पुष्पक्रम किसे कहते हैं - what is inflorescence called

Post Date : 03 October 2022

पुष्प प्ररोह का महत्वपूर्ण भाग है, जो प्रजनन में भाग लेता है। यह एक विशेष प्रकार की प्ररोह कलिका से विकसित होता है, जिसे पुष्पकलिका कहते हैं। ये पुष्प कलिकाएँ कुछ विशेष प्रकार की पत्तियों के कक्ष या प्ररोह के शीर्ष पर विकसित होती हैं। 

वास्तव में पौधे के प्ररोह के पुष्पीय भाग की पत्तियाँ क्रमवार छोटी होती चली जाती हैं तथा इनका रंग भी समाप्त होता जाता है, इन्हीं रूपान्तरित पत्तियों को जिनके कक्ष से पुष्प निकलता है, सहपत्र कहते हैं। 

जिन पुष्पों के आधार पर सहपत्र पाये जाते हैं, उन्हें सहपत्री तथा जिनके आधार पर सहपत्र नहीं पाये जाते, उन्हें असहपत्री कहते हैं कभी-कभी सहपत्र एवं पुष्प वृन्त के मध्य में भी कुछ छोटे-छोटे सहपत्र पाये जाते हैं, जिन्हें सहपत्रिकाएँ कहते हैं। 

प्ररोह का वह भाग जिस पर पुष्प लगे होते हैं पुष्पावली वृन्त कहलाता है। इस पुष्पावली वृन्त पर पुष्प सीधे या पुष्प वृन्त द्वारा जुड़े रहते हैं। पुष्पावली वृन्त पर पुष्पों के लगने के क्रम को पुष्पक्रम कहते हैं। 

पुष्पावली वृन्त से पुष्प एकल या समूहों में उत्पन्न होते हैं। एकल रूप में लगे (या विकसित) होने पर इनमें क्रम अर्थात पुष्पक्रम का सवाल ही पैदा नहीं होता। जब एकल पुष्प पुष्पावली वृन्त (तना) के शीर्ष पर उगता है, तब इसे एकल अन्तस्थ कहते हैं। 

जैसे— नाइजेला, पोस्त इत्यादि, लेकिन जब एकल पुष्प किसी पत्ती के कक्ष से विकसित होता (या लगा होता) है, तब इसे एकल कक्षस्थ कहते हैं। जैसे- गुड़हल, नास्टर्शियम।

पुष्पावली वृन्त पर पुष्पों के लगने या विकसित होने के क्रम को पुष्पक्रम कहते हैं, लेकिन सामान्य रूप में प्ररोह पर ही पुष्पों के लगने के क्रम को पुष्पक्रम कह दिया जाता है। 

पुष्पक्रम की स्थिति में पौधे के प्ररोह पर एक साथ समूह में कई पुष्प लगे होते हैं, जो पौधे के लिए लाभदायक होता है। पुष्प के समूह में लगे होने का निम्नलिखित लाभ पौधे को प्राप्त होता है

1. पौधों में बीज बहुत अधिक मात्रा में उत्पादित होते हैं, जिससे उत्पादन बढ़ता है। 

2. समूह में होने पर पुष्प अधिक आकर्षक हो जाता हैं, जिससे ये कीटों तथा जन्तुओं को अपनी ओर आकर्षित करते हैं, फलत: पर-परागत की संभावना बढ़ जाती है।

3. एक साथ बहुत से मादा पुष्पों में सरलता से परागण हो जाता है। 

4. पर- परागण की संभावना बढ़ने से संकरण के ज्यादा अवसर प्राप्त होते हैं, जिससे नवीन गुण वाले पादपों के उत्पादन की संभावना बढ़ जाती है।

5. कम परागकण अधिक पुष्पों को परागित कर सकते हैं।

पुष्पक्रम के प्रकार  

पुष्पीय पादपों में निम्नलिखित प्रकार के पुष्पक्रम पाये जाते हैं 1. सरल पुष्पक्रम 2. संयुक्त पुष्पक्रम 3. विशिष्ट पुष्पक्रम 4. मिश्रित पुष्पक्रम।

 1. सरल पुष्पक्रम 

सरल पुष्पक्रम वह पुष्पक्रम हैं जिसमें पादप पुष्प सीधे प्ररोह के मुख्य अक्ष से जुड़ा होता है। यह पुष्पक्रम दो प्रकार का होता है- 

  1. अनिश्चितया असीमाक्ष 
  2. निश्चित या ससीमाक्ष।

अनिश्चितया असीमाक्ष पुष्पक्रम 

वह पुष्पक्रम है, जिसके पुष्पावली वृन्त या मुख्य अक्ष की अग्रस्थ कलिका हमेशा बनी रहती है और अपने नीचे नये पुष्पों को जन्म देती रहती है। इस पुष्पक्रम में निम्नलिखित गुण पाये जाते हैं।

  • पुष्पावली वृन्त की वृद्धि की सीमा नहीं होती, क्योंकि इनकी अग्रस्थ कलिका पुष्प का निर्माण नहीं करती, इसलिए इसे अनिश्चित पुष्पक्रम कहा जाता है।
  • नीचे के पुष्प प्रौढ़ तथा बड़े एवं ऊपर के पुष्प कम उम्र के तथा छोटे होते हैं, इस प्रकार का विन्यास अग्राभिवर्धी क्रम कहलाता है।
  • ऊपर से देखने पर पुष्पों के विकास का क्रम किनारे से भीतर की ओर होता है, ऐसे क्रम को केन्द्राभिसारी क्रम कहते हैं।

पुष्पावली वृन्त (रैचिस) के स्वभाव और पुष्प के वृत्ती या अवृन्ती होने के आधार पर यह पुष्पक्रम निम्न प्रकार का हो सकता है।

1. जिनकी रैचिस लम्बी होती है 

(a) प्रारूपी असीमाक्ष – इस पुष्पक्रम में पुष्पावली वृन्त लम्बा होता है, जिस पर संवृन्ती पुष्प अग्रभिसारी क्रम में लगे रहते हैं अर्थात् निचला पुष्प सबसे पहले और ऊपरी पुष्प सबसे पीछे खिलता है; जैसे—सरसों, गोल्डमोहर, मूली, क्रोटोलेरिया लाइनेरिया इत्यादि।

कभी-कभी प्रारूपी रेसीम का अक्ष शाखित हो जाता है, इस प्रकार के रेसीम को संयुक्त रेसीम या पेनिकल कहते हैं। जैसे-गुलमोहर।

 (b) शूंकी – जब पुष्पक्रम प्रारूपी असीमाक्ष के ही समान हो, लेकिन संवृत्ती के स्थान पर अक्ष से अवृन्ती पुष्प जुड़े हों तब इस प्रकार के पुष्पक्रम को शूकी पुष्पक्रम कहते हैं। जैसे–चौलाई, लटजीरा, गुलबेरा, रजनीगन्धा इत्यादि।

सामान्यतः शूकी पुष्पक्रम का मुख्य अक्ष भी शाखान्वित हो जाता है, जिस पर अवृत्ती पुष्प अग्राभिसारी क्रम से लगे होते हैं, तब इस पुष्पक्रम को संयुक्त शूकी कहते हैं। जैसे- पालक, चौलाई।

(c) अनुशूकी - वास्तव ये छोटे-छोटे शूकी पुष्पक्रम हैं, जिनमें कभी-कभी एक और कभी-कभी कई पुष्प लगे होते हैं। प्रत्येक स्पाइकलेट में तीन-तीन तुषसहपत्र होते हैं, जिनमें से नीचे के दो में पुष्पों का अभाव होता है। 

जबकि तीसरे ग्लूम्स में पुष्प होता है इसे लेमा कहते हैं। इसमें लेमा के विपरीत एक सहपत्रिका पायी जाती है, जिसे पेलिया कहते हैं। लेमा तथा पेलिया के बीच में पुष्प स्थित होता है। जैसे- गेहूँ, बाँस, धान तथा घास कुल के अन्य पुष्प।

(d) स्थूल मंजरी - यह पुष्पक्रम शूकी का हो एक रूपान्तरण है, जिसमें पुष्पावली वृन्त मांसल तथा मोटा हो जाता है, जिस पर एक लिंगी अवृन्ती पुष्प लगे होते हैं। पुष्पावली वृन्त के निचले भाग पर मादा पुष्प, बीच में बन्ध्य पुष्प तथा ऊपरी भाग से नर पुष्प लगे होते हैं। 

पुष्पावली वृन्त का ऊपरी भाग पुष्पहीन होता है जिसे एपेण्डिक्स कहते हैं। सम्पूर्ण पुष्पक्रम एक बड़े रंगीन मांसल सहपत्र से ढका रहता है, जिसे स्पेथ (Spathe) कहते हैं। स्पेथ पुष्पों की रक्षा करने के साथ कीट परागण के लिए कीटों को आकर्षित करता है; जैसे- अरबी, जिमीकन्द (सूरन) केला, नारियल (संयुक्त) एरम।

अतिन नारियल के स्पैडिक्स में मुख्य अक्ष शाखित होता है, इस प्रकार के पुष्पक्रम को संयुक्त स्पैडिक्स कहते हैं।

(e) मंजरी- यह पुष्पक्रम भी शूकी के समान ही होता है, लेकिन यह नीचे की ओर लटका रहता है। इसमें एकलिंगी अवृन्ती पुष्प इतने पास-पास लगे होते हैं कि पूरा पुष्पक्रम एक इकाई के रूप में दिखाई देता है। जैसे- शहतूत, आक, भूर्ज। 

(2) जिनकी रैंचिस छोटी होती है

(f) समशिख – यह असीमाक्ष पुष्पक्रम है, जिसका मुख्य अक्ष छोटा होता है जिस पर संवृन्ती पुष्प लगे होते हैं। नीचे के पुष्प पुराने तथा लम्बे पुष्पवृन्त वाले होते हैं Post ऊपर के पुष्प नये तथा छोटे पुष्पवृन्तों वाले होते हैं। 

जिसके कारण सभी पुष्प एक ही ऊँचाई में स्थित प्रतीत होते हैं। जैसे-कैण्डीटफ्ट, कैशिया सोफेरा, प्रूनस सिरेसस, लेन्टाना आदि।

 (3) जिनकी रैचिस निरुद्ध होती है 

(g) छत्रक - यह असीमाक्ष पुष्पक्रम है, जिसमें मुख्य अक्ष एकदम छोटा, एक बिन्दु के रूप में पाया जाता है जिस पर समान लम्बाई के पुष्प इस प्रकार निकलते हैं कि ये छाते का रूप ले लेते हैं। इसमें पुराने तथा बड़े पुष्प परिधि की ओर तथा नये व छोटे पुष्प केन्द्र की ओर लगे होते हैं। जैसे- ब्राह्मी।

कुछ छत्रक पुष्पों में मुख्य अक्ष के ऊपरी सिरे से कई शाखाएँ उत्पन्न हो जाती हैं, इस प्रकार बनी प्रत्येक उपशाखा के शीर्ष पर एक छत्रक पुष्पक्रम पाया जाता है, इस प्रकार के पुष्पक्रम को संयुक्त छत्रक कहते हैं। जैसे – सौंफ, गाजर, धनिया तथा धनिया कुल के शेष सदस्य।

(h) समुण्ड पुष्पक्रम - वह पुष्पक्रम है जिसमें मुख्य अक्ष छोटा निरुद्ध (Supressed) रूप में एक बिन्दु जैसा होता है, जिस पर अवृन्ती पुष्प विकसित होकर गेंदनुमा पुष्प विन्यास बनाते हैं। जैसे- बबूल, लाजवन्ती, कदम्ब। 

(4) जिनकी रैचिस - चपटी होती है 

 (i) मुण्डक  – वह पुष्पक्रम है, जिसमें मुख्य अक्ष का शीर्ष अत्यन्त छोटा तथा चपटा होकर नतोदर या उन्नतोदर रूप ग्रहण कर लेता है, जिसे रिसेप्टेकिल कहते हैं । इस रिसेप्टेकिल पर अनेक अवृन्ती पुष्प इस प्रकार लगे होते हैं कि पूरा पुष्पक्रम एक ही पुष्प दिखाई देता है।

इन पुष्पों को पुष्पक तथा पूरे पुष्पगुच्छ को मुण्डक कहते हैं। मुण्डक की परिधि पर पाये जाने वाले पुष्पक पहले तथा केन्द्र के पुष्पक बाद में खिलते हैं। जब मुण्डक के सभी पुष्पक एकसमान होते हैं, तब इसे समपुष्पकीय मुण्डक कहते हैं। लेकिन जब ये दो भिन्न प्रकार के होते हैं, तब इन्हें विषमपुष्पकीय मुण्डक कहते हैं। 

जैसे- गेंदा, सूरजमुखी, डहेलिया । विषमपुष्पकीय मुण्डक की परिधि के पुष्पकों को रश्मिपुष्पक तथा केन्द्र के पुष्पकों को बिम्ब पुष्पक कहते हैं। सामान्यतः रश्मिपुष्पक स्त्रीकेसर युक्त या नपुंसक जिह्वीय तथा बिम्ब पुष्पक उभयलिंगी एवं नलिकाकार होते हैं। 

रिसेप्टेकिल के नीचे सहपत्र, सहपत्रचक्र के रूप में पाये जाते हैं । इस प्रकार का पुष्पक्रम कम्पोजिटी कुल की प्रमुख विशेषता है। जैसे- गेंदा, सेवन्ती, सूरजमुखी। 

कभी-कभी मुण्डक पुष्पक्रम का मुख्य अक्ष शाखित हो जाता है और प्रत्येक शाखा पर एक मुण्डक पाया जाता है, ऐसे पुष्पक्रम को संयुक्त मुण्डक कहते हैं। जैसे- इचीनोप्स इकीनेट्स।

निश्चित या ससीमाक्ष पुष्पक्रम 

वह पुष्पक्रम है, जिसमें पुष्पावली वृन्त या मुख्य अक्ष की अग्रस्थ कलिका पुष्प में परिवर्तित होकर इसकी वृद्धि को अवरुद्ध कर देती है। इस पुष्पक्रम में निम्नलिखित गुण पाये जाते हैं। 

  • पुष्पावली वृन्त की वृद्धि सीमित होती है, क्योंकि इसकी अग्रस्थ कलिका पुष्प का निर्माण कर देती है। इसी कारण इसे निश्चित पुष्पक्रम कहा जाता है।
  • इसमें नये पुष्प प्रौढ़ पुष्प (अग्रस्थ कलिका) के नीचे से उत्पन्न होते हैं । अत: पुराने तथा बड़े पुष्प ऊपर व नये तथा छोटे पुष्प नीचे की ओर स्थित होते हैं। इस प्रकार का क्रम तलाभिसारी क्रम कहलाता है।
  • इसमें पुष्पों के खिलने का क्रम केन्द्र से परिधि की ओर होता है। इस प्रकार का क्रम परिधिभिसारी क्रम कहलाता है।

ऐसा देखने में आता है कि यह पुष्पक्रम अनिश्चित पुष्पक्रम की अपेक्षा कम पुष्पों में पाया जाता है। पुष्पों के मुख्य अक्ष से निकलने के क्रम के आधार पर यह पुष्पक्रम निम्न प्रकार के हो सकते हैं-

(1) एकलशाखी -  वह निश्चित पुष्पक्रम है, जिसके मुख्य अक्ष के शीर्ष पर पहले एक पुष्प बनता है तथा इसके पार्श्व से पुन: एक शाखा निकलती है, जिस पर पुन: केवल निकलता है यही क्रम आगे चलता रहता है। चूँकि इस पुष्पक्रम में हर बार केवल एक ही एक ही पुष्प शाखा निकलती हैं, इस कारण इसे एकलशाखी पुष्पक्रम कहते हैं।

इस पुष्पक्रम के दो प्रकार हो सकते हैं

(i) कुण्डलाकार - इस प्रकार के एकलशाखी पुष्पक्रम में सारी पुष्प शाखाएँ एक ही ओर निकलती हैं, जबकि दूसरी तरफ इन पुष्पों के सहपत्र बनते हैं। आलू कुल के पौधों में यह पुष्पक्रम पाया जाता है। उदाहरण - आलू।

(ii) वार्छिक -इस प्रकार के पुष्पक्रम में पुष्पावली वृन्त की पार्श्व पुष्प शाखाएँ एकान्तर क्रम में बनती हैं अर्थात् पहली शाखा दायीं ओर, तो दूसरी शाखा बायीं ओर से निकलती है इस कारण इसका पुष्पीय अक्ष वक्रीय रूप में होता है। जैसे- कपास, रैननकुलस, ड्रॉसेरा इत्यादि।  

(2) द्विशाखी - वह पुष्पक्रम है, जिसमें पुष्पावली वृन्त की वृद्धि रुकने के बाद उसके नीचे की दोनों अभिमुखी पत्तियों के कक्ष से प्रत्येक बार दो नयी शाखाएँ निकलकर पुष्प का निर्माण करती हैं। इस पुष्प में बीच के अर्थात् पुराने पुष्प बड़े तथा किनारे अर्थात् नये हैं। 

चूँकि इस निश्चित पुष्पक्रम में हर बार दो शाखाएँ निकलती हैं, इस कारण इसे द्विशाखी या युग्मशाखी निश्चित पुष्पक्रम कहते हैं। जैसे- सागौन, चमेली, हरसिंगार, करौंदा, रात की रानी।

(3) बहुशाखी - इस निश्चित पुष्पक्रम में मुख्य अक्ष की वृद्धि रुकने के बाद इसकी पार्श्व पत्तियों से एक साथ दो से अधिक पुष्प निकलते हैं। इस पुष्पक्रम के बीच का पुष्प सबसे पुराना तथा बड़ा व किनारे के पुष्प नये एवं छोटे होते हैं। सामान्य रूप से देखने पर यह पुष्पक्रम छत्रक के समान दिखाई देता है। जैसे - आक, बोरहाविया।

(4) एकल अग्रस्थ  – वह निश्चित पुष्पक्रम है, जिसमें पुष्पावली वृन्त की शीर्षस्थ कलिका से पुष्प निकलने के बाद इसकी वृद्धि समाप्त हो जाती है तथा इसके पाश्र्व से कोई पुष्प नहीं निकलती है। जैसे- आर्जीमोन।

(5) एकल कक्षस्थ - वह निश्चित पुष्पक्रम है, जिसमें किसी पत्ती के कक्ष की कलिका की वृद्धि एक पुष्प बनाने के बाद समाप्त हो जाती है। अगला पुष्प प्ररोह की अगली शा की पत्ती के कक्ष से निकलता है। जैसे- गुड़हल

संयुक्त पुष्पक्रम वह पुष्पक्रम है, जिसमें पुष्पक्रम की मुख्य शाखा से कई शाखाएँ निकलती हैं और प्रत्येक शाखा पर एक स्वतन्त्र पुष्पक्रम होता है। अत: संयुक्त पुष्पक्रम में प्ररोह की मुख्य शाखा अर्थात् पुष्पावली वृन्त शाखित होता है। 

वास्तव में यह निश्चित अथवा अनिश्चित पुष्पक्रम ही है, लेकिन इसका मुख्य अक्ष विभाजित होता है । यह पुष्पक्रम निम्न प्रकार का हो सकता है।

2. संयुक्त पुष्पक्रम 

(a) संयुक्त रेसीम या पेनिकल - वह पुष्पक्रम है, जिसमें मुख्य पुष्पावली वृन्त शाखित होता है और प्रत्येक शाखा पर एक रेसीम पुष्पक्रम लगा होता है जैसे- नीम, गुलमोहर, अमलतास इत्यादि।

(b) संयुक्त स्पैडिक्स -वह पुष्पक्रम होता है जिसमें मुख्य अक्ष शाखित होता है। और प्रत्येक शाखा पर एक स्पैडिक्स पुष्पक्रम लगा होता है जैसे- नारियल।

(c) संयुक्त स्पाइक - वह अनिश्चित पुष्पक्रम है, जिसकी मुख्य शाखा विभाजित होती है और प्रत्येक शाखा पर एक स्पाइक पुष्पक्रम लगा होता है। जैसे- पालक। 

(d) संयुक्त कोरिम्ब - वह अनिश्चित पुष्पक्रम है, जिसमें कोरिम्ब पुष्पक्रम विभाजित पुष्पावली वृन्त (मुख्य अक्ष) पर लगे होते हैं। जैसे—फूलगोभी।

(e) संयुक्त छत्रक - वह अनिश्चित पुष्पक्रम है, जिसमें छत्रक पुष्पक्रम विभाजित पुष्पावली वृन्त पर लगे होते हैं। जैसे- सौंफ, धनिया। 

3. विशिष्ट पुष्पक्रम  

कुछ पौधों के पुष्पावली वृन्त संकुचित होकर विशिष्ट रूप ग्रहण कर लेते हैं, जिसके कारण उन पर पुष्प भी विशिष्ट क्रम में लगे प्रतीत होने लगते हैं। पुष्पों के ऐसे क्रम को विशिष्ट पुष्पक्रम कहते हैं। यह निम्नलिखित प्रकार का हो सकता है।

(a) कटोरिया - वह पुष्पक्रम है, जिसके सारे पुष्प सहपत्र युक्त होते हैं तथा इनके सहपत्र आपस में जुड़कर एक प्याले की आकृति बना देते हैं। इस प्याले को निचक्र कहते हैं। प्याले के मध्य में एक वृन्त के ऊपर केवल एक जायांग (अण्डप) लगा होता है, जो मादा पुष्प को व्यक्त करता है, जबकि इसका वृन्त मादा पुष्प का पुष्पवृन्त होता है। 

मादा पुष्प त्रिअण्डपी तथा युक्ताण्डपी होता है। मादा पुष्प प्याले के बाहर निकला होता है। जबकि नर पुष्प मादा पुष्प के चारों तरफ लगे होते हैं, जो केवल पुंकेसर के रूप में होते हैं। प्रत्येक नर पुष्प के आधार पर रोम के समान शल्की सहपत्र पाये जाते हैं एवं प्रत्येक पुंकेसर के पुतन्तु में एक जोड़ पाया जाता है। 

जो पुष्पासन को व्यक्त करता है, पुष्पासन के ऊपर का भाग पुतन्तु तथा नीचे का भाग पुष्पवृन्त के समान होता है। ये दो कारण ऐसे हैं, जो इस बात को प्रदर्शित करते हैं कि इसका पुंकेसर ही नर पुष्प है।

यह पुष्पक्रम यूफॉर्बिएसी कुल का विशिष्ट लक्षण है। यह पुष्पक्रम एक पुष्प के रूप में दिखाई देता है। वास्तव में यह एक प्रकार का ससीमाक्ष प्रकार का पुष्पक्रम है। 

जिसमें सबसे पहले मादा पुष्प के रूप में एक पुष्प बनता है, जो पहले परिपक्व होता है। नर पुष्प बाद में बनते हैं जो मादा पुष्प के चारों तरफ स्थित होते हैं । इस प्रकार पुष्पक्रम में तलाभिसारी क्रम पाया जाता है। जैसे— यूफॉर्बिया पल्चेरिमा। 

(b) उदुम्बरक - इसे मुण्डक का रूपान्तरण भी मानते हैं । वह पुष्पक्रम है, जिसमें पुष्पावली वृन्त संघनित होकर प्याले जैसी रचना रिसेप्टेकिल का निर्माण करता है, जो एक छिद्र ऑस्टीओल के द्वारा बाहर खुलती है। 

प्याले में ऑस्टीओल के चारों तरफ नर पुष्प लगे होते हैं, जबकि प्याले के केन्द्रक में मादा पुष्प स्थित होते हैं। नर तथा मादा पुष्पों के बीच कुछ बन्ध्य पुष्प भी स्थित होते हैं ।

ऑस्टीओल छोटे-छोटे शल्कों द्वारा घिरा रहता है । पुष्पों के परिपक्व होने पर कीट आस्टीओल से अन्दर जाकर कीट परागण करते हैं। जैसे- अंजीर, गूलर। 

(c) कूटचक्रक - वास्तव में यह पुष्पक्रम द्विशाखी ससीमाक्ष का ही संकुचित रूप है। इसमें तने की पर्वसन्धि पर दो अभिमुख पत्तियाँ पायी जाती हैं। जिनके कक्षों से द्विशाखी ससीमाक्ष पुष्प निकलते हैं जो हासित होकर वार्छिक ससीमाक्ष में बदल जाते हैं। चूँकि सभी पुष्प अवृन्ती होते हैं। 

इस कारण ये मिलकर एक कूटचक्र बना देते हैं, जो तने को चारों ओर से घेरता है। इसलिए इसे कूटचक्र कहा जाता है। यह पुष्पक्रम तुलसी कुल का प्रारूपिक पुष्पक्रम है। तुलसी, पोदीना, साल्विया इत्यादि में इस प्रकार का पुष्पक्रम पाया जाता है।

4. मिश्रित पुष्पक्रम 

वह पुष्पक्रम है, जिसमें मुख्य अक्ष (पुष्पावली वृन्त) पर अलग तथा इसकी शाखाओं पर अलग प्रकार का पुष्पक्रम पाया जाता है। दूसरे शब्दों में, इस पुष्पक्रम में एक ही मुख्य अक्ष पर दो अलगअलग पुष्पक्रम पाये जाते हैं। इसी कारण इसे मिश्रित पुष्पक्रम कहा जाता है। कुछ प्रमुख प्रकार के मिश्रित पुष्पक्रम निम्नानुसार है-

  • मिश्रित पैनिकल - इस पुष्पक्रम में मुख्य अक्ष असीमाक्षी होता है, जिस पर ससीमाक्षी संयुक्त रेसीम (पेनिकल) पुष्पक्रम की शाखाएँ लगी होती हैं। जैसे- लिंगस्ट्रम
  • मिश्रित स्पैडिक्स – उस पुष्पक्रम में मुख्य अक्ष असीमाक्षी होता है, जिस पर ससीमाक्षी पुष्पक्रम शाखाएँ अग्राभिवर्ती क्रम में लगी होती हैं। जैसे- केला, केले के पुष्पक्रम में अनेक साइमोज प्रकार के पुष्प (सीमित वृद्धि) अग्राभिवर्ती क्रम में अलग स्पेथ द्वारा ढँके रहते हैं। सबसे पीछे के पुष्प सबसे प्रौढ़ तथा आगे के पुष्प क्रमश: उम्र में छोटे होते जाते हैं। 
  • ससीमाक्ष छत्रक - प्याज व लैण्टेना में इस प्रकार का पुष्पक्रम पाया जाता है। यह पुष्पक्रम देखने में छत्रक समान दिखाई देता है, लेकिन यह अनेक ससीमाक्षी पुष्पों के पास-पास उगने से बनता है।
  • ससीमाक्ष कोरिम्ब - कुछ पौधों का पुष्पक्रम कोरिम्ब के समान दिखाई देता है, लेकिन यह वास्तव में ससीमाक्ष पुष्पों के विन्यसन से बना होता है। जैसे - इक्जोरा, होलारीना इण्टीडिसेण्टेरिका। 
  • थिरसस - अंगूर के पुष्प में ससीमाक्षी वृद्धि वाले अक्ष के ऊपर असीमाक्षी पुष्प विकसित होते हैं, इस प्रकार के पुष्पक्रम को थिरसस कहते हैं।