश में बाघों के लिए 20 प्रतिशत आरक्षित क्षेत्र है। गिरसिंह योजना एशिया में एकमात्र आवास परियोजना है। गैंडो के संरक्षण हेतु असम में काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना की गई है। 

इसके अतिरिक्त घड़ियाल प्रजनन परियोजना, सिंह, तेंदुआ परियोजना, हाथी परियोजना, असम, अरूणाचल, मेघालय में चालू की गई है। मालवा और राजस्थान में पाई जाने वाली सोन चिड़िया के भी विलुप्त हो जाने की आशंका है अतः इसके संरक्षण हेतु भी परियोजना आरंभ की गई है।

वन जीव अभ्यारण्य योजना

देश में जैव की सुरक्षा एवं संरक्षण के प्रयास किए जा रहे हैं। इस योजना के अंतर्गत भारत का प्रथम जीवन आरक्षित क्षेत्र जैवमण्डल रिजर्व स्थापित किया गया है। 

यह कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल के सीमावर्ती क्षेत्रों में फैला हुआ है। इसकी स्थापना 1956 में हुई थी। इस योजना के अंतर्गत प्रत्येक जन्तु तथा पौधों का संरक्षण अनिवार्य है। यह प्राकृतिक धरोहर भावी पीढ़ियों की है जिसे हमें ज्यों का हैं।

त्यों उन्हें सौंपता है यहाँ जैव विविधता के रक्षण के लिए 14 आरक्षित क्षेत्र स्थापित किए गए

नीलगिरी नदी के पश्चात् उत्तरांचल के हिमालय क्षेत्र में नन्दा देवी जीवन आरक्षित क्षेत्र 1955 में आरंभ किया गया। इसी वर्ष मेघालय राज्य में भी जैवमंडल स्थापित किया गया।

अण्डमान निकोबार द्वीप समूह में अनेक मिश्रित और विविध प्रकार के जीव-जन्तु पाए जाते हैं। इनके संरक्षण हेतु भी जीव आरक्षित क्षेत्र की स्थापना की गई है। इस योजना में भारत के विविध वनस्पति वाले क्षेत्रों को शामिल किया जा रहा है।

वर्तमान में देश में 86 राष्ट्रीय उद्यान, 480 वन्य जीव अभ्यारण्य तथा 200 से अधिक प्राणी उद्यान हैं।

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