मानसून की उत्पत्ति कैसे होती है - How does monsoon originate

मानसून शब्द का अर्थ - मौसम के अनुसार चलने वाली हवाएँ है। यह शब्द मूलरुप से अरबी भाषा के "मौसिम" शब्द से बना है। सर्वप्रथम अरब सागर में चलने वाली हवाओं के लिए इस शब्द का प्रयोग अरब के भूगोल वेत्ताओं ने किया था। ये हवाएँ छः महीने उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम तथा छः महीने भारत के दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्वी की ओर चलती हैं। इन्हें मानसून पवनें कहते हैं। मानसून पवनों की उत्पत्ति के संबंध में दो प्रकार की विचारधाराएँ हैं।

प्राचीन परम्परागत विचारधारा- यह विचारधारा तापीय अन्तर पर आधारित है, इसके अनुसार पवने बड़े पैमाने में जल समीर व थल समीर ही है जो ग्रीष्म ऋतु में जल भाग से थल भाग की और शीत ऋतु में थल से जल की ओर चला करती है। ग्रीष्मकाल में सम्पूर्ण एशिया के स्थल खंड वाला भाग हिन्द महासागर की तुलना में अधिक गर्म हो जाता है जिससे निम्न वायुदाब क्षेत्र विकसित हो जाते हैं जबकि महासागरों पर अपेक्षाकृत कम तापमान के कारण उच्च वायुदाब पाया जाता है।

मानसून की उत्पत्ति कैसे होती है

इन उच्च वायुदाब क्षेत्रों से निम्न वायुदाब क्षेत्रों की ओर अर्थात् जल से थल भाग की तरफ आर्द्रता से भरी हवाएँ चलती हैं और वर्षा करती हैं। शीत ऋतु में तापमान की दशाएँ विपरीत हो जाती है मध्य एशिया एवं भारत उपमहाद्वीप के उत्तरी पश्चिमी भाग में तापमान बहुत नीचे गिर जाता है जिससे यहाँ उच्च वायुदाब क्षेत्र विकसित हो जाता है। थल की अपेक्षा जल धीरे-धीरे गर्म व ठंडा होता है उस समय तक महासागर शीतल नहीं हो पाते हैं और उनका तापमान थल की अपेक्षा अधिक होता है जिससे वे निम्न वायुदाब क्षेत्र बन जाते हैं। शीत ऋतु में स्थल से जल की ओर हवाएँ चलने लगती है। ग्रीष्मकालीन हवाएँ दक्षिण पश्चिमी मानसून और शीतकालीन हवाएँ उत्तरपूर्वी मानसून कहलाती है।

आधुनिक विचारधाराएँ

फलान नामक विद्वान ने मानसून की तापीय उत्पत्ति का खण्डन कर गतिक उत्पत्ति की नवीन आधुनिक विचारधारा का प्रतिपादन किया है। जिसके अनुसार अभिनव मत में मानसूनी पवनों की उत्पत्ति मात्र वायुदाब तथा हवाओं की पेटियों के स्थानांतरण के कारण होती है। भूमध्य रेखा के पास व्यापारिक कटिबंधीय अभिसरण उत्पन्न होता है। Inter Tropical convergence - ITC जिसे अंत: उष्ण कटिबंधीय अभिसरण कहते हैं। वस्तुतः अन्तः उष्ण कटिबंधीय अभिसरण निम्न वायु दाब का क्षेत्र है जो उत्तर-पूर्वी और दक्षिण-पूर्वी व्यापारिक पवनों को एक-दूसरे से अलग करता है। ग्रीष्म ऋतु में सूर्य के उतरायण के समय खिसककर 30 उत्तरी अक्षांश तक विस्तृत हो जाते हैं।

अतः इन भागों में डोलड्रम की विषुवत रेखीय पछुआ हवाएँ स्थापित जाती हैं। जो कि ग्रीष्म ऋतु की दक्षिण पश्चिम मानसूनी हवाएँ होती हैं। इसके साथ अनेक वायुमण्डलीय तूफानी चक्रवातों की भी उत्पत्ति हो जाती है जो कि दक्षिणी पूर्वी मानसून की विशेषता है। दक्षिणी पश्चिमी मानसून की भाँति उत्तर पूर्वी मानसून (शीतकालीन) की उत्पत्ति भी दक्षिणी गोलार्द्ध में स्थित निम्न दाब के कारण नहीं होती है।

वास्तव में सूर्य की दक्षिणायन होने से वायुदाब की पेटियाँ दक्षिण की ओर खिसक जाती है, जिससे ये दक्षिणी पूर्वी एशिया से हट जाती हैं। परिणाम स्वरुप इन क्षेत्रों में उत्तरपूर्वी व्यापारिक हवाओं का स्वाभिक विस्तार हो जाता है इन्हें ही शीतकालीन मानसून कहते हैं।

अभिनव मत- सन् 1950 के बाद भारतीय मानसून की उत्पत्ति से संबंधित किए गए शोधकार्यों के फलस्वरुप यह जानकारी प्राप्त हुई कि भारतीय मानसून की उत्पत्ति तथा कार्य विधि निम्नानुसार है-

1. हिमालय के तथा तिब्बत के पठार की स्थिति यांत्रिक अवरोध के रूप में या उच्चतलीय ऊष्मा के स्रोत के रूप में है।

2. परिध्रुवीय भंवर, उत्तरी तथा दक्षिणी ध्रुवों के उत्तर उच्च तलीय अर्थात परिवर्तन मंडल में का चक्राकार संचार का निर्माण है।

3. उच्चतलीय (परिवर्तन मंडल में) जेट स्ट्रीम का संचालन तथा उसकी स्थिति।

मानसूनी पवनों की उत्पत्ति के कारक

1. थल और जल भाग के तापीय अन्तर की प्रकृति।

2. तिब्बत के पठार और हिमालय की उपस्थिति।

3. तिब्बत और हिमालय पर निर्मित सूर्य की विभिन्न दशाओं के कारण उच्च व निम्न वायुदाब की दशाएँ।

4. पछुआ हवा और जेट स्ट्रीम के मार्गो में परिवर्तन। 

5. भूमध्य रेखीय निम्नदाब (अगाध) पेटी का खिसकना। 

6. पश्चिमी विक्षोभ चक्रवात का उत्तर-पश्चिम क्षेत्र में प्रवेश करना। 

उपरोक्त सभी कारकों के सम्मिलित सहयोग तथा क्रियाओं से मानसूनी हवाओं की उत्पत्ति होती है। 

जेटस्ट्रीम - जेट स्ट्रीम क्षोभ मंडल के ऊपरी भाग में बहने वाली वायुधारा है। पश्चिमी जेट प्रवाह पश्चिम से पूर्व को प्रवाहित होता है इसके मार्ग में उच्च तिब्बत का पठार और हिमालय पर्वत पड़ते हैं जिससे यह दो शाखाओं में विभाजित हो जाता है। उत्तरी जेट प्रवाह यह हिमालय के उत्तर और दक्षिण में बहता हैं।

दक्षिण जेट प्रवाह - यह देश की जलवायु को प्रभावित करता है। वर्षा कराने वाली शीतकालीन चक्रवात इन्हीं के द्वारा लाए जाते हैं।

1. शीतकालीन उत्तर-पूर्वी मानसून

शीत ऋतु - भारतीय शीत ऋतु की प्रमुख विशेषता तापमान और आर्द्रता का काम पाया जाना है। स्वच्छ आकाश, निम्न तापमान, कम आर्द्रता, शीतल मंद समीर तथा वर्षा रहित दिन इस ऋतु की विशेषता है। यह ऋतु सुहावनी और आनंदप्रद होती है यह ऋतु मध्य नवम्बर से प्रारंभ हो जाती है और फरवरी तक रहती है जनवरी इसका सबसे ठंडा महीना होता है।

विशेषताएँ

1. तापमान - शीत ऋतु में सूर्य की किरणें दक्षिणी गोलार्द्ध में सीधी पड़ती हैं तथा उत्तरी गोलार्द्ध में तिरछी जिससे उत्तरी गोलार्द्ध का तापमान कम होता है दिन छोटे होते हैं। उत्तर भारत के अधिकांश क्षेत्र में दैनिक तापमान 21° से.ग्रे. से कम रहता है, रात में यह कहीं-कहीं हिमांक तक चला जाता है वहीं दक्षिणी भारत समुद्र तटीय क्षेत्र में समुद्र के समकारी प्रभाव के कारण सम तापमान बना रहता है। चेन्नई और कोचीन का जनवरी में तापमान क्रमशः 24° और 25° से.ग्रे. रहता है देश के भीतरी भागों में दैनिक तापान्तर अधिक पाया जाता है।

2. वायुदाब एवं हवाएँ- सूर्य की दक्षिणायन स्थिति के कारण भारतीय उपमहाद्वीप में उच्च वायुदाब का केन्द्र पेशावर के आसपास बन जाता है। दक्षिण के पठार पर अपेक्षाकृत वायुदाब कम होता है उत्तर भारत के मैदानी भाग में उच्च वायुदाब का क्षेत्र होने के कारण यहाँ से हिन्द महासागर की ओर उत्तर-पूर्व तथा दक्षिण-पश्चिम की ओर हवाएँ चलती है।

3. वर्षा - हवाएँ स्थल से जल की ओर चलती है इसलिए शुष्क होती है और वर्षा नहीं करती है किन्तु असम, बंगाल क्षेत्र से चलने वाली हवाओं के रास्ते में बंगाल की खाड़ी पड़ती है। ये भाप ग्रहण कर लेती है और जैसे ही तमिलनाडू पर खाड़ी पार करके आती है पूर्वी घाट की पहाड़ियों से टकराकर वर्षा करती है, से भारत में जो चावल की फसल के लिए बहुत लाभप्रद होती है। 

इस तरह शीत ऋतु में उत्तरपूर्वी मानसून केवल तमिलनाडू में वर्षा होती है उधर भारत के उत्तर-पश्चिम क्षेत्र में भूमध्य सागर से उठने वाले चक्रवात बनते हैं जो पछुआ हवाओं के सहारे यहाँ तक पहुँचते हैं और कश्मीर, पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, उत्तरी राजस्थान, झारखंड और बिहार में वर्षा कराते हैं यद्यपि यह वर्षा नाममात्र की होती है परंतु रबी फसल को इससे लाभ होता है।

शुष्क ग्रीष्म ऋतु- यह ऋतु भारत में मध्यमार्च से जून तक होती हैं मानसूनी ऋतुएँ जिसमें तापमान उच्च , आकाश स्वच्छ और वायु शुष्क होती है। 21 मार्च को सूर्य भूमध्य रेखा पर लंबवत चमकता है तत्पश्चात् सूर्य उत्तरोतर कर्क रेखा की ओर अग्रसर होता रहता है और दिन भी बड़े होते जाते हैं जिससे भारत में गर्मी का मौसम होता है ।

विशेषताएँ

1. तापमान- 21 मार्च के बाद सूर्य के कर्क रेखा की ओर अग्रसर होने के कारण सम्पूर्ण भारत में तापमान बढ़ने लगता है। मार्च में सर्वाधिक तापमान दक्षिण भारत में 43° से.ग्रे. रहता है जबकि अप्रैल में गुजरात और मध्यप्रदेश में 43° से.ग्रे. तापमान तक पहुँच जाता है। 

मई के मध्य तक उत्तर भारत में तापमान बढ़ता है। उत्तर-पश्चिम भारत में तापमान 45° से.ग्रे. से भी अधिक हो जाता है, यह स्थिति जून तक रहती है जबकि वर्षाकालीन हवाएँ यहाँ नहीं पहुँचती। प्रायद्वीप भारत में मई के अंत में तापमान कम होने लगता है। दक्षिणी भारत में समुद्र के समकारी प्रभाव के कारण तापमान 32° से.ग्रे. के आसपास होता है। 

2. वायुदाब एवं पवनें- सम्पूर्ण देश में तापमान बढ़ने के साथ वायुदाब में कमी होने लगती है, थार मरुस्थल के अतिरिक्त छोटा नागपुर के पठारी क्षेत्र में भी निम्न वायुदाब के केन्द्र निर्मित हो जाते हैं, मार्च से मई तक वायु की दिशा एवं मार्ग में महत्वपूर्ण परिवर्तन होते हैं। शीतकालीन मानसून हवाओं की दशाएँ भी परिवर्तित हो जाती है। दिन के समय पछुआ हवाएँ तीव्रगति से चलती है जो बहुत गर्म और शुष्क होती है। इन हवाओं को स्थानीय भाषा में लू कहा जाता है।

3. वर्षा - इस ऋतु में सम्पूर्ण भारत में वर्षा नहीं के बराबर होती है। तापमान की अधिकता के कारण हवाओं की संवहन धाराएँ चलने लगती है, पंजाब और हरियाणा में इन्हें धूल के तूफान, उत्तर प्रदेश में आँधियाँ और पश्चिम बंगाल में काल- बैशाखी या नाखेस्तर कहते हैं। इनकी उत्पत्ति छोटा नागपुर के पठार से होती है। पछुआ हवाओं से पं. बंगाल और उड़ीसा में 10 से.मी. तक वर्षा हो जाती है। दक्षिण भारत में इस ऋतु में होने वाली वर्षा को आम्रवर्षा कहते हैं तथा कहवा उत्पन्न करने वाले क्षेत्रों में फूलों वाली बौछार कहते हैं ।

2. ग्रीष्म कालीन / दक्षिण-पश्चिमी

1. वर्षा ऋतु

वर्षा ऋतु 15 जून से 15 सितम्बर तक रहती है। दक्षिणी-पश्चिमी मानसून भारत में जून से मध्य सितंबर तक वर्षा करने में प्रभावकारी रहता है।

विशेषताएँ

1. तापमान - 15 जून के बाद भारत के तापमान में 3° से 6° से.ग्रे. तक कमी आती है। लंबे समय तक वर्षा नहीं होती है तो बीच-बीच में तापमान बढ़ता जाता है। अगस्त माह में तापमान में और अधिक कमी आती है। थार के मरूस्थल का तापमान लगभग 38° से.ग्रे. तक रहता है। शेष भारत में औसत तापमान 30° से 32° से.ग्रे. के मध्य रहता है।

2. वायुदाब एवं हवाएँ - मई और जून के महीने में भारत अत्यधिक गर्म हो जाता है जिससे उत्तर–पश्चिमी मैदानी भाग में न्यून वायुदाब का क्षेत्र स्थापित हो जाता है तथा हिन्द महासागर पर अपेक्षाकृत उच्च वायुदाब रहता है। अतः हवाएँ समुद्र से स्थल की ओर चलने लगती है। 

भूमध्य रेखा पार करने पर फैरल के नियमानुसार हवाएँ दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व दिशा में चलने लगती है। समुद्र से आने के कारण ये भाप भरी होती है ये वर्षा वाहिनी हवाएँ तीव्र गति से चलती है। इनकी औसत गति 30 कि.मी. प्रति घंटा है। उत्तर-पश्चिम भागों को छोड़कर शेष भागों में यह भाप वर्षा आरंभ कर देती है।

3. वर्षा - जून के प्रारम्भ में मानसूनी हवाओं के साथ बादलों का प्रचंड गर्जन और बिजली चमकना शुरु हो जाता है और तीव्र वर्षा शुरु हो जाती है। इसे मानसून का फटना या टूटना कहा जाता है यह आंतरिक भागों में जुलाई तक पहुँच जाता है जिससे तापमान में काफी गिरावट आ जाती है, चूँकि यह हवाएँ दक्षिण–पश्चिम से आती है इसलिए इन्हें दक्षिणी-पश्चिमी मानसून कहते हैं। यह भारत के दक्षिणी प्रायद्वीप में दो भागों में विभक्त हो जाती है।

1. अरब सागरीय मानसून- अरब सागर से होते हुए हवाओं का एक हिस्सा भारत के पश्चिम तट में प्रवेश करता है, जहाँ पश्चिमी घाट पर्वत से टकराकर पश्चिमी मैदान में पर्याप्त वर्षा कराती है और पूर्वी ढलानों तक आते-आते इनमें वर्षा कराने की क्षमता काफी कम हो जाती है। इसी कारण पूना- मुम्बई में पर्याप्त अंतर होता है। आगे यह पूर्वी महाराष्ट्र एवं मध्यप्रदेश मे सामानय वर्षा करते हुए गंगा के मैदान में प्रवेश करती है और बंगाल की खाड़ी वाली मानसून से मिल जाती है।

अरब सागरीय मानसून की शाखा का दूसरा भाग खम्भात की खाड़ी और कच्छ की खाड़ी से होता हुआ गुजरात, सौराष्ट्र पहुँचता है। यहाँ से पश्चिमी राजस्थान और अरावली पर्वत श्रेणियों के समानांतर होकर आगे यह पंजाब और हरियाणा पहुँचकर अंत में बंगाल की खाड़ी से मिलती है और दोनों तरफ से मिलकर यह हिमालय के पश्चिमी भागों में वर्षा कराती है।

2. बंगाल की खाड़ी वाली मानसून- इनसे भारत के अधिकांश भागों में वर्षा होती है। यह शाखा बंगाल की खाड़ी से चलकर म्यांमार (बर्मा) की पहाड़ियों से टकराकर पर्वत तटीय मैदानों में भारी वर्षा कराती है। इसकी एक शाखा गंगा के डेल्टा से होकर मेघालय में गारो और खासी पहाड़ियों से टकराती है और एकदम 15,000 मीटर की ऊँचाई तक उठ जाती है। वहीं पहाड़ियों के दक्षिण में मासिनराम स्थित है जो भारत का सर्वाधिक वर्षा वाला स्थान है। इस पहाड़ी के बाद मानसून दो हिस्सों में विभक्त हो जाती है।

पहली शाखा - उत्तर पश्चिम की ओर हिमालय की तलहटी के सहारे चलती है।

दूसरी शाखा - उत्तर पूर्व से असम की ओर बढ़ती है किन्तु असम में पर्वतीय भाग अधिक ऊँचे नहीं होने के कारण यहाँ वर्षा बहुत कम होती है।

इस शाखा की मुख्य विशेषता यह है कि जैसे-जैसे यह पश्चिम की ओर बढ़ती है वैसे-वैसे वर्षा कम होती जाती है। इसके द्वारा कोलकाता में 175, पटना में 117, लखनऊ में 101, दिल्ली में 65 और बिहार में 43 से.मी. वर्षा होती है।

2. शरद ऋतु

ग्रीष्म कालीन मानसून और शीतकालीन मानसून के मध्य मानसून के परिवर्तन का काल शरद ऋतु या मानसून प्रत्यावर्तन काल होता है। यह अवधि 15 सितंबर से 15 दिसंबर तक होती है जब मानसून वापस होने लगता है। इस ऋतु में दिन का तापमान अधिक होता है किन्तु रातें सुखद होती है।

विशेषताएँ

1. तापमान - मानसून के उत्तरी भाग से वापस होने के कारण वहाँ का तापमान तेजी से गिरने लगता है। अधिकतम तापमान 30° से 35° से.ग्रे. के लगभग होता है। जबकि न्यूनतम 19° से. ग्रे । पहाड़ी भागों में तो तापमान शून्य से भी कम हो जाता है।

2. वायुदाब और हवाएँ - अक्टूबर माह में सूर्य दक्षिण गोलार्द्ध में पहुँच जाता है जिससे पश्चिमी भारत में बना हुआ निम्न वायुदाब का क्षेत्र समाप्त होने लगता है और बंगाल की खाड़ी की ओर बढ़ता जाता है। मानसूनी हवाएँ इसका अनुसरण करती है किन्तु इनकी वापस जाने की गति धीमी होती है ।

3. वर्षा- लौटती हुई मानसूनी हवाओं से प्रायः चक्रवात या स्थानीय तूफान आते हैं किन्तु वर्षा कम होती है। लौटती हुई मानसूनी हवाएँ बंगाल की खाड़ी पार करते समय पर्याप्त आर्द्रता ग्रहण कर लेती है। जिससे अक्टूबर-नवंबर महीनों में तमिलनाडु तट पर 25 से 50 सेमी वर्षा कराती है।

भारत में वर्षा का सामान्य वितरण तथा विशेषताएँ

भारत में वर्षा का वितरण असमान है। थार मरुस्थल में 15 से.मी. से कम वर्षा होती है तो मॉसिन राम (चेरापूँजी) में विश्व की सर्वाधिक वर्षा 1080 सेमी होती है। वर्षा के इस प्रादेशिक अंतर के कारण वार्षिक वर्षा की प्राप्ति के आधार पर इसे चार भागों में विभाजित किया जाता है।

1. अत्यधिक वर्षा वाले क्षेत्र - इसके अंतर्गत वे क्षेत्र आते हैं जहाँ 200 से.मी. या इससे भी अधिक वार्षिक वर्षा होती है। इसमें पश्चिमी तट के कोंकण मलाबार दक्षिण किनारा क्षेत्र हिमालय की तलहटी, उत्तरप्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल के भाग, मेघालय, असम, नागालैण्ड, मिजोरम, अरूणाचल, मणिपुर और त्रिपुरा आते हैं। रवासी तथा जयंति के कुछ पहाड़ी भागों में 1,000 से.मी. से भी अधिक वर्षा होती है। मासिनराम तथा निकटवर्ती क्षेत्रों में औसत वार्षिक वर्षा 1080 से.मी. तक है।

2. अधिक वर्षा वाले क्षेत्र - इन क्षेत्रों में 100 से 200 से.मी. औसत वार्षिक वर्षा होती है। 100 से.मी. वार्षिक वर्षा की समवृष्टि रेखा गुजरात के तट के दक्षिण की ओर पश्चिमी घाट के समानांतर कन्याकुमारी तक जाती है इस रेखा के पश्चिम में 100 सेमी से 200 से.मी. तक तथा पूर्व के प्रायद्वीपीय प्रदेशों में 60 से.मी. से कम वर्षा होती है। अधिक वर्षा वाले क्षेत्र पश्चिमी घाट के पूर्वोत्तर ढाल, पश्चिम बंगाल के दक्षिण–पश्चिमी भाग, उड़ीसा, बिहार, दक्षिण-पूर्वी उत्तर प्रदेश तथा हिमालय की तराई की संकरी पेटी शामिल है।

3. साधारण वर्षा वाले क्षेत्र - इन क्षेत्रों में औसत वर्षा 50 सेमी से 100 सेमी तक होती है। इनमें दक्कन का पठारी भाग, गुजरात, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तरी व दक्षिणी आन्ध्रप्रदेश, कर्नाटक, पूर्वी राजस्थान, दक्षिणी पंजाब, हरियाणा एवं दक्षिणी उत्तर प्रदेश शामिल है।

4. न्यून वर्षा वाले क्षेत्र - इन क्षेत्रों में 50 सेमी से भी कम वर्षा होती है। इनके अंतर्गत राजस्थान का अधिकांश भाग, हरियाणा व उड़ीसा के कुछ भाग, तमिलनाडु के रायल सीमा क्षेत्र आते हैं। राजस्थान के उत्तर-पश्चिमी भाग थार मरुस्थल में तो कहीं-कहीं 15 सेमी से भी कम वर्षा होती है ।

मानसूनी वर्षा की विशेषताएँ

1. असमान वितरण- ग्रीष्मकालीन मानसून से देश की कुल वर्षा का 75 प्रतिशत तथा लौटती मानसून द्वारा (अक्टूबर-दिसंबर) 13 प्रतिशत शीतकालीन (दिसंबर - फरवरी) मानसून द्वारा 2 प्रतिशत एवं पूर्व मानसून काल (मार्च-मई) में 10 प्रतिशत वर्षा होती है।

2. अनियमित वर्षा- वर्षा ऋतु में वर्षा लगातार नहीं होती है वरन बीच-बीच में वर्षा विहीन काल भी होता है। वर्षा अनियमित और अनिश्चित होती है। लंबे समय तक वर्षा न होने पर कई बार फसलों की क्षति भी होती है।

3. अनिश्चित वर्षा- भारत में वर्षा अनिश्चित भी होती है। कभी समय से पहले कभी समय पर और कभी बहुत देर से आरंभ होती है। इसकी अवधि कभी बहुत छोटी तो कभी लंबी और उपयुक्त भी होती है। 

4. पर्वतीय वर्षा- भारत की वर्षा पर्वतीय वर्षा है । पर्वतों के अनुकूल ढलानों पर पर्याप्त वर्षा तथा विपरीत ढलानों परवृष्टि छाया वाले क्षेत्रों में बहुत कम वर्षा होती है।

5. अनियंत्रित वर्षा- भारत में अधिकांशतः वर्षा मूसलाधार होती है जिससे वर्षा का अधिकांश जल व्यर्थ ही बह जाता है।

6. वर्षा का दुष्प्रभाव - भारत में मानसूनी वर्षा से कहीं सूखे के कारण अकाल तो कहीं पर बाढ़ों से तबाही आ जाती है।

मौसम और जलवायु का मानव जीवन पर प्रभाव

भौगोलिक पर्यावरण के समस्त कारकों में जलवायु सबसे महत्वपूर्ण कारक है। जो मानव जीवन के संपूर्ण पक्षों को प्रभावित करता है। भारत की जलवायु यहाँ के निवासियों पर निम्नांकित प्रभाव डालती है-

1. भारत एक कृषि प्रधान देश है। लोगों का प्रमुख कार्य कृषि है जो पूर्णतः जलवायु के तत्वों- तापमान, वर्षा पर निर्भर है। तापमान और वर्षा के अनुरूप ही देश के भिन्न-भिन्न भागों में भिन्न-भिन्न प्रकार की फसलें उगाई जाती है। जैसे— अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में चावल, मध्यम वर्षा वाले क्षेत्रों में गेहूँ तथा न्यून वर्षा वाले क्षेत्रों में मोटे अनाज ही उत्पन्न किए जाते हैं।

2. जलवायु का देश में जनसंख्या के वितरण एवं घनत्व पर भी स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता है। जिन क्षेत्रों में अनुकूल जलवायु पाई जाती है। वहाँ सघन जनसंख्या निवास करती है तथा प्रतिकूल जलवायु के क्षेत्रों में विरल जनसंख्या निवास करती है। 

उदाहरणार्थ- गंगा घाटी तथा समुद्री तटीय मैदानों में अच्छी जलवायु के कारण अधिक जनसंख्या होती है तो पश्चिमी राजस्थान और थार मरुस्थल के उष्ण व शुष्क जलवायु के कारण जनसंख्या न के बराबर होती है।

3. मनुष्य के आर्थिक क्रियाकलाप - शिकार करना, मछली पकड़ना, लकड़ी काटना, पशुपालन, कृषि, उद्योग व्यापार सभी जलवायु द्वारा नियंत्रित होते हैं, मानव कहाँ पर कृषि करेगा, कहाँ पर शिकार करेगा, कहाँ वनोद्योग सभी जलवायु पर ही निर्भर होते हैं।

4. उद्योग धंधों पर भी जलवायु का प्रभाव पड़ता है, हिमालय पर्वत के तराई प्रदेश में वनोद्योग, राजस्थान में पशुचारण, मध्यप्रदेश में बीड़ी उद्योग एवं असम व पश्चिम बंगाल में जूट उद्योग का विकास इन प्रदेश की जलवायु का ही प्रतिफल है।

5. परिवहन तथा व्यापार पर भी जलवायु का गहरा प्रभाव पड़ता है, आँधी, तूफान, वर्षा, कोहरा आदि का सड़क, रेल, वायु तथा जल परिवहन पर प्रभाव पड़ता है। परिवहन में व्यवधान पड़ने से व्यापार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

6. जल-शक्ति, पवन ऊर्जा, सौर ऊर्जा आदि का उत्पादन भी जलवायु से प्रभावित होता है। 

7. जलवायु का मानव की कार्यक्षमता पर भी गहरा प्रभाव पड़ता है, ग्रीष्म ऋतु से गर्मी से थकान जल्दी होती है।

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि जलवायु का मानव जीव के संपूर्ण क्षेत्रों पर गहरा प्रभाव पड़ता है।

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