लोकमत का क्या अर्थ है - what is the meaning of public opinion

लोकमत का क्या अर्थ है 

जनमत या लोकमत दो शब्दों से मिलकर बना है। जनमत अर्थात् जनता का मत। लेकिन सभी मत जनमत नहीं होते हैं। जो मत सार्वजनिक हित पर आधारित हो वही जनमत है। ऐसा मत भी जनमत है जो अल्पसंख्यकों का मत हो किन्तु बहुमत उससे सहमत हो।

इस प्रकार लोकमत वह मत है जिससे अल्पसंख्यक व बहुसंख्यक दोनों सहमत हो तथा वह लोक कल्याण की भावना पर आधारित हो।

परिभाषा - डॉ. बेनी प्रसाद अनुसार- वह मत लोकमत है जो जन कल्याण के भाव पर आधारित हो। 

लावेल के अनुसार – लोकमत का बहुमत व सर्वसम्मत होना आवश्यक नहीं। लोकमत सही राय पर नहीं विश्वास पर आधारित होना चाहिए।

प्रजातंत्र में लोकमत का महत्व 

यद्यपि अन्य शासन प्रणाली में लोकमत का महत्व होता है किन्तु लोकतंत्र में इसका सर्वाधिक महत्व है - क्योंकि प्रजातांत्रिक शासन व्यवस्था का मूलाधार लोकमत है। गेटिल लिखा है- लोकतांत्रिक शासन की सफलता जनमत की इस बात पर निर्भर करती है कि लोकमत सरकार के कार्यों व नीतियों को किस सीमा तक नियंत्रित करता है।

1. सरकार को बनाना व सरकार को पतन की ओर ले जाना लोकमत पर निर्भर करता है। क्योंकि वही दल सरकार बनाता है जिसे लोकमत समर्थन देता है। यदि सत्तारूढ़ दल लोकमत के अनुसार शासन करता है तो पुनः सत्ता प्राप्त करता है। यदि लोकमत की अवहेलना करता है तो उसका स्थान विरोधी दल ले लेते हैं। 

ई.बी. शुक्ल ने कहा हैलोकमत एक प्रबल सामाजिक शक्ति है जिसकी अवहेलना करने वाला दल अपने लिए संकट को आमंत्रित करता है । 

2. लोकमत के द्वारा सरकार अपने नीतियों व कार्यक्रमों को क्रियान्वित करती है तथा लोकमत सरकार को सार्वजनिक हित विरोधी कार्य करने से रोकती है जो भी कानून बनाए जाते हैं। उनका सीधा संबंध जनता की इच्छा से होता है।

3. लोकमत शासन की निरंकुशता पर नियंत्रण स्थापित करता है। यदि शासक वर्ग मनमानी व भ्रष्टाचार करता है तो लोकमत उस पर नियंत्रण लगाता है। लोकमत योग्य नेतृत्व को भी सामने लाता है।

4. लोकमत नागरिकों में राजनीतिक जागरूकता लाता है। यह जनता को अधिकार व कर्त्तव्यों के प्रति सजग रखता है तथा राष्ट्रीयता की भावना का विकास करता है। 

5. यह व्यवस्थापिका व कार्यपालिका का पथ-प्रदर्शक है। शासन के नवीन कार्यक्रम व योजनाओं के संचालन में सहयोगी बनाता है।

6. लोकमत सामाजिक जीवन को भी नियंत्रित रखता है तथा अनेक सामाजिक समस्याओं को सुलझाने में सहयोग देता है।

इस प्रकार हम देखते हैं कि लोकमत प्रजातंत्र के विकास में महत्वपूर्ण योगदान देता है। इसलिए डॉ. आशीर्वादम ने लिखा है- जागरूक व सचेत जनमत स्वस्थ प्रजातंत्र की पहली जरूरत है।

लोकमत का निर्माण 

लोकमत या जनमत का निर्माण स्वयं नहीं हो जाता, वरन् उसका निर्माण किया जाता है। जनमत के निर्माण तथा व्यक्त करने के निम्नांकित साधन है-

1. शिक्षण संस्थाएँ - शिक्षण संस्थाओं द्वारा बच्चों की विचारधाराओं पर बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है। साधारणतया यह देखा जाता है कि किसी देश के नेताओं या शासकों का ध्यान अपने देश की शिक्षा प्रणाली पर सबसे पहले जाता है। लोकमत को संगठित करने और व्यक्त करने का यह सर्वोत्तम साधन है। 

शिक्षण संस्थाएँ राष्ट्र के चरित्र निर्माण में सहायता प्रदान करती है तथा देश के भावी नागरिकों को तैयार करती है।

2. सार्वजनिक सभाएँ- सभाओं तथा व्याख्यानों द्वारा देश के बड़े-बड़े नेता जनता के सामने सार्वजनिक प्रश्नों पर अपना मत प्रकट करते हैं। इन सभाओं से सार्वजनिक अवस्थाओं को प्रकट करने तथा शासन के कार्यों की आलोचना करने का भी अवसर मिलता है। इस प्रकार लोकमत या जनमत के निर्माण करने तथा उसे व्यक्त करने में सभाएँ भी महत्वपूर्ण भाग लेती है।

3. समाचार पत्र तथा पत्र-पत्रिकाएँ - समाचार पत्र तरह-तरह की घटनाओं, समस्याओं और विचारों के बारे में जनता को सूचना प्रदान करने का कार्य करते हैं। साधारण रूप से समाचार पत्रों में सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और अंतर्राष्ट्रीय सूचनाओं के आधार पर ही जनसाधारण विचारों को बनाता है। 

समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में विभिन्न प्रकार के मत ज्ञात होते रहते हैं। इस प्रकार आधुनिक काल में समाचार पत्र राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय, आर्थिक, आध्यात्मिक सभी प्रकार की समस्याओं की जानकारी कराते हैं। 

लार्ड ब्राइस ने लिखा हैसमाचार पत्रों वाले प्रेस ने ही बड़े-बड़े देशों में प्रजातंत्र को सम्भव कर दिया है। समाचार पत्रों में सरकार की आलोचनाएँ भी छपती है। ये एक प्रकार से सरकार पर नियंत्रण भी रखते हैं। 

एक विद्वान का कहना है कि लोकमत निर्माण का प्रमुख साधन समाचार पत्र है। अच्छे समाचार पत्र लोकतंत्र के लिए ज्योति स्तम्भ का कार्य करते हैं। वे प्रजातंत्र के ग्रन्थ कहे जा सकते हैं।

परंतु समाचार पत्रों को पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त होनी चाहिए तथा उनकों भी निष्पक्ष समाचार जनता तक पहुँचाने चाहिए।

4. रडियो तथा सिनेमा- आजकल जनमत के संगठन में रेडियो और सिनेमा की भी प्रधानता है। इनका कार्य केवल मनोरंजन करना ही नहीं है वरन् वे जनमत का निर्माण भी करते हैं। और उसे व्यक्त भी करते हैं।

इसलिए इन्हें जनता के विचारों को किसी विशेषढाँचे में ढालने के अवसर मिल जाते हैं।

 5. धार्मिक संगठन तथा संस्थाएँ- आज भी भारत में लोकतंत्र के प्रचार और विकास में धार्मिक संस्थाओं का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। लोगों पर धर्म का प्रभाव आज भी जादू की तरह असर करता है। परंतु एक सही जनमत के निर्माण के लिए यह जरूरी है कि धार्मिक संस्थाएँ अपने संकुचित दृष्टिकोण को त्यागकर राजनीतिक प्रश्नों पर एक उदार दृष्टिकोण से विचार करें।

6. राजनीतिक दलों का योगदान - राजनीतिक दल भी सार्वजनिक प्रसार के साधन है। वे जनता में देश की समस्याओं और सरकार की नीति के बारे में विचार रखते हैं। इस प्रकार इन दलों द्वारा जनता में राजनीतिक शिक्षा का प्रचार होता है और एक प्रगतिशील जनमत का निर्माण हो जाता है। 

लोकमत का निर्माण करने में राजनीतिक दलों का बहुत बड़ा योगदान रहता है। ये दल एक प्रकार से निर्णायक भूमिका निभाते हैं। देश के अन्य साधन भी बहुत कुछ राजनीतिक दलों से संबंधित होते हैं। राजनीतिक दल स्थान-स्थान पर सभाएँ करते हैं, चुनाव लडते हैं, अपनी पत्रिकाएँ निकालते हैं और अपने विचारों का प्रचार करते हैं। 

राजनीतिक नेतागण भाषण तथा लेख छपवाकर जनमत को प्रभावित करते हैं। महात्मागाँधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, सुभाषचंद्र बोस, जयप्रकाश नारायण आदि नेताओं ने अपने भाषणों द्वारा भारतीय जनता के हृदयों को जीता और प्रबल लोकमत पैदा किया। 

प्रचार के साधनों के बढ़ने के साथ-साथ लोकमत के निर्माण में राजनीतिक दलों का भी भाग उतना ही बढ़ता जाता है। राजनीतिक दलों के सामने बड़े-बड़े संगठन बेकार साबित हो रहे हैं। दलों की आवाज जनता तक आसानी से पहुँच जाती है।

7. निर्वाचन तथा चुनाव- चुनाव के समय सभी राजनीतिक दल प्रचार साधनों को लेकर जनमत को अपने-अपने पक्ष में करने का प्रयास करते हैं। जनता राजनीतिक दलों की बातों को ध्यानपूर्वक सुनती है। वह इस क्षेत्र में बड़ी तेजी से काम करती है क्योंकि मत देने का निर्णय तुरंत करना पड़ता है। 

वाद-विवाद समाचार पत्रों तथा आकाशवाणी द्वारा साधारण जनता तक पहुँचाते हैं। व्यवस्थापिका सभाओं में सारे दलों के प्रतिनिधि होते हैं, जो प्रायः सभी प्रकार की विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते हैं। 

इस सभासदों के वाद-विवादों से लोगों को देश की समस्याओं के सभी पक्षों का ज्ञान हो जाता है और उन्हें उन समस्याओं पर अपना मत निर्धारित करने का सुअवसर प्राप्त होता है। देश के विभिन्न भागों के प्रतिनिधि वहाँ पर देश की विभिन्न समस्याओं के संबंध में लोकमत की अभिव्यक्ति करते हैं।

इस प्रकार उपर्युक्त साधनों द्वारा लोकमत का निर्माण और अभिव्यक्ति होती है।

लोकमत के बाधक तत्व

1. लोकमत में मुख्य बाधा अज्ञानता व अशिक्षा है। अशिक्षित व्यक्ति सरलता से बहकावे में आ जाते हैं तथा स्वस्थ जनमत का निर्माण नहीं हो पाता।

2. वर्गवाद व साम्प्रदायिकता, जातिवाद स्वस्थ जनमत निर्माण में बाधक है। 

3. साम्प्रदायिकता के आधार पर दलों का निर्माण तथा आदर्श संहिता का अभाव स्वस्थ लोकमत में बाधक है। 

स्वस्थ लोकमत निर्माण की शर्तें

1. जनता शिक्षित होना चाहिए तथा निर्धनता का अभाव होना आवश्यक है।

2. निष्पक्ष समाचार पत्र व शांतिपूर्ण वातावरण स्वस्थ जनमत की आवश्यक शर्त है।

3. स्वस्थ जनमत निर्माण के लिए स्वतंत्रता, समानता व लोकतंत्र की स्थापना भी आवश्यक है। 

4. भाषा व संस्कृति की एकता भी आवश्यक है।

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