देशी रियासतों का एकीकरण क्या है - What is the integration of princely states

 देशी रियासतों का एकीकरण

1. देशी रियासतों के एकीकरण में सरदार पटेल का योगदान 

1875 के 31 अक्टूबर के दिन गुजरात के एक गाँव में सरदार पटेल का जन्म हुआ था। बाल्यावस्था से ही सरदार पटेल बड़े देशभक्त थे तथा ब्रिटिश साम्राज्यवाद की समाप्ति में ही भारत का कल्याण देखते थे।

महात्मा गाँधी के संपर्क में आने के पश्चात् सरदार स्वतंत्रता संग्राम में पूरी शक्ति के साथ कूद पड़े और बैरिस्टरी त्याग कर सारी शक्ति से देश सेवा में जुट गए। उन्होंने गुजरात में क्रांति की आग सुलगाई। स्वतंत्रता संग्राम के लिए बारदोली सत्याग्रह के आंदोलन की जोरदार तैयारी का श्रेय सरदार को ही है। 

सरदार में अनुपम संगठन शक्ति कार्यकुशलता तथा दबंग सैनिक प्रवृत्ति थी और बला का धैर्य भी। अतः उन्हें भारत का लौह पुरूष कहा जाता है। वे काँग्रेस के महाप्राण बने रहे। ब्रिटिश शासन काल में भारत दो भागों में विभाजित था- देशी राज्य और ब्रिटिश प्रांत। 

जब भारत स्वतंत्र हुआ तो देशी राज्यों ने एक कठिन और जटिल समस्या उपस्थित कर दी। लगभग 600 देशी राज्यों पर से ब्रिटिश सार्वभौम सत्ता उठा ली गई और उन्हें भारत या पाकिस्तान में शामिल होने या स्वतंत्र रहने का अधिकार दिया गया।

इससे देश की एकता नष्ट हो सकती थी। सारे देश में अव्यवस्था फैल सकती थी। सरदार पटेल ने अपनी कुशलता एवं दूरदर्शिता से भारत को इस संकट से बचाया उन्होंने देशी राज्यों का भारत में विलय कर अपनी विलक्षण बुद्धिमत्ता का परिचय दिया।

2. जूनागढ़, हैदराबाद व कश्मीर रियासतों का विलय

1947 ई. के बाद केवल जूनागढ़ जम्मू और कश्मीर तथा हैदराबाद रियासतें भारतीय संघ से बाहर थी। जूनागढ़ एक छोटी-सी रियासत थी। इसका नवाब मुसलमान था। अधिकतम प्रजा हिन्दू थी। जूनागढ़ के नवाब ने पाकिस्तान में सम्मिलित होने का निर्णय किया, जिसका वहाँ की जनता ने विरोध किया। 

जनता की सहायता के लिए सरदार पटेल ने सेना भेजा। भारतीय सेना के जूनागढ़ पहुँचने पर जूनागढ़ का निजाम भागकर पाकिस्तान चला गया। वहाँ की जनता ने 1948 ई. में भारत में विलय के पक्ष में मतदान किया।

हैदाराबाद में निजाम का शासन था। निजाम भी भारत में सम्मिलित होने के पक्ष में नहीं था। हैदराबाद की जनता भारत में विलय चाहती थी। अतः उन्होंने निजाम के विरूद्ध कदम उठाया। जगह-जगह प्रदर्शन प्रारंभ किए गए। 

काजिम रिजवी के नेतृत्व में निजाम के सहयोगियों ने सारी रियासत में आंतक फैला दिया तथा लूटपाट की। अंततः जनता की रक्षा के लिए 13 सितंबर, 1948 ई. को सरदार वल्लभ भाई पटेल ने भारतीय सेना हैदराबाद भेजी। 

अतः हैदराबाद निजाम को भारत में शामिल होने के लिए विवश होना पड़ा और हैदराबाद का देशी रियासत भारत में विलय हो गया।

जूनागढ़ व हैदराबाद की समस्या से कहीं अधिक जटिल कश्मीर विलय की समस्या थी। कश्मीर की सीमा पाकिस्तान से मिलती थी। कश्मीर में मुसलमानों की संख्या अधिक थी और मोहम्मद अली जिन्ना भी कश्मीर को पाकिस्तान में मिलाना चाहते थे। 

कश्मीर का शासक हरीसिंह था। उसने स्पष्ट घोषणा नहीं की कि वह पाकिस्तान अथवा भारत किसमें मिलना चाहता है। जम्मू और कश्मीर की जनता  निरंकुश राजा के खिलाफ आंदोलन चला रही थी। जो राष्ट्रीय आंदोलन का अंग था। 

जिन्ना ने 22 अक्टूबर,1947 को कबाइली जुटेरों (पाकिस्तानी घुसपैठियों) के रूप में पाकिस्तानी सेना को कश्मीर भेजा। अतः राजा हरीसिंह तथा नेशनल काँफ्रेंस के नेता शेख अब्दुला ने 26 अक्टूबर, 1947 ई. को भारत से सैनिक सहायता माँगी। 

भारत ने इस शर्त पर सहायता दी कि वह कश्मीर को भारतीय संघ में विलय कर दें। इस शर्त को राजा हरीसिंह ने स्वीकार कर लिया।

भारतीय सेनाओं को सरदार वल्लभ भाई पटेल ने कश्मीर भेजा, उन्होंने पाकिस्तानी सेनाओं को परास्त कर कश्मीर से खदेड दिया। हैदराबाद का भारत में औपचारिक विलय नवंबर 1949 में सैनिक कार्यवाही के बाद हुआ। 

1949 ई. के अंत तक भारतीय रियासतों का भारत में विलय पूरा हो चुका था और उन्हें संघ के विभिन्न राज्यों का अंग बनाया जा चुका था।

देश की इन विभिन्न रियासतों के एकीकरण और विलय का यह जटिल और समस्याग्रत कार्य भारत के तत्कालीन गृहमंत्री सरदार पटेल ने तीन वर्ष में बड़ी सूझ-बूझ, दूरदर्शिता और राजनीतिक कुशलता व दक्षता से पूरा कर लिया। अतः सरदार पटेल की तुलना यूरोप के लौहपुरूष बिस्मार्क से की जाती है।

3. राज्यों का पुर्नसंगठन एवं राज्य की सीमाओं का निर्धारण

अब कुछ ही भारतीय क्षेत्र ऐसे थे जो औपनिवेशिक शासन में थे। ये थे फ्राँस के अधीन पांडिचेरी, कराइकल, येनाम, माहे और चन्द्रनगर और पुर्तगाल के अधीन दादर और नगर हवेली, गोवा और दमन व दयू। 1954 तक, फ्राँस के भारतीय क्षेत्र अधीनस्थ भारत में शामिल हो चुके थे। 

1961 में गोवा की मुक्ति के साथ पुर्तगाल के अधिकार क्षेत्र भी भारत में शामिल हो गए और इसी के साथ औपनिवेशिक शासन से पूरे भारत की मुक्ति प्रक्रिया पूरी हो गई। स्वाधीनता के साथ भारतीय जनता के इतिहास का नया युग आया तथा एक नए और समृद्ध भारत के निर्माण का कार्य तेजी से आरंभ हुआ।

नए भारत का निर्माण - संविधान सभा ने स्वाधीन भारत के लिए एक संविधान और तैयार करने की जिम्मेदारी संभाली। 9 दिसंबर 1946 को उसकी पहली मीटिंग हुई। डॉ. भीमराव अंबेडकर की अध्यक्षता में प्रारूप समिति ने अपना काम 26 नवंबर, 1949 को पूरा किया। 

भारत का नया संविधान 26 जनवरी, 1950 को लागू किया गया और भारत को एक गणराज्य घोषित किया गया। हर वर्ष हम 15 अगस्त को स्वाधीनता दिवस और 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस मनाते हैं। अब भारत संपूर्ण प्रभुत्ता संपन्न लोकतंत्रात्मक गणराज्य कहलाने लगा।

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